जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का मुख्य द्वार बंद नहीं, क़िलेबंद था, मानो किसी विदेशी सीमा पर दुश्मन सेना डेरा डाले खड़ी हो। लोहे की सलाखों के पार, पीली बैरिकेडों की कई परतों ने छात्रों और दिल्ली शहर के बीच एक नो-मैन्स-लैंड बना दिया था। रैपिड एक्शन फ़ोर्स के जवान, हेलमट और ढालों से लैस, उनके पीछे डटे खड़े थे, आँखों में शिकंजा, हाथों में लाठी। अंदर भीड़ जमा थी, हाथों में तख्तियाँ, यूजीसी समानता दिशानिर्देशों और रोहित अधिनियम की माँगों से सजी, कुलपति के कथित जातिवादी बयानों के ख़िलाफ़। उनके पास कोई हथियार नहीं था, केवल अपने तर्कों का बोझ, अपने अधिकारों का अहसास और संविधान में उनका अटूट विश्वास था। कुछ देर हवा में नारे गूँजते रहे, “हम क्या चाहते हैं? न्याय!” फिर राज्य ने अपना असली चेहरा दिखाया।
परिवर्तन इतना अचानक था कि साँसें थम गईं। वह चहल-पहल, वह जीवंतता, सब कुछ बूटों की कठोर थाप में, ढालों की धात्विक खनक में, और अंततः एक नियंत्रित, भयावह खामोशी में विलीन हो गया।
इक्यावन छात्र हिरासत में लिए गए, चौदह गिरफ़्तार हुए। उनमें थे: जेएनयूएसयू अध्यक्ष आदिति मिश्रा, उपाध्यक्ष गोपिका बाबू, संयुक्त सचिव दानिश अली, पूर्व अध्यक्ष नितीश कुमार, एआईएसए की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा। उन्हें अज्ञात स्थानों पर घसीट कर ले जाया गया, जैसे कोई मवेशियों को हाँकता है, चिकित्सा सहायता से वंचित रखा गया, उनकी चोटें पुलिस हिरासत के अंधेरे कमरों में सड़ने के लिए छोड़ दी गईं। खून से सनी कमीज़ें, टूटी हड्डियाँ, फटी आँखों से बहते आँसू, किसी ने नहीं देखे, किसी ने नहीं पूछे।
एक विवरण जो इस पूरे तमाशे की आत्मा को उजागर कर देता है, जो हड्डियों तक को चीर देता है: पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से बी.आर. अंबेडकर का चित्र छीन लिया। वही अंबेडकर, लाखों के मसीहा, संविधान के निर्माता, उस पवित्र ग्रंथ के रचयिता जो उन्हीं अधिकारों की गारंटी देता है जिनका प्रयोग ये छात्र कर रहे थे। पुलिस ने वह चित्र छीना और उसे क्षतिग्रस्त कर दिया। यह हाथापाई नहीं बल्कि प्रतीकों का हत्याकांड था। यह अपमान था, संदेश था, और चेतावनी भी “देखो, हम तुम्हारे नायकों को भी नहीं बख्शेंगे।“
विश्वविद्यालय तर्क-वितर्क के लिए बने हैं, विचारों के आदान-प्रदान के लिए, असहमति की प्रयोगशाला के लिए। राज्य के आदमी तब प्रवेश करते हैं जब तर्क असुविधाजनक हो जाता है, जब सवाल तीखे हो जाते हैं, और सत्ता की नींव हिलने लगती है।
यह बहस नहीं है कि हर प्रदर्शन रणनीति उचित है या नहीं बल्कि गहरा, अधिक पीड़ादायक सत्य यह है: छात्र असहमति को विशेष रूप से कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखे जाने का क्या अर्थ है? परिसर, जो सदियों से सामाजिक और राजनीतिक विचारों की प्रयोगशाला रहे हैं, अब विद्रोही क्षेत्र क्यों माने जाते हैं, जिन्हें सेना-शैली के अभियानों से शांत किया जाना चाहिए ? इक्यावन छात्रों को जातीय समानता की माँगों को लेकर शिक्षा मंत्रालय तक कूच करने के लिए हिरासत में क्यों लिया गया ? क्योंकि उन्होंने पूछा, क्यों हमारे शिक्षक नहीं हैं ? क्यों हमारे संसाधन सूख रहे हैं ? क्यों जाति आज भी हमारी पहचान पर भारी है ?

उत्तर उतना ही सरल है जितना कि भयावह : क्योंकि एक सरकार जो अपने ही लोगों से डरती है, उसे उन्हें जल्दी अनुशासित करना सीखना होगा, क्योंकि जब आपके पास युवाओं को देने के लिए बेरोज़गारी, पेपर लीक, भ्रष्टाचार और एक खोखली, बिकाऊ शिक्षा प्रणाली के अलावा कुछ नहीं बचता, तो उनके सवालों का जवाब देने का एकमात्र तरीका होता है बल, लाठी, गोली, हिरासत, केस।
लोकतंत्र असहमति को हमेशा सीधे प्रतिबंधित नहीं करते, वह बहुत स्पष्ट होगा, बहुत आसानी से पहचाना जाएगा, उन अदालतों में चुनौती दी जा सकेगी जो अभी भी, कभी-कभार, काम करती हैं, इसके बजाय, वे इसकी शर्तों को विनियमित करते हैं जैसे की बैरिकेडों, निगरानी, “सार्वजनिक व्यवस्था” की लचीली, तरल, हथियार बनाई जा सकने वाली भाषा और लाठी की उस भयावह, अदृश्य धमकी के माध्यम से, जब तक कि विरोध का कार्य स्वयं असाधारण साहस का कार्य न बन जाए और फिर वे प्रतीक्षा करते हैं, उस साहस के समाप्त होने की, उस आग के बुझने की।
छात्र प्रदर्शनकारी कोई नया विघटन या आकस्मिक उपद्रव नहीं है। काले आपातकाल के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरने वाले वे ही छात्र थे। मंडल आंदोलन की ज्वाला को हवा देने वाले वे ही थे। भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन, हाल ही में नौकरी कोटा के लिए हुए विशाल प्रदर्शन, कश्मीर में मानवाधिकारों के लिए उठी आवाज़ें, यह वंशावली समृद्ध, गौरवशाली, और अटूट है। विश्वविद्यालय ने हमेशा नागरिकता की प्रयोगशाला के रूप में कार्य किया है: असहमति व्यक्त करना सीखने का स्थान, संगठित होने का पाठ, सत्ता से जवाबदेही माँगने का अखाड़ा। बैरिकेड पर खड़ा छात्र कोई विसंगति नहीं वह लोकतंत्र की सबसे पुरानी, सबसे पवित्र परंपराओं का निर्वाह कर रहा है। उसे कुचलना स्वयं लोकतंत्र की जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना है।
वर्तमान शासन यह जानता है। वे इतिहास पढ़े हैं, यही कारण है कि वे उन्हें कुचलने के लिए इतने दृढ़, उत्साहित और निर्मम हैं।
संविधान का अनुच्छेद 19 (1 )(क) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, बिना किसी शर्त के, बिना किसी “परंतु” के। अनुच्छेद 19 (1)(ख) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के इकट्ठा होने के अधिकार की गारंटी देता है। ये राज्य की ओर से कोई उपहार या इनाम नहीं हैं जिन्हें वापस लिया जा सके। ये मौलिक अधिकार हैं, जन्मसिद्ध अधिकार हैं, जो राज्य से पहले आते हैं और उसकी वैधता को शर्तबद्ध करते हैं। उच्चतम न्यायालय ने बार-बार, अटल शब्दों में कहा है कि विरोध का अधिकार एक जीवंत लोकतंत्र का अपरिहार्य हिस्सा है। शाहीन बाग़ मामले में भी, जहाँ न्यायालय ने विरोध के अधिकार को आवागमन के अधिकार के साथ संतुलित किया, उसने कभी भी क्रूर बल, अंधाधुंध लाठीचार्ज, या अमानवीय हिरासत को मंज़ूरी नहीं दी, उसने संवाद का आह्वान किया, बातचीत का, समझौते का।
लेकिन ये गारंटियाँ “सार्वजनिक व्यवस्था” की उस लचीली, अस्पष्ट, असीम रूप से विस्तार योग्य भाषा के साथ निरंतर तनाव में हैं और इस तनाव को सत्ता अपने पक्ष में मोड़ लेती है।

कानपुर। प्रणवीर सिंह इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी। एक युवा छात्र, प्रखर नाम का एक साधारण युवक, परिसर में लापरवाही से चल रही जेसीबी मशीन से टकराकर मर गया। उसकी मौत एक दुर्घटना थी, जो प्रशासनिक उदासीनता और लापरवाही की गहरी खाई से उपजी थी। छात्रों की प्रतिक्रिया, “प्रखर के लिए न्याय” के नारे, जवाबदेही की माँग, वैध आक्रोश की पुकार थी, एक मरे हुए साथी के प्रति अंतिम श्रद्धांजलि। उन्हें क्या मिला? लाठीचार्ज, प्रांतीय सशस्त्र पुलिस बल की तैनाती। एकमात्र हिंसा वह थी जो पहले ही उनके दोस्त को मार चुकी थी बाकी सब तो सिर्फ सवाल थे। पुलिस ने लाठीचार्ज से इनकार किया। वे हमेशा इनकार करते हैं, हमेशा लेकिन वे खून से सनी तस्वीरें, वे भागते हुए छात्र, वे ज़मीन पर पड़ी लाठियाँ झूठ नहीं बोलतीं, ये चीखती हैं।
नवंबर 2025 , इंडिया गेट। दिल्ली की ठंडी हवा में ज़हर घुला हुआ था, वायु प्रदूषण ने शहर को एक गैस चैंबर में बदल दिया था। छात्र सड़कों पर उतरे, पर यह विरोध किसी राजनीतिक दल का या किसी मज़हबी एजेंडे का नहीं था। यह साँस लेने के अधिकार के लिए था, जीने के अधिकार के लिए, एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के ख़िलाफ़, जो हर साल हजारों को मारता है। पुलिस प्रतिक्रिया त्वरित और नाटकीय थी। अनुमति नहीं थी, यही मुख्य आरोप था। झड़पें हुईं। पुलिस ने मिर्च स्प्रे के इस्तेमाल का आरोप लगाया और सीधे चेहरे से तेईस छात्रों पर मुकदमा दर्ज कर दिया। आरोपों की सूची में था “महिलाओं पर हमला” और, यह सबसे चौंकाने वाला था, भारतीय न्याय संहिता की धारा १९७: “राष्ट्रीय एकता के लिए पूर्वाग्रहपूर्ण अभिकथन।” क्यों? क्योंकि किसी ने कान लगाकर सुना कि किसी ने किसी माओवादी नेता के समर्थन में नारे लगाए, एक आरोप जिसे छात्रों ने हर मंच पर, हर अदालत में खारिज किया। सार्वजनिक व्यवस्था की लचीली भाषा एक पर्यावरणीय विरोध को राजद्रोह के साथ जोड़ने के लिए इतनी फैल गई कि स्वच्छ हवा की पुकार राष्ट्र-विरोधी गतिविधि बन गई।
जनवरी 2026, वाराणसी। प्रधानमंत्री का अपना निर्वाचन क्षेत्र। एनएसयूआई के छात्र मनरेगा के प्रतिस्थापन के ख़िलाफ़ मार्च कर रहे थे, एक ऐसा कानून जो ग्रामीण भारत की रीढ़ था, जिसे बदलने से करोड़ों मज़दूरों की रोज़ी-रोटी छिन जाने का ख़तरा था। विरोध शांतिपूर्ण, संवैधानिक, और लोकतांत्रिक अधिकारों का एक आदर्श उदाहरण था। फिर भी प्रतिक्रिया एक क्रूर, बेरहम लाठीचार्ज थी, जो वीडियो में कैद हुई, पुलिसकर्मी एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर लाठियाँ बरसा रहे थे, उन्हें घसीट रहे थे, गिरा रहे थे। संदेश स्पष्ट था, असहमति के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं है, कोई अभयारण्य नहीं है। अपने मालिक के पिछवाड़े में भी नहीं।
मुंबई। विवेक कॉलेज। तीन युवा छात्राएँ, हिजाब में, नकाब में उनके चेहरे ढके हुए थे, पर उनका विवेक खुला हुआ था। कॉलेज प्रशासन ने नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने बिना अनुमति के, मौन विरोध किया, अपने विश्वास के लिए, अपनी पहचान के लिए। उनका यह विवेक का कार्य आपराधिक करार दिया गया। भारतीय न्याय संहिता की धाराएँ चल पड़ीं। तीन छात्राएँ, जिनका अपराध केवल यह था कि उन्होंने एक प्रशासनिक आदेश को चुनौती दी, अब आपराधी बन गईं।
जेएनयू छात्रों के ख़िलाफ़ दर्ज प्राथमिकी इस आपराधिकीकरण की पूरी कहानी बयाँ कर देती है। धाराएँ: 221 (लोक सेवक को बाधा पहुँचाना), 121 (1) (लोक सेवक को कर्तव्य से रोकने के लिए स्वेच्छा से चोट पहुँचाना), 132 (लोक सेवक को रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल), 3 (5) (सामान्य इरादा) ये सब भारतीय न्याय संहिता की धाराएँ हैं, जिनमें से प्रत्येक में लंबी जेल की सज़ा का प्रावधान है। गंभीर आरोप, बहुत गंभीर।
धारा 121(1) पर गौर करें। इसके लिए सिद्ध इरादा चाहिए, लोक सेवक को उसके कर्तव्य से रोकने का इरादा। उन छात्रों का क्या इरादा था जिन्होंने एक बंद गेट को खोला ? शिक्षा मंत्रालय तक मार्च करना, अपनी माँगें रखना, अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग करना। उस गेट को बंद करने वाली पुलिस का क्या इरादा था? उन छात्रों को रोकना, उनकी आवाज़ को दबाना, उनके अधिकारों का हनन करना। तो बताइए, असली अपराधी कौन है ? असली इरादा किसका आपराधिक है ?
कानून एक उपकरण है, लोकतंत्र के हाथों में, यह अधिकारों की रक्षा के लिए एक ढाल है जो सत्तावाद के हाथों में, उन्हीं अधिकारों को कुचलने के लिए एक तलवार बन जाता है।
27 फ़रवरी 2026, सुबह 10:50। पटियाला हाउस कोर्ट। न्यायाधीश ने 14 छात्र-छात्राओं को 25,000 रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दे दी। राहत की एक लहर दौड़ी पर पुलिस ने न्यायिक हिरासत की माँग की थी “पिछली प्राथमिकियों” के आधार पर। पिछली प्राथमिकियाँ! यानी उनके पास असहमति का इतिहास है, वे पहले भी सवाल पूछ चुके हैं, इसलिए वे “बार-बार अपराधी” हैं, इसलिए उन्हें बिना जमानत के जेल में रखा जाना चाहिए। यही वह तर्क है, वही सत्तावादी चाल, जो हर तानाशाही में इस्तेमाल होती है।

अदालत ने जमानत दे दी। व्यवस्था ने, इस बार, बमुश्किल काम किया लेकिन संदेश तो जा चुका था: तुम्हें गिरफ़्तार किया जाएगा, तुम एक रात हिरासत में बिताओगे, तुम्हारे ख़िलाफ़ गंभीर आरोप लगेंगे, तुम्हें एक वकील ढूँढना होगा, तुम्हें पैसे जुटाने होंगे, तुम्हें बांड भरने होंगे। असहमति की कीमत की गणना सटीकता से की गई है, और उसे इतना अधिक रखा गया है कि आम आदमी उसे वहन न कर सके।
बल कभी केवल नियंत्रण के लिए नहीं होता; वह हमेशा एक प्रदर्शन होता है, एक तमाशा होता है। पुलिसिंग का यह दृश्य तमाशा, परिसर में अर्धसैनिक बलों की तैनाती, गेटों को जंजीरों से बंद करना, गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज करना, यह सब तत्काल विरोध को दबाने से कहीं आगे का संदेश भेजता है। यह संदेश हर उस छात्र को जाता है जो उस दिन घर पर बैठा था, हर उस प्रोफेसर को जो अपनी कुर्सी पर सहम गया था, हर उस नागरिक को जो अखबार पढ़ रहा था।
26 फ़रवरी, जेएनयू। पुलिस ने छात्रों के आने से पहले ही मुख्य द्वार को जंजीरों से बंद कर दिया, बैरिकेडों की कई परतें खड़ी कर दीं, और रैपिड एक्शन फोर्स, दंगा नियंत्रण के लिए प्रशिक्षित एक विशेष अर्धसैनिक इकाई, को तैनात कर दिया। निहत्थे छात्रों के सामने, जिनके हाथों में केवल तख्तियाँ थीं, कागज़ के टुकड़े थे। वे प्रतीक्षा करते रहे, शिकार की प्रतीक्षा करते शिकारी की तरह। जब छात्रों ने “सामूहिक प्रयास” से वह गेट खोला, तो पुलिस झपट पड़ी। पचास से अधिक छात्रों को हिरासत में लिया गया। अज्ञात स्थानों पर ले जाया गया। चिकित्सा सहायता से वंचित रखा गया। महिला छात्राओं को पुरुष अधिकारियों ने पकड़ा, उनके बाल नोचे, उन्हें अनुचित तरीके से छुआ, उन कानूनों का खुला उल्लंघन जो महिलाओं के ख़िलाफ़ पुरुष पुलिसकर्मियों की कार्रवाई पर रोक लगाते हैं।
पुलिस का कथन: पच्चीस पुलिसकर्मी घायल हुए, प्रदर्शनकारियों ने उन्हें काटा, उन पर जूते फेंके।
छात्रों का कथन: शांतिपूर्ण मार्च, क्रूर, अमानवीय दमन।
जेएनयू शिक्षक संघ ने एक ऐतिहासिक बयान जारी किया: “आज की पुलिस कार्रवाई का एकमात्र उद्देश्य छात्रों को उनके लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करने से रोकना था, चाहे कुछ भी हो जाए। ऐसे मार्चों पर प्रतिबंध लगाना, और फिर मार्च करने वालों पर मुकदमा चलाना, और उनके ख़िलाफ़ अत्यधिक बल का उपयोग करना, यह दिल्ली पुलिस की मानक कार्यनीति बन गई है। यह कानून प्रवर्तन का साधन नहीं, बल्कि सत्तावाद और संवैधानिक रूप से गारंटिकृत लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन का साधन बन गया है।”
अगस्त 2025, रामलीला मैदान। हजारों युवा एसएससी अभ्यर्थी, शिक्षक, माता-पिता पेपर लीक और भर्ती भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे। उनका भविष्य उसी प्रणाली द्वारा चुराया जा रहा था जिसने उन्हें अवसर का वादा किया था। परीक्षाएँ रद्द, भर्तियाँ रुकीं, युवाओं के सपने चकनाचूर। शाम ५ बजे की समय सीमा के बाद जब 100 से अधिक प्रदर्शनकारियों ने तितर-बितर होने से इनकार किया, तो दिल्ली पुलिस ने वही किया जो उसने हमेशा किया है: “क्रूर लाठीचार्ज।” वीडियो में छात्र भाग रहे हैं, गिर रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, और पुलिस उनके पीछे दौड़ रही है, लाठियाँ बरसा रही है। संदेश पत्थर की लकीर की तरह स्पष्ट था,: तुम्हारा भविष्य चुराया जा सकता है, तुम्हारे सपने तोड़े जा सकते हैं, लेकिन यदि तुम विरोध करने का साहस करते हो, तो तुम्हारा शरीर इसकी कीमत चुकाएगा।
सबसे प्रभावी और सबसे खतरनाक दमन, वह है जिसे फिर कभी इस्तेमाल करने की आवश्यकता नहीं होती। शारीरिक बल से भी अधिक शक्तिशाली है प्रशासनिक नियंत्रण का वह जाल जो चुपके-चुपके बुना जाता है।
17 फरवरी 2026 , दिल्ली विश्वविद्यालय। एक अधिसूचना जारी हुई, स्याही से लिखा एक साधारण कागज़: एक महीने के लिए परिसर में सभी विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध। प्रॉक्टर कार्यालय ने पाँच या अधिक व्यक्तियों की किसी भी शांतिपूर्ण सभा पर रोक लगा दी। किरोड़ी मल कॉलेज, दयाल सिंह कॉलेज ने पाबंदियाँ और सख्त की, निलंबन की चेतावनी, निष्कासन की धमकी, सोशल मीडिया पर सामग्री साझा करने पर भी रोक। एक छात्र, उदय भदौरिया, ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। उसकी याचिका में कहा गया कि यह व्यापक निषेध संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का खुला उल्लंघन है, असंगत है, और शैक्षणिक प्रवचन पर एक ठंडा, मारक प्रभाव डालता है। 24 फरवरी को, न्यायालय ने नोटिस जारी किया। सुनवाई 10 मार्च को होगी। तब तक, खामोशी छाई रहेगी।
इंडिया गेट मामले में, पुलिस ने 22 छात्रों के मोबाइल फोन जब्त कर लिए। उन्होंने 340 से अधिक सदस्यों वाले एक सप्ताह पुराने व्हाट्सएप ग्रुप के हर संदेश को छाना, हर शब्द को परखा, हर इमोजी को नोट किया, एक “योजनाबद्ध साजिश” का पता लगाने के लिए। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा: “यह समूह अवैध गतिविधियों की योजना बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया प्रतीत होता है।” छात्रों के वकील ने समझाया: “मेरा मुवक्किल एक साधारण द्वितीय वर्ष का छात्र है। उसने एक व्हाट्सएप संदेश देखा, उसमें लिखा था, ‘इंडिया गेट चलो, वायु प्रदूषण के ख़िलाफ़’, और वह चला गया। बस इतना ही।” फिर भी, पुलिस हिरासत मिल गई। एक चिंतित नागरिक के डिजिटल पदचिह्न, उसके फोन के सिग्नल, उसके संदेशों के टाइमस्टैम्प ये सब अब एक आपराधिक साजिश के प्राथमिक साक्ष्य बन गए। यह नई सीमा है, नया युद्धक्षेत्र है।

पर यह तस्वीर और भी गहरी और स्याह है। हिंसा एकतरफा नहीं है, और राज्य का रवैया कभी तटस्थ नहीं रहा।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र इकाई, देश भर के परिसरों में एक खुली, बेशर्म दण्ड से मुक्ति के साथ काम करती है। एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने एक साक्षात्कार में कहा था: “एबीवीपी को परिसर में पूर्ण संरक्षण प्राप्त है, उसने एक प्रकार की तानाशाही बना रखी है। वे पूरे परिसर में ऐसा माहौल बनाते हैं कि वे कुछ भी कर सकते हैं, और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं होता।” कुलपति उनके दबाव में काम करते हैं, संकाय उनके प्रभाव में लिखता-पढ़ता है, और जब कभी हिंसा भड़कती है, तो वामपंथी छात्र ही होते हैं जिन्हें हिरासत में लिया जाता है, निलंबित किया जाता है, और आपराधिक आरोपों का सामना करना पड़ता है।
24 फरवरी 2026 , अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलुरु। एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने, कुछ अन्य लोगों के साथ, परिसर में धावा बोल दिया। उनका आरोप था कि एक कार्यक्रम में कश्मीर में महिलाओं के मुद्दों पर चर्चा हो रही है, जो “अलगाववाद” को बढ़ावा देता है और भारतीय सेना का अपमान करता है। वह कार्यक्रम ‘स्पार्क रीडिंग सर्कल’ नामक एक छात्र समूह द्वारा आयोजित किया गया था। उसका विषय था: 23 फरवरी 1991 को कुपवाड़ा के कुनन और पोशपोरा गाँवों में भारतीय सेना के जवानों द्वारा महिलाओं के साथ कथित सामूहिक बलात्कार पर चर्चा। यह एक ऐतिहासिक घटना थी, एक काला अध्याय, जिस पर बात करना हर नागरिक का अधिकार है।
एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने जबरन परिसर में प्रवेश किया, चर्चा को बीच में ही रोक दिया, विश्वविद्यालय की संपत्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया, जिसमें विश्वविद्यालय का नाम बोर्ड भी शामिल था, और एक छात्र और छह सुरक्षा गार्डों पर हमला कर दिया। और यह सब करते हुए वे चिल्ला रहे थे: “राष्ट्र-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी!”
प्रतिक्रिया क्या थी ? पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की, 18 से 21 एबीवीपी कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया, और सुबह लगभग 3:30 बजे उन सभी को जमानत मिल गई। गृह मंत्री ने कहा: “जबरन प्रवेश और व्यवधान अस्वीकार्य है।” बस इतना भर।
अब तुलना करें। जेएनयू में, पुलिस आरएएफ के साथ आई, गेटों को जंजीरों से बंद किया, पचास से अधिक छात्रों को हिरासत में लिया, उन्हें रात भर बिना चिकित्सा सहायता के रखा, उन पर कई गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया। अज़ीम प्रेमजी में, विरोध परिसर के भीतर ही सीमित रहा, पुलिस ने बाहर “एहतियात” के तौर पर निगरानी रखी, और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं को घंटों के भीतर जमानत मिल गई।
अंतर इतना स्पष्ट, इतना चौंकाने वाला, इतना निंदनीय है कि शब्द कम पड़ जाते हैं। जब एबीवीपी हमला करती है, तो वह एक “विरोध” है, जमानत योग्य, सौम्य पुलिस निगरानी का हकदार। जब वामपंथी छात्र मार्च करते हैं, तो वह एक “साजिश” है, अर्धसैनिक बल, रात भर की हिरासत, और हफ्तों की न्यायिक कस्टडी का हकदार।
25 फरवरी को एक और झटका लगा। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय ने एक और पुलिस शिकायत दर्ज कराई, इस बार एबीवीपी के हमलावरों के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि स्पार्क रीडिंग सर्कल से जुड़े अपने ही छात्रों के ख़िलाफ़। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने शिकायत में कहा कि छात्रों की सोशल मीडिया गतिविधि (कुनन-पोशपोरा पर एक इंस्टाग्राम पोस्ट) ने “वैमनस्य पैदा किया,” और कार्यक्रम बिना आधिकारिक अनुमति के आयोजित किया गया था। पुलिस ने तुरंत आईटी अधिनियम की धारा 66 ई, 67 और बीएनएस की धारा 229 के तहत मामला दर्ज कर लिया।
जिन छात्रों ने एक ऐतिहासिक मानवाधिकार मुद्दे पर चर्चा का आयोजन किया था, वे अब उन्हीं गुंडों के साथ आरोपों का सामना कर रहे हैं जिन्होंने उनके परिसर में तोड़फोड़ की, उनके साथियों पर हमला किया। यही वह समरूपता है जो उत्पीड़क हमेशा रचता है: जब दोनों पक्षों को दोषी ठहराया जाता है, तो शक्ति वाला पक्ष हमेशा, हमेशा जीतता है।
उसी दिन, 24 फरवरी को, लखनऊ विश्वविद्यालय में एक और तमाशा हुआ। एबीवीपी, विश्व हिंदू परिषद, और बजरंग दल के कार्यकर्ता लाल बारादरी के ऐतिहासिक परिसर में हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहते थे। उनका आरोप था: मुस्लिम छात्रों को यहाँ नमाज़ पढ़ने की अनुमति है, पर हिंदू छात्रों को अपनी प्रार्थनाओं के लिए जगह नहीं मिलती। पुलिस प्रतिक्रिया तत्काल और भारी थी: तीन पलटनें प्रांतीय सशस्त्र पुलिस बल की तैनात, कई प्रदर्शनकारी हिरासत में। उपमुख्यमंत्री ने “कानून-व्यवस्था” बनाए रखने का वादा किया।
मुद्दा यह नहीं है कि एबीवीपी को बख्शा जाना चाहिए, मुद्दा यह है: राज्य की दमनकारी शक्ति एक उपकरण है, और उसे चुनिंदा रूप से, सटीकता से इस्तेमाल किया जाता है। जब एबीवीपी निशाने पर होती है, तो वह “कानून-व्यवस्था” का मामला होता है। जब वामपंथी छात्र निशाने पर होते हैं, तो वह युद्ध होता है। जब विरोध हिंदू प्रार्थनाओं के लिए होता है, तो पुलिस आगे बढ़ती है, सख्ती दिखाती है। जब विरोध जातीय समानता के लिए होता है, तो गेट बंद कर दिए जाते हैं, लाठियाँ चलती हैं। यह मुखौटा, यह दोहरा चेहरा, अब गिर रहा है।
इस सबका सबसे भयावह, सबसे गहरा परिणाम है, असहमति के आंतरिक जीवन का क्षरण। एक विशिष्ट, जहरीला भय धीरे-धीरे जड़ें जमा लेता है। जब आप जानते हैं कि आपको हर पल फिल्माया जा रहा है, आपका हर कदम रिकॉर्ड किया जा रहा है, आपका हर संदेश सुरक्षित किया जा रहा है। जब आप किसी सभा में शामिल होने से पहले झिझकते हैं, किसी नारे को दोहराने से पहले सोचते हैं, किसी याचिका पर हस्ताक्षर करने से पहले डरते हैं। जब आत्म-सेंसरशिप एक सचेत विकल्प नहीं, बल्कि एक अचेतन उत्तरजीविता वृत्ति बन जाती है।
जेएनयू विरोध के एक छात्र ने, उन भयावह घंटों के बाद, एक पत्रकार से कहा : “पुलिस ने हमारे छात्रों को उनके बालों से घसीटा। लड़कियाँ चिल्ला रही थीं, और पुरुष अधिकारी उन्हें पकड़ रहे थे, छू रहे थे, अनुचित तरीके से। हमने एम्बुलेंस माँगी, किसी ने नहीं सुनी। हम केवल विरोध करना चाहते थे, बस इतना ही। और अब हमारे कई साथी जेल में हैं।”
यही बल का सबसे शांत, सबसे प्रभावी परिणाम है। लोकतंत्र का धमाकेदार पतन नहीं, बल्कि भाग लेने की इच्छाशक्ति का धीमा, स्थिर, अदृश्य क्षरण। उत्साह, आक्रोश, साहस, सब कुछ धीरे-धीरे थकान में बदल जाता है। सक्रियता की जगह उदासीनता ले लेती है। विरोध के तितर-बितर होने के बाद उस खाली परिसर में जो खामोशी छा जाती है, वह सिर्फ शांति नहीं है। वह नागरिकता के आत्मसमर्पण की आवाज़ है, अंदर की ओर हटने की आहट है, खिड़कियाँ बंद करने और चुप रहना सीखने की करुण कहानी है।
जेएनयू शिक्षक संघ ने अपने ऐतिहासिक बयान में ठीक ही कहा था: “ऐसे मार्चों पर प्रतिबंध लगाना, मार्च करने वालों पर मुकदमा चलाना, और उनके ख़िलाफ़ अत्यधिक बल का उपयोग करना—यह सब दिल्ली पुलिस की मानक कार्यनीति बन गई है। यह अब कानून प्रवर्तन नहीं है, यह सत्तावाद है, और संवैधानिक रूप से गारंटिकृत लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन है।”
जब पुलिस, जो हमारी रक्षक है, सत्तावाद का साधन बन जाती है, तो लोकतंत्र कभी भी किसी एक धमाके से नहीं मरता। वह चुपचाप, धीरे-धीरे, एक लंबी, दर्दनाक आह भर कर मरता है। और वह आह हम में से हर उस व्यक्ति की आवाज़ है, जो घायल, टूटा-फूटा, यह निर्णय ले रहा है कि शायद, अब और नहीं।
यह वह सवाल है जो यह सरकार कभी नहीं चाहेगी कि कोई पूछे: आखिर किस तरह का नागरिक पैदा होता है, किस तरह की पीढ़ी तैयार होती है, जब असहमति ही खतरनाक, आपराधिक, और जानलेवा लगने लगे ?
विश्वविद्यालय का अर्थ है जोखिम लेने वाले विचार, रूढ़ियों को चुनौती देने वाले प्रश्न, असहमति से रचनात्मक ढंग से निपटना सीखने का अभ्यास। उसका अर्थ है ऐसे नागरिक तैयार करना जो तर्क कर सकें, जो संगठित हो सकें, जो शांतिपूर्वक सत्ता को जवाबदेह ठहरा सकें। यही उदार शिक्षा का सबसे बड़ा वादा है, यही लोकतांत्रिक नागरिकता की अटल नींव है।
यदि वही स्थान एक निगरानी वाला क्षेत्र बन जाता है, जहाँ छात्र रोज़ सीखते हैं कि बोलना, सवाल पूछना, विरोध करना, ये सब एक भारी व्यक्तिगत, व्यावसायिक और कानूनी कीमत वसूलते हैं, तो हम केवल कुछ विद्रोही व्यक्तियों को दंडित नहीं कर रहे। हम एक पूरी पीढ़ी को इस तरह ढाल रहे हैं कि वह लोकतंत्र को एक भागीदारीपूर्ण परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि एक दर्शक खेल के रूप में देखे। जहाँ वह केवल देखे, ताली बजाए, या चुपचाप सहमा रहे।
जो छात्र विरोध को लाठी की उस क्रूर थपकी के साथ जोड़ना सीख जाता है, जो यह जान जाता है कि एक व्हाट्सएप संदेश उसे आजीवन आपराधिक रिकॉर्ड दे सकता है, जो यह डर सीख लेता है कि अज्ञात गुंडे कभी भी उसका अपहरण कर सकते हैं, वह छात्र अधिक निष्क्रिय नागरिक नहीं बनता। वह एक गहरा निंदक बन जाता है, जो उन सभी संस्थाओं से स्थायी रूप से अलग हो चुका है जो उसका प्रतिनिधित्व करने का दावा करती हैं।
एक निंदक नागरिक किसी भी सत्तावादी शासन के लिए सबसे कीमती उपहार होता है क्योंकि निंदक वोट नहीं देते, निंदक संगठित नहीं होते, निंदक कभी सड़कों पर नहीं उतरते। वे बस घर पर बैठे रहते हैं, समाचार चैनलों पर बहस देखते हैं, और दुनिया को जलता हुआ देखकर अपनी साँसों में बड़बड़ाते रहते हैं।
यही असली मंशा है।
सरकारें हमेशा यह तर्क देंगी, यह उनका पुराना ढर्रा है: विरोध प्रदर्शन हिंसक हो सकते हैं, भीड़ उग्र हो सकती है, और राज्य का पहला कर्तव्य सुरक्षा और शांति बनाए रखना है। यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं है, इसे स्वीकार किया जाना चाहिए।
कानपुर में, गुस्साई भीड़ ने कॉलेज की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया। जेएनयू में, पुलिस ने दावा किया कि प्रदर्शनकारियों ने उन पर बैनर, लाठियाँ और जूते फेंके, और उनके पच्चीस अधिकारी घायल हुए। अज़ीम प्रेमजी में, एबीवीपी ने आरोप लगाया कि स्पार्क रीडिंग सर्कल “कश्मीर से फिलिस्तीन तक” जैसे नारे लगा रहा था और उमर खालिद जैसे लोगों का खुलकर समर्थन कर रहा था।
हाँ, प्रदर्शन गड़बड़ होते हैं, भावनाएँ उबलती हैं, कभी-कभी संपत्ति क्षतिग्रस्त हो जाती है, कभी-कभी लोग आहत हो जाते हैं, राज्य का यह वैध हित है कि वह अराजकता को रोके लेकिन असली सवाल पुलिस शक्ति के अस्तित्व का नहीं है। असली सवाल है: उस शक्ति का इस्तेमाल कैसे, कितना, और किसके ख़िलाफ़ किया जा रहा है? मुद्दा है उसकी विकृत असमानता, उसकी भयावह आवृत्ति, और उसका खतरनाक सामान्यीकरण।
जब बल अंतिम विकल्प न होकर पहली प्रतिक्रिया बन जाए। जब उसका इस्तेमाल हिंसा रोकने के लिए न होकर सिर्फ़ असुविधा दूर करने के लिए किया जाए। जब एक पर्यावरणीय विरोध को राजद्रोह के आईने से देखा जाए। जब छात्र नेताओं का खुलेआम अपहरण हो और पुलिस को कुछ दिखाई न दे। जब महिला छात्राओं को पुरुष अधिकारी बेधड़क छुएँ, और आधिकारिक जवाब यह हो कि उन्होंने ही पुलिस को काट खाया। जब अंबेडकर की तस्वीर फाड़ दी जाए और पूरे राज्य तंत्र में से एक आवाज़ भी विरोध में न उठे तब हम व्यवस्था बनाए रखने के गवाह नहीं हैं, तब हम चुनौती दिए जाने की असुविधा को व्यवस्थित रूप से कुचले जाने के गवाह हैं। हम एक गणतंत्र को अपने ही बच्चों के ख़िलाफ़ खड़ा देख रहे हैं।
जेएनयू शिक्षक संघ ने सच कहा था: “यह सत्तावाद है, और संवैधानिक रूप से गारंटिकृत लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन है।” इससे बेहतर, इससे सटीक शब्दों में इसे कोई और नहीं कह सकता।
जब बैरिकेड हटा दिए जाते हैं, तो एक अजीब सी खामोशी छा जाती है पर यह खामोशी सिर्फ़ शांति नहीं है, यह एक दबी हुई चीख़ है। दीवारों पर आधे फटे पोस्टर हवा में फड़फड़ाते हैं, जैसे घायल पक्षियों के पंख। वे पोस्टर जिन पर लिखा था “न्याय”, “समानता”, “शिक्षा बचाओ”, अब वे सिर्फ़ गीले कागज़ के टुकड़े हैं, जिन्हें सफ़ाई कर्मचारी सुबह-सुबह झाड़ू लगाकर हटा देगा। एक टूटा हुआ फ्रेम, ज़मीन पर पड़ा हुआ। उसमें अंबेडकर की तस्वीर है, वही अंबेडकर, जिसकी वाणी से यह गणतंत्र बना, जिसके संविधान की शपथ लेकर ये पुलिसकर्मी, ये नेता, ये न्यायाधीश अपनी कुर्सियों पर बैठते हैं। वह तस्वीर अब ज़मीन पर है, फटी हुई, पैरों तले रौंदी गई।
गेट के पास कुछ छात्र खड़े हैं। वे बात नहीं कर रहे। वे बस उस सड़क को देख रहे हैं जहाँ कल तक लाठियाँ चलीं, खून बहा, और आवाज़ें दबाई गईं। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक है, वह चमक आक्रोश की नहीं, बल्कि उस याद की है जो कभी मिटती नहीं, जो हड्डियों में उतर जाती है, खून में घुल जाती है।
27 फरवरी 2026 , सुबह 10:50 । पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर भीड़ जमा है। चौदह छात्र अदालत से बाहर निकलते हैं, आदिति, गोपिका, दानिश, नितीश, नेहा। उनके चेहरों पर राहत है, पर आँखों में गहरी थकान है। शायद वे पहले से ही अगले मार्च की योजना बना रहे हैं, अगले संघर्ष की तैयारी कर रहे हैं। अदालत ने जमानत बांड के सत्यापन का आदेश दिया है। पुलिस ने कहा है: जाँच जारी है, और समय चाहिए। छात्रों ने कहा है : हम सहयोग करेंगे।
जब छात्र यह सीख जाते हैं कि बोलना, सवाल पूछना, विरोध करना, इन सबकी एक कीमत होती है, और वह कीमत बहुत भारी हो सकती है, तब लोकतंत्र कभी एक झटके से नहीं गिरता, वह धीरे-धीरे, चुपचाप, बिना किसी धूमधाम के सिमटता जाता है और वह शांत हो जाता है।
पर याद रखो: एक शांत लोकतंत्र कभी शांतिपूर्ण नहीं होता। वह सिर्फ़ एक ऐसा लोकतंत्र होता है जहाँ तर्कों को भूमिगत कर दिया गया है, जहाँ बैरिकेड अब सड़कों पर नहीं, बल्कि दिमाग़ों में हैं, और जहाँ खामोशी सहमति नहीं, बल्कि शोर को जबरन, क्रूरता से छीन लिए जाने के बाद बची हुई आखिरी आवाज़ है।
यह शासन नहीं है। यह एक ऐसी सरकार द्वारा छेड़ा गया युद्ध है जो सवाल पूछने वाले युवा के विचार मात्र से डर जाती है। और उस युद्ध में हम सब घायल हैं, चाहे हम जागरूक हों या नहीं।
पर युद्ध के बारे में एक अटल सच्चाई है: उसे देखा जाता है। उसे रिकॉर्ड किया जाता है। उसे कभी भुलाया नहीं जाता।
जो वीडियो आज वायरल हो रहे हैं—छात्रों को बालों से घसीटते हुए, लड़कियों के साथ मारपीट करते हुए—वे कभी डिलीट नहीं होंगे। जो प्राथमिकियाँ दर्ज हुई हैं, वे कभी सील नहीं होंगी। वे नाम, आदिति मिश्रा, गोपिका बाबू, दानिश अली, नितीश कुमार, नेहा, इतिहास के पन्नों में स्याही से नहीं, खून से लिखे जा चुके हैं। अंबेडकर की वह फटी हुई तस्वीर, वह टूटा हुआ फ्रेम, वह सिर्फ़ एक तस्वीर नहीं थी, वह करोड़ों के आत्मसम्मान का प्रतीक थी, उसका अपमान कभी माफ़ नहीं किया जाएगा।
इतिहास की याददाश्त बहुत लंबी होती है और वह उन लोगों के प्रति कभी दयालु नहीं होता जो युवाओं पर अत्याचार करते हैं, जो सवाल पूछने वालों को कुचलते हैं, जो लोकतंत्र की जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाते हैं।
नारे आज चुप करा दिए गए हैं, सड़कें सूनी हैं पर यह खामोशी हमेशा नहीं रहेगी।

