विनोद जी, नासिर भाई और ज्ञान जी के जाने के सदमे से हम उबर ही रहे थे कि राजेंद्र कुमार जी चले गए। 16 जनवरी के सूर्योदय से पहले ही रात 2:00 बजे उन्होंने हम लोगों का साथ छोड़ दिया। इस दुनिया को अलविदा कह दिया। बीते एक साल से वे कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे। हर जगह से जवाब दे दिया गया था। फिर भी उनके अंदर की वह ताकत थी कि वह इस असाध्य बीमारी से जूझते रहे और लड़ते रहे। कोरोना के झटके को भी उन्होंने झेला था। इसी दौरान पत्नी का साथ छूटा। परन्तु जीवन की प्रत्याशा कम नहीं हुई थी।
राजेंद्र कुमार होना आसान नहीं है। वह मनुष्यों में मनुष्य, दोस्तों में दोस्त और साथियों में साथी थे। जब भी उन्हें देखता हूं उनमें ऐसा मनुष्य मिलता है जिसका इस स्वार्थी और ढुलमुल दौर में होना दुर्लभ सा लगता है। उनमें जहां वैचारिक दृढ़ता थी, वहीं व्यावहारिक लचीलापन, शालीनता और लोकतांत्रिकता थी। हमारे बीच वे सत्य, सौंदर्य, संवेदना और मनुष्यता के प्रतीक थे। कई बार तो यह भी लगता कि इस मतलबपरस्त दौर में ऐसा भी सादगी और सच्चाई से भरा मनुष्य हो सकता है क्या? जब उनके 75 वें साल पर इलाहाबाद में आयोजन हुआ था, उनकी सादगी और सरलता को लेकर डॉक्टर अली अहमद फातमी ने हल्के-फुल्के अंदाज में चुटकी भी ली थी। मार्क्सवादी शब्दावली में जिसे ‘डी-क्लास’ होना कहा जाता है, वैसा ही उनका जीवन आचरण था। मतलब विचारों में मार्क्सवादी वहीं जीवन व्यवहार में गांधीवादी। उन्होंने ‘सृजन सरोकार’ के गांधी अंक का संपादन भी किया था। अपने इन्हीं गुणों के कारण प्रगतिशील व जनवादी समाज में उनकी व्यापक स्वीकार्यता थी।
राजेंद्र कुमार के अंदर साहस और निर्भीकता का ही उदाहरण है कि जब यूएपीए के तहत सीमा आज़ाद और विश्वविजय को गिरफ्तार किया गया था तो पुलिस वाले राजेंद्र जी के घर भी पहुंच गए। उन्होंने ऑपरेशन ग्रीन हंट के खिलाफ इनके द्वारा निकाली गई पुस्तिका की भूमिका लिखी थी। इस पूछताछ का मकसद लोगों को डराना, ऐसा माहौल बनाना ताकि गिरफ्तार लोगों के पक्ष में लोगों को आने से रोका जा सके। राजेंद्र जी ने इस स्थिति का मुकाबला साहस के साथ किया और पुलिस के मकसद को विफल कर दिया। वे सीमा आज़ाद व विश्व विजय के साथ अर्थात सत्ता के इस दमन के खिलाफ मजबूती से खड़े थे बल्कि उनकी जेल डायरी की भूमिका भी लिखी। इस तरह का साहस साहित्यकारों में अपवाद स्वरूप ही देखने को मिलता है।
डॉ राजेंद्र कुमार का जन्म 24 जुलाई 1943 को कानपुर में हुआ था । अपनी मृत्यु के समय वे 83 वें वर्ष में थे। इलाहाबाद कर्म भूमि थी। एक लंबा समय उन्होंने यहां बिताया और यहां की सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक बन गए। उनके अंदर यह शहर धड़कता था। अपनी साहित्यिक-सामाजिक यात्रा को यहीं से आगे बढ़ाया और उसे एक नई ऊंचाई प्रदान की। उनकी ख्याति एक शिक्षक के साथ जाने-माने कवि और आलोचक के रूप में रही है।
राजेंद्र कुमार उन चुनिंदा कवियों में हैं जिन्होंने इमरजेंसी के दौरान सबसे मुखर होकर कविताएं रची थीं। अपनी ‘नकाबपोश’ कविता में कहते हैं ‘जो परदा हमने अपनी नंगी खिड़की पर टांगा था/ वह वहां नहीं है/ वह शहर के चेहरे पर है’। इस दौरान की लिखी कविताओं का संग्रह 1978 में ‘ऋण गुणा ऋण’ के नाम से आया जिसे चित्रलेखा प्रकाशन ने प्रकाशित किया था। बाद में उसका परिवर्धित संस्करण साहित्य भंडार से 2014 में आया। आपातकाल के काले दोनों और पत्र पत्रिकाओं पर सेंसर के कारण कई कविताएं अपने पहले संस्करण में मूल रूप में नहीं आ पाई थी। ‘बारिश से पहले का अंधेरा’ उन्हीं दिनों ‘धर्मयुग’ में छपी, जहां कई जगहों पर स्याही पोत दी गई थी। परिवर्धित संस्करण में वे मूल रूप में आईं।

राजेन्द्र कुमार के अन्य कविता संग्रह है ‘हर कोशिश है एक बग़ावत’, ‘लोहा लक्कड़’ आदि। वहीं ‘आईना द्रोह’ लंबी कविता है जो पुस्तिका के रूप में आई। ‘प्रतिबद्धता के बावजूद’, ‘शब्द-घड़ी में समय’, ‘यथार्थ और कथार्थ’, ‘कविता का समय’, ‘साहित्य में सृजन के आयाम और विज्ञानवादी दृष्टि’ आदि इनकी आलोचनात्मक कृतियां हैं। इलाचंद्र जोशी पर उन्होंने साहित्य अकादमी के लिए मोनोग्राफ लिखा। अनेक पुस्तकों का संपादन भी किया। वे हैं – ‘साही’ के बहाने समकालीन रचनाशीलता पर एक बहस, आलोचना का विवेक, प्रेमचंद की कहानियां : परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य, स्वाधीनता की अवधारणा और निराला आदि।
राजेंद्र कुमार ने कहानियां भी लिखी हैं और पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उन्होंने 1981 में ‘अभिप्राय’ पत्रिका निकाली जिसकी उन दिनों की प्रगतिशील साहित्य व विचार की पत्रिका रूप में पहचान थी। बाद में 2009-10 के आसपास महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की पत्रिका ‘बहुवचन’ का भी संपादन किया। वह कई सम्मानों से भी सम्मानित किए गए जैसे गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान, मीरा स्मृति सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सम्मान आदि। लेकिन सम्मानों से इतर और ऊपर का उनका व्यक्तित्व था। उनकी निर्मिति सृजन, विचार और संगठन से हुई थी।
राजेंद्र कुमार का जन संस्कृति मंच से जुड़ाव इसके शुरुआती समय से रहा है। 1986 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विज्ञान भवन में उत्तर प्रदेश इकाई का सम्मेलन हुआ था। इसके बाद जो इलाहाबाद इकाई बनी, उसके पहले अध्यक्ष बने। उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य इकाई के अध्यक्ष और उसके उपरांत 2015 में इसके 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन में राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई जिसका उन्होंने बखूबी निर्वहन किया । रायपुर (छत्तीसगढ़) में हुए 16 वें राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रतिरोध मार्च का नेतृत्व भी किया। कैंसर की बीमारी के बाद भी मंच को सृजन और विचार के स्तर पर कैसे सुदृढ़ और दिशाबद्ध किया जाए , यह उनकी चिंता और चिंतन में सर्वोपरि था।

राजेंद्र कुमार ने साहित्य और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया है लेकिन उनकी प्रिय विधा कविता रही है। 1963-64 से ही उन्होंने काव्य लेखन शुरू कर दिया था। अकवितावादी दौर का उनके ऊपर कोई प्रभाव नहीं हुआ। उस वक्त वे निराला और मुक्तिबोध से जुड़ते हैं। उनकी कविताओं से गुजरते हुए मुक्तिबोध याद आते हैं तो वह अकारण नहीं है। मुक्तिबोध कहते हैं ‘कोशिश है/ जीने की /जमीन में गड़कर भी’। मुक्तिबोध की कविताओं में विपरीतताओं के विरुद्ध जीने की जिजीविषा और संघर्ष है। राजेंद्र कुमार की कविताओं में इसका विस्तार मिलता है। यह ‘कोशिश’ अपने वर्ग चरित्र में अलग अर्थ और आयाम लिए हुए है। आमतौर पर मनुष्य के अंदर विविध किस्म की महत्वाकांक्षाएं जन्म लेती और विकसित होती हैं। उसका मन इच्छाओं-आकांक्षाओं के सागर में गोते लगाता है और उसे पाने के लिए तमाम तरह की कोशिशें करता है। अवसरवादी समझौते करता है। इसमें उसे सफलता मिलती है । वह असफल भी होता है।
राजेंद्र कुमार की ‘कोशिश’ इस कथित कोशिश से गुणात्मक रूप से भिन्न है। वह कहते हैं ‘कोशिश – हां, कोशिश ही तो कर सकता हूं।’ यह इस व्यवस्था के अंदर ‘क्षण में लघु, क्षण में विराट’ होने के गुण से पूर्ण ‘महावीरों’ से अलग है। कवि का ‘लघुता’ से साक्षात्कार का भाव अत्यंत सरल-सहज ही नहीं बल्कि यह मध्यवर्गीय संस्कारों से सर्वहारा संस्कारों में रूपांतरण का उसका कठिन आत्मसंघर्ष है। यहां कोई दंभ नहीं है बल्कि यह उनकी पहचान और प्रतिष्ठा का संघर्ष है जिनकी प्रार्थनाएं अनसुनी, व्यथा अनकही, उमंगे अनदिखी और आंसू अनछलके रह गए। कविता का यह केंद्रीय भाव है जो अपने को ‘सामानधर्माओं’ से जोड़ता है जो लगातार ऐसी ही कोशिश में लगे हैं। यह कोशिश बुनियादी बदलाव की है। इसमें निरंतरता है तथा अपने निजी प्रयासों को सामूहिक प्रयासों में रूपांतरण करना है। यही है राजेंद्र कुमार का अपने निज को सामाजिक में समाहित कर देने की कोशिश । उनकी यह कोशिश ‘चिड़िया’ की उस आंख की तरह है जिसके बारे में वह कहते हैं:
‘कोई भी आंख सिर्फ आंख नहीं होती
होती है पूरी की पूरी -एक दुनिया – भरी पूरी
कि सपने हर आंख की आत्मा होते हैं
कोई भी तीर
जिन्हें बेध नहीं सकता’।
अपने प्रिय साथी कवि-आलोचक राजेन्द्र कुमार को विनम्र श्रद्धांजलि।

