समकालीन जनमत
कविता

शम्भु बादल की कविताएँ लोक-अनुभव और वैश्विक चेतना का रसायन हैं

सुशील कुमार


शम्भु बादल की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता में उस धरातल का प्रतिनिधित्व करती हैं जहाँ भाषा, दृश्य और नैतिक आग्रह एकाकार होकर एक संयुक्त संरचना का निर्माण करते हैं। यहाँ कविता वैयक्तिक अनुभूति के वृत्त से विस्तृत होकर इतिहास, राजनीति, वर्ग-संबंध, पर्यावरण और सामाजिक विघटन की बहुस्तरीय वास्तविकताओं को आत्मसात कर लेती है। इन रचनाओं में कवि का स्वर जन-संवादी है, जो नारेबाजी से मुक्त रहकर दृश्यात्मक सघनता और प्रतीकात्मक संयम के सहारे अग्रसर होता है।

‘आ बाघ!’ कविता इस समूचे काव्य-संसार में व्यंग्यात्मक राजनीति की केंद्रीय कुंजी बनकर उभरती है। यहाँ बाघ प्राकृतिक उपस्थिति की परिधि लांघकर पूँजी और सत्ता के उस रूपक में रूपांतरित हो जाता है जो “सुन्दर आवरण” के भीतर प्रवेश हेतु लालायित है। कविता में हाथ जोड़ने, पाँव पड़ने और ‘ऑफ-द-रिकॉर्ड’ आग्रह की भाषा सत्ता के स्वागत-शब्दकोश को उसके यथार्थ मंतव्यों के साथ प्रत्यक्ष कर देती है। यह शिल्प सत्ता-भाषा का अनुकरण करते हुए उसकी नैतिक रिक्तता को उद्घाटित करता है और यह दर्शाता है कि स्वागत की विनम्रता के भीतर किस तरह दमन की तैयारी सन्निहित रहती है।

‘कोल्हा मोची’ वर्गीय अनुभव की कविता है, जहाँ ढोल की थाप के भीतर पीढ़ियों का श्रम और शोषण एक साथ प्रतिध्वनित होते हैं। कमाची की चोट वाद्य-ध्वनि से इतर उस जीवन-लय का प्रतीक बन जाती है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही ढाँचे में आबद्ध है। बिजली, बैंड-बाजे और रंगीन सज्जा के मध्य व्याप्त उदासीनता का बिंब यह स्पष्ट करता है कि चकाचौंध के भीतर भी वर्गीय यथार्थ अपनी कठोरता अक्षुण्ण रखता है। यहाँ विद्रोह केवल विचार से भिन्न एक ठोस क्रिया के रूप में घटित होता है, जो परंपरा के विरुद्ध एक नवीन बीज के रूप में अंकुरित होता दिखाई देता है।

‘चिड़िया’ मासूम जीवन और हिंसा के द्वंद्व की संक्षिप्त, किंतु अत्यंत मारक कविता है। सपना, चहचहाहट और गोली—तीनों एक ही लय में आते हैं और यही लय कविता की नैतिक तीव्रता बन जाती है। यहाँ मासूमियत भावुक आवरण से मुक्त होकर सीधे हिंसा से टकराती है। कविता संकेत देती है कि हिंसा अपवाद स्वरूप उपस्थित होने की तुलना में जीवन के स्वाभाविक प्रवाह में हस्तक्षेप करती हुई उसे खंडित करती है।

‘गुजरा’ लोक-संस्कृति और लोक-जीवन के भीतर प्रच्छन्न असमानताओं को प्रश्नात्मक शिल्प के माध्यम से सम्मुख लाती है। “तुम प्रदर्शन की वस्तु हो?” जैसे प्रश्न लोक के वस्तुकरण की राजनीति को उद्घाटित करते हैं। थाप और चाँटे के संतुलन का संकेत यह स्पष्ट करता है कि कला और प्रतिरोध के बीच का संबंध सौंदर्य से परे जाकर जीवन की अनिवार्य शर्तों से संबद्ध है। इस रचना में प्रश्न-शिल्प कविता को एक जीवंत सामाजिक संवाद में बदल देता है।

‘मौसम को हाँक चलो’ करुणा, उत्तरदायित्व और नैतिक हस्तक्षेप की कविता है। कमरे का दृश्य, धूप के टुकड़े और बाहर रोता बच्चा—ये तीनों मिलकर एक ऐसी स्थिति निर्मित करते हैं जहाँ निजी एकांत और सामाजिक यथार्थ एक ही फलक पर विद्यमान हैं। रोटी देने और लौटने के पश्चात भीतर उपजता डंक अपराध-बोध और संवेदनशीलता की अनुभूति के रूप में उभरता है। अंत में ‘मौसम को हाँक चलो’ का आग्रह सक्रिय हस्तक्षेप की संभावना बनकर सामने आता है, जहाँ परिवर्तन का अभिप्राय प्रतीक्षा से परे जाकर सक्रिय पहल करने में निहित है।

‘बुधन ने सपना देखा’ विकास की शब्दावली और विस्थापन की राजनीति को स्वप्न-बिंबों के द्वारा प्रस्तुत करती है। बुलडोजर, कारखाना, कारोबार और रोटी-कपड़े-घर के वादे—ये सब सत्ता की उस भाषा के प्रतीक हैं जो काल-खंड के भीतर एक ही आघात में जीवन-रचना को परिवर्तित कर देने का दावा करती है। यह कविता स्वप्न और यथार्थ के मध्य की सीमारेखा को तिरोहित कर देती है, जिससे पाठक विकास की भाषा में अंतर्निहित हिंसा का साक्षात्कार अधिक तीव्रता से करता है।

‘चिड़िया वही मारी गयी’ एक विमर्शात्मक कविता है, जहाँ भूख और सामाजिक अपमान के प्रश्न परस्पर गुँथे हुए हैं। कविता के भीतर चल रही बहस वैचारिक स्तर से आगे जाकर नैतिक आग्रह के रूप में पाठक तक संप्रेषित होती है। ‘कविता के साथ कुछ करो’ जैसी पंक्तियाँ रचना को एक सक्रिय हस्तक्षेप की दिशा प्रदान करती हैं, जहाँ कविता सामाजिक संघर्ष का स्रोत बन जाती है।

‘पहाड़ की वेदना’ प्रकृति-कविता की पारंपरिक सौंदर्य-भाषा से इतर मार्ग का संधान करती है। ब्लास्ट, बिखरे पत्थर और आतंकित क्षेत्र—ये सब पर्यावरणीय क्षरण की करुण कथा कहते हैं। यहाँ प्रस्तर-खंड जड़ वस्तु की सीमा लांघकर घायल प्रकृति के जीवंत साक्ष्य बन जाते हैं। इस कविता में प्रकृति का सौंदर्य पर्यावरणीय हिंसा की पृष्ठभूमि में पढ़ा जाता है, फलतः कविता करुणा और चेतावनी—दोनों के स्वर ग्रहण कर लेती है। ‘बीज हँस रहे हैं’ जैसी कविता भी प्रचार-ध्वनि से दूरी बनाते हुए भाषा के सहज प्रवाह में उम्मीद का एक स्थायी ताप रचती है।

‘धूप और छाया’ जीवन के द्वंद्व को आत्मकथात्मक और दार्शनिक, दोनों स्तरों पर साधती है। टोकरी-भर धूप और टोकरी-भर छाया जैसे बिंब घरेलू होते हुए भी घिसे-पिटे अर्थों से मुक्त हैं और जीवन के आरोह-अवरोह को एक सहज दृश्य में रूपांतरित कर देते हैं। बिजली और गर्जन के दृश्य निजी संतुलन को व्यापक संसार की उथल-पुथल से जोड़ देते हैं, जिससे कविता व्यक्ति और काल को एक-दूसरे के समानांतर पढ़ने की दृष्टि प्रदान करती है।

‘लाठी और भैंस’ में लोक-मुहावरा वैश्विक राजनीति की आलोचना का सशक्त उपकरण बन जाता है। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ सत्ता-संबंधों का निष्कर्ष बनकर सामने आता है, और ट्रम्प का संदर्भ इसे अंतरराष्ट्रीय प्रभुत्व की भाषा से संबद्ध कर देता है। अल्पतम शब्दों में विराट् राजनीतिक अर्थ सृजित करने की यह क्षमता शम्भु बादल के शिल्प की विशिष्ट पहचान है।

‘जीवन’ कविता सामाजिक और मानवीय कैद की नग्न तस्वीर प्रस्तुत करती है। पिंजड़ों में आबद्ध लोग, संघर्ष में क्षरित होता अस्तित्व और विकास-चैन पर उठे प्रश्न रचना को एक असहज दर्पण में तब्दील कर देते हैं। समाधान की प्रत्यक्ष घोषणा से विरत रहते हुए भी यह रचना एक कठोर नैतिक प्रश्न छोड़ जाती है, जो पाठक के अंतर्मन में दीर्घकाल तक सक्रिय रहता है। वहीं ‘जीभ’ कविता संक्षेप में रचा गया अत्यंत सटीक प्रतीक है। अपने ही दाँतों से घायल जीभ आत्म-संयम, भय और अंतस से उपजे दमन का रूपक बन जाती है।

‘युद्ध रुकेगा, कैसे??’ इस समूचे काव्य-संग्रह की वैचारिक धुरी की तरह उपस्थित है। नौ खंडों में विस्तृत यह कविता युद्ध, पूँजी, सत्ता और वैश्विक हिंसा के दृश्यात्मक विस्तार के माध्यम से सभ्यता की वर्तमान दशा को सम्मुख रखती है। यह कविता ‘लिरिकल-रिपोर्टाज’ का स्वरूप प्रदान करती है, जहाँ दृश्य मात्र सूचना देने की सीमा लांघकर नैतिक अभियोग का रूप धारण कर लेते हैं।

शम्भु बादल का काव्य-शिल्प समकालीन हिंदी कविता में उस सृजनात्मक अनुशासन का उदाहरण है जहाँ भाषा, दृश्य और नैतिक आग्रह परस्पर आश्रित होने से आगे बढ़कर एक संपृक्त संरचना के रूप में सक्रिय होते हैं। उनका शिल्प भावोच्छ्वास अथवा अकादमिक जटिलता से मुक्त रहकर पाठक से सीधा संवाद साधता है, जो आधुनिक कविता के परिदृश्य में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। समकालीन हिंदी कविता में जहाँ अनेक कवि ऐसे विषयों पर लिखते हुए मुक्त छंद की आड़ में सपाटबयानी का शिकार हो जाते हैं, वहीं शम्भु बादल इस खतरे से बचकर रचना को एक संश्लिष्ट कलात्मक रूप प्रदान करते हैं।

उनके शिल्प की एक अन्य विशिष्टता लोक-मुहावरे और समकालीन राजनीतिक संदर्भ का संश्लेषण है। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ जैसे लोकोक्ति मुहावरे को वे वैश्विक सत्ता-राजनीति के परिप्रेक्ष्य में विन्यस्त करते हैं, जिससे लोक और विश्व एक ही शिल्पीय ताने-बाने में सक्रिय रहते हैं। ‘गुजरा’ जैसी कविताओं में प्रश्नात्मक संरचना भी एक ऐसी कला के रूप में संघनित होती है जो पाठकों को भीतर तक आलोड़ती है।

शिल्पगत गुणों में ‘संक्षेप के भीतर अर्थ का घनत्व’ भी एक उल्लेखनीय पक्ष है। ‘जीभ’ जैसी लघु कविताएँ यह प्रमाणित करती हैं कि कवि न्यूनतम पंक्तियों में अधिकतम वैचारिक और भावनात्मक अर्थ भरने में सक्षम है। यह संक्षिप्तता काव्य-कंजूसी से इतर एक कठोर शिल्पीय अनुशासन का परिचायक है।

समग्रता में, शम्भु बादल का काव्य-शिल्प लोक-अनुभव, समकालीन राजनीतिक चेतना और अर्थ-घनत्व का विरल रसायन है। इन तत्वों का संतुलन कविता को मात्र भावावेश या कोरे वैचारिक वक्तव्य बनने से बचाता है। यह संतुलन ही उनके कृतित्व की केंद्रीय उपलब्धि है। इसी कारण उनकी कविताएँ समकालीन हिंदी साहित्य में एक ऐसी उपस्थिति दर्ज कराती हैं जहाँ शिल्प और अंतर्वस्तु एक-दूसरे से परस्पर सन्निबद्ध होकर रचना को सघन और प्रभावोत्पादक बनाते हैं।

शम्भू बादल की कविताएँ

1. आ बाघ!

(पूँजी-निवेश के लिए आमंत्रण)

आ बाघ!

इस तरह से आ

हमें अच्छा लगे

किसी सुन्दर आवरण में आ

बस, पंजे छिपा ले हमारे दादा!

दाँत ढँक ले हमारे आका!

आ आ

आ हमारे बाबा!

हाथ जोड़ते हैं

पाँव पड़ते हैं

सच नहीं बोलना है

मत बोल

झूठ ही सही

कुछ बोलते रह

लगे कि नया-नया

बहुत कुछ होने जा रहा है

हम भी तुम्हारे साथ

कुछ-कुछ बोलते रहेंगे

हवाई सपनों की खुमारी में

सबको डुबोये रखेंगे

अपने विपक्षी

कुछ नहीं करेंगे

वे ऐसे ही आदतवश

थोड़ा चूँ-चपड़ करते हैं

वैसे भी यदि उनके बेटों को

साथ रख लोगे तो

मजे में विरोध की

मजेदार बातें करेंगे

 

हमने संसद में

उदारता के झंडे

मजबूती से गाड़ दिये हैं

क्रांन्ति की आवाज वहाँ तक

हम जाने नही देंगे

विश्वास करो दादा!

यकीन रखो बाबा!

 

काँटे

कंकड़-पत्थर

हम साफ कर रहे हैं

रास्तों पर कालीन बिछा रहे हैं

घबराओ नहीं

जनता को मना लेंगे

तुम्हें सारी सुविधाएँ देंगे

अन्दर काफी रस है

आओ हमारे बाबा!

आओ हमारे दादा!

 

ऑफ द रिकार्ड:

एक विनती है

एक आरजू है

कुछ गुप्त राशि

फण्ड में चुपके से

जरूर दे देना

 

2. कोल्हा मोची

 

कमाचियाँ जब पड़ती हैं ढोल पर

बजता है ढोल

डिन-डिन-डिन डिडिक-डिडिक

डिन-डिन-डिन डिडिक-डिडिक

और गूँजता है जीवन

कोल्हा मोची का

बाप का

दादे का

परदादे का

 

झक-झक बिजली

और बैण्ड बाज़ों के बीच

रंगीन सज्जा से उदासीन

अपनी ही धुन से

बजता है ढोल

बजता है कोल्हा मोची

बजता है पीढ़ियों का जीवन

 

राघो पण्डित के बेटे का जनेऊ-संस्कार हो

या वीर सिंह की बेटी का ब्याह

या बढ़न साव का कार्तिक-विसर्जन

या मंगरा राम के घर सतनारायण भगवान की कथा

या रनु महतो पर भूत चढ़ना

या चेतु बूढ़े की शव-यात्रा

जमकर बजता है कोल्हा मोची

 

कोल्हा मोची

अपने बेटे के सामने

ढोल रखता है

हाथ में कमाची भी थमाता है

किन्तु बेटा

कमाची तोड़ ढोल फोड़ता है

कोल्हा मोची दरकता है

जड़ से हिलता है

भीगता है

और एक नया बीज

यहीं उगता है

 

कोल्हा मोची देखता है

पहली बार बहुत कुछ एक साथ

बेटे का तना चेहरा

भूख की उफनती नदी

फूटा ढोल

उपेक्षा का फन्दा

मुखिया की हेकड़ी

विधायक का दारू लिये हाथ

 

3. चिड़िया

 

चिड़िया सपना देखती है

गोली खाती है

 

चिड़िया चहचहाती है

गोली खाती है

 

चिड़िया घर बसाती है

गोली खाती है

 

नन्हीं चिड़िया क्या करे?

युवा चिड़िया जानती है

पास जब गोली हो

गोली नहीं आती

 

4. गुजरा

 

गुजरा!

बताओ तो सही

जीवन और मान्दर के बीच

रेखा जो सदियों से

क्षीण बनी हुई है

तुम्हें कौन-सा जीवन-रस देती रही है?

 

हर शाम तुम

नाचते हो

गाते हो

मान्दर पर थाप लगाते हो

दर्जनों पैर

अखड़ा में थिरकते हैं

युवक-युवतियाों के समूह गीत

आह्लादकता को परत-दर-परत

और भी रंगीनियों से भरते हैं

किन्तु सुबह

गुजरा!

तुम्हें अन्धेरा क्यों दिखता है?

जब कि सूरज भगवान

तुम्हारी देह पर

तुम्हारी झोपड़ी पर

तुम्हारी मिट्टी पर

रोशनी उडे़ल रहे होते हैं

और तुम्हारा हाथ

हल की लगाम थामे होता है

 

गुजरा!

जब कभी तुम पर

गाँव के देवता गँवात आते हैं

लोगों के अच्छत देखते हो और

उनके खैर-कुशल कहते हो

ताकि कोई बीमारी न आये गाँव में

पशुओं को बाघ न पकड़े वन में

किन्तु, तुम्हारे ही जीवन में

बीमारी कहाँ से आती है?

बाघ कैसे नोचता है तुम्हें

अपने ही घर-गाँव में!?

और तुम

भूख के भँवर में

कैसे फँस जाते हो?

कैसे धँसती है तुम्हारी कोड़ी

तुम्हारे ही सीने मेें!

 

तुम तो खेतों में

अन्न-बीज बोते हो

तुम्हारे दरवाजे पर

काँटों की झाड़ियाँ

कैसे उग आती हैं?

तुम्हारे ही तलवों को

लहूलुहान क्यों करते हैं ये काँटे?

झक्काझोर झूमर

खेलना तो ठीक है

पर जीवन का रूप

कहाँ-कहाँ क्या है?

हँड़िया और दारू से

कीट कैसे घुसते हैं?

इन पर भी सोचना है

फिर सोचेगा कौन?

मेहमानों के सामने

कोई जब तुम्हें नचाये

तुम्हारी लोक-कला की प्रशन्सा करे

तुम्हें हकीकत नहीं समझनी चाहिए क्या?

तुम प्रदर्शन की वस्तु हो?

तुम्हें तो मुखौटे उतारने और

चाँटे जड़ने की कला भी आनी चाहिए

क्योंकि थाप और चाँटे का सन्तुलन

तुम्हारे लिए

सही जगह

सुनिश्चित कर सकता है

 

5. मौसम को हाँक चलो

 

मैं बिछावन पर पड़ा था

दाँया हाथ माथे के नीचे था

बाँया ललाट पर

उदासी का भारी पत्थर

मन के सीने को

धीरे-धीरे दबाये जा रहा था

आँखों में आकाश से

जल उतर आया था

 

खिड़की का एक पल्ला खुला था

मेरी बगल में

धूप के कुछ छोटे टुकड़े

चुपके से आकर सो गये

एक टुकड़ा अपने नरम उजाले से

मेरी आँखें पोंछने लगा

 

मेरे कमरे का घना अँधेरा

जगह-जगह फट गया

 

बाहर सूखते पेड़ के नीचे

मुरझायी घास पर खड़ा

रूखे बालों वाला बच्चा रो पड़ता है

बच्चा क्यों रो रहा है?

क्या उसकी माँ ने

दूसरा विवाह किया है?

या आकाश में विलीन हो गयी है?

क्या पिता की हत्या हुई है?

वह अनाथ है

मैं रोटी लेकर

उसके पास जाता हूँ

वह चुप नहीं होता

उससे परिचय पूछता हूँ

कुछ नही बोलता

फिर उसकी आँखें पोंछता हूँ

माथे पर हाथ फेरता हूँ

वह कातर

मेरा चेहरा देखता है

रोटी हाथ से ले

मुँह में डालता है

मैं बच्चे को वहीं छोड़

कमरा लौट आता हूँ

यहाँ सैकड़ों बिच्छू

एक साथ डंक मारते हैं

पुनः वापस होता हूँ बच्चे के पास

बिच्छू झड़ जाते हैं

दर्द भी कमता है

 

बेर का सूखता पेड़

पास के सघन सन्नाटे से घिरा

बहुत उदास दिखता है

उसे अनुकूल मौसम का इन्तजार है

 

मौसम के इन्तजार में खड़ा न रहो पेड़

मौसम को हाँक चलो

हरा-भरा बनो

जड़ें गहरी हैं

ऊर्जा है

ग्रहण करो

 

6. बुधन ने सपना देखा

 

बुधन ने सपना देखा:

दबे पाँव आ

किसी ने गालों को चूमा

फिर झकझोरा

सोओ नहीं

जागो

बुलडोजर खड़ा है

बड़े-बडे़ ताकतवर दाँत

चबायेंगे तुम्हारे घर

बिरसा1 अपनाओ

घर बचाओ

तुम्हारे पेड़ काट लिये गये है

कुरहे2 में आग लगी है

 

बाहर एक शेर

काफी दूर से आया

कहता है

घर छोड़ो

बस, एक घण्टे का वक्त है

यहाँ कारखाना बनेगा

बड़ा कारोबार चलेगा

तुम्हें रोटी मिलेगी

कपड़ा, नया घर मिलेगा

 

तुम्हारे हाथ

पैर

पेट

सिर

फसल

दुकान में

नयी गुलामी के

रसायन डाले जा रहे हैं

 

तुम्हारा भाई भी शेर के साथ है

समझाओ

बुधन का मन घबराया

हाथ उठा

कि नीन्द टूटी

 

वह सोचता है:

भोर का सपना है

पता नहीं, क्या होगा?

1. क्रान्तिकारी आदिवासी नेता बिरसा मुण्डा।

2. लकड़ियों और पत्तों से बना शंकुनुमा घर, जिसके नीचे का भाग (घेरा) सबसे बड़ा और गोलाकार होता है तथा क्रमश: पतला होता हुआ सर्वोच्च भाग पर नुकीला हो जाता है।

 

7. चिड़िया वही मारी गयी

(प्रिय कवि गोरख पाण्डेय की याद में)

 

गोरख पाण्डेय ने लिखी कविता:

‘भूखी चिड़िया की कहानी

एक थी चिड़िया

चिड़िया भूखी थी

 

……………………………

भूखी थी चिड़िया

इसलिए गुनहगार थी

मारी गयी चिड़िया

मारी गयी चिड़िया

जो भूखी थी’

कंवल भारती ने लिखी दूसरी कविता:

’चिड़िया जो मारी गयी

………………………………..

लेकिन, गोरख पाण्डेय ने गलत लिखा था

वह चिड़िया भूख से नहीं

चिड़िया होने से पीड़ित थी

…………………………………….

गरीबी नहीं,

सामाजिक बेइज्जती अखरती है

…………………………………

वह चिड़िया थी इसलिए गुनहगार थी

चिड़िया जो मारी गयी’

 

वास्तव में गोरख पाण्डेय ने सही लिखा था

कंवल भारती में भी एक ऊपरी सच है

दूर से दोनों खंडित-से लगते हैं

दाने को तरसती

भूख से तड़पती

जीवन-मृत्यु के बीच की रेखा पर

पहुँचती चिड़िया

अगली सांस बचाने के लिए

छटपटाती चिड़िया

 

भूखी चिड़िया के

मर्मान्तक अनुभव की उपेक्षा

आत्म-समाज-घाती है

कविता के साथ कुछ करो कवि!

कि भूख-सामाजिक बेइज्जती के विरुद्ध

विद्रोह-संघर्ष करे चिड़िया

और यह पूरी मजबूती से

चिड़िया ही कर सकती है

ध्यान दो

माक्र्स का अनुभव गरीबी का

सामाजिक बेइज्जती से रिक्त नहीं

अम्बेदकर का अनुभव सामाजिक बेइज्जती का

गरीबी से रहित नहीं

गरीबी-सामाजिक बेइज्जती का रिश्ता

अटूट-सा है

 

चिड़िया भूखी थी और

चिड़िया चिड़िया थी

चूँकि चिड़िया भूखी थी

इसलिए चिड़िया चिड़िया थी

और चिड़िया चिड़िया थी

इसलिए चिड़िया भूखी थी

इसीलिए गुनाहगार थी चिड़िया

चिड़िया भूख और चिड़िया होने से

पीड़ित थी

इसीलिए चिड़िया वही मारी गयी

 

8. पहाड़ की वेदना

 

तुम जिसे पहाड़ की

भभकती हँसी

या झरना कहते हो

वह पहाड़ के सीने की

उफनती वेदना है

उसकी कसक के पेड़-पौधे

छटपटा रहे हैं

 

बलास्ट की आवाज से

क्षेत्र आतंकित है

दूर-दूर तक बिखरे पत्थर

घायल पहाड़ की

विकृत पर्यावरण की

करुण कथा कह रहे हैं

मनुष्य को सचेत कर रहे हैं

 

9. बीज हँस रहे हैं

 

मेघों के टुकड़े

जो अस्तित्व के लिए

कल हाथ-पैर मार रहे थे

रुई के फाहों-से

दर-दर भटक रहे थे

पसीने-पसीने हो रहे थे

आकाश को

ऐश्वर्य दे रहे थे

आज सघन हो

गरज रहे हैं

चमक रहे हैं

आजादी से

बरस रहे हैं

साथी प्यासी धरती का

सूखा कण्ठ

तर हो रहा है

बीज हँस रहे हैं

 

10. धूप और छाया

 

टोकरी-भर धूप

टोकरी-भर छाया

मेरे साथ-साथ रहती हैं

बचपन की झोली हो या

जवानी का स्कूटर या

बढ़ापे की लाठी

इनका संग

हर वक्त रहता है

 

सूर्य मेरा दोस्त है

वृक्ष मेरा भाई है

 

टोकरी-भर धूप

टोकरी-भर छाया

मेरे लिए

ऊर्जा के घने मेघ हैं

इनके बीच जब गर्जन फुफकारता है

बिजली कौंधती है

तो धरती के दागदार दरख्त

फट जाते हैं

समृद्ध अन्तरिक्ष

लाल हो जाता है

घोंसलों का विश्राम छोड़ चिड़ियाँ

दौड़ पड़ती हैं

जानवर चैकन्ने हो जाते हैं

खेत झूम उठते हैं

मैं इन्हीं के बल

गति की स्याही से

लिखता रहा हूँ जीवन-भर

 

11. लाठी और भैंस

 

आदिम बर्बर

नया रूप

जिसकी लाठी

उसकी भैंस

ट्रम्प की लाठी

ट्रम्प की भैंस

 

बेहतर लाठी जोड़ो

बर्बर लाठी तोड़ो

 

12. लोग चीख रहे हैं

 

लोग चीख रहे हैं

तानाशाही पैर

कब रुकेंगे?

कब टूटेंगे?

 

13. कूप-मंडुको!

 

अन्ध धर्म

पागल हाथी है

रौंद रहा

कुचल रहा

 

कूप-मंडुको!

कट्टर रूढ़ियो

कब तक बन्द रहोगे?

विवेक जगाओ

विवेक धरो

बाहर आओ

खुली हवा लो

 

 

14. जीवन यह

 

पिंजड़ों में इतने-इतने लोग!

लड़-लड़ कट-कट मरते लोग!

विकास कहाँ?

चैन कहाँ?

जीवन यह

क्या मानव का है?

 

15. बिवाई पड़ी है 

 

समाज में

बिवाई पड़ी है

क्यों पड़ी है बिवाई?

 

16. जीभ

 

जीभ घायल है

अपने ही दाँतों से

 

 

 

17. युद्ध रुकेगा, कैसे ??

( विस्तारवाद, दमन,अत्याचार के विरुद्ध संघर्षों में प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों को नमन करते हुए उत्पीड़ित, संकटग्रस्त जनता के लिए यह कविता)

1

नींद नहीं आ रही

आंखें भरी-भरी हैं

बिजली भर-भर

ज्वाला भर-भर

तूफानी घनघोर अंधेरा

बरस रहा

दिन-रात

सप्ताह बीते

महीने गुजरे

वर्ष गये

नए वर्ष की अंतिम सांसें भी

अग्नि-मुक्त नहीं

 

आंतरिक नीति

रहस्यमयी

प्रदर्शनी हो

ताकत की

चर्चा हो

युद्ध-रोक की

पर, लड़ाई चलती रहे

प्रोडक्ट्स बिकते रहें

 

कई-कई रूपों में युद्ध

तांडव मचा रहा है

शस्त्र-अस्त्रों की होड़

युद्धोन्माद गरम

महायुद्ध की

सर्वनाश की आहट

 

बड़ी पूंजी का बड़ा खेल

व्यापक पूंजी खेल रही है

सब लूट-सब लूट

‘माया महाठगनी‘

 

लोलुप के लुटेरे हाथ

हर पल हैं सक्रिय

बाहर वेदना, अंदर उजास

कैसी चाल ?

हमें पता निर्मम सौदागर

2

ऐ!

नये समय का नया सबेरा!

जीवन की नूतन रंगीनी!

यौवन की हरी चमक!

बांसुरी की मीठी लय!

नृत्य की गाती उमंग!

देखो-देखो, देखो

पैशाचिक हमले देखो

मतान्ध हिंस्र देखो

स्त्री-बच्चे-बूढ़े-बीमार-जवान के

कत्लेआम, अपहरण देखो

सर-धड़ अलग देखो

पेटफाड़ बुलेट देखो

नाभिनाल-बद्ध

खून में डूबे

नवजात देखो

जलते परिवार देखो

वीभत्स क्रूरता देखो

गोलियों की बौछार देखो

बमों की वर्षा देखो

मिसाइलों के घात देखो

अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी

सुपरसोनिक मिसाइलों

ड्रोनो के विध्वंस देखो

विस्फोटों की लपट देखो

धुएं के बवंडर देखो

विद्यालयों के अंगार देखो

अस्पतालों का दहकना देखो

रासायनिक मार देखो

जैविक रोग देखो

थल – नभ – जल से

बरसती आग देखो

महानगरों का

शहरों – गांवों का

बागों – वनों का

चिड़ियों – जीवों का जलना देखो

सुरक्षित सुरंग ? देखो

मारक प्रवाह पानी का देखो

 

परमाणु की क्षमता देखो

बन्दर-हाथ उस्तरा देखो

 

लाल – लाल मिट्टी देखो

राख – राख जमीन देखो

सौंदर्य के कंकाल देखो

बन्दियों – घायलों के दर्द देखो

मां के चीत्कार देखो

अनाथ शिशु के रुदन देखो

मलबे की कराह देखो

आंसू की नदियां, स्रोत देखो

सूखे कंठ की प्यास देखो

बेचैन भूख की भूख देखो

 

लाखों के पलायन देखो

विविध भीषण कष्ट देखो

कुचले सपनों की आह देखो

छूटते घरों की पुकार देखो

थके रास्तों की बात देखो

 

देशों के गुट देखो

अपने-अपने हित, द्वेष देखो

व्यक्त्ति के अहं देखो

विश्व की विवशता देखो

 

यूक्रेनी की

फलस्तीनी की

यहूदी की

इरानी की

अफगानी की

कोरियाई की

दुनिया-भर के जन-जन की

पीड़ा देखो

 

पीड़ा-बीच शौर्य देखो

दोपहर के सूर्य देखो

विजय-गान करो

मार्च करो

और तीखे युद्ध करो

निश्चित है

मनुष्यता की जीत

 

3

प्यारे लोगो!

जब सायरन बजता है

दहशत के बाज

माथों पर मंडराते हैं

कैसा लगता है!?

बच्चों के मन

कितने जख्मी होते हैं!?

हवा जहरीली

दंडित कर रही

जख्म है

बीमारी है

दवा नहीं

इलाज नहीं

घर-अस्पताल नहीं

खंडहर-ही-खंडहर हैं

 

गोली-बम जिंदा हैं

आदमी मर रहे

 

4

सनक जीत की

लाशें बिछ गईं

हर वय को

गर्भ तक को

अपंग कर गई

आकाश तक

लहू पसरा है

सुबह सन्न है सूरज

तुष्ट है निष्ठुर तानाशाह

तृप्त है प्रभुत्व-पिपासु नेता

खुश है पाशविक आतंक

त्रस्त है उजड़ी जनता

आह! सभ्यता का कलंक !!

जीवन-मूल्य का

गला रुंधा है

 

5

ये कब्रगाह

ये खौफ

चीख-चीख कर

क्या कहते हैं ?

सुन लो जनरल!

बर्बरता का शिकार

यदि तुम्हें बनाया जाए

कैसा लगेगा?

चहकता घर

उत्साही समाज

हंसता देश उजाड़ना

सांप्रदायिक हैवानियत

अक्षम्य अपराध हैं

उबलता क्रोध धधक रहा

तुम्हारा अन्त

घंटी बज रही

 

6

शांति

अशक्त है!

दुख

कितना गहरा!

कितना फैला है!

 

वसंत रुक गया

कुदरत विह्वल

तारे लज्जित

बहुत उदास हैं

 

इतनी रूढ़ियाँ!

इतने घेरे!

इतने समूह!

इतने मत-मतांतर!

पर, मानव का आधार एक

मानवता

7

ओह!

लड़नेवालो!

अपने परिवार, स्वयं को सुरक्षित रख

कौन तुम्हें कट्टर बना रहा, लड़ा रहा?

तुम्हारे कंधों पर बंदूक रख, चला रहा

उसके छिपे स्वार्थ पहचानो

 

समझो

क्षत – विक्षत है समय

रुधिर से रंगा है अतीत

रंग रहा अभी

अभी बचा लो

भविष्य बचा लो

 

रूढ़ धर्म,

‘अफीम‘ नहीं, हीरोइन है

क्षेत्रवाद-नस्लवाद-संपत्तिवाद-

बद्ध विचार

अमानवीय, संकीर्ण, विकृत मनोवृत्तियां हैं

इनके लिए

कपटी नेताओं के

युद्ध-चक्र में फंस

कितनी बार मरे हो !?

फिर भी

और-और

मारने-मरने को आतुर!

8

ड्रग्स के

विकराल जाल

काट

दीवार धास

मानव हो

विवेक-हृदय रख

मानव बने रहो

धरती

सब के लिए

अपने-अपने क्षेत्र में रहने दो

प्रेम-दया-क्षमा

दिल-दिल में बसने दो

लोगों को

आपस में जुड़ने दो

अपने अधिकार

मजबूती से लेने दो

सभी को

जीने दो

बढ़ने दो

9

 

गौर करो

वक्त की अंगड़ाई

 

युद्ध रुकेगा

युद्ध रुकेगा

शोषणहीनता, न्यायप्रियता से

घेरेबन्दी तोड़

मैं को उज्ज्वल रख

हम बन जाने से

सदमानव बढ़ने से

हितकारी एआई से

बड़े दिल से

खुले प्रेम से

युद्ध रुकेगा

जन-बल से आतंक रुकेगा

 

मानवता का संविधान

करुणा – समता का शासन होगा

उजाले का आदेश चलेगा

अंधकार का नाश होगा

न कोई समाज का

शेर-सियार बनेगा

न कोई टोले-मोहल्ले का

कुत्ता-गिरगिट

सभी

अनुशासित

विकसित

उन्मुक्त

प्रफुल्लित होंगे

तब युद्ध कभी न होगा

कभी न होगा

 

लेकिन

ये सब कैसे???


कवि शम्भु बादल, जन्म: 01 अगस्त, 1945 ; सरौनी खुर्द (गाँव), हजारीबाग (झारखण्ड)।

रचना: (क) पैदल चलने वाले पूछते हैं (लम्बी कविता-पुस्तक);
मौसम को हाँक चलो, सपनों से बनते हैं सपने (कविता-संग्रह); चुनी हुई कविताएँ,
(ख) इनकी कई कविताओं के अनुवाद गुजराती, बांग्ला, तेलुगु, अंग्रेजी और मैथिली में प्रकाशित सम्पादन: (क) पत्रिकाएँ: सम्भावना, अभिकल्प, सम्प्रति ‘प्रसंग’; (ख) पुस्तकें: खुसरो से भारती तक, आज की विविध कविताएँ, समकालीन कविता-यात्रा, कविता: समय, समाज और विचारधारा (परिचर्चा); चयन एवं सम्पादन: शमशेर रचना-संचयन। सेवा: प्राध्यापन; 2007 में स्नातकोत्तर हिन्दी-विभाग, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग, के अध्यक्ष-पद से सेवा-निवृत्त) सदस्यता: पूर्व सदस्य, परामर्श  समिति (हिन्दी) एवं जनरल काउंसिल, राष्ट्रीय साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली (2008-2012 ई.)। सांस्कृतिक यात्रा: उजबेकिस्तान, इंग्लैण्ड, नीदरलैण्ड, बेलजियम, फ्रांस, स्वीट्जरलैंड, इटली, वेटिकनसिटी, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, थाईलैण्ड और रूस। पुरस्कार: राधाकृष्ण पुरस्कार (2012), जनकवि केदारनाथ अग्रवाल स्मृति सम्मान (2019), बिरसा मुण्डा शिखर सम्मान (2023) आदि।
मो. 9931182570

टिप्पणीकार सुशील कुमार कवि और लेखक हैं। सुशील कुमार का जन्म 13 सितंबर 1964 को पटना सिटी (बिहार) में हुआ। विगत इकतालीस वर्षों से वे झारखंड में रह रहे हैं। वर्ष 1985 में उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत बैंक क्लर्क के रूप में की। वर्ष 1996 में वे राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफल हुए और झारखंड शिक्षा सेवा में चयनित हुए। विभिन्न जिलों में शिक्षा पदाधिकारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने सितंबर 2024 में दुमका से जिला शिक्षा पदाधिकारी के पद से सेवानिवृत्ति प्राप्त की। गद्य लेखन की नियमित शुरुआत उन्होंने वर्ष 2004 में अपने व्यक्तिगत ब्लॉग “शब्द सक्रिय हैं” (https://www.authorsushil.com) के माध्यम से की।

उनके प्रकाशित हिंदी कविता-संग्रह हैं— कितनी रात उन घावों को सहा है (2004), तुम्हारे शब्दों से अलग (2011), जनपद झूठ नहीं बोलता (2012), हाशिये की आवाज़ (2020), पानी भीतर पनसोखा (जनवरी 2025) और बाँसलोई में बहत्तर ऋतु (जुलाई 2025)। जनपद झूठ नहीं बोलता (2012) के लिए उन्हें सव्यसाची साची सम्मान प्रदान किए जाने की घोषणा हुई है। ‘बाँसलोई में बहत्तर ऋतु’ को हिंदी में पर्यावरणीय कविता की एक महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में देखा जाता है। उनकी आलोचनात्मक कृतियाँ हैं— आलोचना का विपक्ष (2019) और हिंदी ग़ज़ल का आत्मसंघर्ष (2021)। इधर उनका रचनात्मक सरोकार विशेष रूप से कहानी, उपन्यास, पर्यावरणीय साहित्य तथा हिंदी और गैर-कथा लेखन के विविध रूपों से जुड़ा हुआ है। 

सम्पर्क: 7004353450

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