अरुण आदित्य
सुरेश जिनागल गहन मानवीय संवेदना और सामाजिक सरोकारों वाले कवि हैं। उनकी ये कविताएँ वंचना और उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध की चिनगारी की तरह हैं। मनुष्य की गरिमा और श्रम के सम्मान के लिए संघर्ष को स्वर देती ये कविताएँ एक सधे हुए शिल्प में पाठक की चेतना पर प्रहार करती हैं। कवि ने स्पष्ट लक्षित किया है कि भारतीय समाज में मेहनतकश दलित और मुस्लिम समुदाय को किस तरह मनुष्य की न्यूनतम गरिमा से भी वंचित किया जा रहा है। इस वंचना का प्रतिरोध इन कविताओं में अत्यंत मुखर रूप में मौजूद है। इन कविताओं में प्रतिरोध का एक अपना शिल्प है। कुछ अनूठे बिम्बों और प्रतीकों ने इन कविताओं के सौंदर्य को और निखारा है।
‘आओ किसी भी डगर” शीर्षक कविता में प्रकृति और विकृति का चित्रण एक साथ हैं। शुरुआती पंक्तियों में कवि सहयात्री से प्रकृति और जीवन के करीब चलने का आह्वान करता है, ‘किसी जंगली पहाड़ी की चोटी को नापते चलें, किसी झरने से बात कर उसके साथ किलोल करें, रेत को उछाल कर हंस दें अपनी ही किसी बेवकूफी पर और कोई भूला हुआ वादा याद कर मुस्कुरा कर आगे बढ़ते जाएँ।’ ठीक उसी समय उसे वह सामाजिक विकृति भी याद आती है, जिसने किसी भी जगह को वंचितों के काबिल नहीं रहने दिया है। इसके बावजूद कवि की अदम्य जिजीविषा कहती है कि तमाम विपरीत हालात में भी बढ़ते जाना है। उसे पता है कि यह यात्रा कितनी कठिन है। इस कठिनाई को बताने के लिए कवि ने बहुत सुंदर रूपक का इस्तेमाल किया है-
जहाँ हम किसी दूसरी दुनिया की डायरी के ऐसे शब्द बनते जा रहे हैं
जिनके अर्थों को इस्तेमाल किया जा रहा है हमारे खिलाफ़
जिनकी पंक्तियों से घोंटे जा रहे हैं हमारे गले
जिनके पूर्णविरामो की नोक पर टंगे हैं हमारे मस्तिष्क।
हमारे देश की एकता-अखंडता ही नहीं मनुष्यता के लिए भी खतरा बन चुका सांप्रदायिक विद्वेष कवि की चिंता के केंद्र में है। सांप्रदायिकता का विरोध करने के लिए वे भाषा की अभिधा शक्ति का उपयोग करते हैं। फ़ैज को समर्पित कविता ‘हिज़्र जो शान्त कोने का मुंतज़िर नहीं था’ में वे इधर -उधर की बात न करते हुए सीधे सवाल करते हैं –
आख़िर वो हमीं क्यों थे जिनकी बस्तियों को जलाया गया
क्यों आईं हमारे ही हिस्से जेल की सर्द रातें
क्यों आये ज़ुल्मो–सितम में गुज़रे दिन?
ज़ुल्म-ओ-सितम के ख़िलाफ़ कवि के सरोकार वैश्विक हैं। फिलिस्तीन में निर्दोष नागरिकों पर हो रहे हमले से कवि व्यथित है। गोलियों से छलनी बच्चों के शरीर देखकर कवि को बहुत मार्मिक बिम्ब सूझता है- ‘बंदूकों से छिले पेड़ और बच्चों की टांगों में कोई फ़र्क नहीं अब’। यह कविता सिर्फ़ मार्मिकता ही नहीं जगाती आततायी शक्तियों की पहचान भी करती है-
किसने समय के दरवाज़े पर टांगा यह चुटकुला
कि नायकत्व रहित समय है यह
जो अन्दर बाहर होते हमीं पर हँसता है निरंतर
जबकि कहने वाले भी जानते हैं
तानाशाहों के नायकत्व में डूबा है समय
वैश्विक मुखौटों की पहचान करने वाला कवि देसी सवर्णों के उस मुखौटे को भी बहुत अच्छी तरह पहचानता है जिसके पीछे छिपकर वे एक तरफ तो दलितों से खुद नफरत करते हैं और दूसरी तरफ उन्हें मुसलमानों से नफरत करने को प्रेरित करते हैं। ‘मुसलमान’ शीर्षक कविता की अंतिम पंक्तियों में कवि बताता है कि दलितों को मुस्लिम-द्वेष का मंत्र देने वालों की निगाह में खुद दलितों की क्या हैसियत है –
दिमाग़ में भरे गए नासूर फलित होते रहे उनके स्वार्थ ख़ातिर
जिनकी नज़र में वे न हिंदू थे न मुसलमान
न जानवर थे न इंसान
बस उनके ग़ुलाम थे, इस पृथ्वी पर
किसी भी हत्याकांड में प्राथमिक शिकार थे।
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा था। उसी दूध की तलाश में वंचित-शोषित वर्ग के युवा जब विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में जाते हैं तो व्यवस्था पर काबिज दलक समुदाय की आंखों में चुभने लगते हैं। उनके सपनों की लगातार हत्या करती हुई व्यवस्था उन्हें चलती फिरती लाश बना देती है। सुरेश लिखते हैं-
क्रांति की आग जली थी कभी उनके भी सीने में
देखे थे सपने दुनिया को बदलने के
पर जिम्मेदारियों की बर्फ़ गिरती रही सपनों की आग पर
जब ठगे गए किसी संगठन, किसी संस्था, किसी व्यक्ति के हाथों
ज्ञान के नाम पर किसी प्रोफ़ेसर के हाथों
फूलों की पंखड़ियों की उड़ती खुशबू का कोई क़तरा था
प्रेम
जो पास से निकल जाता अनजान की तरह
मनुष्य होना भी चुभता रहा उनका
इसलिए वे अपनी लाश अपने साथ घूमते लेकर घूमते थे।
सुरेश जिनागल की इन कविताओं में उदासी भी है, टूटना भी है, लेकिन संघर्ष का हौसला भी है और मनुष्यता पर भरोसा बचे रहने की आकांक्षा भी। हालांकि कवि जानता है कि यह आकांक्षा कितनी कठिन है। ‘मनुष्यता पर भरोसे के लिए’ कविता में कवि के समक्ष एक ऐसा पात्र है जो अपनी सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक श्रेष्ठता के भाव में डूबा हुआ है। अपनी संपन्नता और “हिंदू’ पहचान पर गर्व करता यह पात्र कवि को अपने मकान में रहने के लिए कमरा देने का प्रस्ताव देता है। मामला तय होने से पहले वह कवि से पूछता है, “समाज कौन सा है”। यहाँ ‘समाज” से उस व्यक्ति का आशय “जाति” से है। बदले में कवि अपने समाज का नाम ‘मनुष्य’ बताता है। मनुष्य के नाम पर बात बिगड़ चुकी है। पर कवि को अब भी उसके फोन का इंतज़ार है, कमरे के लिए नहीं, बल्कि मनुष्यता पर भरोसे के लिए। मनुष्य की गरिमा, मनुष्यता पर भरोसा और संघर्ष का संकल्प इन कविताओं का सार तत्व है। इन्हीं तत्वों की बदौलत कवि कह सकता है-
अब अपनी ऊभ-चूभ में दक्षिण ध्रुव से टकराती हमारी नाव
हमें ही खेनी होगी
हमें ही बनना होगा नायक।
सुरेश जिनागल की कविताएँ
1. आओ किसी भी डगर
आओ किसी भी डगर
किसी दूर जंगली पहाड़ी की चोटी को नापते चलें
किसी झरने से बात कर उसके साथ किलोल करें
रेत को उछाल कर हंस दें अपनी ही किसी बेवकूफी पर
भूला कोई वादा याद कर मुस्कुरा कर आगे बढ़ते जाएँ
यह याद करना दु:खद लगता है कि कोई भी जगह अपने क़ाबिल नहीं हुई अभी तक
फिर भी सामने से क़रीब आती ट्रेन के आगे से पटरी पार कर बढ़ते जाएँ
बढ़ते जाएँ …
चलते जाएँ…
जगहों को अपने काबिल बनाते
यह सब–कुछ कभी न ख़त्म होने वाली एक दौड़ जैसा है –
जहाँ हम किसी दूसरी दुनिया की डायरी के ऐसे शब्द बनते जा रहे हैं
जिनके अर्थों को इस्तेमाल किया जा रहा है हमारे खिलाफ़
जिनकी पंक्तियों से घोंटे जा रहे हैं हमारे गले
जिनके पूर्णविरामो की नोक पर टंगे हैं हमारे मस्तिष्क।
2.
हिज़्र जो शान्त कोने का मुंतज़िर नहीं था
(फैज़ अहमद फैज़ के लिए )
मुहब्बत–ओ–हिज़्र के सिवा दूसरे ग़म भी पुकारते रहे
पुकारती रही जली बस्तियों की याद
पुकारती रही वीराने में डूबी संसार की पहली ही सीढ़ी की पुकार
किसने हयात की पोटली में ज़रूरी सामान की तरह बांधे थे ये ग़म ?
किसने चुराया जीवन का ज़रूरी हिस्सा
जीवन क्या यही था?
आख़िर वो हमीं क्यों थे जिनकी बस्तियों को जलाया गया
क्यों आईं हमारे ही हिस्से जेल की सर्द रातें
क्यों आये ज़ुल्मो–सितम में गुज़रे दिन?
मुहब्बत की उम्मीद में न सही
खुशी के होशो–हवास में न सही
आदिम–ख़लिश में ज़िंदा रहना भी न सही
पर हिज़्र तो शान्त कोने का मुंतज़िर था ही !
फ़र्ज़ की तरह अता हुई पीड़ाएं किसी हिदायत और दया की मोहताज़ नहीं थी
अज़मत की रूमानियत की भी मोहताज़ नहीं थी
उन्हें ज़रूरी रास्तों की तलाश थी।
3. वे अपनी लाश अपने साथ लेकर घूमते थे
वे अपनी लाश अपने साथ लेकर घूमते थे
एक माचिस भी रहती थी उनके पास
जिससे दुनिया को आग लगाई जा सकती थी
पर वे दुनिया को सुंदर भविष्य के लिए बचा लेना चाहते थे
भविष्य को पेट पर बांधकर
कॉलेज और विश्वविद्यालय पहुंचे थे
वे दुनिया बदलने का सपना लिए आते थे विभागों तक
उनके होठों पर प्यास थी
दिमाग़ में भूख थी
आँखें में दृश्य थे मेहनत के
वे किसी प्रतिसंसार की खोज में लगते थे
पीठ पर बंधी भूख दोस्त थी
जिसका साथ न चाहते हुए भी अनिवार्य सा था
ज्ञान खाना और किताबें पीना चाहते थे वे
एक घर होता है मनुष्य के पास
एक परिवार या एक गांव या एक शहर या एक देश होता है किसी–किसी के पास
पर उनके पास ये होते हुए भी नहीं थे उनके
मनुष्य के रूप में जन्म लेने के कुछ होते हैं नागरिक अधिकार
जो बंद थे किसी डरावनी कथा के सात दरवाजों के सात तालों के पार
जिन तक दलदल में फंसकर ही पहुंचना है उन्हें
जन्म से ही बहनों की शादी और भाइयों की ज़िम्मेदारी का पहाड़ बांधकर आए थे वे सर पर
रहने योग्य घर की इच्छा पर कुर्बान थीं हज़ारों ख्वाइशों को प्राप्त करने की इच्छाएं
क्रांति की आग जली थी कभी उनके भी सीने में
देखे थे सपने दुनिया को बदलने के
पर जिम्मेदारियों की बर्फ़ गिरती रही सपनों की आग पर
जब ठगे गए किसी संगठन, किसी संस्था, किसी व्यक्ति के हाथों
ज्ञान के नाम पर किसी प्रोफ़ेसर के हाथों
फूलों की पंखड़ियों की उड़ती खुशबू का कोई क़तरा था
प्रेम
जो पास से निकल जाता अनजान की तरह
मनुष्य होना भी चुभता रहा उनका
इसलिए वे अपनी लाश अपने साथ घूमते लेकर घूमते थे।
4. उदासी
देश लिपटा है उसके गले तक में
संसद की सीढ़ियों पर पड़ी वह
रोजाना मौत का इंतज़ार करती है
पर अभी तक मौत मुहैय्या कराने वाली सरकार उसके लिए नहीं बनी है
न्याय–मूर्ति के तराजू में पड़ी वह
ख़ुद को क़ायम रखने के कारण खोजती रहती है
शहर परतों में फंसा उसकी तड़फड़ा रहा है
गांव भी ढका है आंधी में उसकी
स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय घर हैं उसके
जहां राज करती आई है वह
वह
तपती दोपहरी में पुलों पर सरिया ढोते मजदूरों के हाथों में रिसता ख़ून
घाम में खेतों की बहुत ऊंची बाड़ के नीचे निनाण करते व्यक्तियों के छाले
रेगिस्तान में भेड़ चराते ग्वाले की लम्बी प्यास
बलात्कार के बाद किसी घर पर पसरा मातम
जाति की आग में जली बस्तियों की रुलाई
ताज़ा मौत की चींटियों द्वारा खाई जा रही हड्डी
प्रधानमंत्री के भाषण के बाद हत्याओं का सिलसिला है
आप उसके आने की प्रक्रिया और कारण जानते हैं
वह किसी संस्कार और प्रवृत्ति की तरह नहीं आती चुपचाप
न ही धार्मिक नारों की तरह शोर करते हुए आती है
फिर भी आती है वह
अनजाने मे
वह आंतरिक से अधिक बाहरी है
उसके स्त्रोत बिखरे हैं हमारे आस–पास ही
आने के बाद वह बनी रहती है खाल और सिर की तरह
परंपराओं की तरह।
5. टूटना
मैं टूटना नहीं जानता
मैं मरना भी नहीं जानता
मैंने पीसने से भी पसीना निचोड़ा है
मैंने खेतों को भी हाथों से जोता है
मैंने पुलों के लिए सरिये मोड़ें हैं
मैंने चमड़े का भी रोज़गार किया है
मैंने प्यास को भी प्यासा रखा है
मैंने भूख को भी भूखा रखा है
पर
अब मेरी सभ्यता को तोड़कर बनाई इस दूसरी सभ्यता में जी घुटता है
चेतना बिलखती है
सर फोड़ती है दीवारों पर
अपना ही हाथ चबा जाना चाहती हैं इतनी जोर से कि खून की धार आसमान को छू जाए
यह कारावास की कोठरी सी लगती है
मैं तुम्हारी दुनिया में अनजान होने की वज़ह से नहीं,
तुम्हारी अकेलेपन की चालाकियों से मरूंगा।
6. मनुष्यता पर भरोसे के लिए
उसका चेहरा भारतीय समाज की परिभाषा है
वह चाहता है मैं उसके बताए मकान में रहूं
लगातार किए जा रहे कॉल उसकी मज़बूरी बयां करते हैं
गाड़ी रोककर उलाहना देना –‘आप मेरे यहां रहना नहीं चाहते’
अपनेपन की परिभाषा के लिए पर्याप्त होगा किसी के लिए भी
मॉर्निंग वॉक के एक दिन
धणिये की महक ने पाश की याद दिलाई या पाश ने धणिये की महक की
निर्णय पर पहुंच ही गया था,
कि अचानक विचारों में सांड की तरह कूदते हुए खेत पर बुलाया उसने
अपने पुरखों का अब तक का इतिहास बहुत सरलता से परोसता रहा
जिनके पुरखे मनुष्यों की खाल के ढोल बजाते रहे
तलावर की नोक पर टांगते रहे उन्हें
वे पता नहीं क्या सोचकर अपने पुरखों के गुण गाते हैं
उन्हें कौन समझाए
महानता तलावार की नोक से या किसी पशु–उपाधि से नहीं मिलती
वह तो एक पतली सी मुस्कान की मोहताज़ है
अपनी अस्सी बीघे ज़मीन का घमंड उसकी आवाज़ को धीमे कर रहा था
नहर से अपने खेत तक
अपने दम पर पानी लाने
और पच्चास लाख के खर्च के बारे में बताते हुए
उसकी आंखों में फतह की अनोखी चमक भर आई थी
दो नौकर रखने के बारे में बताते हुए गर्दन आसमान से टकराने लगी थी
अपने हिन्दू होने का भाव समुद्र की तरह उफन रहा था देह में
इसी क्रम में उसने
संतरे के खेत
बच्चों की पढ़ाई के बारे में भी बताया
घर का बड़ा सा नक्शा दिखाते हुए थोड़ी दूर तक मेरे साथ आया
अंत में किसी परिचित सी आवाज़ में बोला समाज कौनसा है?
मैंने उसका कुछ नहीं बिगड़ा था
न मैंने उसकी ज़मीन दबाई थी
न मैंने गाली दी
न मैंने उसके घर डाका डाला
न ही अपने पूर्वजों की महानता में हत्याओं की गाथा सुनाई
मेरा मनुष्य कहना पर्याप्त था मेरी इज्ज़त के लिए
मेरे और उसके संबंध की मर्यादा के लिए
कमरे में रहने न रहने के निर्णय के लिए
अन्य आदि–आदि के लिए
मैं अब भी उसके फ़ोन का इंतज़ार करता हूं
कमरे के लिए नहीं
मनुष्यता पर भरोसे के लिए।
7. मुसलमान
पिता, चाचा और परिवार के अन्य लोग मज़दूर बने
वे अगड़ों के घर बनाने
गए उनके घर
खेतों में तोड़ने सिटी, काटने कड़वी और उखाड़ने गंवार
तब उनसे सीखा –
मुसलमान बुरे होते हैं
होते हैं गद्दार
नहीं होते संबंधों योग्य
दिमाग़ में भरे गए नासूर फलित होते रहे उनके स्वार्थ ख़ातिर
जिनकी नज़र में वे न हिंदू थे न मुसलमान
न जानवर थे न इंसान
बस उनके ग़ुलाम थे, इस पृथ्वी पर
किसी भी हत्याकांड में प्राथमिक शिकार थे।
8. फ़िलिस्तीन
बमों के गुब्बार उठते हैं
दिन बदल जाता है रात में और रात बदल जाती है दिन में
सपने के डर को हक़ीक़त में बदलते देख,
कच्ची नींद सोते बच्चे उठ रहे हैं रह–रह
वे जान गए हैं सपनों की हकीकत फ़िलिस्तीन भी होती है
(बंदूकों से छिले पेड़ और बच्चों की टांगों में कोई फ़र्क नहीं अब )
गज़ा के आसमान में उनके सपने पतंग की तरह उड़ने थे
पक्षियों की तरह भरनी थीं कुलांचे
जहां समुद्र की ठंडी हवा को बहना था निर्बाध
जहां लोकगीतों की हरियाली पर प्रेमियों को चूमना था परस्पर
वहां इज़रायली विमान रेगिस्तान की तरह पसर गये हैं
फैल गई है अमेरिका की लार चारों ओर
अब सब अलविदा कह रहे गज़ा को
बच्चे
पेड़
पक्षी
लोग
पर
इज़ारयल–अमेरिका की लालसाएं गाड़ रही हैं खूंटे
बांध रही हैं अपने पशु
किसने समय के दरवाज़े पर टांगा यह चुटकुला
कि नायकत्व रहित समय है यह
जो अन्दर बाहर होते हमीं पर हँसता है निरंतर
जबकि कहने वाले भी जानते हैं
तानाशाहों के नायकत्व में डूबा है समय
उनके नायक उनका नेतृत्व कर रहे हैं
अब अपनी ऊभ-चूभ में दक्षिण ध्रुव से टकराती हमारी नाव
हमें ही खेनी होगी
हमें ही बनना होगा नायक।
कवि सुरेश जिनागल
सुरेश जिनागल,
जन्म–30 जून 1995, चूरू, राजस्थान।
परास्नातक–काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी।
शोध कार्य भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से ‘मारवाड़ी लोकगीत: स्त्री जीवन और स्त्री चेतना’ विषय पर पूर्ण किया। विभिन्न पत्रिकाओं और ब्लॉग्स पर कविताएँ और शोध आलेख प्रकाशित।
संप्रति –राजकीय महाविद्यालय पिड़ावा, झालावाड़(राजस्थान)में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर कार्यरत।
संपर्क – रूम नंबर –3, चन्द्र श्री इंटरप्राइजेज, पिड़ावा, झालावाड़, 326034(राजस्थान), मो. नंबर –8104906286
ईमेल–jinagalsuresh18@gamil.com
टिप्पणीकार अरुण आदित्य, दुष्यन्त पुरस्कार, अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान, बेकल उत्साही सम्मान, आयाम सम्मान से सम्मानित कवि हैं. जन्म – 02 मार्च 1965 (प्रतापगढ़ )
प्रकाशित कृतियाँ: ‘रोज ही होता था यह सब’, ‘धरा का स्वप्न हरा है'(कविता संग्रह), उत्तर वनवास (उपन्यास) कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
असद जैदी द्वारा संपादित ‘दस बरस’ और कर्मेंदु शिशिर द्वारा संपादित ‘समय की आवाज़’ में कविताएँ संकलित़। कुछ कविताएँ पंजाबी मराठी और अंग्रेज़ी में अनूदित़। सांस्कृतिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी़।
सम्पर्क: 9873413078
मेल: adityarun@gmail.com

