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महिला मुक्ति का प्रश्न राजनीतिक, सामाजिक के साथ सांस्कृतिक भी है- कुमुदिनी पति

इलाहाबाद। कोरस, इलाहाबाद द्वारा 17 दिसंबर को निर्भया आंदोलन की याद में घर गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय था – “महिला सुरक्षा के व्यापक परिप्रेक्ष्य : घर से सड़क तक “. कार्यक्रम में मुख्य वक्ता कवयित्री कविता कादंबरी और महिला एक्टिविस्ट छात्रसंघ की पूर्व उपाध्यक्ष कुमुदिनी पति थीं। गोष्ठी में सामान्य तौर पर यह बात उभर कर आई कि यह केवल सार्वजनिक स्थान पर ही नहीं बल्कि घरों के चारदीवारी में भी मुक्ति की बात है। यदि हम देखे तो ज़्यादातर महिलाओं का शोषण घर, परिवार व रिश्तेदारों से जुड़ा होता है।

पहले वक्ता के रूप में कविता कादंबरी ने याद दिलाया कि निर्भया आंदोलन और POCSO Act, 2012′ के बाद किस प्रकार से रेप की परिभाषाएं बदलती गई ? महिला सुरक्षा में केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा, राजनीतिक सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा ये सब आती है। समाज में यदि देखे तो सबकी सुरक्षा के अलग-अलग सवाल है, उच्च जाति की महिला के अलग सवाल होंगे  ,दलित महिला के अलग सवाल होंगे। सुरक्षा को लेकर , विकलांग दलित महिला के अलग सवाल होंगे।
हमारा जो समाज है ,कानून है ,वह अपराध के प्रति सहूलियत देता है।  यदि किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो उसकी वजह छोटे कपड़े या रात को बाहर निकलना ये बाते बताई जाती है। उन्होंने अरविन्द जैन की पुस्तक “बचपन से बलात्कार” (2015) के हवाले से कई उदाहरण दिए।

कविता ने कहा कि किस प्रकार से समाज , मीडिया, भाषा, न्याय व्यवस्था सब पीड़ित पर ही दोषारोपण करते हैं। इसके साथ नॉर्मलाइजेशन भी कर देते है। कोर्ट के फैसलों तक में यह प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। इस तरह देखे तो ऐसा लगता है सारा सिस्टम मिलकर रेप कल्चर तैयार कर रहा है ।

यदि हम भाषा के स्तर पर देखे तो समाज में सारी गालियां महिला की योनि से केंद्रित है, ये भी एक तरह से बलात्कार को बढ़ावा देती है। यदि हम अखबारों की भाषा देखें तो उसमें ये नहीं लिखा जाता कि बलात्कार किया बल्कि ये लिखा जाता है कि इज्जत हुई तार तार। बहुधा देखा गया है कि पहले तो पीड़ित महिला की प्राथमिकी दर्ज नहीं होती, यदि दर्ज हो भी गई तो उस पीड़िता से ऐसे प्रश्न किए जाते है जिससे वो मामले को बीच में ही छोड़ देती। बहुत कम केस कोर्ट तक पहुंचते है , उदाहरण के रूप में भवरी देवी का केस देख सकते है।

उन्होंने कहा कि सुनसान सड़कों पर लाइट न होना, सीसीटीवी कैमरे न होना, पब्लिक टॉयलेट महिलाओं के लिए न होना, पब्लिक ट्रांस्पोर्ट सुरक्षित न होना ये भी महिला असुरक्षा के लिए बहुत बड़ी वजह होती है। आज यदि हम देखे तो 6 साल ,4 महीने, 7 महीने के बच्चियों के साथ रेप हो रहे है। पितृसत्तात्मक या ब्राह्मणवादी व्यवस्था हमारे समाज, मीडिया, राजनीति सब जगह व्यापक रूप से विद्यमान है। महिलाओं के साथ बलात्कार होता है और वो मुंह छिपाती है और बलात्कार करने वाला समाज में आराम से घूमता है। जितने भी रेप केस होते हैं उनके 3-4% ही मीडिया के द्वारा दिखाया जाता है।

अगले वक्ता के रूप में कुमुदिनी पति ने अपने जीवन के अनुभव साझा करती है, कि किस प्रकार विश्वविद्यालय की वाइस प्रेसिडेंट होते हुए भी कई प्रकार के समस्याओं का सामना करना पड़ा। जिसके कारण उन्होंने खुद एक टीम बनाई महिला अपराध रोकने के लिए। सिर्फ छात्रों के लिए ही नहीं बल्कि जो प्रोफेसर अपने छात्राओं के साथ गलत करते थे उन पर भी करवाई की, कई अभियान भी चलाए उनका मानना था कि यदि आप कुछ बदलना चाहते है तो सरकार, पुलिस, समाज किसी से उम्मीद मत रखिए। आप को जो करना है, स्वयं कीजिए तभी कुछ हो सकता है।

उन्होंने कहा कि संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि समाज से ,परिवार से बहिष्कृत महिलाओं के लिए सेल्टर होम हो, ताकि पीड़िता जिस परिवार से निकाली गई वहीं जाकर उन्हें फिर नहीं रहना पड़े। समाज जैसा है उसमें पहले से तय है कि जिसके पास शक्ति होगी उसी के पक्ष में न्याय होगा। इस वर्चस्व को बदलने की लड़ाई लड़नी पड़ेगी। तभी कमजोर के लिए न्याय की गारंटी हो सकेगी।

कुमुदिनी पति ने कहा कि यह लड़ाई सिर्फ लड़कियों की नहीं है बल्कि पुरुषों की भी उतनी ही जिम्मेदारी है। उनको भी इसके खिलाफ आवाज उठानी होगी। नारी आंदोलन में सिर्फ पीछे से साथ खड़े नहीं होना होगा बल्कि पहला कदम ही पुरुषों को उठाना होगा। व्यापक तौर पर महिला मुद्दों पर संवेदनशीलता और जागरूकता पैदा करने के लिए कविता पोस्टर, कार्यशाला, फिल्म स्क्रीनिंग, दीवार और मासिक पत्रिकाओं के प्रकाशन की बात भी कही। कहा कि महिला मुक्ति का प्रश्न एक साथ राजनीतिक, सामाजिक और सबसे बढ़कर सांस्कृतिक है। इसलिए हर स्तर पर पहलकदमी बढ़ानी होगी।

कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन अंकित पाठक ने किया और संयोजन कोरस इलाहाबाद की संयोजक प्रतिमा ‘ रानी ‘ ने किया।

कार्यक्रम में रामजी राय, प्रणय कृष्ण, प्रेम शंकर, रूपम मिश्र, अमित सरीन, धर्मेंद्र यादव, विवेक तिवारी, आभा सचान, कवि, ज्योति शुक्ला, प्रज्ञा पांडे, अमृता यादव, आस्था सचान, महुआ, साक्षी, आकांक्षा, प्रतिमा, पूजा, वसुंधरा ,पूजा साहनी, आदर्श, सोनाली, प्रत्यूष वत्सला, शिवांगी गोयल, महक, मानवेंद्र, भानु, आर्यन, कंचन, शुभम, शशि भूषण, अभिषेक, पारुल इत्यादि साथी उपस्थित रहे।

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