Wednesday, February 8, 2023
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फ़िल्म समीक्षा- स्पाइडर मैन: फ़ार फ्रॉम होम

स्पाइडर मैन मेरा पसंदीदा कॉमिक चरित्र है, लाखों करोड़ों अन्य लोगों का भी। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसके प्रशंसकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

बच्चों और किशोरों की दुनिया का एक ऐसा सुपर हीरो जो काफी कुछ उन सा ही है। तथाकथित स्मार्ट लोगों के बीच सामान्य, शांत, गंभीर, अंतर्मुखी, अपनी प्रेमिका को अपने दिल की बात कहने में हिचकिचाने वाला मगर कुछ बड़ा करने की इच्छा रखने वाला भी।

इसके लिए हर किसी को पावर की जरूरत होती है। पर पावर भी सभी को नहीं मिलती है उसे ही मिलती है जो इसे संभाल सकने के योग्य हो, जिसका प्रकृति इसके लिए चयन करे। ऐसे में उस आम लड़के को भी संयोग से एक रेडियोधर्मी मकड़ी के काटने से कुछ चमत्कारी शक्तियाँ मिल जाती हैं।

शुरू में इनका उपयोग वो लोगों का अपनी ओर ध्यानाकर्षण करवाने के लिए करता है, जैसे आज की सोशल मीडिया में प्रसिद्धि की चाह! लेकिन फिर उसे अहसास होता है कि शक्ति के साथ जिम्मेदारियां भी आती हैं।
1962 में मार्वल कौमिक्स के माध्यम से उभरा यह पात्र आज पूरे विश्व में लोकप्रिय है, परंतु इतने वर्षों बाद भी अपनी उन्हीं कैशोर्य भावों को बचाए हुये है। शायद इसलिए भी कि यही वह दौर है जब एक युवा किसी पूर्वाग्रह से अलग खुले रूप से किसी भी बात को उसके सभी पक्षों के साथ देख-समझ सकता है। गलती कर सकता है और उससे सबक लेते उसे सुधार सही पक्ष का साथ दे सकता है।


‘स्पाइडर मैन: फार फ्रम होम’ फिल्म की थीम यह है कि स्पाइडर मैन यानी कि पीटर पार्कर ‘अवेंजर्स: एंडगेम’ के बाद अपने घर लौटा है और अब एक सामान्य जीवन जीना चाहता है, अपने परिवार, दोस्तों और अपनी क्रश के साथ। वो अपने स्कूल ट्रिप के साथ यूरोप जाता है, लेकिन इस बीच वहाँ एक खतरनाक विलेन जिसकी शक्ल किसी तूफान जैसी है की एंट्री होती है, जिसका सामना करने के लिए निक फ्यूरी और उनकी टीम स्पाइडर मैन की भी सहायता चाहती है।

इसका सामना करने के दौरान एक और सुपरहीरो बेक की एंट्री होती है जो उस विलेन से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्पाइडर मैन भी उससे प्रभावित होता है और अपनी तुलना में उसकी परिपक्वता देखते और ज्यादा जिम्मेदार मानता उसे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस युक्त चश्मे वाला गैजेट दे देता है जो आयरन मैन की मौत के बाद फ्यूरी ने उसे एक जिम्मेदारी के रूप में सौंपा था। इस चश्मे में स्टार्क इंडस्ट्री के डाटाबेस की पहुँच और कई हथियारों का नियंत्रण भी है।

इसके बाद सच्चाई सामने आती है कि बेक स्टार्क इंडस्ट्री का ही होलोग्राफिक इल्यूजन स्पेशलिस्ट रह चुका है और वहीं के कुछ अन्य असंतुष्ट कर्मचारियों के साथ ड्रोन, प्रोजेक्टर आदि के माध्यम से एक मिथ्या भ्रामक ख़तरे की रचना करता है, जो लोगों को वास्तविक लगे, वो उससे डरें और उस डर से उन्हें मुक्ति दिलाने के लिए उसका सामना कर वो हीरो के रूप में उभर सके। जितना बड़ा ख़तरा उतना बड़ा सुपर हीरो! अब समस्या कोई प्रत्यक्ष विलेन ही नहीं है, बल्कि अब विलेन अब हीरो के मध्य अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।

स्पाइडर मैन इस छल को समझ जाता है और उसके इस मायाजाल को तोड़ एक छद्म सुपरहीरो की एवेंजर्स में प्रवेश की संभावना को ख़त्म कर देता है।

फिल्म तो सुखांत पर ख़त्म होती है, पर कुछ विचारणीय बिन्दु भी छोड़ती है। क्या आज की दुनिया की एक बड़ी आबादी अपनी समस्याओं के हल के लिए सुपरहीरो की तलाश में नहीं है!

उसे उसकी बुनियादी समस्याओं, वास्तविक दुश्मन गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, अशिक्षा, रोगों आदि की ओर से बहका कर काल्पनिक दुश्मनों के भय से प्रभावित नहीं किया जा रहा है! फेक न्यूज जैसे माध्यम ऐसे भ्रम निर्मित करने में उसका साथ नहीं दे रहे हैं! क्या कोई वास्तविक सुपरहीरो इस व्यूह को भेद पाएगा! युवाओं से ही उम्मीद है…

अभिषेक मिश्र
(अभिषेक कुमार मिश्र भूवैज्ञानिक और विज्ञान लेखक हैं. साहित्य, कला-संस्कृति, फ़िल्म, विरासत आदि में भी रुचि. विरासत पर आधारित ब्लॉग ‘ धरोहर ’ और गांधी जी के विचारों पर केंद्रित ब्लॉग ‘ गांधीजी ’ का संचालन. मुख्य रूप से हिंदी विज्ञान लेख, विज्ञान कथाएं और हमारी विरासत के बारे में लेखन)
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