Sunday, August 7, 2022
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जन वितरण प्रणाली में आधार का प्रहार, लोगों के शोषण का नया प्रकार

सिराज दत्ता

झारखंड के कोल्हान क्षेत्र के हो आदिवासियों के संघर्ष का इतिहास काफ़ी लंबा है. चाहे छोटा नागपूर के राजा के विरुद्ध हो या अंग्रेजों के खिलाफ़, उन्होंने गुलामी को हमेशा चुनौती दी है. आज वही हो समुदाय अपने भोजन के अधिकार के लिए महज़ कंप्यूटर सर्वर की रफ़्तार पर निर्भर हो गया है. जन वितरण प्रणाली में आधार की अनिवार्यता के कारण कार्डधारियों को होने वाली समस्याओं का यह एक उदहारण मात्र है.

राशन के अधिकार पर आधार का पहला प्रहार वैसे परिवार झेले जिनका राशन कार्ड समय पर उनके आधार से न जुड़ने के कारण रद्द कर दिया गया. राशन कार्ड से आधार जुड़वाने के लिए बिचौलियों, राशन डीलरों, प्रज्ञा केन्दों व प्रशासनिक कर्मियों द्वारा पैसे लेना अथवा बार-बार दौड़वाना आम बात है. ऐसे अनेक परिवार अभी भी अपने राशन से वंचित हैं. 2017 में राशन कार्ड रद्द हो जाने के बाद आज तक हाटगम्हरिया प्रखंड के हाश्ये पर रहने वाले वृद्ध आदिवासी पचाए मुंडुईया राशन से वंचित हैं.

पिछले दो वर्षों से राज्य की अधिकांश राशन दुकानों पर पॉस मशीन में आधार-आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के बाद ही कार्डधारियों को राशन दिया जाता है. बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण व्यवस्था के कारण हर महीने व्यापक पैमाने पर लोग राशन से वंचित हो रहे हैं एवं परेशानियाँ झेल रहे हैं.

खुंटपानी प्रखंड के अरगुंडी गाँव के लोगों को बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के लिए गाँव से 2.5 किमी दूर जाना पड़ता है जबकि उनके गाँव में ही राशन दुकान है. गाँव में नियमित इन्टरनेट नेटवर्क न होने के कारण वहाँ पॉस मशीन काम नहीं करती. प्रमाणीकरण के बाद डीलर द्वारा दी गयी अगली तारिख को राशन दुकान जाकर अनाज लेना पड़ता है. कई बार सर्वर की समस्याओं के कारण दिनभर इंतज़ार करने के बाद भी प्रमाणीकरण नहीं हो पाता और वैसे लोगों को फिर अगले दिन पैसे खर्च करके और दैनिक मज़दूरी का नुकसान कर के आना पड़ता है. केवल आरगुंडी नहीं, बल्कि राज्य के अनेक गावों की यही कहानी है.

यह भी सोचने की बात है कि जन वितरण प्रणाली में बायोमेट्रिक व्यवस्था लागू होने से पहले परिवार का कोई भी सदस्य अथवा पड़ोसी भी राशन ला सकता था. लेकिन अब परिवार के वही सदस्य अनाज ला सकता है जिसकी उँगलियों के निशान पॉस मशीन में काम करते हैं. झारखंड सरकार का कहना है कि पॉस मशीन में उँगलियों के निशान काम नहीं करने की अवस्था में डीलर को अपवाद पंजी के माध्यम से राशन देना है. लेकिन यह कहीं होते हुए नहीं दिखता. साथ ही, पॉस मशीन लोगों के शोषण का एक नया हथियार बन गया है. बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण होने के बावज़ूद डीलर कई बार कार्डधारियों को यह बोल के लौटा देता है कि मशीन में उनके उँगलियों के निशान काम नहीं किए और उनके नाम से राशन निकाल लिया जाता है. यह भी देखा जाता है कि डीलर पॉस मशीन में एक से ज्यादा महीने का राशन दर्ज कर देते हैं लेकिन कार्डधारी को केवल एक महीने का अनाज ही देते हैं.

यह स्थिति केवल कोल्हान क्षेत्र तक ही सिमित नहीं है बल्कि पूरे राज्य की कहानी है. वर्तमान में जन वितरण प्रणाली में कई समस्याएं हैं, जैसे डीलर द्वारा कार्डधारी के कोटे से राशन की कटौती करना, राशन कार्ड में परिवार के सभी सदस्यों का नाम न होना, कई वंचित परिवारों का कार्ड न होना, शिकायत निवारण प्रणाली निष्क्रिय होना आदि. लेकिन, इन सब पर कार्यवाई करने के बजाए राज्य सरकार ने अपनी पूरी उर्जा जन वितरण प्रणाली को आधार से जोड़ने में लगा दी.

सरकार दावा करती है कि आधार से जोड़ने के कारण जन वितरण प्रणाली से बड़े पैमाने पर फ़र्ज़ी और डुप्लीकेट लाभुकों को हटाया गया है. लेकिन आज तक केंद्र व राज्य सरकार फ़र्ज़ी और डुप्लीकेट कार्डों की संख्या बता नहीं पाई है और न ही इसकी सूचि सार्वजानिक की है. ऐसे ही फ़र्ज़ी कार्डधारी थे सिमडेगा की 11-वर्षीय संतोषी और दुमका के कलेश्वर सोरेन जिनकी हाल में भूख से मौत हो गयी थी.

जन वितरण प्रणाली झारखंड के लोगों के लिए जीवनरेखा सामान है. पिछले दो वर्षों में राज्य के कम-से-कम 19 लोग भूख के शिकार हुए. अधिकांश व्यक्ति राशन से वंचित थे जिसका एक प्रमुख कारण आधार सम्बंधित समस्याएं थी. पिछले तीन सालों से आधार के कारण लोगों को हो रही समस्याओं पर विभिन्न प्रकार के सबूतों (जैसे, सरकारी आंकड़े, स्वतंत्र शोध, कार्डधारियों की गवाही, ग्रामीणों द्वारा विरोध) की कमी नहीं है. इसके बावज़ूद राज्य सरकार लोगों पर आधार की अनिवार्यता थोपे जा रही है.

इस मुद्दे पर मुख्य विपक्षी दलों का रवैया भी उदासीन है. अब तक कुछ ट्वीट व मीडिया में बयान के अलावा किसी भी दल में जन वितरण प्रणाली में आधार की अनिवार्यता के विरुद्ध स्पष्ट राजनैतिक प्रतिबद्धता नहीं दिखी है. आधार का प्रहार केवल जन वितरण प्रणाली तक ही सिमित नहीं है, बल्कि अन्य जन कल्याणकारी योजनाओं जैसे सामाजिक सुरक्षा पेंशन, मनरेगा आदि की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. क्या इस चुनावी मौसम में राजनैतिक दल आधार के विरुद्ध और लोगों के पक्ष में खड़े दिखेंगे?

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