Saturday, December 10, 2022
Homeस्मृति‘ चाँद की बातें चलती रहेंगी, सूरज की बातें चलती रहेंगी ’

‘ चाँद की बातें चलती रहेंगी, सूरज की बातें चलती रहेंगी ’

युवा चित्रकार राकेश दिवाकर की याद में लिया गया संकल्प

आरा: स्थानीय रेडक्रॉस सभागार में 29 मई को जन संस्कृति मंच की ओर से चित्रकार, अभिनेता, कला-शिक्षक, छायाकार-पत्रकार, समीक्षक राकेश कुमार उर्फ राकेश कुमार दिवाकर की याद में ‘संकल्प सभा’ का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता कथाकार नीरज सिंह, सुरेश कांटक, कवि-समीक्षक जितेंद्र कुमार, संस्कृतिकर्मी संतोष सहर और विधायक सुदामा प्रसाद ने किया तथा संचालन सुधीर सुमन ने किया।

‘संकल्प सभा’ के आरंभ में चित्रकार राकेश कुमार दिवाकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित किया गया। उसके बाद पटना से आये हिरावल के सचिव संतोष झा ने राकेश की याद में लिखे गये गीत ‘चाँद की बातें चलती रहेंगी, सूरज की बातें चलती  रहेंगी’ सुनाकर पूरे माहौल को भावपूर्ण बना दिया। फिर राकेश कुमार और उनके सहकर्मी शिक्षक राजेश कुमार की याद में एक मिनट का मौन रखा गया।

‘संकल्प सभा’ को संबोधित करते हुए डॉ. नीरज सिंह ने कहा कि राकेश कला की साधना तो कर ही रहे थे, कला की विशेषज्ञता भी हासिल की थी। चित्रकला के मर्मज्ञ के रूप में उनकी अकेली पहचान बन चुकी थी। आरा की तमाम सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी रहती थी। परिवर्तकारी राजनीतिक सचेतनता उनकी पहचान थी। वे कभी स्मृतियों से ओझल नहीं होंगे। इसे ही अमरत्व कहा जाता है।

संतोष सहर ने कहा कि राकेश की कलाकृतियों में बड़े बदलाव का पूर्वाभास नजर आता है। उन्होंने जो भी किया, काफी सोच-समझकर और तल्लीनता के साथ किया। कला या साहित्य में औसतपना खतरनाक चीज है। किसी की कला पर लिखने के लिए कलाकार के द्वंद्व पर ध्यान देना चाहिए। राकेश जैसे उम्दा कलाकार पर लिखने वालों को भी गहरे आत्मसंघर्ष से गुजरकर लिखना होगा। साठ के दशक के अंत में साहित्य का रुख जिस तरह जनता की ओर मुड़ा, उसी तरह राकेश ने अपने दौर में चित्रकला को जनता से जोड़ने का काम किया।

कथाकार सुरेश कांटक ने कहा कि राकेश दिवाकर को भोजपुर की कला के संस्थापक के रूप में लेना चाहिए। उन्होंने यहां की किसान-मजदूरों और महिलाओं के संघर्ष को चित्रित किया। इसी तरह के विचार कवि-समीक्षक बलभद्र ने भी व्हाट्स ऐप के जरिए भेजे थे कि आरा की धरती कविता, कहानी के लिए जानी जाती थी, राकेश ने इसे चित्रकला के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण बनाया।

कवि-समीक्षक जितेंद्र कुमार ने कहा कि राकेश राजनैतिक दृष्टि संपन्न कलाकार थे। उन्होंने संकल्प लिया था कि बाजार में अपनी कला को नहीं बेचेंगे और उस संकल्प पर कायम रहे। उनके लिए बड़ा सवाल यह था कि किनके लिए चित्र बनाया जाए। उन्होंने मजलूमों, मजदूरों को अपनी कला का विषय बनाया जिनके श्रम पर दुनिया चलती है।

तरारी विधायक सुदामा प्रसाद ने कहा कि ऐसी दुर्घटनाएं न हों, इसका प्रयास करना चाहिए। उन्होंने बताया कि राकेश ने उनके कहने पर तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन की जीत के बाद कविता पोस्टर बनाये थे।

कवि सुमन कुमार सिंह ने सपनों और संघर्षों के साथी के रूप में राकेश को याद किया और कहा कि राकेश लंबे समय तक सांस्कृतिक संघर्षों के लिए प्रेरणा का कार्य करेंगे।

राकेश के साथी चित्रकार रौशन राय ने कहा कि राकेश सीधे अवाम से जुड़ गए थे। जब तक साँसें चल रही हैं, वे राकेश को नहीं भूल सकते। अपने चित्रों में खुद को रखकर सृजन प्रक्रिया को आगे बढ़ाना राकेश को अन्य कलाकारों से अलग करता है। कवि सिद्धार्थ वल्लभ ने कहा कि राकेश के चित्रों में जटिलता नहीं है, बल्कि उसे देखकर महसूस होता है कि वे किसी द्वंद्व से जूझ रहे हैं।

संभावना कला मंच, गाजीपुर से आए चित्रकार सुधीर सिंह ने कहा कि राकेश की रेखाएं काफी सशक्त थीं। वे रोज चित्र बनाते थे। उनका रचना-संसार बहुत बड़ा था। उसी संस्था से संबद्ध राजीव गुप्ता ने कहा कि उनकी जो पुस्तक प्रकाशित होने वाली है, उसमें हर तरह के कलाकारों पर लिखा है। उनका यह कहना था कि बड़े स्थापित कलाकारों पर तो सब लिखते हैं, पर छोटी जगहों पर काम करने वाले कलाकारों पर कौन लिखेगा। इसी चिंता के तहत उन्होंने समकालीन कलाकारों पर लिखा।

संकल्प सभा के अंत में दस सूत्री प्रस्ताव और संकल्प पढ़ा गया। जिसमें राकेश कुमार दिवाकर और राजेश कुमार की मौत के जिम्मेवार ट्रैक्टर चालक और मालिक के खिलाफ कार्रवाई करने, अवैध बालू खनन और अनियंत्रित बालु ढुलायी करवाने वाले बालू माफियाओं पर अंकुश लगाने, राकेश कुमार और राजेश कुमार के परिजनों को अविलंब न्यूनतम पांच लाख रुपये की सहायता राशि प्रदान करने। दोनों शिक्षकों का पवना हाई स्कूल में स्मारक बनाने, आर्ट कॉलेज का पुनरुद्धार करने तथा उसका नामकरण राकेश कुमार दिवाकर के नाम पर करने तथा राकेश के चित्रों और लेखन को संरक्षित करने तथा उनकी याद में हर साल आयोजन करने तथा ‘कला कम्यून’ को संगठित करने और राकेश से संबंधित संस्मरणों की किताब प्रकाशित करने आदि प्रस्ताव और संकल्प लिये गये।

‘संकल्प संभा’ में जनपथ संपादक कथाकार अनंत कुमार सिंह, इप्टा के अंजनी शर्मा, कवि सुनील श्रीवास्तव, कवि सुनील चौधरी, गीतकार राजाराम प्रियदर्शी, रंगकर्मी सुनील सरीन, कहानीकार और रंगकर्मी डॉ. विंद्येश्वरी, शिक्षक सुनील सिन्हा, चित्रकार कौशलेश, शिक्षक व रंगकर्मी सुभाषचंद्र बसु, स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी विभा सिन्हा ने भी राकेश से जुड़े संस्मरण सुनाए और उनके महत्त्व को चिह्नित किया। संकल्प सभा में जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही, कवि आदित्य नारायण, संस्कृतिकर्मी अनिल अंशुमन, कुर्बान आतिश, धनंजय कटकैरा, सूर्यप्रकाश, अमित मेहता, राजेश कमल, प्रीति प्रभा,  शिवप्रकाश रंजन, शमशाद प्रेम, विजय मेहता, कमलेश कुंदन, संतोष श्रेयांश, नागेंद्र पांडेय, संजीव सिन्हा, कृष्णरंजन गुप्ता, सत्यदेव, दिलराज प्रीतम, माले जिला सचिव जवाहरलाल सिंह, अरविंद अनुराग, रामकुमार नीरज, क्यामुद्दीन, शमशाद प्रेम, अशोक मानव, मंगल माही, निरंजन कुमार, जितेंद्र शुक्ला, किशोर कुमार, बालरूप शर्मा, रविशंकर सिंह, संजय कुमार, राजेंद्र यादव, धर्मकुमार राम, कृष्णेंदु, अखिलेश कुमार, मानसी गुप्ता, जितेंद्र शुक्ला, का. जितेंद्र कुमार, ओमप्रकाश मिश्र, धनंजय सिंह, डॉ. युगल किशोर, प्रतिज्ञा साधना अर्चना, अनिल कुमार वर्मा, श्याम सुंदर राम आदि मौजूद थे।

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