समकालीन जनमत
पुस्तक

क्रांतिकारी दुनिया-‘रेवोल्यूशनरी वर्ल्ड: ग्लोबल अपहीवेल इन द माडर्न एज’

2021 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से डेविड मोटाडेल के संपादन में ‘रेवोल्यूशनरी वर्ल्ड: ग्लोबल अपहीवेल इन द माडर्न एज’ का प्रकाशन हुआ । संपादक की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब में दस लेख संकलित हैं जिनमें क्रमश: अटलान्टिक की क्रांतियों, 1848 की क्रांतियों, पेरिस कम्यून, प्रथम विश्वयुद्ध से पहले की संवैधानिक क्रांतियों, रूस की कम्युनिस्ट क्रांति, 1919 के विल्सनी उभारों, तीसरी दुनिया की क्रांतियों, इस्लामी क्रांति, 1989 की क्रांतियों और अरब देशों की हालिया क्रांतियों का विश्लेषण किया गया है । संपादक का कहना है कि क्रांतियों ने इतिहासकारों का ध्यान हमेशा खींचा है । शायद इसीलिए हेगेल ने फ़्रांसिसी क्रांति के वैश्विक महत्व के बारे में कहा कि इससे केवल एक देश नहीं पूरी दुनिया का इतिहास बदल जायेगा । उस समय के फ़्रांसिसी क्रांतिकारी भी इस बात को मानते थे । इसी तरह 1848 की क्रांतियों के समय मार्क्स और एंगेल्स ने सारी दुनिया के मजदूरों का क्रांति के लिए आह्वान किया था । लेनिन ने भी 1917 की क्रांति के बाद सारी दुनिया के उत्पीड़ित जनगण से एक होकर विश्वक्रांति करने का आवाहन किया था । 1989 की हलचलों के बाद फ़ुकुयामा को भी दुनिया का इतिहास बदलता हुआ प्रतीत हुआ था । आधुनिक युग की सभी क्रांतियों ने खुद को वैश्विक महत्व का माना और उन्हें मानव इतिहास का नया युग कहा । असल में इन क्रांतियों में सार्वभौमिक विचार तो मुखर हुए ही थे, उनकी भौगोलिक पहुंच भी एक देश तक सीमित नहीं रही । अधिकांश क्रांतियां देश की सीमा लांघकर पूरे इलाके या दुनिया में फैलीं ।

इस तरह की सबसे पहली क्रांतिकारी लहर का जन्म 1776 में अमेरिका में हुआ जो 1789 में फ़्रांस तक पहुंच गयी । आजादी के आदर्श से प्रेरित इन क्रांतिकारियों ने पुराने शासक कुलीनों और औपनिवेशिक प्रभुओं का तख्ता पलट दिया । फिर 1791 की हैती की क्रांति, 1798 की आयरलैंड की क्रांति और लैटिन अमेरिकी देशों में क्रांतिकारी युद्धों का सिलसिला शुरू हुआ । इसी दौरान हालैंड, बेल्जियम, पोलैंड और तुर्क साम्राज्य में भी ऐसी ही क्रांतिकारी लहर दौड़ पड़ी । 1848 की क्रांतियों की लहर तो इनसे भी अधिक घनिष्ठ रूप से आपस में जुड़ी हुई थी । समूचे यूरोप में उदारवाद और राष्ट्रवाद के विचारों से अनुप्राणित होकर क्रांतिकारियों ने तत्कालीन बादशाहत का मुकाबला करने के लिए बैरीकेड खड़े कर लिये । जनवरी में इटली से विद्रोह की शुरुआत हुई, फ़रवरी में फ़्रांस में उसका आगमन हुआ । फिर तो जर्मनी, हालैंड, डेनमार्क और आयरलैंड तक उसकी चपेट में आ गये । सैनिक शासन लगाकर हजारों को कत्ल करके अधिकांश देशों में इनको दबा दिया गया । आखिरकार यह क्रांतिकारी उथल पुथल यूरोप के समुद्र पार के उपनिवेशों तक जा पहुंची ।

एशिया में इसका परिणाम बीसवीं सदी के पूर्वार्ध की संवैधानिक क्रांतियों के रूप में प्रकट हुआ । जापान के हाथों रूस की पराजय ने 1905 की रूसी क्रांति को गति दी, फ़ारस में संवैधानिक क्रांति हुई और 1908 के आते आते तुर्की में युवा तुर्क क्रांति संपन्न हो गयी । इसी कड़ी में 1911 में चीन की क्रांति को भी देखना उचित होगा । रूस और जापान की लड़ाई में संविधान वाली एक एशियाई ताकत संविधानविहीन यूरोपीय ताकत को परास्त करने में सफल हुई । इसी वजह से एशिया के जो भी क्रांतिकारी कार्यकर्ता और सुधारक पुराने समाज और तानाशाही शासन प्रणाली का विरोध कर रहे थे उनके आदर्श के बतौर जापान की व्यवस्था नजर आयी । संवैधानिक क्रांति की लहर धुर पूरब से मध्य पूर्व होते हुए यूरोप पहुंची जहां ग्रीस और पुर्तगाल में संवैधानिक शासन कायम हुआ ।

रूसी क्रांति के असरात भी वैश्विक रहे । इसके प्रभाव में दुनिया भर के क्रांतिकारी व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में जुट गये । यूरोप के बाहर भी असंख्य आंदोलनों को इससे प्रेरणा मिली । इसी समय उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों की बाढ़ आ गयी । थोड़े समय बाद यह लहर शांत हो गयी और आजादी की उम्मीद पूरी नहीं हुई । फिर कुछ ही समय बाद उपनिवेशवाद विरोधी क्रांतिकारियों की सक्रियता शुरू हुई । शीतयुद्ध के दौरान तीसरी दुनिया की क्रांतियों ने एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका को हिलाकर रख दिया । विश्व क्रांति के मार्क्सवादी आवाहन ने अमेरिकी सत्ता की नींद हराम कर दी थी । विडम्बना यह रही कि शीतयुद्ध का खात्मा कम्युनिस्ट शासनों के विरुद्ध वैश्विक क्रांति से हुआ । पोलैंड से इसकी शुरुआत हुई, हंगरी, पूर्वी जर्मनी, बुल्गारिया और चेकोस्लोवाकिया होते हुए आखिर रोमानिया में चाउसेस्कू शासन के उन्मूलन से इसका अंत हुआ । इनके बाद की हालिया लहर अरब मुल्कों की क्रांति के साथ आयी थी । किताब का मकसद यही बताना है कि क्रांतियां आम तौर पर वैश्विक होती हैं ।

इनमें अंतर भी रहे हैं । अब तक इनके अध्ययन में अंतरों पर ही जोर दिया जाता रहा है । इसके बावजूद संपादक ने जोर दिया है कि इनकी सहकालिकता आपसी सम्पर्क को देखने के लिए मजबूर करती है । इन सम्पर्कों को उस समय के क्रांतिकारियों ने भी चिन्हित किया था । कुछ ऐसे भी सम्पर्क रहे हैं जो उस समय नहीं दिखायी देते थे लेकिन अब उन्हें इतिहासकार देख सकते हैं । असल में ये सम्पर्क कभी कभी परोक्ष भी होते हैं । बड़े युद्ध, वैश्विक आर्थिक संकट या साम्राज्यों के अंत जैसे कुछ संरचनागत बदलाव इन सबको एक साथ प्रभावित करते हैं । इनके कारण विभिन्न देशों में सत्ता के लिए संघर्ष लगभग एक ही समय शुरू हो जाता है । इसका एक ज्वलंत उदाहरण प्रथम विश्वयुद्ध है जिसके चलते 1917 से क्रांतिकारी विस्फोटों की झड़ी लग गयी थी । इसके अतिरिक्त देशों की सरहदों के आर पार क्रांतिकारी आंदोलनों का प्रत्यक्ष सम्पर्क भी हो सकता है । साम्राज्यवाद, व्यापार और वाणिज्य तथा संचार और परिवहन के आधुनिक साधनों से दुनिया भर के देशों में सम्पर्क घनिष्ठ हुआ है । जैसे जैसे यह एकीकरण बढ़ता गया वैसे ही वैसे क्रांतियों का वैश्विक होना भी तेज होता गया है ।

लगभग सभी क्रांतिकारी नेता घुमक्कड़ रहे हैं । उन्होंने तमाम देशों की यात्रा की । उन्होंने सहयोग और क्रांतिकारी सामाजिकता के नये सूत्र समूचे साम्राज्य में या पारदेशीय स्तर पर स्थापित किये । कभी कभी वे ऐसी सरकारों के साथ भी सम्पर्क बनाते थे जो क्रांति में मदद करने की इच्छा रखती थीं । जिन देशों में क्रांतिकारी सरकारें होती थीं वे अक्सर विदेश के क्रांतिकारी आंदोलनों को सैनिक या असैन्य सहायता देती थीं । इससे भी ज्यादा महत्व की बात क्रांतिकारी विचारों का प्रवाह थी । इनकी अनुगूंज अक्सर सीमाओं के आर पार सुनायी पड़ती थी । आधुनिक काल के अधिकांश क्रांतिकारियों ने गणतंत्र, संविधान, साम्यवाद या उदारवाद जैसे सार्वभौमिक दावे किये । उन्होंने पुराने शासकों को हटाकर लोकप्रिय किस्म की सरकारों का गठन करना चाहा । विदेश से क्रांतिकारी विचारों के आयात का व्यावहारिक पहलू उनका किसी अन्य देश में सफल होने का सबूत बन जाता था । इससे क्रांतिकारी समूह को किसी वैश्विक आंदोलन का अंग होने का गौरव बोध भी हासिल होता था । ये विचार जब एक से दूसरे देश में फैलते थे तो स्थानीय संदर्भों के मुताबिक राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों में अंतर के चलते उनमें अर्थ परिवर्तन भी हो जाता था । इन क्रांतिकारी विचारों के प्रसार के लिए विविध माध्यमों का उपयोग किया जाता था । चिट्ठी, परचा, अखबार और किताबों के अतिरिक्त रेडियो, टेलीविजन, कंप्यूटर और मोबाइल फोन का भी इनके लिए इस्तेमाल होता रहा है । लेख, फोटो, गीत, कविता और तमाम कला रूप इनके प्रसार के माध्यम रहे हैं । विगत सदियों के दौरान इन विचारों को फैलाने के माध्यमों में भरपूर बदलाव आता रहा है । अटलांटिक क्रांतियों के जमाने में पानी के जहाजों पर वे समुद्र पार कर जाते थे । संचार के आधुनिक साधनों के आगमन के साथ उनके प्रसार की गति तेज हुई । संवैधानिक क्रांतियों के समय बेतार के तार के अलावे रेल और स्टीमर ने उन्हें घंटों में फैला दिया था । जैसे जैसे बीसवीं सदी आगे बढ़ी और तकनीकी विकास होता गया वैसे ही वैसे वैश्विक जन गोलबंदी में तकनीक की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती गयी ।

संपादक का मानना है कि विद्रोहों के प्रसार का अध्ययन करते हुए केंद्र से हाशिये की ओर प्रसार की धारणा को मान लेना भ्रामक होगा । अनेक मामलों में वैश्विक क्रांतिकारी आंदोलनों का गुरुत्व केंद्र यूरोप ही नहीं रहा है । हालांकि आधुनिक काल की अनेक क्रांतिकारी लहरों का जन्म यूरोप के भीतर हुआ लेकिन यूरोपीय क्रांतियों पर भी वैश्विक बदलावों का प्रभाव रहा है । उदाहरण के लिए अमेरिका की उपनिवेशवाद विरोधी क्रांति का यूरोप के सभी साम्राज्यी केंद्रों पर उल्लेखनीय असर पड़ा और उनके साम्राज्य के भीतर के जाल के सहारे स्वाधीनता के विचारों का प्रसार हुआ । असल में कोई एक केंद्र कभी रहा ही नहीं और अंतरण भी एकाधिक दिशाओं में होता रहा है क्योंकि सभी क्रांतिकारी आंदोलनों ने एक दूसरे को प्रभावित किया है । क्रांतिकारी आवेग भी लहरों की तरह चलता रहा है । उसकी उठान आती है, उसके बाद बिखराव आता है तब उनका उतार हो जाता है । सहकालिक क्रांतियों में नेताओं या विचारों की यात्रा को छोड़कर भी सम्पर्क का एक और रास्ता होता है । एक जगह पर होनेवाली क्रांति दूसरे देश में समाजार्थिक या राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकती है । उदाहरण के लिए अमेरिकी क्रांति में फ़्रांस का बहुत धन लगा जिससे फ़्रांस में आर्थिक संकट आने से फ़्रांसिसी क्रांति के हालात पैदा हुए ।

क्रांति की धारणा में भी काल और देश के अनुसार बदलाव आता रहा है । अलग अलग देशों में न केवल इसके लिए अलग शब्द होते हैं बल्कि उनके मतलब भी अक्सर एक समान नहीं होते । पश्चिमी दुनिया में जिस अर्थ में इसका प्रयोग किया जाता है उसमें दुनिया भर की हलचलों के बारे में जितना स्पष्ट होता है उतना अस्पष्ट रह जाता है । फ़्रांसिसी क्रांति से पहले इसका मतलब पुरानी राजनीतिक व्यवस्था में वापस पहुंचना हुआ करता था । पहले ग्रहों की गति से जुड़ी परिघटना के लिए प्रयुक्त इस शब्द को राजनीतिक शब्दावली में बाद में प्रवेश मिला । राजनीति में भी इसे चक्रीय गति की तरह ही समझा जाता था । इसके पीछे मान्यता थी कि पूरी नयी व्यवस्था का निर्माण सम्भव नहीं और प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था की पूर्वनिर्धारित क्रमावधि है । तब मानव इतिहास को भी बहुत कुछ प्राकृतिक परिघटना समझा जाता था जिसमें मनुष्य के हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं होती । हाब्स ने भी शासनों के एक चक्र के लिए ही इस शब्द का इस्तेमाल किया है । आज जिसे क्रांति कहा जाता है उसे उस समय विद्रोह या फ़साद कहा जाता था । इसके कारण ही हान्ना आरेन्ट का मानना था कि क्रांति का अस्तित्व आधुनिक युग से पहले नहीं था ।

प्रबोधन के समय इस शब्द का अर्थ बदलना शुरू हुआ । अब इसे मानव जनित क्रिया समझा जाने लगा । इसके साथ ही जनता की धारणा भी लोकप्रिय होना शुरू हुई क्योंकि क्रांतियों को सामूहिक प्रयास माना जाने लगा । यह भी माना जाने लगा कि क्रांतियों से पूरी तरह नयी सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था का जन्म होता है । समय की भी चक्रीय समझ की जगह पर रेखीय समझ विकसित हुई । धीरे धीरे क्रांति के साथ मुक्ति और प्रगति की उम्मीद भी जुड़ती गयी । जब मार्क्स ने क्रांतियों को इतिहास का इंजन कहा तो प्रगति की इसी धारणा के तहत ऐसा माना । समझ में इस बदलाव के साथ शब्द में भी बदलाव आया और इसके लिए इंकलाब नामक अरबी शब्द लोकप्रिय हो गया । अटलांटिक क्रांतियों के बाद यही अर्थ दुनिया भर में मान्य हो गया । किताब में भी इसी अर्थ में क्रांति को समझा गया है ।

अतीत और वर्तमान के समाजों को समझने के लिए विद्वानों ने क्रांति की अलग अलग तरीके से व्याख्या की है । किसी भूभागीय राजनीतिक इकाई में शासक समूह में अचानक परिवर्तन से लेकर सामाजिक क्रांति की ऐसी धारणा तक जिसमें समाज, राजनीति और वर्गीय संरचना में तीव्र रूपांतरण हो जाता है, तमाम तरह की धारणाओं के सहारे इसे समझने की कोशिश होती है । कुछ लोग इसे शासन पर कब्जे के लिए दो समूहों की जन समर्थित होड़ के रूप में भी पेश किया है । इस किताब में किसी देश में सत्ता पर शासक की दावेदारी के विरोध में बहुसंख्यक लोगों के उठ खड़े होने से पैदा त्वरित और अक्सर हिंसक बदलाव को क्रांति के रूप में समझा गया है । साथ ही क्रांति के जन समर्थित गम्भीर प्रयासों को भी इसमें शामिल किया गया है । तख्तापलट या बाहरी हस्तक्षेप से शासक बदलने को ऐसी परिघटना नहीं माना गया है । क्रांति की परिभाषा के राजनीतिक होने के बावजूद उनका सांस्कृतिक आयाम भी प्रकट होता रहा है । राजनीतिक संस्कृति, सामाजिक वातावरण, भाषा और विश्वदृष्टि को आकार देने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है । भय या उम्मीद जगाने में भी इन्होंने योग दिया है ।

क्रांतियों के दीर्घकालीन और तात्कालिक कारणों का दसियों साल तक अध्ययन किया जाता है । उनके कारक, लक्ष्य, साधन और गतिपथ के लिहाज से निजी सिविल नाफ़रमानी के सामूहिक अवज्ञा में बदलने तक और सरकारी ढांचे के नियंत्रण में बदलाव से लेकर पुराने शासकों की विश्वदृष्टि की जकड़बंदी टूटने तक इतिहास में तमाम रूप प्रकट होते रहे हैं । उनकी प्रकृति में मौजूद इस विविधता के चलते क्रांतियों का विश्व इतिहास लिखना मुश्किल है लेकिन इससे उनकी प्रकृति को समझने में मदद मिलती है ।

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