राग रंजन
शचीन्द्र आर्य की कविताएँ आज की हिंदी कविता में एक ऐसे हस्तक्षेप के रूप में पढ़ी जानी चाहिए, जो तेज़ आवाज़ में नहीं, बल्कि संयमित विवेक और नैतिक आग्रह के साथ अपने समय से प्रश्न करता है। ये कविताएँ किसी वैचारिक शिविर की प्रतिनिधि नहीं हैं, बल्कि उस आधुनिक, शहरी चेतना की उपज हैं, जो अपने समय को समझने की कोशिश में असहज प्रश्नों से मुँह नहीं मोड़ती।
कविता ‘जंगल’ स्पष्ट कर देती है कि कवि का मूल सरोकार प्रकृति से बढ़कर, प्रकृति को देखने की दृष्टि से है—
“उनके लिए जंगल का मतलब
छत, आँगन और तीसरी मंज़िल की बालकनी में
हाथ भर की दूरी पर रखे गमलों में लगी तुलसी…”
यहाँ जंगल का संकुचन दरअसल आधुनिक शहरी चेतना का संकुचन है। विकास का विमर्श प्रकृति को ‘अनुभव’ से हटाकर ‘प्रदर्शनी’ में बदल देता है। इस संदर्भ में केदारनाथ सिंह की यह पंक्ति याद आती है –
“हम जिस प्रकृति को बाहर समझते हैं/ वह भीतर से नष्ट हो चुकी होती है।” शचीन्द्र आर्य की कविता इसी भीतरी विनाश की शिनाख़्त करती है।
‘पंचतंत्र की पुरानी कहानी’ सत्ता और लोकतंत्र की विडंबना को लोककथा के माध्यम से उद्घाटित करती है—
“अब जबकि हम चारों तरफ़ शेरों से घिर गए हैं,
हम सबको मिलकर खरगोश हो जाना होगा।”
भय जब सामूहिक स्वभाव बन जाए, तब प्रतिरोध भी प्रतीक्षा में बदल जाता है।
एक और सशक्त कविता ‘भाषा में बड़े हुए लड़के’ का यह अंश देखिये —
“जिस भाषा में लोग बस और लड़की के पीछे न भागने की हिदायतें देते हों,
हमें उन्हें क्या समझना चाहिए?”
यह कविता भाषा को निर्दोष माध्यम मानने से इनकार करती है। भाषा यहाँ सामाजिक प्रशिक्षण का औज़ार है। कवि का प्रतिकार — “हम भी इसी भाषा में बड़े हुए लड़के हैं / हमें पता है तपती हुई दोपहर में बस छोड़ देने का मतलब” — इसे नैतिक स्वाभिमान और साहस देता है।
यहाँ अज्ञेय का यह कथन बरबस स्मरण हो आता है — “भाषा वही नहीं कहती जो हम कहते हैं / वह बहुत कुछ पहले से तय कर चुकी होती है।”
शचीन्द्र की कविताओं में स्मृति किसी बोझ या नॉस्टैल्जिया की तरह नहीं आती— यहाँ स्मृति असंभव भाव न हो कर एक नैतिक संभावना है।
“उनमें बचे रह गए हैं धागे…
वही रखते हैं, पीछे वापस लौटा ले जाने वाली लीक।”
शचीन्द्र स्मृति के बहाने उस सबकी ओर लौटते रहने का आह्वान भी करते हैं, जिसके बचने में हमारी मनुष्यता के बचने की सम्भावना साँस लेती है। “धौला कुआँ” कविता में वे कहते हैं –
“जैसे हमारा समय, चिंतन, जीवन… सब अपभ्रंश हो गए,
वैसे ही यह धवल घिस-घिस कर धौला हो गया।”
कुआँ यहाँ इतिहास, स्मृति और जीवन का साझा प्रतीक है। यह कविता पूछती है — कौन तय करता है कि क्या बचेगा और क्या पाट दिया जाएगा?
शचीन्द्र आर्य की कविताएँ नैतिक विवेक, भाषिक आत्मालोचन और स्मृति-चेतना की महत्वपूर्ण बानगी हैं। ये कविताएँ शोर नहीं मचातीं, बल्कि अपने समय की धड़कन को सच की पुख़्ता ज़मीन पर कान लगाए हुए हमारे साथ सुनती हैं। ये कविताएँ कागज़ पर अतिरिक्त जगह नहीं घेरतीं और बावजूद इसके — या शायद इसीलिए — उनकी अर्थवत्ता सघन है और देर तक गूँजती है। अच्छे कवियों का संकोच उन्हें उपदेशात्मक होने से बचाता है!
यही इनकी ताक़त है— और यहीं पर इनकी सम्भावना भी।
शचीन्द्र आर्य की कविताएँ
1. जंगल
जो घास में लेमन ग्रास और चिड़िया में कौए, गिलहरी को जानते हैं,
उनके लिए जंगल का मतलब
छत, आँगन और तीसरी मंजिल की बालकनी में
हाथ भर की दूरी पर रखे गमले में लगी तुलसी, मिर्च और करेले की बेल है ।
वह कभी नहीं समझ पाएंगे, लोग जंगल क्यों नहीं छोड़ना चाहते ।
2. पंचतंत्र की पुरानी कहानी
अब जबकि हम चारों तरफ़ शेरों से घिर गए हैं,
हम सबको मिलकर खरगोश हो जाना होगा ।
और उस दिन का इंतज़ार करना होगा,
जब शेर एक दिन खरगोश की बात मान लेगा ।
3. ख़ून में थोड़ा लोहा
वह समझते नहीं हैं ।
जब तक हमारे ख़ून में लोहा है,
तब तक हम आपस में घुलते रहेंगे ।
यह लोहा हम सब में
चुंबक होकर अपना काम करता रहेगा ।
वह समझते नहीं हैं ।
4. बुद्ध मुस्कुरा उठे
उन्होंने भी क्या ख़ूब कहा,
‘बुद्ध मुस्कुरा उठे’ !
तुम क्या अपना उपहास उड़ाए जाने पर
गालों को
थोड़ा सिकोड़ कर
होंठ हिला रहे थे
और उन्हें लगा, तुम मुस्कुरा रहे हो
मुझे तो लगता है,
तुम किसी की मूर्खता, अज्ञान और अहंकार पर क्या ही हँसे होगे
5. उनतीस फरवरी
वह भी कितना चालाक रहा होगा,
उसने इस दिन लौट आने का वादा किया होगा
और उसने महीने में यह दिन जोड़ लिया होगा ।
ऐसे उनका प्यार
इस तारीख़ में हमेशा के लिए बचा रह गया ।
6. भाषा में बड़े हुए लड़के
जिस भाषा में
लोग बस और लड़की के पीछे न भागने की हिदायतें देते हों,
हमें उन्हें क्या समझना चाहिए ?
उन्होंने लड़कियों को भी बस बना दिया ।
जिस तरह सड़कों पर बेतहाशा बसें दौड़ रही हैं,
वैसे ही एक लड़की के चले जाने पर दूसरी लड़की आ जाने की कल्पना है ।
हम भी इसी भाषा में बड़े हुए लड़के हैं,
हमें पता है, तपती हुई दोपहर में बस छोड़ देने का मतलब ।
7. धागे
गर्मी की दुपहरों में जब कभी
एक चींटा दूसरे चींटे को खींच कर ले जाते हुए दिखता है,
तब लगता है, उनमें बची रह गयी हैं कुछ नमी ।
कुछ स्मृतियाँ । कुछ स्वप्न ।
उनमें बची रह गयी हैं, एक साथ चलने
और उसमें खो जाने पर भी वापस लौट आने की संभावना ।
उनमें बचे रहते हैं धागे । कुछ कमजोर और कुछ मजबूत ।
वही रचते हैं, पीछे वापस लौटा ले जाने वाली लीक ।
सोचता हूँ,
मेरे पास भी बचे रहते कुछ ऐसे धागे, ऐसे रास्ते
जहाँ भीतर लौटते चींटे की तरह मैं भी लौट पता ।
8. धौला कुआँ
वह बोले, वहाँ एक कुआँ होगा और उन्होंने यह भी बताया,
यह धौला संस्कृत भाषा के धवल शब्द का अपभ्रंश रूप है ।
जैसे हमारा समय, चिंतन, जीवन, स्पर्श, दृश्य, प्यास सब अपभ्रंश हो गए
वैसे ही यह धवल घिस-घिस कर धौला हो गया ।
धवल का एक अर्थ सफ़ेद है ।
पत्थर सफ़ेद, चमकदार भी होता है ।
उन मटमैली, धूसर, ऊबड़ खाबड़ अरावली की पर्वत शृंखला
के बीच सफ़ेद संगमरमर का मीठे पानी का कुआँ । धौला कुआँ ।
कैसा रहा होगा, वह झिलमिलाते पानी को अपने अंदर समाये हुए ?
उसके न रहने पर भी उसका नाम रह गया ।
ज़रा सोचिए, किनका नाम रह जाता है, उनके चले जाने के बाद ?
कहाँ गया कुआँ ? कैसे गायब हो गया ? किसी को नहीं पता ।
एक दिन,
जब धौलाधार की पहाड़ियाँ इतनी चमकीली नहीं रह जाएँगी,
तब हमें महसूस होगा, वह सामने ही था कहीं ।
ओझल सा ।
उस ऊबड़ खाबड़ मेढ़ के ख़त्म होते ही पेड़ों की छाव में छुपा हुआ सा ।
जब किसी ने उसे पाट दिया, तब उसे नहीं पता था,
कुओं का संबंध पहाड़ों से भी वही था, जो जल का जीवन से है ।
9. भूमिका
कोई होता, जो हमें बता पाता,
किस तरह हम इस समय को समझ सकते थे ।
कैसे पहले की गयी गलतियों से कुछ सीख लेना था ।
किन मौकों को बेहतर इंसान बनने के लिए चुना जाना था ।
अगर उनसे इतना भी न होता,
तब, कम से कम वह यह बता पाते, यह समय
किस तरह दोबारा हमें अतीत में ले जाने की कोशिश करता रहा,
जहाँ हम बर्बर, हिंसक, खुरदरे होकर सिर्फ़ आवारा भीड़ होते गए ।
उसे लगता,
इतिहासकार यह भूमिका ठीक से निभा सकते थे ।
10. बचा हुआ समय
उनके लिए सवाल यह नहीं था,
घोंघा जिस गति से चलता है, उस गति से हमारी पृथ्वी
अपने अक्ष पर कितने समय में एक चक्कर पूरा कर पाती ?
वह सोचते होंगे,
पृथ्वी अगर दुगनी गति से घूमती,
तब बरसात का मौसम जल्दी आता । बांधों में पानी भरा रहता ।
गर्मी कम पड़ती । कम गर्मी पड़ने पर उन्हें पहाड़ों पर जाना नहीं पड़ता ।
वह नहीं सोचते होंगे,
तब क्या होता खेतों में खड़ी गेंहू की फसल का ?
उस बूढ़े घड़ीसाज की ठीक की हुई घड़ियों का ?
तब क्या बागों में दसेहरी की बौर आम बन पाती ?
क्या साल में दो बार धान आने से सबकी भूख मिट जाती ?
महिलाओं को गर्भ में कितने दिन रखना होता, अपने अजन्मे बच्चों को ?
इन सवालों के बीच खटके से उसके दिमाग में
एक सवाल उगता,
ऐसा चाहने वाले, क्या करते इस बचे हुए समय का ?
11. अनुपस्थित
जो अनुपस्थित हैं,
वह कैसे हमें दिखाई देंगे, इसकी कोई तरकीब हमारे पास नहीं है ।
ऐसा नहीं है, उनके न दिख पाने भर से उसके होने का भाव भी ख़त्म हो गया ।
पर ज़रूरी है,
हम कभी महसूस कर पाएं, जितने लोग दिख रहे हैं,
उससे कई गुना लोग, इन आँखों से नहीं दिख रहे हैं ।
जैसे जितनी कविताएँ, कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र बना दिए गए,
उनसे कहीं अधिक उन मनों में अधबने या अधूरे ही रह गए ।
जितनी किताबें छप सकीं,
उस अनुपात में बहुत बड़ी संख्या में वह कभी छप ही नहीं पायीं ।
इसे मैं कुछ इस तरह देखता हूँ, जब हम नहीं थे,
यह समय ऐसे ही दिन को विभाजित करता रहा ।
हमारे न होने से क्या वह अतीत शून्य हो गया ?
कभी वह क्षण भी आएगा,
जब सामने होते हुए, कई लोग इस वर्तमान से भविष्य की तरफ़ चल देंगे ।
उनका या हमारा आमने-सामने न होना, क्या हमें या उन्हें अनुपस्थित बना देगा?
जैसे जब कविता नहीं लिख रहा था,
या कुछ भी नहीं कह रहा था, तब भी मैं था ।
वह प्रक्रिया भी कहीं मन में, मेरे अंदर चल रही थी ।
बिलकुल ऐसे ही यहाँ कुछ भी अनुपस्थित नहीं था ।
कवि शचीन्द्र आर्य, (जन्म- 09 जनवरी, 1985)
दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए (हिन्दी), बी. एड., एम. एड. और पीएचडी । ‘हिंदवी’, ‘कविता कोश’ और कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित एवं संकलित ।
पुस्तकें: ‘दोस्तोएवस्की का घोड़ा’ (डायरी) और ‘क़ुतुब मीनार खड़े-खड़े थक गया होगा’ (कविता संग्रह)
संपर्क: shachinderkidaak@gmail.com
टिप्पणीकार राग रंजन, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से वाणिज्य में स्नातक। दो दशकों से बहुराष्ट्रीय संस्थानों में कार्यरत। लेखन स्वांतः सुखाय। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं, ब्लॉग्स में रचनाएँ प्रकाशित। कविता संग्रह “खुलती रस्सियों के सपने”।
संपर्क: 9686694459

