सुधीर सुमन की कविताएँ
1. बेरहम रात
रात बेरहम
सख्त अंधेरा
आराम नहीं पल भर
दीवारों के पार
शमा खामोश
मानों हजारों मिल का फासला
जितनी तेज हो रही पुकार
उतनी गहरी होती खामोशी
अनसुना, दम तोड़ता
एक आदिम नैसर्गिक राग
कहां है फुरसत
कहां है हिम्मत
कहां है बेचैनियों की थाह
बस जैसे कोई रूह तड़पती
खलाओं में खोने को मजबूर
अपने भविष्य की फिक्र में सब
आगोश में लिए प्यारी चीजें
खोए हैं एक गरम-सी नींद में
और इधर सर्दी बढ़ती जा रही
हर चीज पर जमती जा रही.
2. जब रात घेरती है
जब रात घेरती है
कलेजे को रेतती है कोई कटार
धीरे-धीरे
जब अंधेरे में
कोई आस का जूगनू भी नहीं चमकता
जब आंखों में सिर्फ बरसात का मौसम
और भादो की काली रात होती है
तब कोई किसी का कर्ज उतारता है
इकरारनामा है कोई।
कुछ भी कहना
कुफ्र हो जाता है
काफिर करार देने की कसौटियां
मानो सिर्फ मेरे लिए हों।
तमन्ना के आदमकद गुलदस्ते को धो-पोंछकर
किसी तहखाने से निकालकर
गिलोटिन पर रख दिया गया हो जैसे
बेरहम कटार गिरता है
सारे फूलों-पखुंडि़यों को क्षत-विक्षत करता-
इतने वक्त में
कितनों संग कितने अफसाने बन जाते।
गोया दिल न हुआ
बाजार का सामान हो गया
बरसती है कोड़े-सी आवाज-
धिक्कार है
इनजॉय भी नहीं कर सकते।
फलसफे की सारी दीवार
भरभराकर गिरती है
हदें, हैसियत, बगावत, चाहत के
अपने और पराये किस्से है
उनकी तासीर अलग-अलग है
उनका तबसरा जुदा-जुदा है
3. जहाँ मैं हूँ
जहां मैं हूं
अरब का रेगिस्तान नहीं
न ही कबीलों के आपसी टकराव में
खतरे में है कोई मधुर स्वप्न
फिर भी
ऐसा क्यों लगता है
जैसे रेत में हूं
झुलसाती गरमी में
अथाह प्यास का मारा
भटक रहा हूं कब से
किस चीज की तलाश है मुझे?
बादल आते हैं मेहरबां
चंद बूंदों की कृपा कर
चले जाते हैं
और उमस बढ़ जाती है
घुटने लगता है वजूद
जिस्म का जर्रा-जर्रा टूटता है।
शीतल हवा आती है
कुछ पल के लिए
छूकर चली जाती है
कुछ इस तरह
जैसे कोई खुशनुमा ख्वाब हो बस
उसके जाते ही
भयानक खला पैदा हो जाता है
कोई रुकता नहीं
सबको किसी न किसी के
कर्ज चुकाने हैं
शायद मैंने नहीं किया
किसी पर एहसान
अगर किया भी हो
हिसाब कहां रखा
मेरा कर्ज नहीं किसी पर
क्या इसीलिए, इसीलिए
भटक रहा हूं अंतहीन?
4. पुकार
पुकारता रहता हूं
किसी को
वह आए कि
बेचैन रूह को
आराम मिले कुछ पल
मगर कोई क्या करे
बचाना है सबको अपने लिए कुछ
अपना भविष्य, अपनी प्यारी चीजें, अपने लोग
अपनी सुरक्षा
पता नहीं
आंख कब लग जाती है
पिता,
तुम इस सर्द रात में
नींद में उतरते हो
आते हो
मृत्यु के अंधेरे समुंदर पार कर
वही अपने पुराने घर
खपड़ैल का ओसारा
वही दुख, वही अकेलापन
तुम्हारे बगल में
लेट जाता हूं
तुम्हारे सीने से चिपककर
भूल जाना चाहता हूं
सारे रंजोगम
तुम्हारे दुख को बांटना चाहता हूं
कि आंखों में सैलाब उमड़ता है
उसमें देर तक
इधर-उधर तैरती रहती हैं
चीजें, लोग, घटनाएं….
5. इस रहगुज़र से
हमारे दरम्यान
क्या सहज है
क्या है उलझा
इसकी नहीं करनी तलाश
किस विमर्श के
किस खांचे में
कैसी है मेरी सूरत
इसे जानकर क्या करूंगा
मेरे लिए तो
यह वक्त है खास
जिसमें हूं मैं
और जिसमें घुली हो तुम
हवा की तरह।
ऐसा कोई लम्हा नहीं
जिससे लापता हो तुम
वह राह जो
तुम्हारी आंखों से होके गुजरती है
किस कदर फैलती गई है मेरे अंदर
चला जा रहा अनवरत
अंजाम से बेफिक्र।
मुहब्बत है, बस मुहब्बत
वर्ना क्यों पुकारता
हर लम्हा
जिस्म जिस्म को
सांस सांस को।
रोज कितने हुजूम से
होके निकलता हूं
कितनी सूरतें, कितने जिस्म
कोई और भाता नहीं
जेहन-ओ-दिल पे कोई और छाता नहीं
एक दुनिया है दौड़ती-भागती
जो यूं ही चलती रहती है
यह ऐसा दौर है कि
जहां भी ठहरता हूं कुछ पल
इश्क के अफसानों से
गुजरता हूं
किताबें, पेंटिंगें, फिल्म,
दोस्त- सबका विषय इश्क
हद है कि
जो रोजगार है मिला
उसमें ऐसी ही कहानियां मिलती हैं
-एक से नाम
-एक से सवाल
-एक सी तलाश
जैसे हर कोई हो कह रहा-
एक तुम्हीं नहीं
जमाने गुज़रे हैं
इस रहगुज़र से
6. सिलसिले
हर जोरो आजमाइश
दम तोड़ देती है
भुलाने की हर कोशिश
नए सिरे से जोड़ देती है
तुम्हारे घर की दीवारों के बीच
छिपे अदृश्य स्कैनरों को
आहत-डरी कमजोर रूहों सी
मंडराते अहसासों को
राहत दिलाने भागता हूं
फिर भी हमेशा
उन्हें नाकाम पाता हूं
यकीन करो
जितना दूर जाता हूं
उतना करीब आता हूं
उंगलियां थम जाएं भले
फोन के बटन तक आते-आते
थमते नहीं सिलसिले ख्याल के
जाने-पहचाने-अजनबी चेहरों से
मुलाकातें बेअसर
बातों के सिलसिले
जाने कैसे
जुड़ जाते हैं तुम्हीं से अक्सर
7. रक़ीब से
जो सांसे
धड़क रहीं
मेरी सांसों संग
जो सूरत ख़यालों में
है हर पल
उसपे हक क्या जताना
ग़र इश्क है तो
बार-बार दावेदारी क्यों
इश्क इज़हार के टोटके
मुबारक हो तुम्हें
मेरे पास जो है वो
8. जून की बारिश
जून की बारिश में
ट्रेन का सफ़र
पेड़ नहाए हुए
चुपचाप खड़े हैं
भैंस बैठी पगुरा रही है
बगुला उस पर बैठा है
घास ने नदी के बीच रेत पर
उसके सीने पर
अपना आशियाना बना लिया है
कटे हुए फ़सलों वाले खेतों में
हरियाली की चादरें
बिछी हैं
चादरों में जड़े
जल-आइनों के बेतरतीब टुकड़े
करते हैं झिलमिल
सब कुछ मानो ठहरा हुआ है
ट्रेन के गुजरते ही
अचानक चौंकती है
और बदन से आ लिपटती है
बेहद नर्म-नाजु़क
ठंढी हवा।
9. अरमान
कोई तो अरमां होगा
कोई तो ख़्वाहिश होगी
कि नींद न आई तुम्हें,
थकान और ऊब
मुझे गिरा देती है अक्सर
बिस्तर पर
नींद बस आती है
और उसमें दाखि़ल हो जाती हैं
कई कई हलचलें
जैसे कई अधूरी-पूरी कहानियां
जैसे अनदेखी फिल्मों के कई टुकड़े
फ़र्क़ यही है कि
किसी ख़्वाब ने तुम्हें सोने न दिया
और मेरी नींद में
ख़्वाबों का तूफ़ान मचलता रहा
उस नींद में
मेरी सूरत बच्चों जैसी
यूं ही नहीं
बच्चों की नींद भी तो
अनगिन ख़्वाबों से बुनी होती है
जो कुछ भी गुजरता है
उनकी आंखों से
वह कई-कई रंग-रूप बन
दाखि़ल होता है अहसास में
हां!
मैं जानता हूं
वह बच्चा मरा नहीं है।
10. इस अंधेरे में जाने दो
दोस्तो,
जाने दो
मुझे इन अंधेरों में
जिसमें रमी है यह दुनिया
मुझे न बताओ
इसकी हक़ीक़तें, कुछ तो है अहसास
पर थोड़ा जाने दो
इसके भीतर
देखूं तो जरा क़रीब से
वह कौन सा जादू है
जिसमें अपनी आंखों को खोकर
हमारे अंदर उतरता है नशा
समझदारी का
मुझे दूर न रखो
यह दूरी मुझे कमज़ोर बना रही
यह हिफाजत
जानलेवा न बन जाए
यह अंधेरा मुझे घूर रहा
इससे पहले कि यह मुझे निगल जाए
इसके खतरनाक सम्मोहन से
ज़रा आंखें मिलाने दो
ज़रा जाने दो
इस समुंदर में
कुछ तैरना आता है
बाक़ी सीख लूंगा
डूबने के डर से
भागते रहना
कहीं किसी टापू पर बैठ
इन कालिया लहरों को गरियाने का
कोई मतलब नहीं
यक़ीन है
यह वैसा ही होगा
जैसा तुम बताते रहे
कुछ तो मुझे भी है पता
फिर भी ज़रा महसूस करने दो
मुझे इसके सारे तहखानों
सारे सुरंगों, पूरे तंत्र को
जानने दो।
11. एक दिन आऊंगा
एक दिन अचानक
उमस से भरे किसी दिन
हवा के ठंढे झोंके की तरह मैं आऊंगा
तुम्हारे तपते सुलगते तन-मन पर
पहली बारिश की तरह बरस जाऊंगा
किसी अजनबी शहर में
किसी बस अड्डे, किसी रेलवे प्लेटफार्म पर
भीड़ और इंतजार की ऊब के बीच
पीछे से तुम्हारे कंधे पर रखूंगा
अपना हाथ
जब हकीकत उलट दे अपने नकाब
जिंदगी के सारे भ्रम टूट जाएं
आऊंगा बनके ख़्वाब
गहरी स्याह रात में जैसे
बजता हुआ कोई दिलकश साज
जब किसी रात तारें गिनोगे
फंस जाओगे अतीत की गलियों में
मैं झटके से आऊंगा ख्यालों में
सवालों की पोटली थमाऊंगा
जब किसी अंतहीन यात्रा में
किसी पदयात्री की तरह
दुनिया के पेंचोखम खोलने में
पसीने, धूल और थकान को ओढ़े
आगे बढ़ोगे
मैं बार-बार आऊंगा
बादलों के समान
छाया लिए
12. कोई दाखिल है अकेलेपन में
कोई दाखिल है गहरे
मेरे अकेलेपन में
कौंधता है रह-रह
मेरी मुस्कान में
देख ले जो कोई अचानक
उसे वजह पता न चले
इतनी तेज-रफ्तार दुनिया में
सांस की तरह है संग
भीड़ में खोने नहीं देता
थकान मांगती है उससे पनाह
गति उसकी थमती नहीं
तीखी धूप, झकाझोर बारिश
रक्त जमाती ठंढ
सबने तौबा की है
सारे मौसम हसीं हो गए हैं
13. ये सब किसके लिए?
ये कविताएँ
ये आलोचनाएँ
ये चर्चाएँ
यह महानता
किसलिए किसके लिए
जरा बताओ
क्या करूंगा इनका
जब चाहने वालों की भीड़ में
तन्हा खुद को ढूंढता
मैं बार-बार तुम्हें ढूंढूगा
और तुम कहीं नज़र न आओगी।
हां! मुझे जलना होगा लगातार
मुझे पता है
क्योंकि अंधेरा घना हो रहा है,
तुम्हारा पता न मिलता तो भी
मैं यही करता
अपने तपते लहू को उतारता रहता
शब्दों में अटपटे ढंग से
और जलकर खाक हो जाता
मगर तुमने जगा दी है
नई ख़्वाहिशें
लाखों-करोड़ों जन के लिए
जो अर्पित करूंगा खुद को
क्या वे इतना न करेंगे
कि मेरी जिंदगी से
मुझे मिला दे
14. वह अजीब सी लहर
वह एक अजीब सी लहर थी
जिसने पिछला सबकुछ धो डाला
और उसके साथ बहते हुए
मैं कुछ नया होके निकला
कितने स्पर्श, कितने सपने
कितने राग, कितने दर्द
जिसके नक़्श थे मौजूद
जेहन और जिस्म पे
धुंधले हो गए वे
अब उस लहर संग
बहना चाहता हूं
मगर वह अपनी गति
अपने आवेग में मग्न
मुझे धकेल रही जिस ओर
वहां पहुंचकर कहीं
पुराने सिलसिले
फिर न जाग उठें
जहां नया नया न हो
वह हो बस
पुराने का विस्तार
15. आओ, इस वीरान घर में
यह भारी-भरकम दरवाज़ा खोल ही दिया है तो
प्रवेश करो इस घर में
जो वीरान पड़ा था वर्षों से
वहां दुःस्वप्नों और उदासी के जाले
बुन रखे होंगे मकड़ियों ने
फुर्सत हो तो उन्हें झाड़ डालना
ख्वाब भी कई फूलों और
घास-पत्तों के बीच मिलेंगे
आओ, इस आंगन में अपने पांव रखो
जिसमें गुलाब की पंखुड़ियों की खुश्बू
रची-बसी है,
जहां बेले और रातरानी का जादू
अब भी कायम है
आ ही गए हो तो
जरा सांसों में भरो मुझे
मुझे संवारों
अपनी जिंदगी के साथ
इन गिलहरियों और तोतों संग
दोस्ती गांठों
वीरान दिनों के यही तो थे संगी-साथी
16. इस आवेग का क्या करूं
ओ मेरे मेहरबान!
मुझे याद न दिलाओ
कि करने हैं कौन-से काम
किन ऊंचाइयों को पाना है
किन सपनों के लिए लगानी है
बाजी जान की,
तुम जब मिले
तब भी जिंदगी थी उसी राह
बेशक कोई अंश था मुरझाया
जिसे तूने हरा कर दिया
एक नए आवेग, नई उम्मीद से
भर उठी थी जिंदगी
पर इस उम्मीद, इस आवेग,
इस हरेपन का क्या करूं
अब वह हुनर भी बता दो
कि कहीं कोई उम्मीद जगा
कैसे वापस हुआ जाता है
अपनी पुरानी दुनिया में
कैसे किसी को निकालकर
दर्द के समुंदर से
गुम हुआ जाता है
रोजमर्रे के जंजाल में
मुझे सिखा दो कला
इस नए इश्क़ की
17. तिनका कभी नहीं डूबता
जिंदगी का सफ़र
कितने वर्तुल भंवरों से गुजरता
तेज प्रवाह में बहता जाता
मेहरबान तिनके कितने-कितने
डुबने से बचाने को तैयार दिखते
हां, कई बार थामा उन्हें
उठाना भी चाहा बोझ
जो बढ़ता जाता है निरंतर
जो बचाते हैं डूबने से
वही डूबाने लगते हैं अपने वजूद में
मुक्ति एक नए बंधन में तब्दील हो जाती है
फिर भी ऐसा न था कि बंधना न चाहा, पर
कोई तिनका कभी
मंजूर नहीं करता
डूबने को नदी की अथाह गहराई में
हमारे साथ,
मुक्ति के, संघर्ष के
ऐसे राही, अन्वेषी
नहीं मिलते अक्सर।
18. प्रेम में-1
ख्याल घेरे रहते हैं दिन-रात
हर पल का साथ
तुम्हारी बातें, तुम्हारी सूरत लिए
सोता हूं जागता हूं
फिर भी
आधी रात गुजरने के बाद
जाने कहां से उतरता है अधूरापन
ढूंढता हूं तुम्हें हकीकत में
पाना चाहता हूं और करीब
बेहद करीब
जहां कोई फासला नहीं
माना कि जो कभी मेरा था
वह दिल मेरा न रहा
अब तो जिस्म भी जैसा मेरा नहीं
बेकाबू वह घुल रहा मानो हवा में
उसके कतरे-कतरे से तुम्हारी पुकार
जैसे फूल की खूश्बू
वैसे देह की
रोके न रुके
मनमौजी हवाओं संग यारी
पराग ज्यों उड़ने बिखरने के बेताब
खो जाने को
ओह !
ये रात के आखिरी पहर
आंख खुलती है
और करवटों का सिलसिला शुरू
जागती आंखों में उमड़ते बेकाबू ख्वाब
अजीब सी तमन्ना
जिस्म नन्हे कणों में हो तब्दील
तुम्हारे करीब प्रकट हो जाए काश!
आने वाले जमाने में
शायद हो ऐसा
शायद हो ऐसा।
19. प्रेम में-2
रात जैसे-जैसे
बढ़ती है
प्यास होती है
उतनी तेज
नींद टूटती है अक्सर
आधी रात के बाद
तमन्नाएं जागती हैं
सारे पर्दे उतार
बेचैन रूह
बेचैन जिस्म
एक पल में
पार करना चाहे
वक्त का लंबा फासला
सैकड़ो मीलों की दूरी
तुम्हारी आंखों में
आंखें डाल
खो जाना चाहता हूं
होठों पे होठ रख
एक बोलती खामोशी के सागर में
डूब जाना चाहता हूं
तुम्हारे आलिंगन में बंधकर
फिर ख्वाब की कई
सूरतें जगाना चाहता हूं
20. वह चमक किसकी थी?
छिपकलियां, तिलचट्टे
दीमक, मच्छड़ और
चूहों से भरा हुआ
नमी से भरा एक कमरा
जिसमें दुःस्वप्न और स्वप्न
आपस में जूझते रहते
और उसमें आने वालों पर
काबिज होते जाते
वह क्या था,
जिसके बल पर
हमने वहां गुजारी रात
अपनी ऊर्जा से टिमटिमाते
सितारे की तरह
कविताओं में वह
चमक किसकी थी
जिसके मद्धिम प्रकाश में
गुम हुए हमारे भय
हमारे अंदर जड़ जमाए अंधेरे
आलोकित हुए
हमारे तन-मन
21. जो उलझी है आदम के जमाने से
दुनिया के गोरखधंधे में
छुपकर बचने की कोशिश नाकाम
आसान नहीं बचना
इस बावरी बयार से
नैनों के भंवर में जो गिरा
फिर उसे डूबने की फि़क्र क्या
ख्वाब और हकीकत ने
अपनी अपनी सरहदें
तोड़ दी है
ख्वाब बदल रहे हकीकत में
और हकीकत हुए जा रहे
ख्वाब से हसीन।
बाबा आदम के जमाने से
जो उलझी है
उसे क्यों सुलझाऊं
रहे, बहे धमनियों में…
कवि सुधीर सुमन, जन्म: 1/1/72 आरा, बिहार। मूल रूप से ख़ुद को साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता मानते हैं। पिछले तीस वर्षों से जन संस्कृति मंच की विभिन्न जिम्मेवारी में। कविता का एक संग्रह ‘सपना और सच’ प्रकाशित हो चुका है।
इन्होंने ‘समकालीन जनमत’ का लगभग सोलह वर्षों तक संपादन किया है। फिलहाल इसके संपादक मंडल में हैं। पत्रिका ‘इस बार’ में संपादन सहयोग और जनपथ के नागार्जुन अंक का अतिथि संपादन किया है। कुबेर दत्त की पुस्तक ‘एक पाठक का नोट्स’ का संपादन भी किया है। विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में साहित्यिक कॉलम लिखने के साथ वे युवानीति, हिरावल और भूमिका के लगभग 20 मंचीय और नुक्कड़ नाटकों में अभिनय भी करते रहे हैं। इन्होंने नुक्कड़ नाटक और बाल नाटक भी लिखे हैं। फ़िलहाल वे झारखंड के एक कॉलेज में आवश्यकता आधारित शिक्षक हैं।
सम्पर्क:09431685572 ईमेल:s.suman1971@gmail.com
टिप्पणीकार कवि राजेश कमल, जन्म- 02 -October -1975(सुपौल ) कुछ वेब और लघु पत्रिकाओं में कविताएँ, जसम से संबद्ध अभी क़रीब 20 वर्षों से पटना में सांस्कृतिक सक्रियता ।
संपर्क : 9304033554 ईमेल:rajeshkamal09@gmail.com

