समकालीन जनमत
कविता

सुमन शेखर की कविताएँ प्रयोगधर्मी और लंबी साँस की कविताएँ हैं

आदित्य शुक्ला


सुमन शेखर की ये कविताएँ लंबी साँस की कविताएँ हैं। जैसे किसी चित्रकार ने एक लंबी साँस में एक चित्र खींच दिया हो। इन कविताओं में भूख की विडंबना है तो इनमें अपनी परंपरा की याद करने का एक आग्रह भी है। इनमें प्रयोगधर्मिता है। कवि के पास शिल्प से खेल करने की दृष्टि और माद्दा है। इनमें कोमलता है, प्रेम की यादों के नरम चित्र हैं। इनमें शाश्वत मूल्यों को तलाशने की एक कोशिश भी है। साहित्य संसार में व्याप्त विरोधाभाषों पर तंज भी है। कवि अपनी दृष्टि के मार्फ़त अपने साहित्यिक मुहावरे को चिह्नित करने और रेखांकित करने का प्रयास करते हैं। इन मायनों में कवि सुमन एक संभावनाशील कवि हैं। हालांकि, लंबी साँस की इन कविताओं में कहीं-कहीं ध्वनि के कम होने का ख़तरा है। कविता दृश्यों, बिंबों और ऐन्द्रिकता से संघनित होकर एक इकाई बनती है। कवि को अपने मुहावरों को और परिष्कृत करना चाहिए ना कि उसे बने बनाये मुहावरों से संतुष्ट हो जाना चाहिए। कवि सुमन के पास पीड़ित के पक्ष में पर्याप्त संवेदना है जिसका इस्तेमाल वे जन चेतना से लैस मारक कविताएँ लिख सकते हैं। कविता ‘भाषाविद कहते हैं’ उनकी प्रयोगधर्मी प्रवृत्ति को दिखाती है। यह कविता ना सिर्फ़ अपने शिल्प में विशेष है बल्कि इसका विषय और शीर्षक भी आकर्षक हैं। यह कविता मशहूर फ़िल्मकार वांग कर वाई की फ़िल्मों के नायक नायिकाओं से प्रेरित है। यह सच है कि वांग कर वाई की फ़िल्में अपने दर्शक पर अमिट प्रभाव छोड़ती हैं। इस कविता को पढ़कर लगता है कवि ने वांग के नायक-नायिकाओं को इतना आत्मसात कर लिया है कि उसके लिए इस विषय पर इतनी प्रयोगशील और सुंदर कविता लिखना संभव हुआ। एक और कविता ‘तुम जोरन हो’ कोमल भावनाओं की एक सुंदर कविता है। यह कविता कम से कम मेरे मन में लोक जीवन से जुड़े एक बिम्ब की छवि उभारती है। कवि को अपनी रचनाओं के सम्पादन के बार में थोड़ा सजग होना चाहिए। कविता सिर्फ़ अपने शब्दों और शिल्प में नहीं होती बल्कि अंतराल में भी होती है। शब्द और शिल्प के साथ अन्तराल की रचना करना भी कवि के कार्यभार का हिस्सा है। जैसे कविता ‘भूखा व्यक्ति संसार चबा लेता है’ आवश्यक बिंबों और विषय की कविता होते हुए भी कुछ दुहराव और शब्दातिरेक का शिकार है। कविता ‘महान वरिष्ठ कवि’ में कविता की लंबाई और सपाट वर्णन विषय में निहित तंज के प्रभाव को कम करते हैं।

सुमन की इन कविताओं में विषय भिन्नता है जो पाठक को कवि की दृष्टि के प्रति आश्वस्त करती है। कवि के पास प्रयोग करने की जो क्षमता और तेवर हैं वह आशान्वित करता है कि आगे चलकर वे और नए प्रयोग करके हिंदी साहित्य को अपनी रचनाओं से समृद्ध करेंगे।

 

सुमन शेखर की कविताएँ

1.भूखा व्यक्ति संसार चबा लेता है 

एहसास ज़रूरी है
बुरे में दुख का
दुख में सुख का
सुख में भूख का
भूख में रोटी का
रोटी में मेहनत का
मेहनत में पसीने का
पसीने में नमक और पानी का
एहसास ज़रूरी है

शब्दों में मिठास का
प्रेम में देवत्व का
करुणा में शांति का
क्रोध में चयन का
संयम में पुरुषार्थ का
शोक में जीवन का
बातों में तर्क का
भाव में शुद्धता का, क्योंकि
‘हर आदमी एक विचार है, व्यक्ति नहीं,’
एहसास ज़रूरी है

दबती-उठती पूंछ और मूंछ में मनुष्यत्व का
शिकायत और बुराई में व्यक्ति के मन का
किसी के हक़ का खाने में अपने हाजमे का
एहसास ज़रूरी है

सभ्यता राजनीति से नहीं, आध्यात्मिक ऊँचाई से बचेगी
जीवन केवल तर्क से नहीं भाव से भी बनता है
संतुलन और दिशा दोनों ज़रूरी है
समय ऐसे लोगों से भरा है, जो आदर्श की केवल ‘बातें’ करते हैं
सबकुछ गणना और जोड़-घटाव के अधीन ही नहीं घटता प्रिय
पशुता मनुष्यता से आगे की बात है,
(इस समय का सच यही है)
निश्चितता पर संशय का
एहसास ज़रूरी है

चुनाव में सुनहरे भविष्य का
शोषण में अपने हक़ का
नारों में आवाज़ का
चुप्पी में हार का
जीत में दमन का
शोर में सन्नाटे का
सोचने में व्यवस्थित बचे रह पाने का
एहसास ज़रूरी है

किसका एहसास ज़रूरी है?

तुमने कहा था- भूख का एहसास सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

‘भूख’ सबसे ज़्यादा जाना गया शब्द है
भूख सबसे ज़्यादा अबूझा शब्द है
भूख की हर शाख पर बैठे हैं सेवक
भूख कितनी ज़्यादा हो सकती है
कि बेचनी पड़ जाए जर-जोरू-जमीन
बेचनी पड़े झूठ, बेचना पड़े व्यक्ति, समूह, आडंबर, धर्म, ग़रीबी, लूट और सहिष्णुता
बेचनी पड़े हवा, आँखों का पानी , जंगल, नदी और समंदर
बेचनी पड़ जाए रेल, हवाई जहाज़, टेलिकॉम, अस्पताल, तेल, गैस, भविष्य और
देश समूचा
जिसके खाते में नारे विचारों की जगह लेते हैं,
उसकी भूख की भव्यता,
मीडिया भी बाँचने से कैसे चूक सकती है!

मूर्तियाँ देवताओं/महापुरुषों की बनाई/पूजी जाती हैं
सेवक को चुना हमने भविष्य बनाने के लिए,
सेवक भूखे रहे इतने,
देवता बनने से कैसे चूक जाते!

एहसास ज़रूरी है भूख का
भूख वाकई सबसे ज़रूरी मुद्दा है
भूख वाकई भूलाया गया मुद्दा है
सेवक का पेट कितना बड़ा है
और कितनी विशाल है उसकी भूख!

बोलने की कला और दिखने की भूख
इस हद्द तक महान बताई जाएगी!

भूखा व्यक्ति संसार चबा लेता है-
कह गए हैं पुरखे।

 

2. महान वरिष्ठ कवि 

महान वरिष्ठ कवि
आहत नहीं होते आलोचनाओं से
आहत नहीं होते,
नए पाठकों तक अपनी जगह बनाने की नाकामी से, अपने बूढ़ेपन से
कुछ नया लिखने को बचा नहीं है, प्रभाव अब फीका है,
इससे भी आहत कहाँ होते हैं!

आहत हो जाते हैं नए पौधों की पीठ न खुजाये जाने से
आहत हो जाते हैं पोस्ट के ‘एक लाइक’ न दबाने वालों से
और उससे भी ज़्यादा आहत हो जाते हैं
दूसरे पोस्ट पर ‘लाइक’ लगाए जाने से

महान वरिष्ठ कवि
कितना संशय पैदा करते हैं भला!

अब, व्यक्ति की रचना को देखकर कुछ कहा जाए
या उनसे सीखना होगा
रचना के इतर मठ, धर्म-जात की राजनीति,
लाइक-कमेन्ट की अवधारणा
नतमस्तक हो जाना दिखना,
‘मैं तुम्हारा-तुम मेरा गुणगान प्रिये’ पद्धति का!

साहित्य में पढ़ा था-
महान वरिष्ठ कवि अंगुली पकड़ कर सीखाते थे
कविता, कहानी और आलोचना की कला
उन्हीं महान पुराने वरिष्ठ कवियों का रोना सुना
विलुप्त हुए इस प्रथा पर

अगर इसमें कोई तयशुदा नियम कानून हों
तो बताया जाए
मैं, महान वरिष्ठ कवि को आहत नहीं कराना चाहता हूँ
मैं चाहता हूँ बचाए रखना उनका आवेग,
उनकी ऊर्जा और उनकी प्रभुता
उनके चेहरे की मुस्कान, उनकी रात का चैन,
सुबह की अच्छी चाय और यह एहसास कि ‘मैं सीख रहा हूँ’

क्योंकि,
मैं अभी-अभी शुरू हुआ
ख़ुद को डूबते हुए नहीं देख सकता
कितना कुछ सीखना है अभी

कितना कुछ सीखना-देखना बाकी है अभी श्रद्धेय!

 

3. तुम बदले हो 

किसी किताब के किसी वाक्य में छिपे किसी शब्द ने
याद दिला दिया बरसों पुराना चुंबन
चाय से भरी कप होंठों से लगाते ही याद आई-
उसके होंठ भी कुछ इसी तरह जगह बनाते थे
और उसकी आँखें भीड़ में भी तलाश लेती थी मुझको

याद आया यह वाक्य भी-
‘ज़्यादा पढ़ना दुखों में इज़ाफ़ा करना है’

पढ़ने के लिए पूरे भूगोल में
मैंने केवल उसे ही पढ़ना चुना

सबसे पहले मुझसे छूटा था कुछ,
वह था- स्वयं
उसकी शिकायत थी- तुम बदले हो
मेरे पास सिवाय बदलने के क्या रह गया था शेष!

प्रेम के तीन पड़ाव-
स्वीकृति, टकराव और फिर बचे रह पाए
तब पुनः स्वीकृति
सर्वस्य स्वीकृति

जैसे हैं,
उसी के साथ पूर्णता में धारण करना
मनुष्य ने सीखा ही नहीं!

परिणाम यूँ दो होते-
या तो तुमसे चूक जाता
या चुक जाता
दोनों में नुकसान मेरा ही था
बदलता न तो क्या करता!

मेरी तस्वीरों में चेहरे अलग-अलग दिखते हैं
हर तस्वीर पर कहती- इसमें पहले से सुंदर दिखते हो
सबसे अंतिम तस्वीर हमारे साथ की थी
उसका अंतिम वाक्य था-
तुम पहचान में नहीं आ रहे,
तुम अब काफ़ी बदल गए हो।

उसका अंतिम चुम्बन मेरी दाहिनी आँख पर था,
और इसी समय उसने तय किया-
मुझे जाना होगा ताकि तुम ढूँढ पाओ ख़ुद को
उसने कहा नहीं, यह मेरे मन ने सुना उसका अंतिम वाक्य था
और वह चली गई
लौटने के निशान पर उसने बोए घास

चली गई ऐसे, जैसे ‘लौटना’ शब्द
उसके शब्दकोश से, मेरे हिस्से का विलुप्त हुआ हो गया हो

किसी किताब के किसी वाक्य में छिपा शब्द है-
‘तुम बदले हो।’

 

4. अतिरिक्त

अपने ही शत्रुओं की तरह लड़ने उकसाने को बेकरार हैं
आश्रय, अनाथाश्रम मे तब्दील हो चुका है
कहने को भी अपने, दूर तक संदेह की दृष्टि में हैं
अधिकार जीवन से गौण हो चला है
प्रेम विस्मृत रास्ता और
दुख मेरा पर्याय

अच्छे लोग ज़्यादा समय नहीं जीते
जो रहे प्रिय, जल्दी ही साथ छोड़ गए
जीने को नया केवल खुद को खराब करना शेष है
इसके अतिरिक्त क्या है शेष!

यह मुझे ध्यान और मौन की तरफ धकेल रहा है आयु।

 

5. तुम जोरन हो 

मार्च के बाद महीने बुलेट ट्रेन पर सवार होकर दौड़ते हैं
कितना कुछ भी कर लो तैयारी
बहुत कुछ चूक जाता है
छूट जाता है कहीं बीच में ही कुछ-कुछ
कभी भूल जाता है कुछ-कुछ,
आगे बढ़ने की रफ़्तार में

नवंबर आते ईंधन खपने लगता है,
धुक-धुक कर चलती है गाड़ी जैसे
महीना भी धीरे-धीरे उतरता है कैलेंडर से

नवंबर उतरते गहरी उदासी भरती जाती है
थकान से बदन टूटता जाता है
नींद पलकों पर सुस्ताना चाहती है
और हथेली,
तुम्हारी गर्म हथेली में फिर से हरी हो जाना चाहती है

साल भर चलता रहे ईंधन,
इसमें तुम और दिसंबर की तुम्हारी हथेली की अनिवार्यता
अकाट्य है

यह साहित्य के शब्द का लिया गया कोई झूठा सहारा नहीं है
यकीनन, तुम्हारी हथेली दिसंबर में मिला वह जोरन है
जिससे बाक़ी महीनों [के दूध का] भूगोल बदल जाता है।

6. याद

वह एक ऐसा आदमी था,
जो भूला ही रहा सबके बीच रहकर
उसे याद रख पाने का कारणउसके जीवित रहते कोई नहीं ढूँढ पाया

और इस तरह वह मरा
जैसे किसी ने कुछ जाना-देखा ही नहीं
कहीं कुछ घटा-बढ़ा भी नहीं।

 

7. जो हमेशा है, वह डरावना है I

सत्य का सबसे अधिक विरोध वही करता है,
जो सत्य से बहुत दूर खड़ा हो
या वश में हो किसी खूबसूरती के

जिसे रोने की आदत लग गई
उसे काँधे की आदत बहुत पहले लग चुकी है

वह एक दिन सुबह उठता है
आँख पर पट्टी बांध बाहर चला जाता है
वापसी में, वह अपना घर भूलने की कोशिश करता है
ताकि पूरी तरह थकना जान पाए

मेरे पिता एक लंबे समय से लापता हैं
हर शाम उनको ढूँढने निकलता हूँ
खाली हाथ जाता हुआ,
खाली-खाली लौट आता हूँ
सुबह फिर से आँखों में
पिता के होने के सपने भरे होते हैं

आखिर किस वजह से किसी कवि ने कहा होगा-
“कवि को वह गाने दो, जो वह गाना चाहता है”

दुनिया का सारा लेखन
कल्पना के लेप से रंगा है
इमारत भव्य है, नींव झिलमिल
अपनी गलतियों को
कविता की शक्ल देकर सुधारा नहीं जा सकता

महान, जाने हुए लेखकों को पढ़ा,
सारे भ्रम टूटे
खुद की हार और नाकामियों तले
खुद को कितना ज़्यादा सहानुभूति परक लिखा जा सकता है!

ऐसे महान, जाने हुए कवि ने
उस बुराई को कहीं भी दर्ज़ नहीं किया,
जिसमे वह खुद संलिप्त रहे

ऐसे महान, जाने हुए कवि ने
उसकी जगह भी खुद को रखकर लिखा,
जो उसकी दी हुई पीड़ा का बोझ ढो रहे थे

ऐसे महान, जाने हुए कवि ने ऐसा भी लिखा
जिसपर उसने अमल न किया
लेकिन उसे पता था
यहाँ ‘वाह’ और ‘आह’ के साथ ‘सम्मान’ की गारंटी है,

तब जाना संदेह और स्मृति एक सीमा पर कितने सौतेले हैं।

 

8. भाषाविद कहते हैं…

(वोंग कर वाई का नायक और नायिका)

सूनी सपाट देह
ख़ाली-ख़ाली पेट
और उससे भी ज़्यादा
ख़ाली-ख़ाली दिल
ख़ाली-ख़ाली से भी बदतर

जिसमे रहने वाला एक दिन अचानक से निकल गया
न कुछ कहा
न कुछ सुना
निकल कर अलग हुए ऐसे
जैसे सड़क पर दूर से ही दिख सकने वाला कोई पर्यटक
जिसके गुम हो जाने की कोई पहल नहीं होती

वह भूल गया भाषा
भूल गया दिल का कमरा
भूल गया हमारे बाहों की लिपि
भूल गया उंगलियों में जागती रातें
भूल गया सब या शायद
उकता गया!

वह ख़ाली-ख़ाली से भी बदतर दिल, पेट और देह के साथ
ख़ाली-ख़ाली सी सुनसान रातों में बसर करती है
रात को दिन की तरफ़ सुलगाती है
दिन को फूंककर रात कर देती है हर रोज़

पेट की भूख लगे, तो हाथ चूमती है
मन की भूख लगे, तो उसके घर के नीचे खड़ी हो
एकटक खिड़की से झांकती है भीतर
देख लेती है अपने प्रेम को किसी और के साथ
किसी और लिपि की प्रतिष्ठा में निरत

दिल की भूख हो तो यादों का उधरा कम्बल ओढ़ती है
देह की भूख हो
तो मन, दिल और देह को दिनों-दिन समय की चक्की पर पिसती जाती है
कि कोई तो हल होगा!

कोई तो हल होगा!

जिसको मेरे बिना जीना अपराध लगता था
कितनी निष्ठुरता से चला गया बिना कुछ कहे!

 


कवि सुमन शेखर, जन्म- 13 जुलाई 1995, शिक्षा-मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर।
कई नाटकों का लेखन, अभिनय और निर्देशन।
ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली में कुछ विशेष शो का संचालन।
कुछ फ़िल्में- सैड्डिस्ट (देश-दुनिया के प्रमुख फिल्म फेस्टिवल में शामिल), ख्वाबिदा (एन एफ डी सी बेस्ट रोमांटिक फिल्म 2025) लाउडस्पीकर (अवार्ड विनिंग), वेपर (फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में प्रदर्शित), छिछोरे, दिल्ली पुलिस, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, शेड्स ऑफ रेड (अवार्ड विनिंग) , स्माइल वेरसेज़ स्माइलीज(अवार्ड विनिंग), अनचाहा, दाग, इंटॉक्सिकेशन, द लिफ्ट, फर्स्ट लव, प्राची, चिट्ठी, किरदार सहित कई फिल्मों और एड में अभिनय, लेखन सह निर्देशन। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित।

वर्तमान पता-अंधेरी वेस्ट, मुम्बई में ठिकाना।
स्थाई पता- माँ, कृष्णा नगर, खगड़िया-851204
मोबाइल-8877225078
ईमेल- Shekhers9144@gmail.com

 

टिप्पणीकार आदित्य शुक्ल, जन्मः 27 नवम्बर 1991, गोरखपुर (उ.प्र.)। पढ़ाई-लिखाई गोरखपुर से। सृजनः ब्लॉग लेखन और विभिन्न पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ और ललित गद्य
प्रकाशित। ‘सात समन्द की मसि करौ’ नामक एन्थॉलॉजी में कविताएँ संकलित।

सम्प्रतिः सॉफ्टवेयर क्वालिटी एनालिस्ट

मोबाइलः 7836888984

ई-मेलः shuklaaditya48@gmail.com

 

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