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साहित्य-संस्कृति

‘ साझी संस्कृति का परचम बुलंद करते हैं राही मासूम रज़ा ’

लखनऊ। जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से उर्दू शायर तशना आलमी के नौंवे स्मृति दिवस के मौके पर 20 सितंबर को यूपी प्रेस क्लब में डॉ राही मासूम रज़ा जन्मशती समारोह का आयोजन किया गया। इसकी सदारत ‘अभिनव क़दम ‘ पत्रिका के संपादक जयप्रकाश धूमकेतु (मऊ) ने की। जसम लखनऊ के सचिव फरजाना महदी ने संचालन किया।

मुख्य वक्ता थीं प्रोफेसर इशरत नाहिद। उन्होंने कहा कि राही मासूम रज़ा की दुनिया बहुत वुसअत थी, उसे ‘आधा गाँव’ तक महदूद करके नहीं देखा जा सकता है। वो तो एक मुसव्विर चित्रकार हैं जो हिंदुस्तान को पेंट करते हैं। उनके जीने और जीने देने के अपने उसूल हैं, जिन पर वो हमेशा कारबंद रहे। वो अपने अल्फ़ाज़ से सियासी, समाजी, इंसानी मसाइल, रिश्तों की पेचीदगियों, वादों-मुआहिदों में उलझी गिरती क़दरों और इंसानियत को पेश कर देते हैं, जिसमें हमें आज के हिंदुस्तान की अक्सबंदी भी साफ़-साफ़ दिखाई देती है।

प्रो नाहिद ने राही के उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ पर बात करते हुए कहा कि यह उपन्यास 1967-68 में लिखा था। आधी सदी बीत चुकी है, क्या बदला देश में ? जो हालात उस वक़्त थे, कुछ बदले क्या ? नहीं। कुछ नहीं बदला, बल्कि भीषण रूप इख़्तियार करता जा रहा है। सवाल भी हमारे, जवाब भी ज़मीर दे रहा है, समाज दे रहा है। इस उपन्यास की कामयाबी यही है। फ़िरक़ापरस्ती बढ़ती जा रही है, या यह कहिए कि बढ़ाई जा रही है। राही जी ने उस वक़्त भी उस माहौल को समझा था। अपने इस उपन्यास के ज़रिए उन दूरियों के दरमियान पुल-साज़ी, पुल-निर्माण का काम करने की कोशिश की है।

दिल्ली से आए अबू हुरैरा का कहना था कि अगर आप धर्म, पंथ, जाति, भाषा, क्षेत्र या किसी भी मत को लेकर कट्टर हैं तो आप राही मासूम रज़ा को बर्दाश्त नहीं कर सकते। राही ने सामाजिक न्याय और जात-पात के विरोध में उस समय आवाज़ बुलंद की जब साहित्य में ऐसे विमर्श आम नहीं थे। ‘ आधा गॉंव ‘ को कर्बला की पूरी कहानी सही कालखंड के साथ समझे बग़ैर पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जयप्रकाश धूमकेतु ने कहा कि साहित्यकार अपने समय में, अपने समय को रचता है लेकिन उसमें अतीत की गूंज होती हैं, वहीं भविष्य की आहट भी। राही की जबान हिंदुस्तानी है जिसमें भोजपुरी भी शामिल है। राही मासूम रज़ा का लेखन ऐसा ही है। उन्होंने ‘आधा गांव’ , ‘टोपी शुक्ला’, ‘कटरा बी आरजु’ जैसा उपन्यास लिखा। उनकी शायरी भी उनके विचारों का आईना है। यह सब हमारी धरोहर है। यह इतिहास ही नहीं है इसमें हमारा वर्तमान भी है।

धूमकेतु जी का यह भी कहना था कि राही सांझी संस्कृति का परचम बुलंद करते हैं। वे मानवीय संवेदना और भाईचारा को प्रतिष्ठित करते हैं। आज की हालत में विभाजनकारी शक्तियों के हौसले बुलंद हैं । ऐसे में राही का साहित्य हमें उनके विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देता है। यह साल राही की जन्मशती का है। हम लोग मिलकर राही को याद करेंगे और फासीवाद के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ायेंगे। परिचर्चा में शकील सिद्दीकी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम की शुरुआत में सरोजिनी बिष्ट ने तश्ना आलमी की ग़ज़ल ‘जलते शिकम की आग बुझाने को कुछ नहीं है/ बच्चे बिलख रहे हैं खिलाने को कुछ नहीं ।/फांके के के साथ-साथ अंधेरा है शाम का /चूल्हा तो क्या चराग जलाने को कुछ नहीं’ और वीरेन डंगवाल की कविता ‘हमारा समाज ‘ का सस्वर पाठ किया। ‘डॉक्टर तशना आलमी एक अजूबा’ नाटक की किताब का विमोचन भी हुआ। इस किताब के लेखक शब्बीर हसन ‘अली सागर’ हैं । उन्होंने कहा कि तश्ना आलमी की शायरी, ज़िन्दगी और जद्दोजहद को इस नाटक में उकेरा गया है। तश्ना आलमी विस्थापन की जिंदगी जीने को मजबूर हुए।

कार्यक्रम में हरिचरण प्रकाश, डॉक्टर उषा राय, इरा श्रीवास्तव, नैय्यर उमर, तस्वीर नकवी, शैलेश पंडित, अशोक मिश्रा, धर्मेंद्र कुमार, शहंशाह हुसैन, अलका पांडे, मंदाकिनी राय, आशीष सिंह, जय श्रीवास्तव, अनिल कुमार श्रीवास्तव, रेनू शुक्ला, नगीना निशा, विमल किशोर, अवतार सिंह बहार, नगीना निशा, के के शुक्ला, वीरेंद्र त्रिपाठी, श्रीप्रकाश मिश्र, कौशल किशोर सहित बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत की।

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