सत्यपाल सहगल की कविताएँ सहज में सुंदर की अनुभूति की कविताएँ हैं। इन कविताओं में निसर्ग और सर्ग के बीच धड़कता हुआ जीवन है। जीवन में व्याप्त सुख-दुख, अनिश्चितता, आकस्मिकता को देखने की एक संवेदी दृष्टि इन कविताओं में सतत अनुभूत की जा सकती है। आत्म की तलाश, जीवन में प्रेम की उपस्थिति-अनुपस्थिति, अनुभूति, अभिव्यक्ति की नई संरचनाओं की अन्वेषी ये कविताएँ पाठक से भी एक संवेदी-अनुभूति की अपेक्षा करती हैं। ये पंक्ति-दर-पंक्ति पढ़े जाने की मांग करती हैं। सपाट पाठ करने पर हवा में सनसनाते तीर की तरह जाते जीवन को पकड़ नहीं पाएंगे।
इन कविताओं में पाठ-सौंदर्य के साथ-साथ एक जीवन-दर्शन भी है। ‘होने’ और ‘न होने’ को वे उम्मीद और नाउम्मीद की तरह नहीं देखते बल्कि संभाव्यता के यथार्थ की तरह देखते हैं-
एक गीत अब भी बजता
आकाश अब भी उसे सुनता है
कभी नहीं सुनता है।
यहाँ ‘न सुनने’ को लेकर कोई निराशा नहीं है। जीवन में बहुत कुछ होता है, बहुत कुछ नहीं हो पाता। सत्यपाल सहगल होने और न हो पाने को संभाव्यता के एक ही सिक्के के दो पहलू मानते हैं। इसी तरह अंधेरे और उजाले को भी दो अन्योन्यश्रित स्थितियों के रूप में ही देखते हैं।
मैं बचा हूँ
उजाला कहता है
…..
तुम मेरी वजह से बचे हो
अँधेरा कहता है।
सत्यपाल सहगल बिम्ब रचते नहीं, बल्कि सोचते ही बिम्बों की भाषा में हैं। मनुष्य और प्रकृति के सामान्य कार्य-व्यवहार को भी उनकी दृष्टि बिम्बों के रूप में देखती है। उनके बिम्ब भी बिल्कुल अलग तरह के हैं। जीवन की गति को लेकर यह अनूठा बिम्ब देखिए-
हवा में जाता सनसनाता तीर है हमारा जीवन
अँधेरे में पड़ी है हमारी चप्पल
यहीं कहीं होगी
चीजों को ज्यों का त्यों रख देना सत्यपाल सहगल की काव्यदृष्टि को मंजूर नहीं। उदासी भी उनकी कविता में आती है तो एक प्यार पगी स्मृति के साथ काव्यात्मक सौंदर्य की चूनर ओढ़कर आती है।
नाम उसका कोई और रहा होगा
मैं प्यार से उसे उदासी कहता
वह अपने से प्यार करती थी
इसी कविता में कस्बे की उदासी को अभिव्यक्त करने के लिए वे अद्भुत रूपक का प्रयोग करते हैं –
रस्सी पर सूखती चूनर की तरह
मेरे सामने फैली रहती
मैं क़स्बा था
शहर से बड़ी दूर।
सत्यपाल सहगल स्वांत: सुखाय लिखते हैं, लेकिन उनके अंतस को सुख कहाँ से मिलता है? जवाब उनकी कविता में ही है कि उनके अंतस को दूसरे के लिए सुख की वस्तु या वजह बनकर ही सुख मिलता है। एक कविता में कवि का स्वप्न है कि वह किसी के लिए आंसू पोछने का रूमाल बन जाए। दूसरों को सुख देने के लिए वह दोना, बटन, सिटकनी हल्दी कुछ भी बनने को तैयार है। इस कविता का स्वप्न आम जन की पुकार बन जाना है। यह कविता एक ऐसी खिड़की बन जाना चाहती है, जहाँ से ताजा हवा पाठक के मन-सदन में दाखिल हो सके। इस तरह कवि का ‘स्वांत: सुखाय’ अंतत: ‘सर्व-जन सुखाय’ बन जाता है।
सत्यपाल सहगल संबोधनधर्मी कवि हैं। कभी वे आत्म को संबोधित करते हैं, तो कभी दूर देस के चाँद को अपने आंगन में झाँकने का आमंत्रण देते हैं। कभी मुंडेर बनकर सुबह के फड़फड़ाते पक्षी को विश्राम का आमंत्रण देते हैं। वे कविता की तलाश में कहीं नहीं जाते, आसपास मौजूद कविता खुद चलकर उनके मन के दरवाजे तक आती है-
दरवाज़े के बाहर ही खड़ी होती है
कविता की पहली पंक्ति
किसी जादुई आवेश में
खुल जाता है दरवाज़ा
पंक्ति वह गले से लिपट जाती है मेरे।
इन कविताओं का अभीष्ट पाठक की संवेदना को उन निर्जन कोनों-अँतरों में ले जाना है, जहाँ सामान्य जन की पहुँच की सीमा समाप्त हो जाती है। कवि पहले उन जगहों का विवरण देता है जहां तक सामान्य सामाजिक समझ-संवेदना ले जाती है।
एक दिन वे पूछेंगे मेरी गली
मेरे शहर में रुकंगे
मेरे स्वजनों के चिन्ह खोजेंगे
मेरी डायरी की तलाश करेंगे
ढूँढेंगे मेरे मानचित्र
मेरे घर को व्यवस्थित करेंगे
लाएँगे मेरी प्रामाणिक तस्वीर
धूल उतारेंगे मेरे शब्दों पर से
पर आगे कवि उन जगहों का जिक्र करता है जहाँ वह पाठक को वास्तव में ले जाना चाहता है-
पर क्या वे जायेंगे
क्या वे जाने की इच्छा रखेंगे
उन जगहों तक जहाँ रहते थे लोग
जिनसे किया मैंने प्रेम।
संरचना की दृष्टि से इन कविताओं में पॉलिटिकली करेक्ट के बजाय पोएटिकली करेक्ट होने का आग्रह अधिक दिखता है, परंतु ये कविताएँ सौ फीसदी पॉलिटिकली करेक्ट भी हैं। जबकि पॉलिटिकली करेक्ट होने के आग्रह के साथ लिखी गई रचनाएँ पोएटिकली करेक्ट हो भी सकती हैं और नहीं भी। समय के बीहड़ सवालों को भी काव्यात्मक भाषा मे कह सकने का शिल्प इन कविताओं को अलग रंगत देता है। अभिव्यक्ति का संकट आज की सबसे बड़ी समस्या है। सत्यपाल सहगल इस संकट को कितनी मार्मिक पंक्तियों में व्यक्त करते हैं –
मेरी आवाज़
किसी सिंध, चनाब या रावी में
गिर गयी है।
आवाज़ का नदी में गिर जाना कितना कारुणिक दृश्य है। उससे भी कारुणिक यह है कि कवि को अपनी यह पीड़ा अपने देश के किसी मनुष्य से नहीं, दूर देस के चांद से साझा करनी पड़ रही है। तीसरी दुनिया की धूप जैसी कविताओं में कवि के सरोकार कुछ ज्यादा खुलकर सामने आते हैं, लेकिन एक उदात्त मानवीय सरोकार सभी कविताओं में मौजूद है। बाहर के अंधेरे और भीतर के उजाले की तलाश करती ये कविताएँ मनुष्य को थोड़ा और मनुष्य बनाने की कोशिश करती हैं। थोड़ी कोशिश पाठक को भी करनी पड़ेगी।
सत्यपाल सहगल की कविताएँ
1. रात में हमारे हिस्से का आसमान था
रात में हमारे हिस्से का आसमान था
उसको ओढ़ते थे
कभी नहीं भी ओढ़ते थे
कभी एक गीत उसको सुनाते थे
कभी सुनता था
कभी नहीं सुनता था
एक गीत अब भी बजता है
आकाश अब भी उसे सुनता है
कभी नहीं सुनता है
2. सनसनाता तीर है हमारा जीवन
हवा में जाता सनसनाता तीर है हमारा जीवन
अँधेरे में पड़ी है हमारी चप्पल
यहीं कहीं होगी
कुछ है जो हिल रहा है
कुछ था जो हिलता रहता था
कुछ था चमकती चट्टान की तरह
रास्तों की बग़ल में
हमारे रास्तों की बग़ल में
कुछ है
शीशे की तरह चमकता
हमारे रास्तों की बग़ल में
3. अंधकार घेरता है बाहर
अंधकार घेरता है बाहर
भीतर उजाला
मैं बचा हूँ
उजाला कहता है
तुम बचे हो
अँधेरा कहता है
तुम मेरी वजह से बचे हो
अँधेरा कहता है
4. मुझे ले लो दोने की तरह
मुझे ले लो दोने की तरह
मेरा उपयोग करो
रूमाल की तरह रख लो
अपनी जेब में
मैं तुम्हारे दरवाज़े की सिटकनी हो सकता हूँ
तुम्हारी शर्ट का बटन
तुम्हारी गली में नीम का पेड़
मैं तुम्हारी पुकार हो सकता हूँ
स्वप्न के बीच
वह खिड़की जहाँ से हवा
तुम्हारे घर आती है
मुझे ले लो मुझे बिना बताए
मैं नहीं जानना चाहता
कब ले लिया गया मुझको
कब बना मैं तुम्हारी डाक का डिब्बा
तुम्हारी हल्दी और नमक
तुम्हारा परदा तुम्हारे सात परदों में एक
तुम्हारा सुई-तागा
इस सर्दी
मैं तुम्हारा कोट हो सकता हूँ
धुला और तहा कर रखा
पहनने के लिए तैयार
ले लो मुझे जैसा भी मन हो।
5. यही है कविता
दरवाज़े के बाहर ही खड़ी होती है
कविता की पहली पंक्ति
किसी जादुई आवेश में
खुल जाता है दरवाज़ा
पंक्ति वह गले से लिपट जाती है मेरे
मेरे बिस्तर तक आ जाती है
एक दूसरी पंक्ति शीशे की खिड़की पर
गिलहरी की तरह घूमती है
नहीं, फुदकती है
तीसरी पंक्ति सामने आकाश में उड़ती है
मेरी आँखों के सामने
और अब आँखों से दूर
गगन में ग़ोते खाती
इस बीच उसमें शामिल हो जाता है राहगीर
सड़क पर सामने शीर्षक की तरह चला आता
उसे अभी प्रतीक्षा करनी होगी
शीर्षक सबसे आख़िर में दिया जाएगा
इधर देखिए न जाने कितनी पंक्तियाँ
घर की बेतरतीबी में से झाँक रही हैं
उसके गर्द-ओ-ग़ुबार
और रसोई की महक में
ऊपर जाती सीढ़ी के तीसरे पायदान पर
अटकी धूप में
यही है कविता
जिसके बारे में इतना शोर मचा रहता है।
6. चिह्न
एक दिन वे पूछेंगे मेरी गली
मेरे शहर में रुकंगे
मेरे स्वजनों के चिन्ह खोजेंगे
मेरी डायरी की तलाश करेंगे
ढूँढेंगे मेरे मानचित्र
मेरे घर को व्यवस्थित करेंगे
लाएँगे मेरी प्रामाणिक तस्वीर
धूल उतारेंगे मेरे शब्दों पर से
मेरे प्रांतर का पूरा नाम जान जायेंगे
उन नदियों तक पहुँचेंगे जिसका पिया मैंने जल
करेंगे उन पक्षियों की पहचान सुने जिनके गीत
पर क्या वे जायेंगे
क्या वे जाने की इच्छा रखेंगे
उन जगहों तक जहाँ रहते थे लोग
जिनसे किया मैंने प्रेम
क्या वे पूछेंगे कहाँ हैं उनके पौत्र।
7. हिसाब
जब मैं लौट कर आया मेरे हाथ में शाम की
कुछ टहनियाँ थी
जब मैं शाम को लौट कर आया तो
दिन खर्च करके
मेरी जेब में दिन के जितने हरे नोट थे मैंने खर्च कर
डाले
मैंने पूरा दिन ऐसे नीलाम कर दिया जैसे
नीलाम करते हैं लोग सामान घर बदलते हुए
जब मैं शाम को घर लौटकर आया
तो मेरे हाथ में शाम की पत्तियाँ थी
हरी, मुलायम और घनी।
8. ओ दूर देस के चाँद
ओ दूर देस के चाँद
मेरे आँगन में झाँक
मैंने तमाम चीख़ें संभाल कर रक्खी हैं.
तू उन पर पड़
मैं अपने से वैसे ही दूर हूँ
जैसे कोई अपने देस से होता है.
मेरी आवाज़
किसी सिंध, चनाब या रावी में
गिर गयी है
मेरी नाव तट पर बंधी है।
9. ओ सुबह के फड़फड़ाते पंछी
ओ सुबह के फड़फड़ाते पंछी
मैं एक मुँडेर हूँ
आ बैठ जा,फिर उड़ जाना
एक दीवार बन जाता हूँ
अपनी छाया उस पर गिराना
हो सके तो ले जाओ मेरी याद
जहाँ भी जाना
दिनों का रेला लिए
मैं एक मुँडेर हूँ
औ’ मेरे सामने एक खुला
मैदान है।
10. तीसरी दुनिया की धूप
यह तीसरी दुनिया की धूप है श्रीमान
यह गाय-भैंसों
औ’ खपरैलों पर पड़ती है
यह मूर्ख है
यह कूड़े के ढ़ेर पर भी पड़ती है
इसकी शर्ट के बटन खुले हैं
तमाम दीवारों के साये खदेड़ती रहती है
इसे मैंने अक्सर हाफंते देखा है
रेवड़ों के पीछे
इसे मैंने पहाड़ों पर देखा था
रेले की तरह
सड़क पर जाती है।
11. उदासी
नाम उसका कोई और रहा होगा
मैं प्यार से उसे उदासी कहता
वह अपने से प्यार करती थी
मैंने नोट किया
रस्सी पर सूखती चूनर की तरह
मेरे सामने फैली रहती
मैं क़स्बा था
शहर से बड़ी दूर
वहाँ मुझे वह पहली बार मिली
एक पता पूछती हुई।
कवि सत्यपाल सहगल पंजाब के सुनाम में 1958 में जन्मे और हिंदी के सुपरिचित कवि, आलोचक हैं। सिरसा, हरियाणा में स्नातक तक की शिक्षा के बाद पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से स्नातकोत्तर और पीएच.डी करने के बाद वहीं हिंदी विभाग में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहे।
कविता और आलोचना की अनेक पुस्तकें प्रकाशित। ‘कई चीजें’, ‘धूप और गंध’, ‘बाहर सब शांत है, और ‘दूसरी किताब’ उनकी चर्चित काविता पुस्तकें हैं। ख्यात पंजाबी कवि लाल सिंह दिल की प्रतिनिधि कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया है।
संपर्क: ईमेल- satyapalsehgal@gmail.com
टिप्पणीकार अरुण आदित्य, दुष्यन्त पुरस्कार, अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान, बेकल उत्साही सम्मान, आयाम सम्मान से सम्मानित कवि हैं. जन्म – 02 मार्च 1965 (प्रतापगढ़ )
प्रकाशित कृतियाँ: ‘रोज ही होता था यह सब’, ‘धरा का स्वप्न हरा है'(कविता संग्रह), उत्तर वनवास (उपन्यास) कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
असद जैदी द्वारा संपादित ‘दस बरस’, कर्मेंदु शिशिर द्वारा संपादित ‘समय की आवाज़’ और संजय कुंदन द्वारा संपादित ‘गहन है यह अंधकारा’ में कविताएँ संकलित। कुछ कविताएँ पंजाबी मराठी और अंग्रेज़ी में अनूदित। सांस्कृतिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी।
संपर्क
adityarun@gmail.com

