समकालीन जनमत
कवितानई क़लम

सत्यव्रत की कविताएँ आदिम संवेदनाओं का एक कोलाज हैं।

विनय सौरभ


सत्यव्रत की इन कविताओं से गुज़रते हुए यह स्पष्ट होता है कि ये कविताएँ आधुनिक जीवन की विडंबनाओं, महानगर के दमघोंटू यथार्थ और स्मृतियों में बची हुई आदिम संवेदनाओं का एक कोलाज हैं। कवि का स्वर गहरा, व्यंग्यात्मक और कहीं-कहीं बेहद बेचैन करने वाला है।

​‘विशाल में प्रवेश’ और ‘शर्त’ जैसी कविताएँ महानगरीय जीवन की क्रूरता को उधेड़ती हैं। यहाँ ‘विशाल’ शब्द केवल आकार का नहीं, बल्कि उस खालीपन का प्रतीक है जो भीड़ में भी मनुष्य को अकेला करता है।

“महानगर की दीवालें मूत और
मेहनत से समांतर रंग चुकी हैं” – जैसी पंक्तियाँ एक नग्न यथार्थ को प्रस्तुत करती हैं। कवि ‘दवाओं के खोखे’ और ‘व्हॉट्सएप स्टेटस’ के माध्यम से जीवन के कृत्रिम हो जाने पर तीखा कटाक्ष करता दिखता है। यहाँ अस्तित्व का संकट गहरा है, जहाँ मनुष्य अपनी पहचान ‘मेरा व्यक्ति’और पसीने की गंध को बचाए रखने के लिए संघर्षरत है।

​इसके विपरीत, ‘दिशा दक्षिण’ कविता एक ‘यूरोपियन’ या ‘पश्चिमी’ आधुनिकता के बरक्स एक ‘देसी’ और नैसर्गिक जीवन की ओर लौटने की छटपटाहट है। यह एक सुंदर कविता है। यहाँ ‘दक्षिण’ केवल एक दिशा नहीं, बल्कि सुकून और जड़ों का रूपक है। ‘चींटियों’ और ‘बहनों’ के खेल का बिम्ब अत्यंत कोमल और नॉस्टेल्जिक है, जो शहर की कर्कशता के विरुद्ध खड़ा है।
​‘छाया प्रदेश में मौतें’ (कुंभ त्रासदी पर केंद्रित) में कवि का आक्रोश चरम पर है। यह कविता सत्ता और व्यवस्था द्वारा आम आदमी को ‘प्रयोग’ की वस्तु समझ लेने के विरुद्ध एक हलफनामा है।

“खेतों में खूब आग है
और सारे के सारे हम पानी में हैं”
– यह पंक्ति विरोधाभास के ज़रिए सामूहिक पीड़ा को अप्रचलित तरीके से व्यक्त करती है।

​ इन कविताओं के पाठ के साथ यह लगता रहा कि शिल्प के स्तर पर कवि की बिम्बधर्मिता सशक्त है, लेकिन कहीं-कहीं अभिव्यक्ति इतनी अमूर्त (abstract) हो जाती है कि संप्रेषण में बाधा आती है। जैसे “कसैली मूर्च्छाएँ… निराकार चाकुएँ” जैसे प्रयोग थोड़े बोझिल लगते हैं। कविताओं में ‘गद्य’ का प्रभाव अधिक है, जिससे लयात्मकता बाधित होती है, हालाँकि यह खुरदरापन ही इन कविताओं का और कवि का भी मूल स्वभाव प्रतीत होता है।

​ये कविताएँ उस ‘मनुष्य’ का पक्ष लेती हैं जो व्यवस्था और विकास के पहियों के नीचे कुचला जा रहा है, फिर भी अपनी शर्तों पर जीवित रहने की जिद ठाने हुए है।

 

सत्यव्रत की कविताएँ

1. विशाल में प्रवेश

इतने विशाल महानगर की गली की अशुक्त बू
कुत्तों और सहिष्णुओं से भर गई
इतने विशाल में क्या है – कथन और कथरियों से त्यक्त पीठें!

इस विशाल में
कसैली मूर्च्छाएँ कब असहमत होकर निराकार चाकुएँ बन जाएँ
जो अचानक से इतने सुलभ निष्कर्ष पर पहुँच सकती हैं
कि निस्पृह और संदर्भहीन होने को महानगर की चाही गली भी चोर मालूम पड़े

जीवन की निरपराध उम्मीद
प्राथमिकताओं की नोची ईमानदारी
अशक्ति का सारा समाज लेकर लोहे की किस बालू में सिरा दूँ
उनका क्या होगा जो घुटनों के दर्द की तरह रोज याद नहीं आए
उन स्त्रियों की उत्तरकथाएँ कहाँ गई
जिनमें अंसंख्यों ने डूब-डूब कर पवित्र होने की डुबकी लगाई
जिनके घाटों पर रेहड़ियों के सामान और मालाएँ बिकती रहीं(?)

ढाँढस और ढलान के लिए
फिलहाल सारे अवरोध अनुपलब्ध हैं
पलाश वसंत पतझरी ऋतुओं के बजबजाए
लगभग कट चुके प्रतीक लेकर
कब तक सुन्न शोकहृदयों को कुरेदूँ!

जमा पूँजी में
गत दिवंगत बीमारियों में खपाई दवाओं के खोखे
डिप्रेस्ड सोसाइटी के तेल में छने नारे
घर से आते प्रत्याशित कॉल
चाबियों के छल्ले
व्हॉट्सएप के स्टेटस
बोतलों में सड़़ चुके पानी
के अतिरिक्त
इतना पानी नहीं है कि नीलेपन में झाँकूँ तो कोई परछाई उभरे ही

लेकिन उन कटे हुए बालों का क्या होगा
जो मेरे थे
जिन्हें आगे से मोड़़कर
आईना माबूद की तरह देखता था(?)
रात का लाल चाँद उलगुलान की तीली कान में चुभोता है अचानक
कौंधती प्रज्ञा मुझे नहीं चुन पाती…

इतने सँकरे और असमतल देहयानों से होकर
ढाबों की लालसाएँ और लिप्तताएँ अवैध होना चाहती हैं
हमारे बीच सबकुछ है सिवाय एक मृत्यु के
जिसे तमाम सहमतियों के बावजूद भी आने नहीं देते!

मुझे उस मनुष्य से बचना है
जो गुलमोहर की छाँव में इस साहस के साथ सोता है
वह स्त्री की याद को भुला देगा

— मुझे डराता है!

दूधों से नहाई
ख्वाहिशों ने पनीले गद्य में
फँसाकर वाक्य जाली चार…
क्या चुनूँगा फिर?

लाल बत्तियों पर खाली होता यह विशाल
जलस्मृतियाँ हैं कंधों पर पड़ती पीली स्ट्रीट लाइट
दिन भर के गद्य अवाक्य सब झुलसाते
अस्थियों में आसुत होकर टूट रहे हैं
महानगर की दीवालें मूत और मेहनत से समांतर रंग चुकी हैं
खेद से कतराते हर चौथी सीढ़ी पर टोकती आवाज़
मेरी नहीं है
पुराने प्रायश्चित नहीं घेरेंगे मेरी लेटी घटनाएँ
साँप तुम मुझे दूध पीने के भ्रम में घेरो
मार दो लाठी से।

2. दिशा दक्षिण

जंगल का फूल
सूखता है
ओस की बूँद नम कर देती उसे
धूप उड़ा ले जाती है
जिस दक्षिण में

मुझे वह दक्षिण चाहिए

जहाँ सारे फूल सूख-सूखकर पनाह पाते हैं
जहाँ जीवन के सबसे अस्थिर स्वप्न अबाबील की तरह
उड़ उड़ कर उबासी लेते हैं

लालटेन की तरह जलते हैं
दिन भर से लौटकर आए बूढ़े घुटने
फूटे मटके की तरह बजते हैं
फूस के दरवाजे जैसे नरम बच्चे
काँच की कोई नकली रेलगाड़ी लिए जा रहे हैं
जहाँ बहनें एक साथ बैठकर
खेलती हैं वह
जो फूल खेलते हैं जंगल में

हमें उस दक्षिण में जाना चाहिए

बहनें सोई तो नहीं होंगी
वे अब भी गा रही होंगी वह
जो फूल गाते हैं जंगल में

इससे पहले कि वे संझा का दिया जलाएँ
उन उड़ते पतंगों का पीछा करते
एक दिन उन लेलगाडियों के ठीक बाएँ मिलेंगे हम

ज्वार की गरम रोटी खाते हुए
उस लेलगाड़ी का पीछा करते-करते एक दिन चींटियों के बिल में घुस बैठेंगे
जहाँ बहनें वह खेल रही होंगी
जो चींटियाँ खेलती हैं
वह गा रही होंगी
जो चींटियाँ गाती हैं दक्षिण में

हमारा दक्षिण किसी भी पूर्व
किसी भी उत्तर
किसी भी पश्चिम में हो सकता है
जहाँ फूल सूख-सूखकर पनाह पाते हैं
लेलगाड़ियाँ थकान से ठिठुरती हैं सारी रात
लालटेनें चमकाती हैं फूस के दरवाजे
चींटियों के घर हिराते हैं और बहनें गा-गाकर थकती नहीं हैं।

3. छाया प्रदेश में मौतें
(प्रयागराज महाकुंभ की त्रासदी के नाम)

उतरिए इस नदी में यहाँ मौत का समुद्र है
लीजिए साँस जीवन के लिए तो कदापि नहीं
यहाँ मृत्यु के मयखाने हैं
डूबिए और पार हो जाइए
यह ईश्वर की शरणागति का प्रयोगात्मक मार्ग है
प्रयोग के लिए तो कदापि नहीं यह जीवन के लिए है

हम किस तरह के लिए थे
तुम्हारे मनोरंजन लिए थे
तुम्हारी विज्ञप्ति और विशाखा के लिए थे
तुम्हारे शतरंज के लिए थे
तुम्हारी घोड़ा गाड़ी, कट्टे, कचहरी के लिए थे
भले ही हमारे सपने बहुत ही बेमज़ा थे
हमारी नींद बहुत ही खाली थी
हम भले ही जीवन के लिए नहीं थे
पर प्रयोग के लिए तो कदपि नहीं थे

यद्यपि हम शव ही थे जो रो नहीं सके
प्रेमिकाओं को न ढूँढ़ सके
विधाता को न सूँघ सके
न हूक सके अपनी चोट पर
हमारी आँखों में कुछ सफेद नहीं रहा
कि जिसमें गुजरे आँख का पानी तो वह आँख का हो
हमारी आँखों में खेत है,
खूब खेत हैं,
खेतों में खूब आग है
और सारे के सारे हम पानी में हैं।

4. शर्त

मेरा व्यक्ति एक खिड़की खरीदने गया है
दीवार खोदकर लगाएगा
कान में कोई अभीप्सा फूलेगी लंबी वय के बाद
बाजुओं के रातरानी-फूल पानी के अभाव में बुझ लजेंगे
नाखुश अनाज के नाखून में हवा सा घुलता कंठ
लौट चुकने की नाज़ुक इजाज़त माँगता है
किंतु मेरा देशकाल-मेरा व्यक्ति-मेरी देहगंध!

थौथुल चाँदनी की निरुद्देश्यीय धूप में दमकती निर्जन छातियों पर खुशगवार नहीं हुआ जा सकता
या पुण्यात्मा की दिशा में पुनीत होने के लिए पीठ को झुकाकर अंजुरी में नहीं भरना चाहता रेत
कचोडियों के साथ बुलबुलाता प्यार का गीत उदिग्न करता तो है
लेकिन मेरा देशकाल-मेरा व्यक्ति-मेरी देहगंध मुझे इस इल्मियत से भर देते हैं कि मेरी घास बिना हवा का आस्वादन किए सहसिधार भुन रही है

मैं अपने समेत आग की तटस्थ मौत में अचानक सहित आग हो जाऊँगा
यह सब जानते हुए
पीली अंगुलियों से रिसता चोटों का गरम घाम
मुझे आहत नहीं करता
मेरे पास अलगुजरे समय की कोई चिट्ठी भी नहीं है
न इस घड़ी कोई उत्प्लावित नाम
मैं बस उन तलाशों पर हँस सकता हूँ
जो मुझे कहीं नहीं छोड़ेंगी
फिर भी मैं, मेरी पीठ और रिसती अंगुलियाँ
उन्हें छूती चली जाएँगी
मैं चिरोल के बीजों सा
निर्विवाद सर्वमान्य तो रहूँगा
लेकिन मेरा व्यक्ति मुझे मेरा पसीना सुँघायेगा
मैं अंततः मनुष्य हूँ
चुपचाप यक़ीनन वह खिड़की लगा लूँगा
जो खोली जाएगी इस शर्त पर
कि पसीना सूख न पाए
और कोई ब्रह्मा किसी कमल पर बैठ दीवार की नाभि में न पसर आए।


जन्म – 04 मार्च 2006। निवाड़ी (मध्यप्रदेश) जिले के एक गाँव ‘ज्योरा मौरा’ से हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से ग्रेजुएशन , सेकण्ड इयर के छात्र हैं तथा हंसराज कॉलेज से स्पेनिश लेंग्वेज की पढ़ाई भी कर रहे हैं।  कुछ पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ  प्रकाशित हैं। रज़ा फाउंडेशन के ‘आज कविता 35’ तथा ‘रज़ा स्मृति : समवाय 2025’ में कविता पाठ किया है। 

सम्पर्क: satyavratrajak@gmail.com

 

टिप्पणीकार विनय सौरभ झारखंड के नोनीहाट, दुमका में जन्म. भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई नब्बे के दशक में तेजी से उभरे युवा कवि. सभी शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन. पहला कविता संग्रह ‘बख़ितायारपुर ‘ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित. झारखंड सरकार के सहकारिता विभाग में सेवारत

संपर्क:binay.saurabh@gmail.com

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