समकालीन जनमत
कविता

उद्देश्य कुमार की कविताएँ मध्यवर्गीय जीवन की एकरसता से जूझती हैं

अनुराग यादव


एक रचनाकार अगर वास्तव में समाज को एक नया नज़रिया, सोचने समझने का एक नया तरीका प्रदान करना चाहता है उसे अपनी दृष्टि एकआयामी की जगह बहुआयामी रखनी आवश्यक है। उद्देश्य कुमार की कविता में ये बहुआयामी दृष्टि स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है और वो इसकी आवश्यकता बताते हुए कहते है –

“वयस्कों की दुनिया को बच्चों की आंखों से
पुरुषों की इस दुनिया को स्त्री के स्पर्श से
और एक व्यवस्थित शहर की गंध को एक ग्रामीण, प्रवासी मजदूर के पसीने की गंध से ही समझा जा सकता है।”

उनकी यह दृष्टि मात्र मनुष्यों को ही अपने विवेचन के केंद्र में नहीं रखती बल्कि मनुष्येत्तर प्राणियों से भी जीवन के मूल्यों को ग्रहण करने के पक्ष में है। इसका स्पष्ट उदाहरण ‘खोने का डर’ कविता में मिलता है जिसमें वो कबूतर के जोड़े से प्यार की भाषा सीखने की इच्छा व्यक्त करते हैं और अपनी असमर्थता दिखाते हैं-

“कितना साफ है उनका प्यार और उसकी अभिव्यक्ति
उनके प्यार की यह भाषा समझने की कोशिश करता हूँ
तो अपनी भाषा खोने का डर लगा रहता है
और तब मुझे इंसानों की भाषा की सीमितता का बोध होता है।”

उद्देश्य की कविता में मध्यवर्गीय परिवार में बड़े हुए एक व्यक्ति की टीस भी सुनाई देती है जो केवल इसलिए पैसे कमाने के पीछे भाग रहा है क्योंकि आज भी सामाजिक दवाब और प्रतिष्ठा व्यक्तिगत इच्छाओं का दमन कर देती है-

“मध्यवर्गीय हैं, मर्द हैं बहुत दुख की बात है
क्या करें माता पिता का, समाज का दबाव है नहीं तो मुझे थोड़े न चाहिए था दस लाख का पैकेज”

इसी के साथ उद्देश्य की नजर एक इमारत पर लटके मजदूर की तरफ जाती है और समाज के उस तबके का भी ख्याल आता है जिन्हें दो वक्त की रोटी कमाने के लिए अपने जीवन को खतरे में डालना पड़ता है या सरकारी योजनाओं की राह देखनी पड़ती है –

“पलभर को नजर जाती है, सोचता हूँ क्या मैं यह नौकरी कर पाऊंगा ?
सोच कर पैर में सिहरन होने लगती है
जैसे कभी पेड़ से उतरते वक्त होती थी बचपन में
एक औरत बैंक में आती है, पासबुक पकड़ते हुए मैंने उसके हाथ को देखा उंगलियों और हड्डियों के बीच मांस की गैरमौजूदगी और हड्डियों का एक ढांचा सा शरीर, पर एक हंसी, दूसरी भाषा की हंसी
लजाई हुई सी
रोज किसी सरकारी स्कीम के पैसे के इंतजार में, आशा में सरकते हुए बैंक को आते बूढ़े, मजदूर और महिलाएं”

उद्देश्य कुमार अपने जीवन में पैर पसार रहे खालीपन और एक ही काम में लगे रहने की नीरसता को अपने बहुआयामी तथा विश्लेषणात्मक दृष्टि से दूर करने के लिए तत्पर हैं जिससे इनकी कविता सायास और स्वतःस्फूर्त दोनों रचना कौशल को स्वयं में समाहित किए हुए है जिसका स्पष्ट प्रमाण ‘चलते हुए’ कविता में वो प्रस्तुत करते हैं जिसमें वो सामान्य जीवन में अपने आस-पास हो रही घटनाओं को ध्यान से देखते हैं और उसे अपनी कविता में दर्शाते हैं –

“चाय की चुस्की लेते हुए, बस की पिछली सीट पर बैठे हुए या रास्ते में चलते हुए
मैं यह सब देखता-सुनता रहता हूँ
और मन ही मन लिखता रहता हूँ फिर भूल जाता हूँ और कभी-कभी लिख देता हूँ।”

इस प्रकार उद्देश्य कुमार की कविताओं में हम मध्यवर्गीय जीवन की नीरसता और समाज की ऐसी दोहरी तस्वीर पाते हैं जिसमें एक व्यक्ति केवल इसलिए ज़्यादा पैसे कमा रहा है क्योंकि समाज में प्रतिष्ठा के ऊँचें पायदान पर पहुँचना चाहता है और दूसरा केवल पेट भरना चाहता है, साथ ही एक रचनाकार के लिए आवश्यक दृष्टि का स्पष्ट अंकन पाते हैं, जो उनकी कविताओं को विशिष्ट बनाता है।

 

उद्देश्य कुमार की कविताएँ

1.रात में बालकनी में बैठकर

रात में बालकनी में बैठ कर शहर को देखने पर सब व्यवस्थित लगता है

दूर तक बस रोशनी, इमारतें, इस समय शोर भी कम सुनाई पड़ता है, लोग कम दिखाई देते हैं

प्रवासियों को यह शहर किस निर्ममता से छुपा लेता है

आधे-अधूरे, टूटे लोगों को, उनकी यात्राओं को

मानो कोई बेआवाज सी चीख है

आंखों का ही दोष है शायद उन्हें अंधेरा नहीं दिखता

रोशनी के दो सिरों के बीच का घुप्प अंधेरा

इसलिए कभी अंधेरे को कान लगा कर सुनना भी चाहिए

उसकी अपनी एक धुन होती है, उसमें दर्ज है हम सबका गुजरा हुआ वक्त

वयस्कों की दुनिया को बच्चों की आंखों से

पुरुषों की इस दुनिया को स्त्री के स्पर्श से

और एक व्यवस्थित शहर की गंध को एक ग्रामीण,
प्रवासी मजदूर के पसीने की गंध से ही समझा जा सकता है।

 

2.बसंत में बरसात

ये जो असमय की बारिश है

जो हो रही है चुपचाप, बेआवाज़

बस दिख जाती है लैम्पपोस्ट में

पर जिससे बढ़ जाती है छोटे बाजार में हलचल

और फेरीवाले, ठेलेवाले बटोरने लगते हैं अपना सामान

इस मौसम में बरसात नहीं होती, यह बसंत है

हालाँकि फूल नहीं दिखे कहीं, न कोयल की कूक

न ही हवा में घुली बरसात की उमंग

जैसे बसंत गुजर रहा चुपचाप

उसी तरह हो रही है बरसात आज रात

रो रहा है बसंत मानो भीतर-भीतर

और रिस रहा है पानी उसके रंगों से

ज़मीन पर आते-आते हो जाता है जो बिल्कुल काला

तीसरे माले के मुंडेर पर बैठा है एक बंदर

छज्जे की ओट लिए, भूखा है शायद

सोचता हूँ उससे पूछ लूँ कि क्या उसे बसंत समझ आया

पर भूखे जानवर से दूर रहने में ही भलाई है

सो मैं बस सोचता रहा उसकी सोच जानने को

एक बिल्ली के रोने की आवाज़ आती है, हालाँकि कुत्ते आज शांत हैं

ट्रेन की आवाज़ पृष्ठभूमि में उभरती है

सोचता हूँ उस ट्रेन से पूछ लूँ

बसंत, क्या तुम्हें बसंत समझ आया

तुम तो गाँवों से आती हो ना ?

ट्रेन लेकिन हाई-स्पीड थी वो निकल गई पलक झपकते

मैं अभी बस सवाल तैयार ही कर रहा था कई सारे

कुछ इसी तरह बसंत भी आता होगा

थोड़ी-थोड़ी देर के लिए और हम अनदेखा कर देते होंगे

हमें बस जिंदा रखने के लिए थोड़ी खुशबू बिखेरता होगा
और फिर गुजर जाता होगा

सोचने लगता हूँ यह सब, जब होती है बसंत में बरसात, चुपचाप।

 

3.खोने का डर

एक जोड़ा कबूतरों का रहता है खिड़की के पास

दिन-रात गुटरगूं करता

बारिश होती तो छिप जाता

और खाली दुपहरी में उसी छज्जे की छाँव में करते एक दूसरे को प्यार

कितना साफ है उनका प्यार और उसकी अभिव्यक्ति

उनके प्यार की यह भाषा समझने की कोशिश करता हूँ

तो अपनी भाषा खोने का डर लगा रहता है

और तब मुझे इंसानों की भाषा की सीमितता का बोध होता है |

 

4. हमारा दुख और उसका बोध

कोई परिवर्तन की बात नहीं करता

सबको एक जगह चाहिए या तो एक कोना

सबका अपना व्यक्तिगत दुख है

कोई काम से दुखी है, कोई बिना काम के दुखी है

किसी को फुर्सत नहीं है, कोई खालीपन से डरता है

मध्यवर्गीय हैं, मर्द हैं बहुत दुख की बात है

क्या करें माता पिता का, समाज का दबाव है नहीं तो

मुझे थोड़े न चाहिए था दस लाख का पैकेज

यूरोप का जीवन कितना अच्छा है, वहीं सेटल होना
चाहिए, एक बिजनेस होना चाहिए, जीवन भर कौन नौकरी करेगा

यार रोज का डेली रूटीन परेशान कर देता है बिना मतलब का काम

क्या करना मतलब का पैसा तो मिल रहा है

पैसा कमाने के लिए काम तो करना पड़ेगा

बात तो सही है

इस बीच एक आदमी टंगा है बिना किसी सुरक्षा के

एक निर्माणाधीन बहुमंजिली इमारत के किसी माले पर

पलभर को नजर जाती है, सोचता हूँ क्या मैं यह नौकरी कर पाऊंगा ?

सोच कर पैर में सिहरन होने लगती है

जैसे कभी पेड़ से उतरते वक्त होती थी बचपन में

एक औरत बैंक में आती है, पासबुक पकड़ते हुए मैंने उसके हाथ को देखा उंगलियों और हड्डियों के बीच मांस की गैरमौजूदगी और हड्डियों का एक ढांचा सा शरीर, पर एक हंसी, दूसरी भाषा की हंसी

लजाई हुई सी

रोज किसी सरकारी स्कीम के पैसे के इंतजार में, आशा में सरकते हुए बैंक को आते बूढ़े, मजदूर और महिलाएं

हमारा दुख और उसका बोध।

 

5.चलते हुए

रास्ते में चलते हुए, चाय की चुस्की लेते हुए, या बस की पिछली सीट से कुछ लोग दिखाई देते हैं

कोई ग्रामीण जो शहर में नया है, कोई शहरी जो पुराना है

कोई जो कोचिंग से लौट रहा है और किसी सवाल पर चर्चा कर रहा है

कोई जो ऑफिस से लौट रहा है और दूसरे साथी के लिए सीट रोके हुए है

बोरे को काँख में दबाए मजदूरी से लौटता एक मजदूर दिख जाता है

जो यह सोचता है कि सही बस में चढ़ा है कि नहीं और सकुचाते हुए किराया पूछता है

रास्ते में एक माँ दिख जाती है जो अपने बेटे के सिर पर ईंटों का बोझ लादती है
और पता नहीं क्या बुदबुदाती है उसके कान में

चाय की दुकान पर कुछ बेरोजगार नौजवान दिख जाते हैं

जो हाँड़ी में जमा दही और भात के ग्रामीण स्वाद पर चटखारे लेते हैं
और सिगरेट फूंकते अपना मूड-फ्रेश करते हैं

पसीने में तर-बतर एक नेपाली जो पानी का ठेला खींचकर अभी बैठा है
और बीड़ी फूँकता दो पल सुस्ताता है

चाय की चुस्की लेते हुए, बस की पिछली सीट पर बैठे हुए या रास्ते में चलते हुए
मैं यह सब देखता-सुनता रहता हूँ
और मन ही मन लिखता रहता हूँ फिर भूल जाता हूँ और कभी-कभी लिख देता हूँ।


कवि उद्देश्य कुमार, जन्मतिथि: 21.08.1993 (वाराणसी), 
प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी में फिर इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री ली। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से एम. बी. ए. और उसके बाद 3 साल साउथ इंडियन बैंक में सहायक शाखा प्रबंध के पद पर कार्य किया। सिनेमा, साहित्य, राजनीति में रुचि। कुछ पत्र-पत्रिकाओं, सोशल मीडिया, ब्लॉग और अन्य डिजिटल माध्यमों पर कविताएँ और वैश्विक राजनीति एवं अन्य विषयों पर लेख प्रकाशित।

सम्प्रति: असिस्टेंट मैनेजर, साउथ इंडियन बैंक
शाखा – एडुलाबाद, हैदराबाद (तेलंगाना)
सम्पर्क: मोबाइल 6393116675

ईमेल: udd1993kumar@gmail.com

 

टिप्पणीकार अनुराग यादव, जन्मतिथि 26 सितंबर 2001 है। अनुराग, अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हैं। कविताएँ लिखते हैं। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रामनगर और बाराबंकी से पूर्ण की है। इनका स्नातक हंसराज कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी से वर्ष 2022 में पूर्ण किया तथा 2024 में हिंदू कॉलेज दिल्ली यूनिवर्सिटी से परास्नातक की शिक्षा पूर्ण की है ।

सम्पर्क: 6386080963

 

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion