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संजीव का कथा-साहित्य स्वाधीन भारत की सत्ता के खिलाफ चार्जशीट है : रविभूषण

हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार संजीव के उम्र के 75वें वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर ‘संजीव अमृत महोत्सव समिति’ के बैनर से पूरे देश में आयोजन किये जा रहे हैं, जिसकी शुरुआत आसनसोल, पश्चिम बंगाल से हो चुकी है। इसी कड़ी में 13-14 नवंबर 2021 को संजीव के गाँव बाँगर कला और सुल्तानपुर में दो दिवसीय आयोजन हुआ।

13 नवंबर को बाँगर कलाँ में यह आयोजन तीन सत्रों में संपन्न हुआ। आरंभ में आयोजन के महत्त्व पर बोलते हुए कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि हिन्दी क्षेत्र में दिमागी उसर ज्यादा है। संजीव पर होने वाला आयोजन इस उसर क्षेत्र में एक नयी साहित्यिक शुरुआत है। उन्होंने कहा कि संजीव यहाँ पैदा हुआ, पर खिले बंगाल के एक छोटे कस्बे कुल्टी में। हिन्दी पट्टी में साहित्य से संबंध रखने वाला हर कोई संजीव को जानता है। प्रेमचंद की परंपरा को उन्होंने काफी वैविध्य के साथ आगे बढ़ाया है।

इस आयोजन में मुख्य भूमिका निभाने वाले कथाकार शिव कुमार यादव ने कहा कि बाँगर कलाँ को अपने इस रत्न की कीमत समझनी चाहिए। संजीव की रचनाओं पर शोध करने वाले युवा आलोचक सुधीर सुमन का मानना था कि संजीव की यात्रा न्याय और बराबरी के लिए संघर्षरत एक रचनाकार की यात्रा है। अपने कथा साहित्य के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज को जनतांत्रिक बनाने की कोशिश की है। जाति और लिंग के स्तर पर मौजूद अन्याय, उत्पीड़न, अपमान आदि का उन्होंने सतत प्रतिरोध किया है।

पहले सत्र में कथाकार संजीव का ग्रामीणों की ओर से अभिनंदन किया गया तथा उनके कथानायकों का भी सम्मान किया गया। संजीव की कथा पात्र जस्सी बहू बीमार होने के कारण नहीं आ पायी थीं, तो उन्हें उनके घर जाकर सम्मानित करने का निर्णय हुआ। इस मौके पर संजीव की पत्नी प्रभावती जी, उनके बचपन के मित्र रामशिरोमणि पांडेय, उनके भाई के सहकर्मी और रचनाओं के पाठक चर्चित शिक्षक उदयभानु सिंह के साथ-साथ आयोजन में शामिल वक्ताओं को भी सम्मानित किया गया। संजीव के मित्र रामशिरोमणि पांडेय ने ‘दोस्ती’ फिल्म के गीत को गाकर सबको भाव-विह्वल कर दिया। संजीव के परिवार के लगभग सारे सदस्य इस अवसर पर मौजूद थे। इस मौके पर अवधी के लोकगायक बृजेश यादव ने लोकगीत सुनाया।

दूसरे सत्र में ‘हिन्दी कथा साहित्य में गाँव और संजीव’ विषयक परिचर्चा में बोलते हुए आलोचक रविभूषण ने जोर देकर कहा कि बाँगर कलाँ का नाम बाहर संजीव के कारण ही जाना जाएगा। समस्या यह है कि हम राजनीति को ज्यादा महत्त्व देते हैं, परंतु शासन-प्रशासन के पद पर रहे लोग जब वहाँ से हट जाते हैं, तो प्रायः लोग उन्हें भूल जाते हैं। राजनीति कुछ देर के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है, पर संस्कृति हमेशा महत्त्वपूर्ण होती है। एक लेखक का नाम सैकड़ों-हजारों वर्षों तक जीवित रहता है। संजीव हमारे बेशकीमती कथाकार हैं। वे बाँगर कलाँ और अवध क्षेत्र के गौरव हैं। भारत के गाँवों की जितनी भी समस्याएँ हैं, संजीव ने अपनी कहानियों में उन समस्याओं को चित्रित किया है और संकटों का समाधान तलाशने की कोशिश की है। जातिगत भेदभाव, बेरोजगारी, किसान आत्महत्याओं तथा बच्चों और महिलाओं से जुड़े किसी भी सवाल को संजीव ने नहीं छोड़ा है। उनके कथा-साहित्य में भारतीय समाज का जीवन संपूर्णता में चित्रित हुआ है। संजीव समाज की बेहतरी के कथाकार हैं, वे समाज के सुंदर भविष्य का सपना देते हैं। वे जनता के लेखक हैं और उनकी कैसे हिफाजत हो, यह जनता को सोचना होगा। उनके ग्रामीणों को भी यह भूमिका निभानी होगी।

बृजेश यादव ने कहा कि संजीव अपनी विचारधारा को छिपाते नहीं है। भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समाज जिस कदर विचारशून्य और विचारहीन हो चुका है, उससे उसकी मुक्ति जरूरी है। हिन्दी आलोचना को भी विचारधारा पर पर्दा नहीं डालना चाहिए, बल्कि संजीव जिस तरह अपनी रचनाओं में खुलकर भारतीय समाज के संकटों के निदान के लिए अपने जो स्पष्ट विचार व्यक्त करते हैं, उस पर गौर करना चाहिए।

रामप्रकाश कुशवाहा ने कहा कि जैसे कोई मरीज डॉक्टर के पास जाता है, उसी तरह हिन्दी भाषी समाज को संजीव की कहानियों और उपन्यासों के पास जाना चाहिए। नेहरू युग में साहित्य के भीतर नेतृत्व पर सवाल प्रायः नहीं उठाये जाते थे, लेकिन संजीव और उनके समकालीन कहानीकारों ने व्यवस्था के जनविरोधी स्वरूप को उजागर करने और उसे बदलने को अपना लक्ष्य बनाया। उनकी कहानी ‘अपराध’ हिन्दी कहानी में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप थी।

कौशलेंद्र ने आल्हा और झांसी की रानी के प्रसंगों की चर्चा करते हुए कहा कि जो लोग छूट गये हैं या जिन्हें जानबूझकर छोड़ दिया गया है, उनकी कथा लिखने की हिम्मत होनी चाहिए, जैसी हिम्मत संजीव ने दिखाई है। बजरंगबली कहार ने कहा कि संजीव मेहनतकश वर्ग और स्त्रियों के प्रति संवेदनशील कथाकार हैं। उदयभानु सिंह का मानना था कि उनकी कहानियों में आम ग्रामीणों की सच्चाई नजर आती है। सुरेशचंद्र शर्मा ने कहा कि गावों को उपेक्षित करके साहित्य जयी नहीं हो सकता। रामप्यारे प्रजापति ने कहा कि संजीव ने अपने पात्रों के अनुभवों को जिया है, उसे गहराई से महसूस किया है, उसके बाद उनके जीवन को चित्रित किया है। परिचर्चा का संचालन युवा आलोचक सुधीर सुमन ने किया।

अंतिम सत्र में आजमगढ़ की नाट्य संस्था ‘सूत्रधार’ ने संजीव की कहानी ‘झूठी है तेतरी दादी’ की नाट्य प्रस्तुति की। एक स्त्री जिसे गलती से किसी और पुरुष का दुल्हन बना दिया जाता है, उसके जीवन की सच्चाइयों के जरिये इस कहानी में संजीव ने संकेत किया है कि जाति की अवधारणा ही स्त्री विरोधी है। तेतरी दादी के बेटे तो ब्राह्मण बन जाते हैं, पर वे अंत्यंज ही बनी रह जाती हैं। नाटक का निर्देशन अभिषेक पंडित ने किया तथा ममता पंडित, डॉ. अलका सिंह, रणजीत सिंह, रीतेश रंजन, सूरज यादव ने मुख्य भूमिकाएँ निभायीं। नेपथ्य से संजीत भी शामिल रहे। संचालन रोहित प्रसाद पथिक ने किया।

दूसरे दिन का आयोजन दो सत्रों में जिला पंचायत परिषद, सुल्तानपुर के सभागार में हुआ। पहले संजीव अमृत महोत्सव समिति के संयोजक शिव कुमार यादव ने आमंत्रित वक्ताओं और श्रोताओं का स्वागत किया, उसके बाद संजीव का नागरिक अभिनंदन किया गया। पहले सत्र का संचालन करते हुए कवि डी.एम. मिश्रा ने संजीव के कृतित्व पर प्रकाश डाला।

दूसरे सत्र में ‘हिन्दी कथा साहित्य और संजीव’ विषय पर गंभीर परिचर्चा हुई, जिसकी अध्यक्षता रविभूषण ने की। कवि अष्टभुजा शुक्ल इस सत्र के मुख्य अतिथि थे। संचालन सुधीर सुमन ने किया।

परिचर्चा सत्र की शुरुआत करते हुए ‘युगतेवर’ पत्रिका के संपादक कमलनयन पांडेय ने कहा कि संजीव आलोचना सजग कथाकार नहीं हैं। अधिक लिखना और सार्थक लिखना उनकी विशेषता है। वे स्थिति के नहीं, बल्कि वास्तविकता के कथाकार हैं। यदि स्वतंत्र भारत का वास्तविक इतिहास लिखा कोई लिखना चाहेगा, तो उसे संजीव के कथा-साहित्य को आधार बनाना होगा। संजीव सामंती और पूंजीकेंद्रित सत्ता के शोषण के शिकार लोगों के तरफदार हैं, उन्होंने दलितों-वंचितों की फजीहतों, उनके स्वप्नों और आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी तरह का रास्ता चुना और सत्तर के दशक से आज तक रचनारत हैं। वे अपनी मिसाल आप हैं। उन्होंने शोषण, वैषम्य के चित्रण के साथ अपनी रचनाओं में प्रतिरोध की शक्ति को भी चित्रित किया है।

परिचर्चा के अध्यक्ष डॉ. रविभूषण ने कहा कि संजीव प्रेमचंद की कथा-परंपरा के वारिस हैं। प्रेमचंद ने हिन्दी कथा साहित्य में न्याय के प्रश्न को केंद्र में रखा। संजीव की रचनाएँ भी न्याय को सवाल केंद्र में रखती हैं। उनके कथा-लेखन में स्वतंत्रता और मुक्ति के प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं। स्वाधीन भारत के समाज और जीवन के जितने भी प्रश्न हो सकते हैं, नागार्जुन और परसाई के बाद सबसे अधिक संजीव के यहाँ मिलते हैं। उनका कथा-साहित्य स्वाधीन भारत की सत्ता के खिलाफ चार्जशीट है, वह सत्ता-संरचना को बदलने के लिए है। किंतु वे केवल सत्ता-परिवर्तन के कथाकार नहीं हैं, बल्कि बुनियादी रूप से व्यवस्था-परिवर्तन के कथाकार हैं। सत्तर के दशक से वे वैचारिक रूप से टिककर लिख रहे हैं, तब से उनका गाँव बाँगरकलाँ भी बदला है, सुल्तानपुर भी बदल गया है और पूरा भारत ही बदल चुका है, कारपोरेट कैपिटल के साथ स्टेट का गठबंधन हो चुका है, अडानी की प्रति दिन आय 1 हजार करोड़ रुपये से अधिक है, पोस्ट ट्रूथ का दौर चल रहा है, राजनीति अंको की गणित में फंस चुकी है। नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के इस नये समय को संजीव चित्रित ही नहीं करते, बल्कि इसमें परिवर्तन की आकांक्षा को भी स्वर देते हैं। वे परिवर्तनकामी और एक्टिविस्ट यानी सक्रियतावादी कथाकार हैं। रविभूषण ने कहा कि उनका साहित्य समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों, इतिहासकारों और संस्कृतिकर्मियों के लिए ऐसे नये सूत्र देता है, जो बहुत काम के हैं। उनका साहित्य समस्त भारत से जुड़ा साहित्य है। वे हिन्दी के भारतीय कथाकार हैं।

लखनऊ से पधारे चर्चित आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य की कसौटी बदलने की बात की थी, भारतीय समाज में जो लोग हाशिये पर है, उन किसान-मजदूरों, दलितों-स्त्रियों को वे साहित्य के केंद्र में ले आये थे। संजीव ने प्रेमचंद की कसौटी का विस्तार किया है। संजीव का कथा-साहित्य आजाद भारत के कालपात्र सरीखा है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने लेखक के लिए समाजशास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान के ज्ञान को जरूरी बताया था, संजीव ने इस प्रविधि का भी विस्तार किया। ‘सूत्रधार’ और ‘प्रत्यंचा’ उपन्यासों की खासियत की चर्चा करते हुए वीरेंद्र यादव ने कहा कि वे स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास की बड़ी क्षतिपूर्ति करते हैं। किसान आत्महत्याओं पर केंद्रित ‘फाँस’ में वे उपन्यास के प्रचलित फ्रेम को तोड़ते हैं। वे अपनी कहानियों और उपन्यासों में आजाद भारत के जनतंत्र का क्रिटिक रचते हैं।

वरिष्ठ कवि अष्टभुजा शुक्ल ने संजीव को पूर्णकालिक लेखक बताया और उन्होंने ‘प्रेतमुक्ति’ और ‘सूखी नदी के घाट पर’ कहानी की चर्चा करते हुए कहा कि जीवन कितना व्यापक है, इसमें बाधाएँ और सौंदर्य क्या हैं, संजीव इसके पारखी हैं। कविता में मुक्तिबोध का जो अंतर्द्वंद्व है, जो परेशानियाँ हैं, वही संजीव के कथा-साहित्य में मिलता है। उनके यहाँ जीवन का आख्यान थोड़ा नहीं पड़ता, क्योंकि जीवन व्यापक है।

प्रसिद्ध कथाकार और ‘तद्भव’ पत्रिका के संपादक अखिलेश ने कहा कि जो भी चीज अन्यायपूर्ण है या जो यथार्थ दमनकारी है, संजीव उसकी आलोचना करते हुए उसके खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत रखते हैं। उनकी कहानियाँ गढ़े हुए प्रतिरोध की कहानियाँ नहीं हैं। सातवें दशक में प्रतिरोध और यथार्थ की जो कहानियाँ लिखी जा रही थीं, उनसे कई चीजें छूट जाती थीं, लेकिन संजीव की कहानियों के साथ ऐसा नहीं है। संजीव की ‘अपराध’, ‘तिरबेनी का तड़बन्ना’, ‘मानपत्र’, ‘आरोहण’ जैसी कहानियों और ‘सूत्रधार’ जैसे उपन्यास की उन्होंने खास तौर से चर्चा की। उन्होंने यह भी कहा कि ‘फाँस’ किसान आत्महत्याओं पर पहला महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। अखिलेश ने यह भी रेखांकित किया कि संजीव के कथा-साहित्य में शोध का सूखापन और रूखापन खत्म हो जाता है और जिंदगी हिलोरे लेते हुए दिखायी पड़ती है।

कथाकार शिवमूर्ति ने उनसे जुड़ाव के अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि जनवरी 1980 में उनकी कहानी ‘कसाईबाड़ा’ धर्मयुग में छपी और संजीव की कहानी ‘अपराध’ सारिका में छपी। उन्हें पता चला कि संजीव भी सुल्तानपुर के हैं, तो दोनों एक-दूसरे के करीब आये। यद्यपि वे कुल्टी में रहते थे, पर अपने गाँव से उनका गहरा जुड़ाव था, वहाँ से इन्होंने नायक-नायिकाएँ निकाली। जस्सी बहू और प्रेरणास्रोत जैसी कहानियाँ इसका उदाहरण हैं।

आलोचक डॉ. रघुवंशमणि ने कहा कि जब तक समाज शोषण, असमानता, गरीबी और लाचारी रहेगी, तब तक संजीव की कहानियों और उपन्यासों की प्रासंगिकता बनी रहेगी। उन्हंे दुख है कि अपने विचारों के अनुरूप उनके लेखक का सामाजिक-राजनीतिक कर्म नहीं है। लेकिन रचनाकार आंदोलनों के सारतत्व, उसके बीज को संभालकर रखता है, ताकि समय अनुकूल होने पर वे फिर से पल्लवित हो सकें और संजीव ने यह कार्य बखूबी किया है।

लखनऊ से आये इप्टा के चर्चित रंगकर्मी राकेश ने संजीव की दो कहानियों ‘ज्वार’ तथा ‘हिटलर और काली बिल्ली’ के हवाले से कहा कि संजीव परंपरा, स्मृति, पहचान और प्रतिरोध सबको अपनी कहानियों में दर्ज करते हैं। मुरादाबाद से आये उर्दू के कथाकार नदीम राइनी ने हिन्दी- उर्दू को सगी बहनें बताते हुए कहा कि वे संजीव की कहानियों का उर्दू में अनुवाद करेंगे। इलाहाबाद से आये हरेंद्र मौर्य ने कहा कि समाज में इस तरह का लेखन करने वाला साहित्यकार दुर्लभ है। वे सिर्फ वर्तमान की चिंता ही नहीं करते, बल्कि उनकी रचनाओं में तीस-चालीस साल आगे की भी चिंताएँ नजर आती हैं। डॉ. सूर्यदीन यादव का सुझाव था कि संजीव के पात्र अपनी भाषा बोलते हैं, कथाकार के इशारे पर नहीं नाचते। वे जनता के अनुभवों के कथाकार हैं। उनके कथा साहित्य को अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। डॉ. सुशील कुमार पांडेय ‘साहित्येंदु’ ने भी संजीव के कथा-साहित्य की विशेषताओं पर प्रकाश डाला।

कमला नेहरु संस्थान के प्राचार्य और हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. राधेश्याम सिंह ने कहा कि संजीव की स्थानीयता भी वैश्विकता से जुड़ी हुई है, तात्कालिक भी उनके यहाँ सार्वकालिक है। अपनी रचनाओं में भी वे विभिन्न तत्वों को जुआते है। चीजों और घटनाओं को एकीकृत रूप में देखने का नजरिया ही संजीव को बड़ा बनाता है। उनका लेखन एक एक्टिविस्ट लेखन है। प्राचार्य रामप्यारे तिवारी ने कहा कि संजीव की रचनाओं में ऐसी समसामयिक समस्याएँ भी हैं, जहाँ तक प्रेमचंद नहीं पहुँच पाये थे। उनके पात्रों में जीवन के लिए संघर्ष करने की जिजीविषा नजर आती है। संजीव काया प्रवेश करने में निपुण हैं।

संजीव ने कहा कि मुझे खरी-खरी आलोचना चाहिए। मैं खुरदुरा लेखक हूँ, पॉलिश्ड नहीं हूँ। मैं चाहता हूँ कि जो मैं लिख रहा हूँ, उसकी आलोचना हो, ताकि और अच्छी कहानियाँ लिख सकूँ। अगर मैं मित्रों की प्रत्याशा पर खरे न उतरूँ तो वे जरूर बताएँ कि वे क्या चाहते हैं?

इस अवसर पर संजीव अमृत महोत्सव समिति के संयोजक शिव कुमार यादव के कहानी संग्रह ‘भूर भू स्वाहा’ का लोकार्पण भी किया गया। इस मौके पर आशाराम जागरथ, डॉ. आद्या प्रसाद प्रदीप, डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी, डॉ. मन्नान सुल्तानपुरी, सोमेश शेखर, हरिलाल शुक्ल, प्रेमपुष्प मिश्र, परवेज करीम, वाईपी शाही, श्याम नारायण श्रीवास्तव आदि साहित्यकार मौजूद थे। हालाँकि सुल्तानपुर में युवा साहित्यकारों की अनुपस्थिति खटकी। सुल्तानपुर में आयोजन की सह-आयोजक साहित्यिक संस्था ‘सृजनपीठ’ थी। अंत में शिवकुमार यादव ने आमंत्रित वक्ताओं और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

इस दो दिवसीय आयोजन में चार राज्यों- झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी शामिल हुए।

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