Friday, July 1, 2022
Homeसाहित्य-संस्कृतिमध्यकालीन हिंदी साहित्य के अनुभव परिसर को विस्तार देती हैं मुगल बादशाहों...

मध्यकालीन हिंदी साहित्य के अनुभव परिसर को विस्तार देती हैं मुगल बादशाहों की हिंदी कविताएँ 

डॉ.संगीता मौर्य

                                                           

दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला के 26 अप्रैल 2022 संस्करण में  अमित शर्मा की छपी एक रिपोर्ट के अनुसार सीबीएसई के नये पाठ्यक्रम में मुगलों के इतिहास को कम करने एवं मध्यकालीन भारत के विषय में छात्रों को सीमित जानकारी देने की बात की गयी है। इसी तरह शहरों के नाम  बदले गये। जिसमें  मुगलसराय, इलाहाबाद आदि शहरों के नाम में परिवर्तन को हम देख सकते हैं।

भारत देश की खूबी इसकी अनेकता में एकता ही है। विभिन्न धर्म, संस्कृतियाँ, तीज-त्योहारों की यह विविधता ही इसकी सुंदरता है। इसकी सुंदरता में दाग लगाने का काम समय-समय पर होता रहा है। मुग़ल राजवंश भारत में एक गौरवपूर्ण स्थान रखता है। मुगलों ने भारत वर्ष में एक बड़े साम्राज्य का निर्माण किया। हिन्दुओं की संस्कृतियों, उनकी भाषाओं को जानने-समझने की एक शानदार कोशिश की। मुग़ल बादशाहों ने पर्शियन शैली को भारतीय शैली में मिलाकर एक अनूठी भारतीय वस्तुकारी का नमूना पेश किया। इन्होंने वास्तुकला, स्थापत्य कला, चित्रकला के साथ ही संगीत तथा साहित्य में  भी  महत्वपूर्ण काम किया। मुगल बादशाहों का यह कार्य भारत को और हिंदी साहित्य के अनुभव संसार को विस्तार देता है।

“मुग़ल-वंश के समय में भारत ने पुनः विदेशों से संपर्क स्थापित किया। भारत ने विदेशों और मुख्यतया उत्तर-पश्चिम के दूरस्थ देशों से व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध स्थापित किये। भारत के व्यापार, उद्योग और संपत्ति में भी वृद्धि हुई। इसका प्रभाव कला और साहित्य पर पड़ा। मुग़ल-काल में वास्तुकला, चित्रकला, नृत्यकला, संगीतकला आदि सभी कलाओं और फारसी, उर्दू, हिन्दी आदि विभिन्न भाषाओं के साहित्य की प्रगति हुई।”[i]

मुगल बादशाहों की मातृभाषा तुर्की थी, जबकि उनके धर्म की भाषा अरबी और फारसी थी। लेकिन उनकी रूचि और पसंद की भाषा हिंदी थी। इतिहास गवाह है कि मुगल बादशाह बाबर से लेकर अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र तक सभी ने हिंदी और हिंदी कवियों का बड़ा आदर किया । मुगल साम्राज्य की स्थापना का श्रेय बाबर को जाता है। इसका जन्म फरवरी 1483 में आन्दिजान में हुआ था। जो वर्तमान में उज्बेकिस्तान का हिस्सा है। जब बाबर अपने राज्य आन्दिजान में शासन कर रहा था, उन दिनों इब्राहिम लोदी की सेना का एक सैन्य अधिकारी बाबर से जा मिला। उस समय बाबर अपने अधिकारियों को बेग उपाधि से नवाजता था। इब्राहिम लोदी का अधिकारी जब बाबर की सेना में मिल गया तो वह ‘हिन्दू बेग’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस ‘हिन्दू बेग’ ने बाबर, हुमायूँ और अन्य सैन्य अधिकारी को, जो अब ‘बेग’ के नाम से प्रसिद्ध थे, सबको हिंदी सिखायी।

बाबर अपनी मातृभाषा तुर्की में कविता लिखता था। भले ही बाबर का समय युद्धों और संघर्षों का रहा हो, बावजूद इसके बाबर के कवि ह्रदय में कविताएँ हमेशा हिलोर लेती रहीं । प्रोफेसर हादी हसन के मुताबिक बाबर की फारसी में लिखी उन्नीस कविताएँ मिलती हैं। बाबर अपने ‘बाबरनामा’ में जिक्र करता है कि 13 शव्वाल 928 हिजरी(6 सितंबर,1522ई.) का यह वर्ष बाबर की अति व्यस्त साहित्यिक गतिविधियों का वर्ष भी रहा। उसने अपने पुत्र कामरान की शिक्षा के लिए दो हजार पंक्तियों की एक तुर्की कविता लिखी। नादिराते शाही में लिखा है-

“भारतीय मुग़ल राजवंश के बादशाहों और उनके परिवार के सदस्यों के जीवन में कविता हमेशा मौजूद रही है । यहाँ तक कि उनके बारे में जो इतिहास लेखन हुआ है, उसमें भी कविता मिलती है ।[ii]

तुर्की मातृभाषा होने के बाद भी मुग़ल बादशाहों ने हिंदी में कविताएँ लिखीं । जिन्होंने कविताएँ नहीं लिखीं, वह भी हिंदी को सम्मान देने में पीछे नहीं रहा। मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं-

“बाबर जब भारत का बादशाह बना तभी से मुग़ल-दरबार में हिन्दी कविता की मौजूदगी के प्रमाण मिलते हैं।”

चन्द्रबली पांडे बाबर के दरबार में एक दोहा सुनाये जाने का उल्लेख करते हैं-

              “नौ सौ ऊपर था बतीसा, पानीपत में भारत दीसा।

              अठई रज्जब सुक्करवारा, बाबर जीता वराहीम हारा।।”[iii]

         बाबर यह स्वीकार करता है कि वह यहाँ की बोली-भाषा से परिचित नहीं था । इस संबंध में अजीजुद्दीन हुसैन लिखते हैं-

“न हम यहाँ की बोली समझ सकते हैं और न यहाँ वाले हमारी जबान जानते हैं ।”

लेकिन  बाबर यहाँ की बोली-बानी समझने का पूरा प्रयास करता है।

मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं कि- “बादशाह रहते हुए उसने स्थानीय बोली सीखने और समझने की कोशिश की, जिसका सबूत यह है कि उसके तुर्की कविता के दीवान में एक शेर है, जिसमें दो शब्द हिंदी के हैं ।

“मुज-का न हुआ कूज हवस-ए-मानक-ओ-मोती। 

फुकरा हालीन बस बुल्गुसिदुर पानी-ओ-रोटी।“ [iv]

इसमें ‘पानी’ और ‘रोटी’ शब्द हिंदी के हैं । इसके साथ ही बाबर की आत्मकथा ‘बाबरनामा’ पढ़ते हुए कुछ रुबाईयों का जिक्र मिलता है-

हाय, तौबा के मारे परेशान हूँ!         

क्या करूँ क्या नहीं,सख्त हैरान हूँ!   

लोग पछता के करते हैं तौबा,   

मगर मैं तो तौबा ही करके पशेमान हूँ !”[v]

 

अत: हम कह सकते हैं कि बाबर के समय में हिंदी की रुबाईयाँ प्रचलित थीं। बाबर ऐसा शासक था जो युद्ध के साथ ही भारत के साहित्य, कला और भाषा आदि से प्रभावित हुआ और इन सबको प्रभावित भी किया । बाबर के बारे में इतिहासकार हरवंश मुखिया लिखते हैं कि-

“अगर बाबर भारत न आता तो भारतीय संस्कृति के इन्द्रधनुष के रंग फीके रहते ।”[vi]

उनके अनुसार भाषा, संगीत, चित्रकला, वास्तुकला, कपड़े और भोजन के मामलों में मुग़ल योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

मुग़ल काल का दूसरा बादशाह बाबर और माहम सुल्ताना का बड़ा पुत्र हुमायूँ था। हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 ई.में काबुल में हुआ था। 26 दिसंबर को बाबर के मृत्योपरांत 30 दिसंबर,1530ई. को हुमायूँ मुग़ल-सिंहासन पर बिराजमान हुआ। हुमायूँ को आर्थिक कठिनाई विरासत के स्वरूप ही प्राप्त हुई  थी। यह सच है कि बाबर द्वारा अपने भाईयों को साथ लेकर चलने की नसीहत ने हुमायूँ के रास्ते की मुश्किलों को और बढ़ाया । हुमायूँ के  सामने कई कठिनाईयाँ थीं, जिसमें कलिंजर पर आक्रमण, चुनार का घेरा, बहादुरशाह से संघर्ष, शेरखां से संघर्ष, चौसा का युद्ध, बिलग्राम का युद्ध आदि कठिनाईयों का सामना करते हुए हुमायूँ अपने शासनतंत्र को मजबूत करने की कोशिश करता रहा । इन संघर्षों के बीच भी हुमायूँ ने हिन्दी भाषा  और हिन्दी कविता दोनों को प्रश्रय देने में कहीं कोई कोताही नहीं बरती । यह अलग बात है कि हुमायूँ के कविता लेखन का कोई प्रमाण नहीं मिलता लेकिन वह कविता प्रेमी था जिसके सबूत के तौर पर चंद्रबली पांडे लिखते हैं-

“उसके दरबार में फारसी के कुछ ऐसे कवि थे जो हिन्दी में गीतों की रचना करते थे। वे थे अब्दुल वाहिब बिलग्रामी और शेख गदाई देहलवी।”[vii]

आगे लिखते हैं-

“हुमायूँ के दरबार में क्षेम नाम का एक हिंदी कवि भी था।”[viii]

इस तरह से हम कह सकते हैं कि  हुमायूँ ने हिन्दी कवियों को स्थान दिया था।

मुगलकाल का सबसे यशस्वी और उदार सम्राट अकबर था । राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं-

“अशोक के बाद देश में दूसरा ध्रुवतारा अकबर ही दिखाई पड़ता है। कुषाण कनिष्क (ईसवी प्रथम सदी) अकबर से भी बड़ा विजेता और भारतीय संस्कृति से अत्यंत प्रभावित था । पर, उसे उन पहाड़ों के तोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ी, जिनसे अकबर को मुकाबिला करना पड़ा । समुद्रगुप्त (ईसवी सातवीं सदी) बहुत बड़ा विजेता था, संस्कृति और कला का बड़ा प्रेमी तथा उन्नायक था। पर, उसने करीब-करीब भारत के सारे भाग को एकराष्ट्र कर दिया था। पर, उसके सामने भी वह दुर्लघ्य भयंकर मार्ग-रोधक पर्वतमालायें नहीं आई, जो अकबर के सामने थीं । यही बात हर्षवर्धन (ईसवी सातवीं सदी) के बारे में है । उसके बाद तो कोई ऐसा पुरुष नहीं दीख पड़ता, जिसका नाम अकबर के सामने लिया जा सके। ”[ix]

15 अक्तूबर,1542 ई. में अकबर का जन्म हुआ । इनकी माता का नाम हमीदा बानू बेगम था । अकबर समन्वय की संस्कृति को लेकर आगे बढ़ा । वह हिन्दू-मुस्लिम दोनों को एक साथ मिल – जुल कर रहना सिखाना चाहता था । इसके लिए उसने सुन्दर प्रयास किया । राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं-

“अकबर ने इसी महान समन्वय का बीड़ा उठाया….वह दूर तक सफल हुआ।…हिन्दू-मुसलमान दोनों की संस्कृति-साहित्य, संगीत, कला, ज्ञान-विज्ञान का सब आदर करें, सभी उन्हें स्नेह और सम्मान की दृष्टि से देखें, यह पहला काम था, जिसे अकबर ने सबसे पहले शुरू किया। फिर अकबर ने चाहा, दोनों की मिलकर एक जाति हो जाय- एक हिन्दी या भारतीय जाति बन जाये। इसके लिए उसने दोनों में रोटी-बेटी का संबंध स्थापित किया ।”[x]

अकबर का यही समन्वय भाषाओं में भी दिखता है । अकबर ने हिन्दी भाषा और हिन्दी कवियों  को अपने दरबार में ही नहीं, बल्कि अपने दिल में भी जगह दी। वह केवल हिन्दी कवियों को जगह ही नहीं देता है, बल्कि स्वयं भी हिंदी में कविताएँ लिखता है। अकबरनामा खंड-1 से यह उद्धरण उद्धृत है कि-

“बादशाह सलामत का स्वभाव बड़ा प्रेरणामय है और वे हिन्दी तथा फारसी में कविताएँ भी लिखते हैं । वह बहुधा काव्यालोचन के गंभीर विषयों पर भी चर्चा करते हैं । काव्य पुस्तकों में वे रूमी की मसनवी तथा हाफिज के दीवान के अंश मुँह जबानी सुनाते हैं तथा उनकी विविधता एवं सुंदरता की व्याख्या भी करते हैं । निम्नलिखित काव्यांश बादशाह की योग्यता का परिचय देता है :-

मजनूँ के गले में ये पागल-पन की जंजीर नहीं है,

यह स्नेह का हाथ है जिसे प्रेम ने उसके गले  पर रखा है।।

 

आगे लिखते हैं-

“हिंदी में भी उन्होंने कविताएँ बहुरंगी अनोखे ढंग की लिखी हैं जो काव्यकला का बेजोड़ उदाहरण हैं।”[xi]

समन्वय की विराट चेष्टा अकबर के यहाँ मौजूद थी। यही कारण था कि जितना वह हिन्दू को सम्मान देता था, उतना ही मुस्लिम को ı दोनों के लिए बराबर नियम कानून थे ।

कृष्ण कल्पित लिखते हैं- “अकबर ने हिन्दू-मुसलमान में कोई भेद नहीं किया अकबर दिल्ली के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान का वैसा ही मुरीद था जैसा असदुल्ला खां, ग़ालिब,  मीर तकी का । अकबर ने चन्द बरदाई विरचित एक लाख छंदों वाले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो को आद्यांत सुना था!”[xii]

इतना ही नहीं, इनके यहाँ धर्म का समन्वय भी खूब दिखाई पड़ता है । इनका धर्मग्रंथ ‘दीन-ए-इलाही’, धर्म के समन्वय का अनूठा उदाहरण है । मैनेजर पाण्डेय ने ‘मुग़ल बादशाहों की हिन्दी कविता’ नाम से एक महत्वपूर्ण पुस्तक का संकलन और संपादन किया है, जिसमें उन्होंने बाबर और हुमायूँ का जिक्र करते हुए अकबर से लेकर बहादुर शाह जफ़र तक की कविताओं को रखा है । इसमें अकबर की लगभग 36 कविताओं का संकलन है ı मैनेजर पाण्डेय के संपादन में निकली यह पुस्तक महत्वपूर्ण है, जिसको पढ़ा जाना चाहिए। मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं कि-

“इस कविता-संग्रह को पढ़ते हुए पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि ये पद, गीत, और गान जिस ग्रंथ से लिए रचे गए हैं, वह संगीत का ग्रंथ है । संग्रहकर्ता कृष्णानन्द व्यास देव रागसार ने 32 वर्षों तक सारे भारत में घूम-घूम कर गीतों का संग्रह किया था । ये पद, गीत या गान गायकों की मदद से मौखिक परंपरा से प्राप्त हुयी हैं। गायिकी की प्रक्रिया में स्वर, तान, लय, राग-रागिनी आदि की सुविधा और जरुरत के अनुसार पाठों में परिवर्तन संभव है।”[xiii]

इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ ‘संगीत रागकल्पद्रुम’ नामक ग्रंथ से और कुछ ‘नदिराते शाही’ ली गयी हैं । संगीत ग्रंथ होने के कारण इसके पाठ का प्रभाव और इसके श्रवण का प्रभाव में अंतर आना स्वाभाविक है। अकबर के दरबार के नवरत्नों में वीरबल और राजा टोडरमल जैसे कवि भी थे, जो मुख्य सलाहकार भी थे। हिन्दू और मुस्लिम को बाँटने वाले कुछ लोग अकबर और महाराणा प्रताप की लड़ाई को धर्म की लड़ाई बताकर आपस में वैमनस्य फैलाना चाहते हैं ı लेकिन उनको यह बात याद रखनी होगी कि अकबर और महाराणा प्रताप की लड़ाई धर्म की लड़ाई नहीं थी, बल्कि वह सत्ता की लड़ाई थी । डॉ. रामपुनियानी अपने एक व्याख्यान में कहते हैं कि-

“हल्दी घाटी के मैदान में एक तरफ अकबर की सेना है तो दूसरी ओर महाराणा प्रताप की सेना है । अकबर की सेना में अकबर खुद नहीं है बल्कि अकबर के बदले राजा मान सिंह हैं जो अकबर के प्रधान सेनापति हैं। राजा मान सिंह की सेना में हिन्दू भी हैं, मुसलमान भी हैं। इधर महाराणा प्रताप की सेना में उनके सेनापति हकीम खान सूर हैं ।  दोनों ही सेनाओं में हिन्दू और मुसलमान दोनों हैं । इसलिए यह लड़ाई धर्म के लिए नहीं है, सत्ता के लिए है। यह लड़ाई हिन्दू मुसलमानों के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह लड़ाई दो राजाओं के बीच में है।”[xiv]

आगे कहते हैं कि

“अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर राजा बने और महाराणा प्रताप की विरासत मिली राजा अमर सिंह को। लेकिन जहाँगीर और अमर सिंह में दोस्ती हो गई। बाद में अमर सिंह, जहाँगीर के एक मजबूत आधार के रूप में रहे।”[xv]

एक बड़ी अच्छी फ़िल्म आई थी ‘मुग़ले आज़म’ जिसमें धर्म के समन्वय को बड़ी खूबसूरती से दिखाया गया है। अकबर के महल के अंदर कृष्ण-मंदिर होना और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे उत्सव का बड़े धूम-धाम से मनाया जाना धार्मिक समन्वय का एक बड़ा संदेश है । इस तरह की बात का उल्लेख इतिहास में भी मिलता है।

               इससे बढ़िया समन्वय क्या हो सकता है कि अकबर जैसा बादशाह हिन्दी में कविता लिख रहा है। अकबर की कविताओं को पढ़ने पर सूरदास की कविताओं की याद आने लगती है जिसमें वह कृष्ण की आराधना करता है-

कन्हाते अब घर झगरो पसारो / कैसे होय निरवारो।

यह सब घेरो करत है तेरो रस/ अनरस कौन मंत्र पढ़ डारो।।

इन कविताओं में संगीत की गहरी समझ के साथ ही भक्ति है, जिसमें कृष्ण की आराधना की गयी है ı अब सब घर में जो झगड़ा फैल गया है, उसका निपटारा कैसे हो? अकबर की एक और कविता जिसमें वह जनता के दुःख को हरने की बात करता है-

शाह अकबर के दुरजन दूर करो मौन-दीन ख्वाजा।

सप्तदीप और अष्ट दिशा पर हुकुम होय ।।

सब मुलक खलक पर और जाय तन मन ते।

दुःख दारिद्र भाजा ।।”[xvi]

कुछ पद ईश्वर की वंदना के भी मिलते हैं-

प्यारे तू मन मेरे तन में बसत रजनी दिन तोही सों

जीवन बनत मेरो।”[xvii]

तो कुछ पदों में राग-रागिनियों की गहरी समझ अभिव्यक्त होती है-

भोरही भैरवराग अलाप्यो/ अहो प्यारे वंशी में आन।

खरज गांधार रिषभ पंचप/ मध्यम निषाद धैवत तान।।

आरोही अवरोही अस्थायी/ संचाई ताल काल और मान।  

उरपति रप लाग डांट देशी/मारग तानसेन सुनो साह अकबर परमान।।”[xviii]

अकबर की कविताओं को पढ़ते हुए बहुत बार ब्रज भाषा कवि सूरदास की कविताएँ मेल खाती प्रतीत होती हैं-

‘नाथ,अनाथन की सुधि लीजै’ कुछ इस तरह के और भी पद देखने को मिल जाते हैं । हम जानते हैं कि  अकबर के नवरत्नों में से एक रहीम भी भक्ति कविता लिखते थे। अकबर के दरबार में प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन भी थे। उन दिनों राजा टोडरमल भी ‘राजा ढोल और मरवन’ की कथा लिख रहे थे। अकबर के समय के ही कवि श्रीपति लिखते हैं-

अब के सुल्तान फुनियांन समान है,बांधत पाग अट्ब्बर की

तजि एक को दूजो भजै जो कोई,जब जीभ कटे वहि लब्बर की

सरनागत श्रीपति ‘श्रीपति’ की, नहिं त्रास है काहुहि जब्बर की

जिनको कुछ आस नहीं हरि की, सौं करौ मिलि आस अकब्बर की।।[xix]

 

श्रीपति इस कविता में सीधे कहते हैं जिसको हरि की आस नहीं है, वह ही अकबर की आस करता है। अर्थात श्रीपति, अकबर के संरक्षत्व को अस्वीकार करते हैं । इस कविता को श्रीपति अकबर के दरबार में सुनाते हैं । जिसे सुनकर अकबर नाराज नहीं होता, बल्कि श्रीपति को पुरस्कृत करता है । कवि और कविता के प्रति इतना आदर कम देखने को मिलता है।

      जहाँगीर, अकबर और जयपुर की राजकुमारी मरियम उज्ज्मानी का पुत्र था। जहाँगीर तीक्ष्ण बुद्धि वाला योग्य शासक था। डॉ.बेनी प्रसाद ने जहाँगीर के बारे में लिखा है कि-

“सर्वांगिक रूप से जहाँगीर का शासन काल साम्राज्य के लिए शांति और समृद्धि का रहा । उसकी संरक्षता में उद्योग और व्यापार की उन्नति हुई, स्थापत्य-कला ने महत्त्वपूर्ण सफलता पायी, चित्रकला अपने उच्चतम शिखर तक पहुँच गयी, साहित्य की इतनी प्रगति हुई जितनी पहले कभी नहीं थी।”[xx]

मैनेजर पाण्डेय जहाँगीर की 4 कविताओं का जिक्र करते हैं ı संभवतः कविताओं की संख्या ज्यादा भी हो सकती है । क्योंकि जहाँगीर ने  अपने शासन काल के सत्रह वर्ष तक का वृत्तांत अपनी आत्म कथा में लिखा है । जहाँगीर के दरबार में कवियों का खूब सम्मान था। जहाँगीर अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-जहाँगीरी’ में स्वयं लिखता है-

“मैंने निशापुर वाले नाजिरी को बुलाया था । यह काव्य कला में अन्य लोगों से बढ़कर था । इस समय वह मेरी सेवा में आया और उसने अनवरी की इस कसीदे का अनुकरण किया –बाज इंचे जवानी व जमालस्त जहाँरा । आगे लिखते हैं मैंने उसको एक हजार रुपये और एक घोड़ा, एक लिखअत इस कसीदे के लिए पुरस्कार स्वरूप दिया।”[xxi]

इस पुरस्कार से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जहाँगीर कला प्रेमी के साथ ही साहित्य प्रेमी भी था । इसकी कविताएँ इसका प्रमाण हैं –

बनि बिन वनिता आई है पिय मन भाई सौतन/मध खेलत लालभँवर मानों फूल फुलवारी।

एकनसों नैन सैन एकनसों  मीठे वैन एकन को/पाछे ते अंक भरत अचानके छवि।

भई दूनी दुले रागहिंडोल मिल गई।। [xxii]    

शाहजहाँ के शासनकाल की अवधि लगभग तीस वर्ष की थी। यह काल भी मुग़ल साम्राज्य के लिए वैभव का काल रहा ı इसलिए इसको मुग़ल काल का स्वर्ण-युग भी कहा जाता है। क्योंकि अकबर ने जो श्रेष्ठता का पैमाना निर्धारित कर दिया था, उसको आगे बढ़ाने का काम शाहजहाँ ने किया। शाहजहाँ के समय में वास्तु-कला की खूब उन्नति हुई, साथ ही भाषा के क्षेत्र में भी शाहजहाँ ने महत्वपूर्ण काम किया। इस समय में फारसी, हिन्दी, संस्कृत आदि भाषाएँ भी उन्नति कर रही थीं। वह हिन्दी प्रेमी था। शाहजहाँ के समय में राज कवि पंडितराज जगन्नाथ थे, जिन्होंने ‘गंगाधर’ और ‘गंगा लहरी’ नामक ग्रंथ की रचना की। ‘सिंहासन बतीसी’ और ‘बारहमासा’ के लेखक सुंदरदास को भी शाहजहाँ का संरक्षण प्राप्त था। यह बात भी गौर करने वाली है कि साहित्य और कला को सम्मान  देना वाला शाहजहाँ कविता का भी बड़ा प्रेमी था। एके क्राइनिकी  लिखते हैं-

“कविता शाहजहाँ के दरबार की भाषा बन गयी थी। बादशाह दरबार में कविता में बात करता था, आम जनता से अपने दरबारियों से भी, और दूसरे लोग कविता में ही जवाब देते थे।”[xxiii]

इस तरह शाहजहाँ के दरबार में फारसी, संस्कृत, हिंदी आदि भाषाओं के कवि स्थान प्राप्त किये हुए थे । इतना ही नहीं, शाहजहाँ ने स्वयं कविता रची । मैनेजर पाण्डेय ने अपनी संपादित पुस्तक ‘मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता’ में शाहजहाँ की चौदह कविताओं को संकलित किया है, जिसमें कुछ पद विरह के हैं तो कुछ श्रृंगार के, कुछ भक्ति के पद भी हैं –

माई काहे को कहो अब ही जो मोहि जिन बरजो/ लाल तन को री चिताबो।

मनमोहन प्राणेश्वर की छवि रीझत/ अति मति गति सुध बुध बिसारी।

सब अजहूँ भूल जैहें री तोहि सिख देबो।।

लगन सों फल ताकी कहा कहिये री/ अब लोगन सुंदर सखि भायो प्रेम बीज को बोयेबो।

पर रुचिर हो ‘साहजहाँ’ तिनको पंच सरहू ते सरस/ अब बस करके मति गति मनहर लेबो।।”[xxiv]  

शाहजहाँ कह रहे हैं कि मनमोहन की ऐसी छवि मन में बस गयी है जिसके कारण अब  सुध-बुध भी बिसर गया है। कुछ इस प्रकार की भी पंक्तियाँ हैं कि-

भादों कैसे दिनन माई श्याम काहेकों आवेंगे।”[xxv] कुछ श्रृंगार के पदों को इस प्रकार रचते हैं कि-        “अधर चन्दन घसिले पूरी सखियाँ आज मोरे आइए/ रसलावन गुणवंत जुरमिल सखियाँ इन सेजरीयाँ।।”[xxvi]

इसी तरह की एक कविता जिसका रचना विधान अद्भुत है-

“दादुर चातक मोर करो किन सोर सुहावन को भरू है।। 

नाह तेही सोई पायो सखी मोहिं भाग सोअहगाहूँ को बरु है।।”[xxvii]

इस कविता का भाषिक सौन्दर्य और लयात्मकता उभर कर सामने आयी है। जिसका संगीत मन को सुकून देना वाला है। कहा जाता है कि जब औरंगजेब, शाहजहाँ को कैद कर लिया था तब अपने उन दुर्दिन दिनों को शाहजहाँ हिन्दी कविता में अभिव्यक्त करता है-

जनमत ही लख दान दियो अरु नाम रख्यो नवरंग बिहारी।

बालाहिं को प्रतिपाल कियो अरु देस मुलक्कु दियो दल मारी।

सो सुत बैर बुझे मन से धरि हाथ दियो बंधि सारि में डारी।

शाहजहाँ बिनवै हरि सों बल राजीब नयन जाए बिहारी।।[xxviii] 

औरंगजेब जैसे बादशाहों ने भी हिन्दी में कविताएँ लिखी हैं। मुग़ल बादशाहों के बारे में  बात करने पर  उनके कत्लेआम, धर्मं परिवर्तन और हिन्दू मंदिरों को गिराने जैसी बातों को याद दिलाया जाता है। औरंगजेब के बारे में भी यह बताया जाता है कि वह बहुत कट्टर राजा था ।

औरंगजेब ने  भारत में लगभग 50 वर्षों तक राज्य किया और अपने राज्य का विस्तार भी किया लेकिन यह ध्यान देना होगा कि इन 50 वर्षों में वह चाहता तो जबरदस्ती सबको इस्लाम धर्म स्वीकार करवा सकता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

प्रो.अतहर अली  अपनी पुस्तक में लिखते हैं, कि हिन्दू अधिकारियों की सबसे अधिक संख्या जहाँगीर के समय में थी, जो कि 34 प्रतिशत थी। हमें राम पुनियानी जी के इस व्याख्यान की ओर ध्यान देना चाहिए, जिसमें वे कहते हैं-

“दिल्ली में एक रोड का नाम बदला गया है, उसका नाम है औरंगजेब। औरंगजेब का नाम इसलिए भी बदला गया कि उसने हमारे मंदिरों को तोड़ा। पहली बात यह कि औरंगजेब ने काशी में भगवान विश्वनाथ के मंदिर को तोडा था साथ में एक और बात पता चली कि वह आसाम के गोहाटी में स्थित कामख्या देवी मंदिर को दान दिया, उज्जैन में महाकाल का मंदिर है उसको भी दान दिया, औरंगाबाद में भगवान कृष्ण का मंदिर है उसको भी दान दिया। तीसरी एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उसने मंदिरों को दान दिया तो मस्जिद भी तोड़ी। एक बार की बात है गोलकुंडा के नवाब ने औरंगजेब को तीन साल तक लगान नहीं दिया जबकि औरंगजेब महाराजा है। यहाँ राजा तानाशाह है। औरंगजेब जब नवाब से पूछा आपने तीन साल तक लगान क्यों नहीं दिया तब नवाब ने कहा कि मेरे राज्य में अकाल है। मेरी प्रजा मुझे लगान नहीं दे रही है तो मैं आपको लगान कहाँ से दूँ। लेकिन महाराजा भी चालाक था। महाराजा ने अपने जासूस को भेजा और इसका पता लगवाया तो पता चला कि तानाशाह ने अपनी सारी संपत्ति एक मस्जिद के नीचे छिपा रखी है। तो औरंगजेब क्या करेगा मस्जिद तुड़वायेगा। हम केवल औरंगजेब के मंदिर तोड़ने की बात को लेकर चलते हैं और बातों को भूल जाते हैं।”[xxix]

औरंगजेब केवल मंदिरों को दान ही नहीं देता था, बल्कि सगुण भक्ति की कविता भी करता था-

 “उत्तम लगन शोभा सगुन गिन ब्रम्हा विष्णु।

महेश व्यास कीनो शाह औरंगजेब जसन तखत बैठो आनन्दन।

नग खेंच दाम विशात वर गायन मोहनप्रत।            

ब्रम्हा रचौ तिन मध गायन गुमी जन गाबत तिनके हरत दुखदंदन।।”[xxx]

               औरंगजेब की इस कविता को पढ़कर सहसा यह यकीन करना मुश्किल होता है कि इसके रचयिता औरंगजेब हैं । लगता है कि यह कविता भक्तिकालीन कवियों की है लेकिन वास्तविकता यही है कि इसका रचयिता औरंगजेब है । औरंगजेब के बारे में बर्नियर लिखते हैं- “शासक बनने के बाद औरंगजेब ने मजहबी उस्ताद से कहा था, एक शासक के लिए धर्म की भाषा से अधिक उपयोगी है, स्थानीय भाषा’।”[xxxi]

यही कारण है की औरंगजेब अपने बेटे आज़मशाह को ब्रज भाषा में शिक्षित करने के लिए ब्रज भाषा का व्याकरण लिखने वाले उस्ताद मिर्ज़ा खां को नियुक्त करता है । श्याम कुलपत लिखते हैं-

“औरंगजेब के दरबार में हिन्दी के एक कवि वृन्द थे, जो कभी-कभी औरंगजेब को खरी-खोटी सुना देते थे। कालिदास जैसे कवि औरंगजेब की वीरता की तारीफ करते थे। औरंगजेब के कुछ मसनबदार भी हिन्दी के कवियों को संरक्षण देते थे। ऐसे ही एक मसनबदार हिम्मत खां मीर थे, जो कवियों को संरक्षण देने के कारण अपने समय के रहीम खान खाना कहे जाते थे। उन्होंने श्रीपति भट्ट, बलवीर और कृष्ण कवि को संरक्षण दिया।”[xxxii]

औरंगजेब के बाद से मुग़ल काल के पराभव का समय शुरू हो चुका था। अब जितने भी बादशाह रहे,  उनके शासन की अवधि बहुत कम रही। उनको अपनी बादशाही बचानी मुश्किल पड़ने लगी। औरंगजेब के समय में ही जाटों, सिखों और मराठों में कुछ धार्मिक सामाजिक असंतोष बढ़ने लगा ı यह ही मुग़ल साम्राज्य से संघर्ष का कारण बना। इन शासकों की दुर्बलता का लाभ मराठों ने उठाया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी शाहजादा आज़म और शाहजादा कामबक्श में सिंहासन के लिए संघर्ष हुआ। इस तरह से बादशाही के संघर्ष में उलझे उन तमाम मुग़ल बादशाहों ने भी हिंदी कविता लिखी, जिनको कम समय के लिए बादशाही नसीब हुई।

औरंगजेब के पुत्र आजमशाह के बारे में मैनेजर पाण्डेय का कहना है कि वह सुलझी हुयी भाषा का कुशल कवि था। इनकी कविताओं में प्रेमाभिव्यक्ति देखी जा सकती है। इनकी काव्य कुशलता का एक नमूना इन कविताओं में देखा जा सकता है जिसमें दरिद्रता हरने के लिए गौरी और शिव की आराधना की गई है –

गौरी ईश्वरी शिवा भवानी आनन्द देजै/ रुद्राणी सर्वाणी सर्व मंगला मृडानी मैनका दारिद्र भंजै।।

आगे की कविता भी शिव को समर्पित है-

भस्म भूषण अंग चर्चित गंग शिखर बहुर रूप शिवजी/ गांडवर में डमरू बाजत फूँकत फणेश भारी।। अपनी कविताओं में इस तरह की भाषा का प्रयोग तो कोई भाषा का मर्मज्ञ ही कर सकता है।

 औरंगजेब का दूसरा पुत्र ‘मोजम शाह’ शाह आलम बहादुर शाह की कविताओं में ब्रज भाषा का वह माधुर्य है, जो हमें अपनी ओर खींचता है । वे उच्च कोटि के कवि थे । ब्रज भाषा की इनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि पूरी राग-रागिनियों को ध्यान में रखकर लिखी गई हों । मैनेजर पाण्डेय का मानना है कि वह रीतिकालीन परम्परा का कवि है-

अब तुम जागो क्योंन मोरे मीत पियरवा हमारी प्रीत तुम सन लागी।

नींदके माते साहआलम सुरजनुमा भव

नुमा सगरी रैन रंग रस पागी।।[xxxiii]

इन गीतों में प्रिय से उलाहना भी है कि मैं तुम्हारे प्रेम में पगी हुई हूँ और तुम नींद में इतने मतवाले थे कि तुमको इसकी खबर ही नहीं हुई ।

जहाँदार शाह भी हिन्दी में कविताएँ लिखते थे। इनकी कविताओं में एक तरह की सरसता दिखाई पड़ती है-

मोरे गरवां फूलन को हरवा।

रात चोर चोरी आन कर डार गयो प्यार से सुन्दर मीत पियरवा।।

होंतो ऐसी नींद की माती करवाटीयाँ न लई सारी रतवा।”

इन कविताओं को पढ़ते हुए भोजपुरी पट्टी में गाये जाने वाले गीत उभर कर सामने आने लगते हैं। साथ ही विद्यापति की एक बड़ी मशहूर कविता की याद दिलाता है कि-

मोरे रे अंगनवा चानन केरि गछिया, ताहि चढ़ी कुररए काग रे

इस तरह की लोक गीत संबंधी कविताओं के साथ ही जहाँदार शाह की कई कविताएँ देवी गीत की कविताएँ भी हैं-

भोरवा भवा मइका नीक सगुणवा आवेंगे पियरवा

मंदिर सखीरी मोरी पहर सिंगारावा करहु भेंट जीवनवा।

मौज भई जियरा सुख पाइली आनन्द से चमक

रह्यो धाम अंगनवा।।”[xxxiv]

   जहाँदार शाह की एक और बड़ी सुन्दर कविता है-“कौन जानेरी सखी मनकी बात वीरानी।” सच में इन कविताओं में कितना सादापन है जो दिल की गहराइयों को छुए बिना नहीं रह सकता। उत्तर भारत में माई के गीत आज भी उसी रूप में प्रचलित है जिस रूप में शाहआलम अपनी कविताओं में वर्णित करते हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए एक शांत समाज की प्रतिछाया महसूस की जा सकती है। यहाँ किसी तरह की साम्प्रदायिकता की कहीं कोई गुंजाइश नजर नहीं आती।

          मैनेजर पाण्डेय ने मोहम्मद शाह की सबसे अधिक 58 कविताओं का जिक्र किया है। इन कविताओं की विषयवस्तु विभिन्नता लिए हुए है, जिसमें से कुछ कविताएँ होली की हैं-

होरी की ऋतु आई सखी री चलो पिया पै खेलिए होरी।

अबीर गुलाल उडावत आवत सिर पर गागर रस की भरी री ।

महम्मद शा सब मिल मिल खेले मुख पर अबीर मलो री।।

इन होली के गीतों में भारतीय संस्कृति की सोंधी महक को महसूस किया जा सकता है। होली हिन्दुओं का एक बड़ा त्यौहार है। आज भी होली के गीत गाये जाने की परम्परा विद्यमान है। मोहम्मद शाह की एक और कविता की बानगी देखी जा सकती है-

आओ बलमजी हमारे डेरे अबीर गुलाल मलो मुख/ तेरे होरी के दिनन मोसे मत उरझे रे।

जो पिया मोसे रूस रहे हो बलि-बलि जाऊं सब ही घने रे।

महम्मद शा पिया सदाही रंगीले दूर न/ बसो बसो मोरे नेरे।।[xxxv]

 महम्मद शाह साहित्य में अपने रंगीन स्वभाव के कारण मोहम्मद शाह रंगीले के रूप में जाने जाते हैं। मोहम्मद शाह का समय परिवर्तन का समय था। गुजरात, मालवा और बुंदेलखंड के कुछ भागों में मराठों की सत्ता स्थापित हो गयी और मुग़ल साम्राज्य विघटित होने लगा।

मुग़ल बादशाह अहमद शाह कविता के बड़े प्रेमी थे ı वे लिखते हैं-

तनकी तनक सराय में किनइ ना पायो चैन/ शाम नगरा कूंचका बाजत हैं दिन रैन।

को रूप देख के चित न रहा एक ठोर/ अहमद अपनें मीत की वह चितवन कछु और।।[xxxvi]

 

 बादशाह अजीज अल-दीन आलम गीर अपनी कविताओं में हिन्द में आनन्द की बात करते हैं-

“हिन्द में आनन्द भयो कोटि दुरजन गए/ बैठे तखत वली आलमगीर सानी।

बाजे निशान फरहान सुने गढ़पति/ फरर नई गई धाक डर हुकुम मानी।।” जहाँ कबीर “पानी बीच मीन पियासी” कहते हैं तो वही आलमगीर लिखते हैं-“भई तुमारे दरश विन मानो विन नीर।”[xxxvii]

मैनेजर पाण्डेय ने अबुल मुजफ्फर जलाल उद्दीन मुहम्मदशाह आलम सानी की सबसे अधिक कविताओं का जिक्र किया है। इनकी कविताओं का फलक व्यापक है। जिसमें कुछ सीठने हैं तो कुछ होरी कवित्त से संबंधित कविताएँ हैं तो कुछ नायिका भेद की कविताएँ शोभा बढ़ा रही हैं। मैनेजर पाण्डेय सीठने का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखते हैं “सीठने का अर्थ है- शादी में बारात के आने पर भोजन के समय स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत, जिसे गाली या गारी गाना भी कहते हैं।”[xxxviii] इनकी कविताओं में लोक गहरे रंग को देखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य पर गाली गाने की परम्परा है। यह गाली यहाँ का शगुन है, जिसके बदले में गाली गाने वाले को शगुन के तौर पर रुपये-पैसे दिए जाते हैं। उदाहरण स्वरूप इस ‘सीठने को देख सकते हैं-

“समधी ने समधन को जल्दी हाथ में ले दिखलाया।

मोटा,खासा बड़ा,सुनहरा, भला पलंग का पाया।।”[xxxix]         

ऐसी कविताओं को लिखने वाला कवि निश्चय ही भारतीय परम्परा में रचा बसा कवि होगा। होली की हुड़दंगई के बारे में सबको पता है। इसीलिए आलम सानी होली एक पर्व की तरह मनाने का आग्रह इसके साथ करते हैं कि-

खेलत फाग को आज सबे, मीरो भीज गई अब रंग सू सारी।

खेल की राह  सू खेल करो नहीं फेंट गहो और देउंगी गारी।।

अबीर,गुलाल सुगंध रलो और रंग भरी पिचकारी ही मारी।

मो सू करो बरजोरी लला मत, दौर गहो नहीं बाँह हमारी।।[xl]

मुहम्मद शाह आलम सानी अपनी लगभग साठ कविताओं के माध्यम से होली गीतों में एक अलग रंग भरते हैं। इतना ही नहीं नायिका भेद के सभी रूपों की जानकारी भी कवि को है-

जो पिया आवे मोरे घरवा, करूँ संगरावा, लेहू बलाएँ, परहूँ पाएँ।

कहा करूँ, कित जाऊं, सखी री, भोर भए, लो अज हूँ न आए छैल तुरकवा।।[xli]

एक प्रेमिका अपने प्रेमी को याद करते हुए कहती है कि अगर प्रिय घर आ जाएँ तो वह अपना श्रृंगार करेगी और उनकी बलायें लेगी, लेकिन इंतजार करते हुए रात बीत गयी, भोर हो गया, फिर भी वह नहीं आया क्योंकि वह अब विदेशी हो गया है ।

              अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र के समय में मुग़ल सत्ता और दिल्ली शहर दोनों की स्थिति ठीक नहीं थी। इनकी कविताएँ अंग्रेज कंपनी के लूट के बाद देश और दिल्ली की बदहाल स्थित का एक  आर्तनाद है। एक उदाहरण देख सकते हैं-

“जिन गलिन में पहले देखीं लोगन की रंगरलियाँ थीं।

फिर देखा जो उन लोगन बिन सूनी पड़ी व् गलियाँ थीं।

ऐसी अखियाँ मीचे पड़े हैं करवट भी नहीं ले सकते,

जिनकी चालैं अलबेली और चलने में छलबलियाँ थीं।

खाक का उनका बिस्तर है और सर के नीचे पत्थर है,

हाय!वह शकलें प्यारी-प्यारी किस किस चाव से पलिया थीं।।

हम देख सकते हैं कि दर्द में डूबे इनके शेरों में मानव जीवन की गहरी सच्चाई और भावनाओं की दुनिया बसती थी। जफ़र साहब बेहतरीन शायर थे इनके बारे में यह भी कहा जाता है कि रंगून में अंग्रेजों की कैद में रहते हुए भी उन्होंने बहुत सी गज़लें लिखीं बतौर कैदी उन्हें कलम नहीं दी जा सकती थी लेकिन सूफी संत की उपाधि वाले बहादुर शाह जफ़र ने जली हुई तीलियों से दीवार पर गज़लें लिखीं। इस तरह इनकी उर्दू गज़लों की प्रसिद्धि से सभी परिचित हैं लेकिन बाद में वे सूफीमत के प्रभाव में आकर हिन्दी में रचनाएँ करते हैं। जिस प्रकार सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी अपने ‘पद्मावत’ में रानी पद्मावती का क्रम बद्ध वृतांत रचते हैं ठीक उसी प्रकार बहादुर शाह जफ़र भारतीय समाज में स्त्री के दुःख-दर्द से परिचित हैं  वह लिखते हैं कि-

सुन री सहेली मोरी पहेली/ बाबल घर में रही अलबेली,

मात पिता ने लाड़ से पाला/ समझा मुझे सब घर का उजाला,

एक बहन थी एक बहनेली।।”[xlii]

आज भी छेका की रस्म यानी आज भी भाषा में कहें तो गठबंधन या एंगेजमेंट की रस्म का भी वर्णन किया है-

कुछ कुछ मोहि समझ जो आई/ एक जा ठहरी मोरी सगाई।

आवन लागे ब्राम्हन नाई/कोई ले रूपया कोई ले धेली।।”[xliii]

आगे उसकी शादी का जिक्र है कि-

ब्याह का मोरे समां जब आया/ तेल चढ़ाया,मढ़ा छवाया।

सालू सूहा सभी पिन्हाया/ मेहंदी से रंग दिए हाथ हथेली।।”[xliv]

और आगे भी सास-ननद और बहू के संबंधों के ताने-बाने की कहानी इसमें अंकित है। बहादुर शाह जफ़र की कवितायेँ पढ़ते हुए इसके अर्थ साफ दीखते हैं, कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ती । कहने का आशय यह है की ये सारी कविताएँ ब्रज भाषा के वर्त्तमान स्वरूप के ज्यादा करीब हैं। इन कविताओं को पढ़ने पर कहानी-सा आनंद आता है। इन कविताओं में भारतीय समाज व संस्कृति की गहरी पड़ताल है। ऐसी रचना बिना भारतीयता में रचा-बसा कोई कवि कर ही नहीं सकता है।

               इस तरह हम देखते हैं कि मुग़ल बादशाह बाबर से लेकर अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफ़र तक लगभग सभी बादशाहों ने हिंदी के ब्रज भाषा में कविता लिखी। जिसने कविता नहीं भी लिखी, वह हिन्दी भाषा, उसके कवि एवं उनकी कविताओं के लिए हमेशा भूमि तैयार करता रहा ।  मुग़ल बादशाहों ने केवल हिंदी कविता का विकास ही नहीं किया, बल्कि रचा भी ı इनकी कविताओं से हिंदी क्षेत्र के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक विकास को समझा जा सकता है । भले ही इनकी मातृभाषा तुर्की और राज-काज की भाषा फारसी रही हो, लेकिन इनके भाषिक व्यवहार की भाषा तो हिंदी ही थी। उस समय में राजनीति कई टुकड़ों में बँटी थी, लेकिन इन बादशाहों ने पूरे मनोयोग से भारत वर्ष के लिए एक सर्वमान्य भाषा निर्मित की। इनकी कविताएँ मुग़ल बादशाहों के सहृदय होने का प्रमाण भी देती हैं ı इन कविताओं में वह मानवीय छवि निर्मित होती है, जिससे पूरे हिन्द के निवासियों को पुनः एकसूत्र में पिरोया जा सकता है । यह बात हमें और हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी याद रखनी होगी कि इस एकता की हर समय जरूरत रही है और आज भी है।

 संदर्भ ग्रंथ-

[i] मध्यकालीन भारत-एल.पी.शर्मा, प्रकाशन-लक्ष्मी नारायण अग्रवाल,पुस्तक प्रकाशन एवं विक्रेता, पृष्ठ-4

[ii]नादिराते शाही, दूसरी बार बार प्रकाशित सन 2006, रामपुर रज़ा लाइब्रेरी, प्रस्तावना,पृष्ठ-क

[iii] मुग़ल बादशाहों की हिन्दी कविता-संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ-15

[iv] मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता- संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ-15

[v] बाबरनामा-अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद, युगजीत नवलपुरी-साहित्य अकादेमी नवीन शाहदरा, दिल्ली,   पृष्ठ-419

[vi] अगर बाबर न आता तो भारत कैसा होता? जुबैर अहमद, बीबीसी संवाददाता,दिल्ली 14 फरवरी 2016

[vii] मुग़ल बादशाहों की हिन्दी कविता-चन्द्रबली पांडे, नागरी प्रचारणी सभा, काशी, संवत् 1997,पृष्ठ-61

[viii] वही, पृष्ठ-7

[ix] अकबर-राहुल सांकृत्यायन- किताब महल एजेंसीज, इलाहाबाद, प्राक्कथन से

[x] वही, प्राक्कथन से

[xi] अकबर के जीवन की कुछ घटनाएँ, संपादक-शीरीं मूसवी, नेशनल बुक ट्रस्ट,2000,ई.,पृष्ठ-92

[xii] हिन्दनामा एक महान देश की गाथा-कृष्ण कल्पित,राजकमल पेपरबैक्स,पृष्ठ-217

[xiii] मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता- संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ-21

[xiv] https://youtu.be/9DgxVPcnnlg

[xv] https://youtu.be/9DgxVPcnnlg

[xvi] मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता- संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ-37

[xvii] मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता- संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ-39

[xviii] मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता- संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ-35

[xix] आजकल-संपा.सीमा ओझा, वर्ष-64, अंक-5,सितंबर-2008, पृष्ठ-44

[xx] मध्यकालीन भारत-एल.पी.शर्मा, प्रकाशन-लक्ष्मी नारायण अग्रवाल,पुस्तक प्रकाशन एवं विक्रेता, पृष्ठ-115

[xxi] तुजुक-ए-जहाँगीरी- अनुवादक डॉ. मथुरा लाल शर्मा,राधा पब्लिकेशन नई दिल्ली,पृष्ठ-105

[xxii] मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता- संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ-47

[xxiii] https://hindi.newsclick.in/Mughal-Emperor-and-Hindi-Poetry

[xxiv] मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता- संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ-51

[xxv] वही,पृष्ठ-50

[xxvi] वही,पृष्ठ-50

[xxvii] वही,पृष्ठ-51

[xxviii] आजकल-संपा.सीमा ओझा, वर्ष-64, अंक-5,सितंबर-2008, पृष्ठ-44

[xxix] https://youtu.be/CvSTMDx1QjU

[xxx] मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता- संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ-55

[xxxi] https://hindi.newsclick.in/Mughal-Emperor-and-Hindi-Poetry

[xxxii] https://hindi.newsclick.in/Mughal-Emperor-and-Hindi-Poetry

[xxxiii] मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता- संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ61-62

[xxxiv] मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता- संकलन और संपादन-मैनेजर पाण्डेय,पृष्ठ-65

[xxxv]वही, पृष्ठ-66

[xxxvi] वही,पृष्ठ-81

[xxxvii] वही, पृष्ठ-83

[xxxviii] वही, पृष्ठ-29

[xxxix] वही,पृष्ठ-86

[xl] वही,पृष्ठ-94

[xli] वही,पृष्ठ-97

[xlii] वही,पृष्ठ-132

[xliii] वही,पृष्ठ-132

[xliv] वही,पृष्ठ-132

(लेखिका राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय गाजीपुर ( उ.प्र.) में हिंदी की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं )

        

RELATED ARTICLES
- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments