हरे प्रकाश उपाध्याय
विनोद कुमार ‘हंस’ कविता की दुनिया में बिलकुल अभी-अभी दाखिल हो रहे कवि हैं। फ़िलहाल उनका स्वागत और स्वीकार इसी रूप में किया जाना चाहिए। उनकी कविताओं से साक्षात्कार का मेरा भी यह पहला ही मौका है।
उनकी कविताओं से गुज़रते हुए एक उभरते कवि की ऊभ-चूभ, कुछ नया कहने-देखने और दिखाने की छटपटाहट साफ महसूस होती है। जैसा कि होता है कि अमूमन हर नई शुरुआत बहुत सारी नई आकांक्षाओं, नये ढबों से लदबद होती है, वही उसमें अनुकरण और डगमगाहट भी शामिल होती है, तो वह सब भी विनोद की कविताओं में करीब-करीब है ही। जैसे किसी शिशु का सौंदर्य उसकी तुतलाहट, उसकी डगमगाहट और उसके अनेकशः प्रयत्नों में ही निहित होता है और उसमें वही सब भाता भी है, उसी तरह नये कवियों की कसौटी उनकी अभिव्यक्ति व विचार की परिपक्वता नहीं होती, बल्कि उनकी ऊर्जा और कोशिश ही आकर्षित करती हैं।
आप किसी नये कवि को पढ़ें तो उसमें चिंतन और कहन के अनेक स्वरूप एक साथ उभरते दिखाई देते हैं, कवि चहुँतरफा देखते हुए अपना रास्ता तलाशता प्रतीत होता है। यह एक स्वाभाविक गुण है। समय के साथ अनुभव और रुचियाँ प्रौढ़ होती हैं, फिर कवि का अपना मुहावरा भी विकसित होने लगता है। वैसे कहन के निजी मुहावरे के विकसित होने से अधिक अहम चिंतन का सही परिप्रेक्ष्य व कोण का बनना या बनाना होता है। यह कवि उस दिशा में सचेष्ट मालूम होता है, यह आश्वस्तकारी है।
कोई कवि आँख खोलते ही परिवर्तन का वाहक नहीं बन जाता। कविता बड़बोलेपन से बड़ी नहीं बनती, देखने का नजरिया और जिज्ञासु प्रवृत्ति उसे आकर्षक बनाती हैं। पहले तो कवि को अपने अनुभवों को ही ईमानदारी के साथ समझने, विश्लेषित करने और उसे कहने की कला अर्जित करनी पड़ती है।
एक नये कवि के तौर पर विनोद की संवेदनशीलता और सामाजिक रूढ़ियों के प्रति उनका विद्रोह भाव ध्यान खिंचता है। पर कवि को कंधे पर किसी हाथ की अपेक्षा के बगैर अभी बहुत सारी दीवारें लांघनी भी पड़ेंगी, दीवारों के व्यामोह में कैद होने से कवि का तो क्या, किसी का भी कोई रास्ता नहीं निकलता, और जब तक कवि दीवारों से बाहर नहीं निकलेगा, वह दुनिया देखेगा कैसे और बगैर दुनिया देखे कविता लिखेगा कैसे? कल्पना की उड़ान भरने के लिए भी दीवारों की चौहद्दी लांघनी पड़ती है। ये बातें यहाँ इसलिए कहनी पड़ रही हैं क्योंकि कवि के तौर पर विनोद कुमार ‘हंस’ उम्मीद पैदा करते हैं।
विनोद कुमार ‘हंस’ की कविताएँ
1. घोसलों में आकाश
मां को लगता है कि मैं बहन का पक्षधर हूँ
वे कभी कभी झल्लाते हुए मुझे घृणा की
नजरों से देखतीं, मानो कहती हों कि
तूने ही इसे बिगाड़ रखा है.
मां को घोसलें मे रहने की आदत है, उनकी मां को भी थी
और उनकी मां की मां को भी, उन्होंने उड़ना न जाना था
पक्षियों के जगत में यह धारणा फैलाई गई कि मादा पंख
सृजन को पोषित करने हेतु उपयुक्त है, पंखो का फैलाव
उड़ने को नहीं ढंकने के लिए हो, मां की अपेक्षा बहन से
उड़ने की नहीं ढकने की है.
बहन को अपने पुरुष मित्रों से बतियाते देख
मां अक्सर दबी आंखों से मुझे संकेत करती
मैं कपास की रुई सा उन संकेतो को उड़ा देता
फैलाव का मैं पक्षधर हूँ जिससे फैलेंगे और फैलाव
मैं घोंसलों मे आकाश भर देना चाहता हूं जिससे
सृजित को भी फैलाव मिले, ढंकाव अंधकार है
फैलाव प्रकाश.
2. मूल्य और पतन
पंडिताइन के तेवर कुछ बदलने से लगे हैं!
वह अब पैसे
ऊंचे हाथ से नहीं छोड़ती और न ही
अंजुली फैलाती है सौदा लपकने को
संविधान इसे मूल्य बताता है और
संघ सांस्कृतिक पतन
3. दीवारें उपन्यास हैं जीवन की
जब नहीं होता कोई मेरे दु:ख मे
कंधे पर आहिस्ते से हाथ रख
सजीले आंखों की मौन से पुचकारने वाला
तब कमरे की यह दृढ़ दीवारे मेरी
पीठ को अपने सहारे मे लेकर थपथपाती हैं .
इन्हीं दीवारों में कैद है मेरा इतिहास
मेरी किलकारियां महफूज है इन्हीं दीवारों व
पलस्तर के बीच की पतली शह में, दर्ज है मेरी प्रेमिका
व मेरे बीच की बातों के दस्तावेज इन्हीं दीवारों पर
इन्हीं दीवारों की पलस्तरें पसीज उठती हैं सुनकर मेरी सिसकियां और झर जाती हैं लद्द से बिखरती जमीन पर
जैसे मैं बिखरा पड़ा होता हूं फर्श पर.
इन दीवारों के साथ सुनी है मैंने मां की लोरियां
खाई है डांट पिता की पीते सिगरेट पाए जाने पर
इन्हीं दीवारों पर बहन का सर लड़ाकर की है
खूब शैतानियां, इन्हीं दीवारों पर फेंककर
फुलाया है मेरा सिर बड़े भाई ने, बाबा की तरेरती
आंखों का आतंक गूंजता है इन्हीं दीवारों पर
और बहती है बोलियां बचाव की मेरी दादी की
इन्हीं दीवारों पर.
दीवारें उपन्यास हैं जीवन की
जिस पर चढ़ते उतरते रंग प्रति वर्ष
लिखते हैं मुझको, मैं लिख रहा हूं प्रतिक्षण
इन्हीं दीवारों पर.
4. स्पर्श
हार चुके शब्दों के अर्थ बिखरकर छितरा गये हैं जमीं पर ठीक वैसे जैसे मैं बिखरा पड़ा हूँ हम दोनो को चाहिए स्पर्श नवभावों का
5. आखिरी संदेश
घर के बारजों पर रखे गमलों में
कलियां अब नहीं खिलतीं
बादलों ने कहा हम तो देते हैं खूब पानी
चिड़िया चहकती हैं
हमने तो पंखों में भरकर लाई हैं हवाएं
सूरज का कहना है कि
मैं तो दिन भर देता हूं प्रकाश
मधुमक्खियों के प्रदेश में पड़ गया है अकाल
चांद की चांदनी को कबूतर बनाकर
भेजा गया है मेरी खिड़की पर
मैं आकाश के झिलमिलाते तारों से थोड़ी सी
रोशनी उधार लेकर लिख रहा हूं पत्र
कमरे में पसरे स्याह हवाओं के कागज पर
बादल, चिड़िया, सूरज
कलियां अब नहीं खिलेंगी
मधुमक्खियां के प्रदेश में जारी रहेगा
अकाल
मैं लिख रहा हूं संदेश आखिरी
आज उसके नाम.
6. गौरैया
घोसले में अब भी जिंदा है गौरैया की नरमी, जिसके पंखों की आड़ में
सुरक्षित हैं चूजों के पंख, जो कल अपने
फैलाव में ढक लेंगे धरती.
घोसले में अभी जिंदा है गौरैया
जिसकी उलझे तिनकों में दिखता है
उसका संघर्ष, और दिखता है प्रयत्न
धरती को घर बनाने का.
घोसले में अब भी जिंदा है गौरैया की सांसें
जो फूंकते हैं जीवन, कसी हुई है तिनकों के बीच
वही सांसे दे रही है घोसलों को नया मकाम, गौरैया
अब भी जिंदा है चूजों और घोसले के साथ.
7. निश्चिंत रहो तनये
निश्चिंत रहो तनये
मैं छोड़ गया दुनिया ऐसी ही जो घेर तुम्हे
देगी संबल, निश्चिंत रहो तनये
मैं खींच गया हूं वह लकीर जिसने भी लांघा उसे
अगर मैं स्वयं बनूंगा वही सुते, निश्चिंत रहो तनये
तुम उड़ो गगन में मुक्त बहो ढक लो पंखों में
पूर्ण मही, तुम होकर पवन मधुर शीतल फैलो जग में
फूंको जीवन, मैं गोद लिए तुमको अब भी इस
विश्व धरा में फिरता हूं, तनुजा तुममें मैं अब भी
पहले जैसे ही जीता हूं.
8. सिसकियां
युद्ध, सीमाओं के दोनों ओर
जो बराबरी मे लाता है
वह सिसकियां होती हैं.
सीमा के एक ओर उल्लास
एक ओर त्रास के बीच
जो दोनों ओर पिघलता है
वह सिसकियां होती हैं.
सरहद पर खड़ा सैनिक
उस ओर मरकर दुश्मन कहलाएगा
इस और मरकर शहीद
जो दोनों और पलकों से झड़ेंगे
वह आंसू कहलाएंगे.
युद्ध का इतिहास दर्ज होता है
दर्ज होते हैं मृत्यु के आंकड़े
दर्ज होते हैं उल्लास के गीत
त्रास की राशियां दर्ज होती हैं
सिसकियां, बस भरती हैं अपनी अटकती
श्वासों के बीच, सीमाओं के दोनों ओर
वह अवसाद कहां दर्ज होता है
9. छिपाव
तुम छुपाते रहे और छिपे हुए को
जानता हुआ मैं हर बार तुम्हे विश्वास दिलाता रहा
कि मैं अनजान हूं
सब कुछ जानते हुए भी कुछ न जानने का बर्ताव
संबंधो के दूर तक चलने की एक मूक आवाज है
हर बार जब तुम विपत्तियों की श्रृखलाएं गिनाने लगते
मैं बनावटी सहानुभूतियों से तुम्हारे छिपाव को
पुष्ट करने हेतु देता हूं नवीन पंख, मैं आश्वस्त हूँ
तुम्हारे छिपाव मे छिपा है तुम्हारा कल्याण और
मैं भी चाहता हूँ तुम्हारा कल्याण
10. रहना सालती हैं
गिराने होंगे पत्ते
या फिर वे खुद ही गिर जाएंगे
बचेंगी तो बस डालियां
जो हर बारिश में थोड़ा और बढ़ जाती हैं
पत्ते आएंगे जाएंगे
एक दुनिया में हजारों दुनिया की तरह
जो रह जाएंगे दुनिया में डालियों की तरह
वह हम होंगे
हमारी जड़ों को मालूम है कौन जाएगा
और कौन रहेगा
जाना कितना आसान है और रहना कितना मुश्किल
दूरियां कम से कम बुलाती तो है
रहना सालती हैं.
11. एक वादा अपने आप से
एक बिटिया के साथ
मैं ले आऊंगा घोसले से एक जान
ले आऊंगा एक आंगन से उसका संगीत
एक बिटिया के साथ मैं ले आऊंगा
छत के तुचके डब्बों में खिली हुई
बारहमासी, गेंदा, गुलाब की हंसी
नीम की बांह में झूलती खुशी खाली कर आउंगा
बीन लाउंगा धमक व पायल की झंकार
एक फ़र्श की सतह से
खाली कर लाऊंगा सोने की एक जगह
जिनकी आदत रोशनदान से घुसती धूप को है
एक चमक जो देखते ही खिल उठती है
बिल्ली कुत्तों व गाय की आंखों पर
मैं ले आऊंगा घर के शीशे से उसकी तस्वीर
मोहल्ले की प्रेमियों से संकोच व सिरहने
बुड्ढी दादियों से उनकी गीतों की परंपरा
भाभियों से हंसी ठिठोली
भाइयों से ले आऊंगा जिम्मेदारियां व
सुरक्षा का भार
मां से ले आऊंगा उसकी प्रतिलिपि
अगर दे जाऊंगा किसी को कुछ चीज
तो वह बाप होगा
उसके फ़र्ज को दबा जाऊंगा देकर कर्ज़
तो मैं एक वादा करता हूं अपने आप से
करूंगा विवाह कानूनी रिवाज़ से
दहेज व कर्ज से मुक्त मैं ले आऊंगा फ़र्ज
एक बाप से
एक बिटिया के साथ मैं ले आऊंगा खुशियां अपार
अपने परिवार को
12. झबरीला
अटक गई नज़र उससे तेरी
नकबहा छबरीला, नंग धड़ंग
जो फड़फड़ा रहा था अपने को उलझाए
मां के फटे ब्लाउज की निचली पट्टी से पकड़े
मुझे देखते ही खीसे निपोर दी
नाक जो होंठ पर आकर मुंह में जाने ही वाली थी
मुझसे दो-चार होते ही सरपोट ली
एक हाथ से ब्लाउज के चिथड़े अस्तर से टंगकर
दूसरे से कोहनी व हथेली के बीच पोंछ डाली
गिजगिजाहट की उलझन के बीच छींक मारी और फिर
पीला सा एक तार मां की साड़ी से उसके नाक के बीच झूल गया जो झूलते झूलते दम तोड़ जमीन पर जा गिरा पर
एक सिर अब भी झूल रहा था झबरीले के नाक
व उसके नाभी के बीच गाढ़ा सा, मां की फैली हथेली
में यकायक दस का नोट छोड़ते पीली साड़ी वाली गोरी
चाची को विकार सा हुआ, मां ने कमर व कूल्हे के गहरान
के बीच में धंसे झबरीले को हाथ से थोड़ा आड़ दी
झबरीला अब भी मुझे देख रहा है और गाढ़ा सा
अब भी लटक रहा है उसकी नाक व नाभी के बीच
13. ईमानदारी
लापता हो गई! लापता हो आई!
मेरी एक भाव वृत्ति लापता हो गई!
पूरा अंतर्मन छान डाला
पड़ोसियों का मनमस्तिष्क खंगाल डाला
हाय! पता नहीं कहां चली गई
मेरी प्यारी ‘ईमानदार’ वृत्ति गुम हो गई
मैंने पूछा अपने मोहल्ले के बच्चों से
तुमने देखा है कहीं ‘ईमानदारी’ को?
उनका जवाब आया
अंकल यह ‘ईमानदारी’ कौन है?
हमें तो पता ही नहीं यह कहां रहती है
अंकल अंकल हमने सुना तो है
स्कूल में पढ़ा भी है
पर हमने देखा नहीं है उसको
मैंने पूछा चाय की टपरी पर चुस्की लेते
उन वृद्धो से
चाचा मेरी ‘ईमानदारी’ वृत्ति कहीं खो गई है
आपने देखा है क्या उसे?
वह कहने लगे, कहने क्या लगे हंसने लगे
और चारों तरफ कहकहा उठा
और फिर स्तब्धता छा गई
फिर यकायक एक जोर सा थप्पड़ मेरे गालों पर पड़ा
मेरे पिता उन वृद्धि में शामिल थे
आवाज आई, निर्लज्ज !
जब तेरी ‘ईमानदारी’ को ‘तृष्णा’ नंगा करती
अपनी जंघा पर बिठा रही थी
तब तुम क्या कर रहे थे?
तेरा ‘क्रोध’ तेरी ‘चाटूकारिता’ रक्षा कर रही थी ‘तृष्णा’ की
तू तो मग्न था स्वार्थ लिप्सा में
भरे समाज में नंगी घूमी थी ‘ईमानदारी’
किसी ने भी स्वीकार न किया उसे
अंतत: आत्महत्या कर ली उसने
हमने भी अंतिम संस्कार देखा है उसका
मैं बेहोश हो गया
अपनी सत्व की मृत्यु पर पागल हो गया
मै जल उठा अंतर में, मेरी तृष्णा झुलस रही थी
आत्मग्लानी से
14. पेट और हिंसा
रोज़ की हिंसा में शामिल नहीं?
वह टींस भरने वाले शब्द
जो प्रेम के बदले
भूख की छटपटाहट में निकलते हैं
दर्द दोनों छोर है
एक ओर कंधों पर बोझ का
पेट की मरोड़ का एक ओर
कवि विनोद कुमार ‘हंस’, जन्म सन 2002, उत्तर प्रदेश जिला चित्रकूट तहसील मानिकपुर। हिंदी विषय से परास्नातक विद्यार्थी के रूप में यात्रा जारी है।
सम्पर्क: ईमेल-vk6307260@gmail.com
मोबाइल: 8090601872
टिप्पणीकार हरे प्रकाश उपाध्याय, बिहार के आरा जनपद के एक गाँव बैसाडीह में 05 फरवरी 1981 को जन्म। प्रारंभिक शिक्षा जनपद के ही गाँवों में। बाद में वाया आरा-पटना इंटर व बीए (समाजशास्त्र प्रतिष्ठा)। फिर दिल्ली में कुछ समय फ्रीलांसिंग, छोटी-मोटी नौकरी। कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन सहयोग। पत्रकारिता के कारण फिर लखनऊ पहुँचे। कुछ समय नौकरी के बाद, फिर 2014 से फ्रीलांसिंग व ‘मंतव्य’ (साहित्यिक पत्रिका) का संपादन-प्रकाशन। सन् 2017 के अंत में ‘रश्मि प्रकाशन’ नामक प्रकाशन संस्था की शुरुआत।
पुस्तकें : 2009 में भारतीय ज्ञानपीठ से पहला कविता संग्रह ‘खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएं’, फिर वही से 2014 में पहला उपन्यास ‘बखेड़ापुर’ तथा 2021 में कविता संग्रह ‘नया रास्ता’ प्रकाशित।
सम्मान-पुरस्कार : कविता के लिए अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार (दिल्ली), हेमंत स्मृति सम्मान (मुंबई), कविता-कथा के लिए युवा शिखर सम्मान (शिमला), साहित्यिक पत्रकारिता के लिए स्पंदन सम्मान (भोपाल), उपन्यास के लिए ज्ञानपीठ युवा लेखन पुरस्कार (दिल्ली)।
पता : महाराजापुरम, केसरीखेड़ा रेलवे क्रॉसिंग के पास, कृष्णानगर, लखनऊ-226023
सम्पर्क: मोबाइल : 8756219902

