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डॉ. कफील खान की रिहाई की मांग को लेकर कल भाकपा-माले,आरवाईए का बिहार और यूपी में विरोध दिवस

पटना/लखनऊ। रासुका में पिछले पाँच माह से अधिक समय से जेल में बंद गोरखपुर के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. कफील खान की रिहाई की मांग को लेकर 19 जुलाई को भाकपा-माले, आरवाईए, आइसा व इंसाफ मंच बिहार और उत्तर प्रदेश में राज्यव्यापी विरोध दिवस आयोजित करेंगे।

यह जानकारी भाकपा-माले के बिहार राज्य सचिव कुणाल  और उत्तर प्रदेश की राज्य इकाई की ओर से अरुण कुमार ने एक विज्ञप्ति में दी।

अरुण कुमार ने बताया की पार्टी द्वारा पार्टी द्वारा चलाए जा रहे प्रदेशव्यापी दमन विरोधी सप्ताह के तहत 19 जुलाई को डॉ. कफील खान की डॉ कफ़िकी मांग को प्रमुखता से शामिल करते हुए कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन करेंगे । उन्होंने कहा कि गोरखपुर के जाने-माने बाल चिकित्सक डा. कफील खान योगी सरकार के बेतुके, फर्जी आरोपों व सांप्रदायिक घृणा के चलते रासुका के तहत मथुरा की जेल में लंबे समय से बंद हैं। चारों ओर से उनकी रिहाई की मांग उठ रही है। जेल में कोरोना संक्रमण का खतरा है और जनकवि वरवर राव के मामले में हम यह देख चुके हैं। दूसरे, महामारी के मौजूदा दौर में डा. कफील जैसे चिकित्सक का समाज बेहतर उपयोग जेल के बाहर कर सकता है। भाकपा (माले) भी डा. कफील की रिहाई की मांग के लिए रविवार (19 जुलाई) को राज्यव्यापी प्रतिवाद दिवस मनायेगी। यह प्रतिवाद शारीरिक दूरी व अन्य एहतियात बरतते हुए किया जाएगा।

भाकपा-माले के बिहार राज्य सचिव कुणाल ने आज कहा कि डाॅ. कफील खान को तीसरी बार जेल में डाला गया है। वर्ष 2017 में गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में आपराधिक सरकारी लापरवाही के कारण ऑक्सीजन के अभाव में 60 से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी। डॉ. कफिल ने इसके लिए सरकार की आलोचना की थी। इसी वजह से उनके पीछे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार हाथ धोकर पड़ी हुई है।

उन्होंने कहा कि ऑक्सीजन की कमी का जिम्मेवार सरकार थी, लेकिन उल्टे अगस्त 2017 में डॉ. कफिल पर ही बच्चों की मृत्यु के लिए जिम्मेवार ठहराकर उन्हें जेल भेज दिया गया। महीनों जेल में गुजारने के बाद आखिर वे जमानत पर बाहर आए और खुद सरकार द्वारा गठित जांच दल ने 2 साल बाद सितम्बर 2019 में उन्हें दोषमुक्त घोषित कर दिया। लेकिन जांच दल ने उन्हें योगी जी से माफी मांगने को भी कहा। डॉ. कफिल ने माफी नहीं मांगी और वे फिर योगी जी के निशाने पर आ गए।

12 दिसम्बर 2019 को उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में सीएए के खिलाफ आयोजित सभा को संबोधित किया था। उक्त सभा में उत्तेजक भाषण देने के आरोप में 29 जनवरी 2020 को पुनः उन्हें मुंबई हवाई अड्डे से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। 10 फरवरी 2020 को उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत मिल गई। लेकिन जेल से रिहा करने में जानबूझकर 3 दिन देर की गई। 13 फरवरी को कोर्ट ने उन्हें रिहा करने का आदेश फिर से जारी किया। लेकिन रिहाई की बजाय 14 फरवरी को उन पर 3 महीने के लिए रासुका लगा कर फिर डिटेन कर दिया गया।

डिटेंशन की अवधि खत्म होने से पहले फिर 12 मई 2020 को रासुका की अवधि के 3 महीने के लिए बढ़ा दी गई है।

सरकार की नीतियों – फैसलों का विरोध करने के कारण डॉ. कफिल पर रासुका लगाना एकदम नाजायज है। यह विरोध की आवाज दबाने का फासीवादी कदम है। पूरा देश सरकार के रवैए की आलोचना कर रहा है और डॉ. कफिल की रिहाई की मांग कर रहा है।

उन्होंने कहा कि डॉ. कफिल पड़ोस के गोरखपुर के होने के कारण बिहार से सजीव रूप से जुड़े रहे हैं। जब चमकी बुखार से मुजफ्फरपुर में हाहाकार मचा हुआ था, उन्होंने यहां कैम्प लगाकर बच्चों का इलाज किया। विगत वर्ष की बाढ़ और पटना के जलजमाव के समय भी वे पटना सहित कई जगह लोगों का इलाज किया। सीएए के खिलाफ चल रहे आंदोलन में भी उन्होंने भाग लिया। भाकपा-माले, इंसाफ मंच, इनौस – आइसा के बैनर से 19 जुलाई को राज्य स्तर पर डॉ. कफिल की रिहाई के लिए आवाज उठाई जाएगी। लॉक डाउन के मद्देनजर शारीरिक दूरी का पालन करते हुए जहां जैसे जितना संभव हो विरोध का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

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