आगा मीर सय्यद अब्बास हुसैन खोरासानी
उत्तराखंड के कोटद्वार जनपद में दीपक कुमार कश्यप उर्फ़ मोहम्मद दीपक ने धारा के विपरीत जाते हुए हमारे दौर की मुख्यधारा बजरंग दल का विरोध किया। ये विरोध उस मुस्लिम दुकानदार के लिए था, जिस को ज़बरदस्ती उसकी इच्छा के विपरीत बजरंग दल वाले मुख्यधारा में लाना चाहते थे।
ये घटना भारत की न ही पहली घटना है, और न ही आखिरी घटना है, जिसमें किसी ने साहस का प्रदर्शन करते हुए तथाकथित मुख्यधारा को निरुत्तर कर दिया हो। भारत का इतिहास ऐसे वीरों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपने दौर की मुख्यधारा का धता बताते हुए श्रेष्ठता कायम की। हमारे देश के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का साहस उस दौर की सबसे ताकतवर ब्रिटिश हुकूमत को नतमस्तक कर देता था। इसी क्रम में एक क्षेत्र है “दोआबा”, जिसकी ख्याति ही सैकड़ों सालों से मुख्यधारा को निष्प्रभावी करने की रही है | दोआबा का मतलब गंगा और यमुना नदी के बीच का इलाका जो इतिहासकार डब्लू० सी० बेंनेट के अनुसार सहारनपुर से लेकर वर्तमान प्रयागराज अथवा इलाहबाद में आकर समाप्त होता है। जिसे हम गंगा – जमुनी तहजीब कहते हैं, वो दरअसल इसी इलाके की हिन्दू – मुस्लिम एकता की साझी सांस्कृतिक विरासत है। पर ये एकता कोई बटन दबाने से नहीं आई। ये वक़्त की उस भट्टी में ढली है, जिसमे जालिमों के ज़ुल्म की आग धधक रही थी। ये उन परीक्षाओं से गुजरी है, जिसकी पहली शर्त ही कुर्बानी है। ऐसा ही एक ज़ालिम शासक था दिल्ली सल्तनत का मोहम्मद बिन तुगलक़।
जियाउद्दीन बरनी ने तारीख – ए – फिरोजशाही में बताया कि जिस हिसाब से टैक्स मोहम्मद बिन तुगलक़ ने लगाया, उसका लक्ष्य स्थानीय नेतृत्व को आर्थिक दबाव में लेना था। मनमाने तरीके से लगान कभी दस गुना तो कभी बीस गुना बढ़ा दिया जाता था। उस दौर मैं टैक्स लेने को तुगलक़ ने युद्ध बना दिया था | टैक्स कलेक्टर (उम्माल) किसानों को मारते थे, और बदले में किसान उन्हें मार देते थे तथा उस दौर के इडी / सीबीआई यानि अमीरान – ए – सदाह दोनों को मारते थे | जली फसलें, बर्बाद खेत और बदहाल किसान उस दौर की आम तस्वीर थी | इन सबका कारण मोहम्मद बिन तुगलक़ की नीतियां थी | हाल ये हो गया कि अभी तक भी किसी हुकूमत का ज़ालिम आदेश “तुगलकी फरमान” कहलाता है |
तुगलक़ ज़ालिम होने के साथ साथ डरपोक भी था | डरपोक इसलिए क्यूंकि उसने मंगोलों के भागे हुए राजकुमार तर्माशिरिन के खौफ से ही बतौर नजराने 5000 दीनार दे दिए। वह सिर्फ मंगोलों से नहीं स्थानीय राजाओं से भी डरता था, इसलिए उसने ऊपर वर्णित कर नीति अपनाई जिससे स्थानीय क्षत्रप असहज रहे। तुगलक़ ज़ालिम और डरपोक होने के साथ – साथ संकीर्ण भी था | वह इतना संकीर्ण था कि स्वयं को सुन्नी घोषित करके वो सूफियों और शियों को अपना मुस्लिम भाई मानने के बजाये दुश्मन मानता था | इसकी पराकाष्ठा ये थी कि उसने अपनी राज्य सत्ता का दुरूपयोग पैग़म्बर मोहम्मद (स.अ.व.) के वंशज – सैयदों के कत्लेआम के लिए किया | सीरत – ए – फिरोज्शाही बताती है कि बाद में राज्य नीति के तहत सूफियों और शिया समुदाय की किताबें जलाई गयी, और उनके विशेषज्ञों की बेइज्ज़त्ती और क़त्ल – ए – आम किया गया |
अब ज़िक्र उस दोआबा का जिसके विद्रोह ने तुगलक़ सल्तनत को हिला कर रख दिया | इस विद्रोह के तीन बड़े कारण थे | पहला 10 से 20 गुना लगान के साथ साथ दोआबा की जनता पर गृह कर (खरी) और चारागाह कर (चराई) थोप दिया गया था | दूसरा दोआबा सूफियों और सय्यदों के प्रभुत्व वाला क्षेत्र था, जिसे तुगलक़ ने अपने संकीर्ण मानसिकता के चलते निशाने पर लिया था | तीसरा ये कि बरनी के अनुसार अपनी कम निगाही से मोहम्मद बिन तुगलक़ ने 3,70,000 लोगों की एक “खुरासान आर्मी” का गठन किया था, जिसमे बड़ी संख्या में दोआबा के ही राजपूत और हिन्दुस्तानी सिपाही शामिल थे | बाद में इस सेना को ख़त्म कर दिया गया तथा इसका आर्थिक भार टैक्स के रूप मर दोआबा पर ही थोप दिया गया |
मनमाने तुगलकी फरमानों के विरोध में 1335 ई० तक छोटे छोटे विद्रोह हुए, जिसमे से ज़्यादातर दक्षिण में हुए | हांसी और सिरसा के गवर्नर सय्यद इब्राहीम ने 1336 – 37 में ज़ालिम हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया। सय्यद इब्राहीम ने शाही खजाना लूट लिया और बाद में स्वतंत्रता की उदघोषणा कर दी | इसको दबाने के लिए शाही सेना द्वारा आक्रमण कर उन्हें शहीद किया गया। तारीख कड़ा मानिकपुर (1916), तारीख आईने अवध (1880) एवं इतिहासकार डब्लू० इ० फोर्ब्स० द्वारा संकलित हिस्ट्री ऑफ़ ओउध फ्रॉम दी अर्लिएस्ट टाइम्स (1880) जैसी किताबें बताती है कि इन्ही सय्यद इब्राहीम के वंशजों में अमीर सय्यद मोहम्मद इस्माइल उर्फ़ बड़े मीर ने कड़ा – सुल्तानपुर में अपने खानदानी किले में 18 राजपूत क्षत्रपों को दो बार पनाह दी | बाद में इन्होने सन 1340 ई० में वर्तमान जनपद फतेहपुर के खागा तहसील में “बहेरा सादात” की स्थापना की, जो पुनः उस दौर में समस्त राजपूत और हिन्दू विद्रोहियों की पनाहगाह बनी।
महत्त्वपूर्ण है कि इसके पहले दोआबा के सादात और उनके साथियों की पनाहगाह वर्तमान जनपद कौशाम्बी के तहसील चायल के ग्राम कसिया का बड़ा इमामबाड़ा हुआ करता था, जिसकी स्थापना और देखभाल जैदी और नकवी सय्यद करते आ रहे थे, और जिसे 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों ने ढहा दिया। बाद में इसका पुनर्निर्माण हुआ, और ये आज भी स्थित है।
दोआबा में जिन मौकों पर दिल्ली का सुलतान हारा, उसमे सबसे उल्लेखनीय है उसके भाई मालिक मुबारक खान की मौत। दरअसल जब तुगलक़ ने खुरासान आर्मी को समाप्त किया, तो उसमे शामिल राजपूतों को टैक्स की छूट मिलनी बंद हो गयी और वो उसी दस – से बीस गुना लगान के घेरे में आ गए जिसमे पहले से बाकी के किसान पिस रहे थे। उस पर हद ये कि स्थानीय हिंदी क्षत्रपों को बुलाकर सुलतान ने या तो मार दिया या अँधा कर दिया। इन्ही अत्याचारों को तुगलक़ के समकालीन इतिहासकार बरनी ने “रस्म – ए – शिकार – रफ्त” (मनुष्य का शिकार) कहा है।
दोआबा में विरोध करने वालों में बड़ी संख्या हिन्दुओं की थी, और उसी में से 18 बड़े राजपूत राजाओं ने सय्यद मोहम्मद इस्माइल उर्फ़ बड़े मीर और उनके बेटे सय्यद शाह नुरुद्दीन उर्फ़ शाह नूर से शरण मांगी। इसी क्रम में बड़े मीर और शाह नूर ने तुगलकी फरमानों को जला दिया और विद्रोह का उद्घोष कर दिया। इस बाद उनकी सुलतान के भाई मुबारक खान से जंग हुई जिसमे तारीख में लिखा है कि 40 से भी कम सय्यदों ने तुगलक़ की 50,000 के लगभग सेना पर हमला कर दिया, और दोनों बाप बेटे, जिसमे विशेष तौर पर शाह नूर के शौर्य का वर्णन है, ने मुबारक खान को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद सुल्तान ने दोआबा में किसानों पर ज़ुल्म की इन्तहा कर दी लेकिन इन सब के बाद भी आज के समय सय्यद मोहम्मद इस्माइल उर्फ़ बड़े मीर और उनके बेटे सय्यद शाह नुरुद्दीन उर्फ़ शाह नूर की दरगाहों पर आने वाले लोग इस बात की निशानी है कि दोआबा की ज़मीन भाईचारे और साहस की वो अप्रतिम धरती है, जिसके आगे दिल्ली के सूरज, इतिहासकार डब्लू० सी० बेंनेट० के अनुसार एक बार नहीं बार – बार डूबा है।
दिल्ली सल्तनत के दौर में, अकबर और औरंगजेब के दौर में, और उसके बाद अंग्रेजों के दौर में दिल्ली की हुकूमत दोआबा के आगे झुकी है | इनमे दोआबा के प्रमुख नायकों जैसे शाह नूर के वंशज हकीम मीर सय्यद ज़फर अली खान व हकीम मीर सय्यद अमानत अली खान, जिन्हें क्रांति का शम्स – ओ – क़मर कहा गया, तथा सय्यद विलायत हुसैन, मौलवी लियाक़त अली, राजा इरादत जहाँ जैदी इत्यादि के प्रतिरोध की निर्णायक भूमिका रही।
(लेखक से संपर्क नक़ीब अल अशरफ़, ज़ैदी सादात, सरपरस्त, बड़ा इमामबाड़ा, 22 गाँव दोआबा, ग्राम – कसिया, तहसील – चायल, ब्लॉक – मूरतगंज, जनपद कौशांबी)

