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178 दिन से अनशन कर रहे संत आत्मबोधानंद की 27 अप्रैल से जल का भी त्याग करने की चेतावनी

हरिद्वार.  अविरल निर्मल गंगा की मांग को लेकर हरिद्वार के मातृ सदन में 24 अक्टूबर 2018 से अनशनरत युवा संत आत्मबोधानंद ने अपने अनशन के 177वें दिन 18 अप्रैल सरकार को खुली चेतावनी दी कि यदि 25 अप्रैल तक तक सरकार नही मानी तो वह 27 से पानी भी छोड़ देंगे.

उन्होंने एक संक्षिप्त बयान में कहा कि ‘ चूँकि 177 दिनों के अनशन के बाद भी मेरी मांगों को न तो माना गया है और न ही मुझसे कोई वार्ता ही करने आया है ऐसी परिस्थिति में यदि 25 अप्रैल 2019 तक मेरी मांगें नहीं मानी जाती है तो 27 अप्रैल 2019 से मैं जल का भी त्याग कर दूँगा.’

माटू संगठन के विमलभाई और रामबीर राणा ने कहा कि संत आत्मबोधानंद जी के इस निर्णय के पीछे सरकार की पिछले 6 महीनो से उनकी मांगों के प्रति उपेक्षा है.  सरकार ने न उनसे कोई बात की न ही कोई लिखित ब्यान तक नही दिया. यह ना केवल अफसोस की बात है, वरन लोकतंत्र में संवैधानिक, नैतिक बल और आहिंसात्मक आंदोलनों को दरकिनार करने की शर्मनाक हरकत है.

विमल भाई ने कहा कि हम इस सरकारी मौन का पूरी तरह से निषेध करते हैं. 11 अक्टूबर 2018 को स्वामी सानंदजी ऋषिकेश में सरकारी अस्पताल में अपनी संदेहास्पद मृत्यु से पहले लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखते रहे जिसका प्रधानमंत्री ने कभी कोई जवाब नहीं दिया. उन्हीं की उपवास पद्धति को मानते हुए, उनकी मांगों की पूर्ति के लिए आज आत्मबोधानंद जी अपने जीवन को दांव पर लगा रहे हैं. इस सरकार ने ना सानंद जी से कोई सकारात्मक बात कि ना ही आत्मबोधानंद जी के साथ कोई संवाद किया है.

उन्होंने कहा कि स्वामी सानंद की मुख्य मांगे  साल भर से ज्यादा लटक रही है. गंगा एक्ट, गंगा भक्त परिषद, गंगा पर निर्माणाधीन प्रस्तावित बांधों पर रोक, गंगा पर खनन पर रोक व  वन कटान पर रोक आदि पर कोई ठोस सकारात्मक कदम सरकार ने आज तक नहीं उठाया.

चुनाव के समय में सरकार के पास यह आसान बहाना है कि आचार संहिता लागू है किंतु हरिद्वार में चल रहे भयंकर खनन और स्टोन क्रेशरो की वजह से गंगा पर बुरा असर हो रहा है. स्थानीय हरिद्वार प्रशासन अब तक के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेशों को लागू करने में असफल दिखता है.

विमल भाव ने कहा कि केंद्र सरकार ने गंगा पर कोई नए बांध नही बनेंगे, ऐसे कई बयान दिए. मगर खास करके खनन जिसको कि पुराने अदालती आदेशो, सरकारी अधिसूचना के साथ यदि प्रशासनिक सख्ती बरती जाती तो राज्य सरकार अपने स्तर पर भी रोक सकती है.  मगर खनन माफिया को रोकने में सरकारें पूरी तरह असफल क्यों दिखाई दे रही है ?

वास्तव में गंगा की अविरल प्रवाह और गंगा के गंगत्व को पुनः स्थापित करने के लिए उत्तराखंड में मंदाकिनी नदी पर सिंगोली-भटवारी, धौलीगंगा पर तपोवन-विष्णुगाड तथा अलकनंदा पर विष्णुगाड- पीपलकोटी परियोजनाओं को रोकना जरूरी हैं.  चूंकि फिलहाल ये तीनों परियोजना अभी निर्माणाधीन है। तथा सीधा गंगा के प्रवाह पर असर डालती है.  पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह जी की सरकार ने भागीरथीगंगा पर 4 निर्माणाधीन परियोजना रोकी थी. तब गंगा के लिए अपने आप को समर्पित कहने वाली भाजपा सरकार ने इन परियोजनाओं को क्यों नहीं रोका ? जबकि केंद्र राज्य को होने वाली प्रतिवर्ष होने वाली 12% मुफ्त बिजली के नुकसान को ग्रीन बोनस के रूप में दे सकती है जोकि 200 करोड़ से भी कम होगा.

उन्होंने कहा कि इन सब परिस्थितियों में ही युवा संत आत्मबोधानंद को ये कड़ा निर्णय लेना पड़ा है.  सरकार को किसी भी स्तर से आकर पहल करनी चाहिए. सरकार अपनी कथनी को लिखित रूप में लेकर आए। संत आत्मबोधानंद का जीवन बचना ही चाहिए.

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