समकालीन जनमत
कविता

उर्मिल मोंगा की कविताएँ स्वप्न और उम्मीद जगाती हैं

कौशल किशोर


कहा जाता है कि मानवीय दर्द का एहसास व अनुभूति तथा मुक्ति की कलात्मक अभिव्यक्ति ही आज की कविता है। भाव, विचार व संवेदना उसका केंद्रीय तत्व है। जीवन जगत ही इसका मूल स्रोत है। किसी कवि की रचनात्मक स्थितियां इसी से निर्मित होती हैं।
उर्मिल मोंगा ऐसी ही कवयित्री हैं। उनकी कविता में जीवन के विविध रंग मिलते हैं। इन रंगों से मिलकर उनकी कविता बनती है। वैसे तो यहां जीवन के विविध विषय हैं। फिर भी कविता के केंद्र में स्त्री है। एक तरफ उसके जीवन के सुख-दुख व संघर्ष  की अभिव्यक्ति है, तो वहीं उत्पीड़क व पितृसत्तात्मक व्यवस्था से उनकी मुक्त की अभिलाषा या कामना है। कहते हैं कि साहित्य जीवन की पुनर्रचना और उसकी आलोचना है।
उर्मिल मोंगा की कविता की दुनिया में दोनों मिलती हैं। वे धर्म, रूढ़ियों तथा सामाजिक जड़ता पर चोट करती हैं। इस तरह इनका नजरिया मानवीय, प्रगतिशील और आधुनिक है।

 

उर्मिल मोंगा की ‘औरतें’ कविता को लें। स्त्री सृष्टि का स्रोत है। वह सृजन करती है और जीवन को सुसंगत बनाने में  जुटी रहती है। वह न सिर्फ अपने जीवन को सुधारना चाहती है बल्कि अपने आसपास भी जो जीवन है, उससे भी उसका भावनात्मक रिश्ता बना रहता है। जैसे चींटियां, पक्षी, पेड़-पौधे आदि का जीवन भी फले-फूले, इसमें भी लगी रहती हैं।

उर्मिल मोंगा मध्यवर्गीय ही नहीं ऐसी स्त्रियों की व्यथा का भीे सामने ले आती हैं जिनके पास घर नहीं है। वे घर से निकाल दी गई हैं। उनके हालात का चित्र कुछ इस तरह खींचती हैंः

‘देश के हर प्लेटफार्म पर/दिखाई देती है/एक स्त्री/जिसके पास सामान/सिर्फ एक पोटली/जिसने कभी नहीं की बालों में कंघी/…थक चुकी/खुद से बतियाते बतियाते/ उसकी जुबान से निकलते/गीत कभी/बदल जाते गालियों में/अक्सर सुबकने लगती’

उर्मिल मोंगा स्त्रियों की दशा दुर्दशा को ही चित्रित नहीं करती बल्कि स्थितियों के प्रति उनके अंदर उभरते प्रतिकार और प्रतिरोध के भाव को भी अभिव्यक्त करती हैं। गीत का गाली में बदल जाना, यह ऐसा ही भाव है। हमारे समाज का जैसे जैसे आधुनिकीकारण हुआ, महिलाओं को शिक्षा, रोज़गार का अवसर तथा लैंगिक समानता को कानूनी दर्जा मिला, जीवन और समाज के सभी क्षेत्रों में उन्होंने दावेदारी जताई है, अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, वैसे वैसे उन्हें हिंसा जैसी स्थितियों का भी सामना करना पड़ा है। इसकी शुरुआत भ्रूण हत्या से ही हो जाती है। अर्थात वह अपने घर में ही सुरक्षित नहीं है।  कविता ‘कन्या वध’ इसी को लेकर के है।

उर्मिल मोंगा पितृसत्तात्मक व्यवस्था के छल और छद्म को उजागर करती हैं।  राम को अवतारी भगवान और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वे सीता के साथ किए गए छल को सामने लाती हैं। रावण द्वारा स्वर्ण मृग के माध्यम से सीता को ठगा गया तो राम ने पहले तो अग्नि परीक्षा ली फिर जंगल में छोड़ दिया। वे धर्म के संजाल पर भी चोट करती हैं जहां स्त्रियों को न तो बेटी रहने दिया जाता है, न कुंवारी और ना ही सुहागिन। धर्म के ठेकेदारों के लिए वे मात्र खिलौना हैं। उर्मिल मोंगा का इस बात पर जोर है कि औरतों की लड़ाई उनकी स्वयं की लड़ाई है। उन्हें अपना न्याय युद्ध स्वयं लड़ना होगा। वह कहती हैंः

‘ठगी गई सीता/देख स्वर्ण मृग/छल तो मेरे साथ भी हुआ/पर नहीं चाहती/कोई राम आए/छुड़ाए रावण की कैद से/ले अग्नि परीक्षा/फिर छोड़ दे/वाल्मीकि के द्वार/मुझे स्वयं/लड़ना होगा/न्याय युद्ध’

 

उर्मिल मोंगा आजादी के बाद उभरते सवालों और प्रसंगों को अपनी कविता में ले आती हैं। मजहब के आधार पर देश का विभाजन हुआ। लोगों से उनका घर छूटा, परिवार छूटा। उन्हें उम्मीद थी कि वे लौटेंगे वापस। जिन पड़ोसियों के साथ आत्मीय लगाव था, मिल-जुल कर रहते थे, वे दिन लौटेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ।

यह त्रासदी ‘दीवार’ कविता के माध्यम से व्यक्त होती हैं । जो अपने भाई थे, अपने बंदे थे उनके बीच दीवार खड़ी की गई। वह ऊँची होती गई। वे कहती हैं ‘बहुत ऊंची है/मजहबी/सियासी/दीवारें’। उर्मिल मोंगा धर्म की निरर्थकता सामने लाती हैं। वर्तमान समय में उसकी भूमिका मनुष्य को बांटने और उन्हें आपस में लड़वाने की हैः ‘धर्म के नाम पर/बने मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, डेरे/धर्म रक्षा के नाम पर/उन्मादी भीड़/कर रही है/नर-संहार’।

आम आदमी की दशा दुर्दशा, उसके सहज सरल जीवन के साथ पूंजीवाद के विकास में जिस तरह से मनुष्य और मनुष्यता का अवमूल्यन हुआ है, उस पर भी उर्मिल जी की नजर है। पूंजीवाद ने प्रकृति और  पर्यावरण को नष्ट किया है। ‘अब न आंगन/न झरोखें/न गलियों में दिखने वाले पेड़/सिर्फ और सिर्फ/कंक्रीट पत्थर के जगल’
यह विकास नही विनाश है। इसके मूल में अकूत मुनाफा है। उर्मिल जी दौलत को अंध महासागर की संज्ञा देती हैं। उनकी समझ है कि दौलत ही है जो मनुष्य को अहंकारी और दंभी बनाता है। उसके जीवन को क्षतिग्रस्त करता है। ‘दंभ’, ‘द्वेष’ ऐसी अनेक कविताएं हैं जो धन की संस्कृति पर चोट करती हैं। रचनाकार का जोर इस बात पर है कि मनुष्य को धन की संस्कृति से विरत रहना चाहिए। इस तरह उर्मिल मोंगा जी पितृसत्ता, धर्मसत्ता तथा पूंजी की सत्ता को स्त्री और समाज के विकास में बाधक मानती हैं। उनकी कविता की वैचारिकी तर्क, विवेक और विज्ञान पर आधारित है। तभी तो ‘स्वप्न’ कविता में उनकी चाहत इस रूप में व्यक्त होती हैः
‘स्वप्न में बुद्ध आये/तुम्हें/आजादी चाहिए/या मोक्ष /बस आजादी…../मोक्ष में /जीवन कहां?’
उर्मिल मोंगा की कविता की यह कला है कि वे सहज सरल तरीके से अपनी बात रखती हैं। कोई बनावटीपन नहीं है। जो देखती और समझती हैं, उसे ही व्यक्त करती हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये कम शब्दों में गहरी बात कहती है। ये मित कथन की रचनाकार हैं। कविता की यही विशेषता है। अपनी इसी विशेषता के कारण वह अन्य विधा से अलग होती है। उसकी विधागत पहचान बनती है। इनकी अधिकांश कविताएं आकार में छोटी लेकिन भाव, विचार व संवेदना में गहरी हैं।
उर्मिल मोंगा विपरीतताओं से संघर्ष करती हैं। गलत के विरुद्ध संघर्ष  का भाव है। इनकी कविता  में ‘किसान’ हैं, आम आदमी की दशा-दुर्दशा, स्त्रियां हैं। वहीं, उनका संघर्ष भी है। वहां हताशा और निराशा नहीं हैं। यहां उम्मीद है। उर्मिल जी ‘भोर की कविता’ लिखती हैं। उनके यहां नए पेड़ हैं जो धराशाई होने के बाद भी हजारों बीज छोड़ जाते हैं जिससे उगेंगे अनेक नए पेड़। ‘मैं भी पेड़ हो जाऊँ’ की तमन्ना है, कुछ इस तरहः
‘कितनी बार कुल्हाड़ी चली/अंग-अंग काट डाला/सहते हर बार/असीम धैर्य था/सावन आया/फूट आई शाखाएं/नई कोपलें/पंछी लौट आए/तुम  मुस्करा उठे/मन चाहता है/मैं भी पेड़ हो जाऊँ’

 

यह उम्मीद इनकी कविता में बनी रहती है। यहां प्रकृति, जीवन संगीत, उसकी कोमलता और मार्मिकता पूरे आवेग के साथ कविता में व्यक्त होती है। यहां ‘बच्चे उम्मीद हैं’। नदी की जलधारा में जो प्रवाह है, वैसी  ही भाषा है, अभिव्यक्ति में पारदर्शिता है। ऐसी ही कविताओं का उनका यह संग्रह है। कविताएं दिल में उतरती हैं और दिमाग पर अपना असर छोड़ती हैं।

 

 

उर्मिल मोंगा की कविताएँ

1. औरतें

डूबी रहतीं
लोक-परलोक सुधारने
जोड़ती, पाई पाई
खरीदती कभी बर्तन
कभी कपड़े
तलाशती फूलदान किसी मेले में

नहीं पीती सिगरेट, दारू
गम भुलाने के लिए
जाती है, चीटियों की बिलों तक
आटा डालने
कभी पीपल को जल चढाती
रखती मुंडेर पर पानी
पंछियो को डालती दाना
सींचना चाहती
समूची सृष्टि स्नेह से |

2. अपना घर

देश के हर प्लेटफार्म पर
दिखाई देती है
एक स्त्री
जिसके पास सामान
सिर्फ एक पोटली

जिसने कभी नहीं की बालों में कंघी
बिखरे बाल, जटाएँ बन चुके

थक चुकी
खुद से बतियाते -बतियाते
उसकी जुबान से निकलते
गीत कभी
बदल जाते गालियों में
अक्सर सुबकने लगती

शायद याद आ जाता
घर से निकाल दी गई स्त्री को
अपना वो घर |

3. दीवारें

माँ पार कर गई
सातवां दशक |

कभी कभी अचानक
रोने लगती
सिहर उठती
कांपती

शायद उसे याद आ जाता
लाहौर का रेलवे स्टेशन
फौजी का घिनोना चेहरा
जिसने मारा चाबुक
सहलाने लगती अपनी पीठ
छीन लिया उसने माँ के दहेज़ का ट्रंक
बहुत रोती याद कर कर
अपने बिछड़े परिजन

अत्यंत प्रेम करती थी जिन्हें
याद आती उसे कपिला गाय
खजूरों के ऊँचे पेड़, हवेली
याद कर तड़पती

बहुत ऊँची है
मज़हबी
सियासी
दीवारें ||

4. न्याय युद्ध

ठगी गई सीता
देख स्वर्ण मृग

छल तो मेरे साथ भी हुआ
पर नहीं चाहती
कोई राम आये

छुड़ाए रावण की कैद से
ले अग्नि परीक्षा

फिर छोड़ दे
बाल्मीकि के दूवार

मुझे स्वयं
लड़ना होगा
न्याय युद्ध ||

5. दीक्षा

चरखे की घूं -घूं में
सुनती नाम धुन
चरखा और सतगुरु
साथी हैं दो
सुबह सवेरे आश्रम

समाधि में देखती
गहरा नीला आकाश
निराकार
दोपहर में कातती सूत
कर्म करती
खुश रहती
भूल जाती
युवा होती
चार बेटियाँ
आदेश हुआ सतगुरु का
कितनी गुणवती …

दीक्षा दिलाओ बेटियों को
विश्वास ना हुआ स्वंय पर
अहो भाग्य !
सतगुरु ने स्वंय बुलाया
दुल्हन की तरह सजाई बेटियां
कर दी सतगुरु को समर्पित |

साध्वियाँ कहलाने लगी
चन्द ही दिनों में
मुरझा गए फूल से चेहरे
कभी झाड़ती जूते
पिलाती कभी जल
पंखा झुलातीं
फिर भी सुनती सेवादारों की फटकार

अन्धी आस्था की भेंट चढ
गंवाने लगी जिन्दगी
न कुंवारी न सुहागिन, वे बेटियां ||

6. विकास

कूची और रंगो से भरते
बदरंग शहरों की दीवारों पर
इन्द्रधनुषी रंग

छिपा देना चाहते असली चेहरा
ऊंची – ऊंची दीवारों के पीछे
छिपी बस्तियाँ |

सूअर, कुतों संग
कीचड़ में खेलता बचपन
चीथड़ों से झांकता यौवन

गन्दे नालों की सड़ांध
कट रही बदहाल जिन्दगी
बिखर रहा इन्द्रधनुषी स्वप्न ||

7. नये पेड़

जूझता रहा पेड़
तूफानों से

आखिर एक दिन हार गया
पंछियों के घोसले गिर गये
दर्जनों अंडे फूट गए

धराशायी हो गया
फिर भी आश्वस्त रहा

फैल गये हज़ारों बीज
दूर दूर तक
उगेंगे अनेकों नये पेड़ |

8. स्वप्न

स्वप्न में बुद्ध आये
तुम्हें
आजादी चाहिए
या मोक्ष

बस आजादी …
मोक्ष में
जीवन कहां ?

9. कोकिला

हरा भरा जंगल
पेड़ों की छाँव
वनस्पतियों की भीनी महक
बादल
खेल रहे छुप्पन छुप्पी का खेल

उदास, बेचैन कोयल
पंख फैला
उड़ चली
इधर उधर
कुहकने लगी
गूंजने लगी
उसकी क्रंदन भरी आवाज़

दूर पहाड़ियों पर
ढूंढ रही
बिछुड़ा साथी

तभी आ गया उसका प्रेमी
रुदन बदल गया
मीठी तान में
गाने लगी कोयल
मधुर संगीत

पुलकित हो उठा जंगल
देख अनूठा प्रेम ||

10. मैं भी पेड़ हो जाऊँ

कितनी बार कुल्हाड़ी चली
अंग – अंग काट डाला
सहते हर बार

असीम धैर्य था
सावन आया
फूट आई शाखाएं
नई कोंपलें

पंछी, लौट आए
तुम मुस्करा उठें

मन चाहता है
मैं भी पेड़ हो जाऊँ।।

11. बाजार

वर्षो बाद
गई ननिहाल
टूटने के कग़ार पर
शहतीरों की छत वाला
नानी का कमरा

दीवार पर टंगी
धूल भरी तसवीर
पुराना सन्दूक
चूहों के कुतरे
सूत के गोले

टूटा अटेरन
चरखा
पुराना दरी का अड्डा
बता रहा
नानी बुनती थी दरियाँ
बेटियों के दहेज के लिए
बिखरे सरकन्डे
चुभ गये पाँव में
काट लाती थी
नहर किनारे से
पत्ता – पत्ता जोड़
बनाती थी सरफोश छाबे
रंग बिरंगे
बाँटती परिजनों को।

माँ ने सीखा चरखा
कातती रही सूत
सुलझाती रही ताउम्र
उलझे सूत की गुत्थियां
जीवन की पहेलियाँ

हम बहनों ने
सीखा बहुत कुछ
वक्त बदल गया
ढूंढ निकाली
नई राहें
स्कूल
कालेज
पढ़ाई
कमज़ोर पड़ी हस्तकला
बनी शोभा
प्रदर्शनियों की

स्वप्न टूटे
खयालात बिके
बिकने लगे जजबात
सब बाजार हो गया
घर, गाँव, शहर

12. कभी

फूलों ने खिलना
पेड़ो ने झूमना
हवाओं ने बहना
पंछियों ने चहचहाना
बन्द नहीं किया

सूरज ने उगना
लहरों ने उठना
खेतों ने लहलहाना
बन्द नहीं किया

है घुटन चहुंओर
सांसों ने चलना
आँखों ने देखना
कण्ठ ने गुनगुनाना
बन्द नहीं किया
बेशक
बन्द हैं सारे दरवाजे
खिड़कियां भी खुली नहीं
ऊषा की किरण ने आना
बन्द नहीं किया ..


कवयित्री उर्मिल मोंगा, जन्म : 14-11-1961, गांव बलियाली (भिवानी)। प्रकाशित कृति: काव्य संग्रह ‘उड़ना है अपने पंखों से’। अनुवाद: ‘मैं शिखंडी नहीं’ (उपन्यास) तथा ‘एंटीने पर बैठी सोन चिड़ी’ (कविता संग्रह) का पंजाबी से हिंदी अनुवाद । साक्षरता पत्रिका ‘पैगाम’ का संपादन । कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन।
पंजाबी साहित्य अकादमी हरियाणा द्वारा सम्मानित।
सम्पर्क: 9416436082

टिप्पणीकार कौशल किशोर, कवि, समीक्षक, संस्कृतिकर्मी व पत्रकार
जन्म: सुरेमनपुर (बलिया, उत्तर प्रदेश), जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में प्रमुख.
 लखनऊ से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘रेवान्त’ के प्रधान संपादक। 
प्रकाशित कृतियां: दो कविता संग्रह ‘वह औरत नहीं महानद थी’ तथा ‘नयी शुरुआत’। कोरोना त्रासदी पर लिखी कविताओं का संकलन ‘दर्द के काफिले’ का संपादन। वैचारिक व सांस्कृतिक लेखों का संग्रह ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ तथा ‘शहीद भगत सिंह और पाश – अंधियारे का उजाला’ प्रकाशित। कविता के अनेक साझा संकलन में शामिल। 16 मई 2014 के बाद की कविताआों का संकलन ‘उम्मीद चिन्गारी की तरह’ और प्रेम, प्रकृति और स्त्री जीवन पर लिखी कविताओं का संकलन ‘दुनिया की सबसे सुन्दर कविता’ प्रकाशनाधीन। समकालीन कविता पर आलोचना पुस्तक की पाण्डुलिपी प्रकाशन के लिए तैयार। कुछ कविताओं का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद।  कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन।
मो – 8400208031)

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