समकालीन जनमत
कविता

संतोष पटेल की कविताएँ मानवीय संघर्ष और अस्मिता के विस्तार तक ले जाती हैं

नीलाम्बुज सरोज


संतोष पटेल की कविताएँ हिंदी कविता में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं। उनका कविता संग्रह ‘कारक के चिह्न’ केवल साहित्यिक सौंदर्य का उत्सव नहीं, बल्कि समाज की जटिल असमानताओं और जातिवादी संरचना के विरुद्ध सशक्त प्रतिरोध का दस्तावेज़ है। कवि यहाँ कविता को मात्र मनोरंजन या शांति का साधन नहीं मानता, बल्कि उसे चेतना जगाने और संघर्ष के लिए उकसाने वाला औज़ार बनाता है।

कवि की कविता ‘कारक के चिह्न’ संसाधनों पर सदियों से काबिज़ शक्तियों और जातिवादी गठजोड़ की पोल खोलती है:
“मतलब उन्होंने
जिन्होंने सदियों से खटमल की तरह
चूसा है खून और
पकड़ कर रखे हैं सारे अवसर…”

यहाँ सत्ता-संपन्न जातियों की परजीवी प्रवृत्ति को तीखे व्यंग्य के साथ प्रस्तुत किया गया है। कवि दलित-पिछड़े वर्गों को चेताते हैं कि यदि इन ‘कारक के चिह्न’ को न पहचाना गया तो प्रतिरोध की ऊर्जा कमज़ोर पड़ जाएगी। उनकी एक महत्वपूर्ण कविता “हाँ, मैं कवि हूँ” कवि की वैचारिक स्थिति स्पष्ट करती है:
“हाँ, मैं कवि हूँ – चारण नहीं,
दरबारी नहीं,
किसी दल का भोंपू भी नहीं,
मैं कवि हूँ बेसहारों का…”

यहाँ कवि स्वयं को सत्ता-प्रणीत काव्यधारा से अलग करते हुए हाशिए पर पड़े समाज का स्वर बनने की घोषणा करता है। उसकी कलम बाल मज़दूरों, पीड़ित स्त्रियों, शोषित वर्गों और अन्याय से जूझ रहे लोगों की आवाज़ है। चे ग्वेवारा ने कहा था: “A true revolutionary is guided by true freelings of love”

संतोष पटेल केवल प्रतिरोध ही नहीं, बल्कि प्रेम और संवेदनाओं की भी कविताएँ लिखते हैं। उनकी कविता ‘प्रेमी बनो तो मांझी जैसा’ प्रेम को केवल निजी संबंध तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे मानवीय संघर्ष और अस्मिता के विस्तार तक ले जाती है:

“इस प्रेम में है जिजीविषा,
इस प्रेम में है समर्पण,
इस प्रेम में है संबंध की ज्वाला…”

वहीं “रंगे हाथों पकड़ा गया प्रेम करते”
में प्रेम और प्रकृति का सहज सम्मिलन मिलता है—
“पकड़ा गया था जब रंगे हाथों
करते हुए प्रेम
शायद यही था मौसम ऋतुराज…”

इन कविताओं में प्रतिरोध और प्रेम के भी स्वर दिखाई देते हैं—एक ओर सामाजिक अन्याय के ख़िलाफ़ ज्वाला है तो दूसरी ओर जीवन और मानवीय संबंधों का सौंदर्य भी।
संतोष की भाषा सीधी, सहज और तीखी है। वे जटिल प्रतीकों की बजाय सादगी और यथार्थ की ठोस भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उनका काव्य-संसार दलित-पिछड़े समाज, श्रमिकों, स्त्रियों और अस्मिताबोध की लड़ाई का मंच है।

‘कनकटही कप’ वाली कविता का मूल बिंब यही है। किसी कप का जब हैंडल टूट जाता है तो घर के लोग उस कप को घर के नौकर नौकरानियों के लिए अलग निकाल कर रख देते हैं। इसे कवि ने कनकटही कप कह कर उस पूरी सामंती मानसिकता पर व्यंग्य किया है।

‘कारक के चिह्न’ समकालीन हिंदी कविता में एक ऐसे कवि की पहचान कराता है जो समझौता नहीं करता। उसकी कविता ‘सुकून’ नहीं देती, बल्कि बेचैनी पैदा करती है। यही बेचैनी पाठक को आत्ममंथन की ओर ले जाती है।

यह संग्रह उन सभी पाठकों के लिए अनिवार्य है जो कविता को केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि परिवर्तन का औज़ार मानते हैं। संतोष पटेल की कविताएँ हमें याद दिलाती हैं कि शब्द अगर सही दिशा में प्रयुक्त हों तो वे किसी भी व्यवस्था की नींव हिला सकते हैं।

 

संतोष पटेल की कविताएँ

1. हां मैं कवि हूँ- चारण नहीं

दरबारी नहीं
किसी दल का भोंपू नहीं
मैं कवि हूँ बेसहारों का
कचरे में भविष्य तलाशते बच्चों का
मैं मिथ्यावाचन की हाँ में हाँ नहीं मिलाता
झूठ पर स्वयं को नहीं जिलाता।

मैं कवि हूँ
भात भात करती मरती बच्चियों का
बचपन को ईट भट्टों में झोंकते बाल मजदूरों का
अपनी मां की आंखों की नूरों का
जिनका कोई नहीं
भगवान तो बिल्कुल ही नहीं
होता तो जरूर उनकी सुनता
उनके लिए कुछ गुनता।

मैं लिखता हूँ
तार-तार हो रही नारी की मर्यादा पर
गिद्ध के दूषित इरादों पर
मासूम बालिकाओं के साथ हो रहे अत्याचार पर ।

मैं रचता हूँ काव्य
कलम को स्याही के बदले
आग में डुबोकर
ताकि जल जाए जातिवादियों का अंहकार
दुर्विचार / दुर्व्यवहार
वंचितों की अब आह में नहीं
कराह में नहीं
उनकी प्रतिरोध की ऊष्मा से
पिघल जाता है लोहा
फिर हाड़-मांस की क्या बिसात?

मैं सुनाता हूँ गीत क्रांति का
जो अभी दबी है
उस मजदूर की मजदूरी में
जो बीस बीस ईटें एकबार में ढो ले जाता है
चार मंजिलों पर
फिर भी वह अपनी मंजिलों से दूर है आज।

मेरी लेखनी चलती है
फासिस्टों की षडयंत्र पर
तानाशाहों और अताताईयों के प्रपंच पर
मैं रुकता नहीं
मैं झुकता नहीं
क्योंकि मैं उपज हूँ
इंकलाब के गान की
और कविता है
शत प्रतिशत ईमान की।

 

2. कारक के चिह्न

कर्ता ‘ने’
मतलब उन्होंने
जिन्होंने सदियों से खटमल की तरह
चूसा है खून और
पकड़ कर रखे हैं सारे अवसर
कर्म ‘को’
अपने भाइयों और बिरादरियों वालों को
करण ‘से’
समस्त सरकारी संसाधनों से
सम्प्रदान के लिए
अपनी जातीय एकता बनाये रखने के लिए
अपादान ‘से’
अलग करके दूसरों से
सम्बन्ध का के की
अपनों का, अपनों के और अपनों की
अधिकरण में पर
अपनी संस्थानों/विश्वविद्यालयों/ अकादमियों में
समस्त अपने हड़पे मंचों पर
जमे रहने की व्यवस्था है
सम्बोधन ‘हे’ ‘अरे’
यानि हे !हमारे भाइयों बहनों
समझो इस कारक के चिन्ह को
अरे ! भाइयों बहनों
नहीं समझोगे तो पछताओगे
क्योंकि समझने लगे हैं वे भी
इस कारक के चिन्ह को।

 

3. क्रोधित हुए थे वे

देखो भाई!
मैं नारी का बहुत सम्मान करता हूँ
लेकिन पता नहीं
जैसे कहीं सुनता हूँ मायावती का नाम
पता नहीं मुझे बहुत गुस्सा आता है
बेड़ा गर्क कर दिया उसने यूपी का
हाथी ही हाथी
बताओ भला होता है क्या कोई
ऐसा मुख्यमंत्री?

देखो भाई!
मैं दलितों का बहुत करता हूँ सम्मान
लेकिन पता नहीं
जैसे सुनता हूँ नाम अम्बेडकर का
पता नहीं मुझे बहुत गुस्सा आता है
बेड़ा गर्क कर दिया देश का
ये संविधान कोई संविधान है भला
बताओ होता है कोई
ऐसा संविधान निर्माता?

देखो भाई!
मैं ओबीसी का बहुत सम्मान करता हूँ
लेकिन पता नहीं
जैसे सुनता हूँ नाम लालू यादव का
पता नहीं पूरे देह में आग लग जाती है
बेड़ा गर्क कर दिया बिहार का
जंगल राज्य
बताओ भला ऐसा होता है कोई
गरीबों का मसीहा

गुस्से में तमतमाये पता नहीं
वे मुझे धमका रहे थे या
अपनी हाथों से फिसलती हुई ताकत से
बौखलाए हुए थे वे
पर बोलते समय उनके मुँह से
थूक और अजीब सी आवाज़ निकल रही थी
और आँखों में घृणा की लकीरें
साफ देखी जा सकती थी।

 

3. कनकटही कप

चाय की प्याली टूटते ही चढ़ बैठी मालकिन
क्रोध में तमतमाई नौकरानी को सुनाई, झाड़ लगाई चिल्लाते हुए बोली
पता है तुम्हें यह बोन-चाइना का था खराब कर दी तुमने
पूरी टी-सेट तुमको
क्या मालूम कहाँ से इसे मंगाया था
कितना प्यारा कप था
साहब का यह
सुना कर खरी-खोटी कप टूटने का गुस्सा नौकरानी पर उतारा।

टूटने पर कप मालकिन ने गुस्से का घूंट पिया
दबा दिया बोलकर उसे इसलिए भी कहीं भाग ना जाए नौकरानी
फिर ठंडे मन से टूटे कप को देखा
परखा कप की डंडी
टूटा हुआ पाया
उठा का उसे एक तरफ कर दिया।

जब गांव से उनके मजदूर जो करते थे उनकी खेत का देखभाल
सूकट काका उनके घर आये थे
ठंडी के दिन में साइकिल पर लादकर
लाये थे एक हड़िया दही, एक बोरी चिउड़ा और एक थैला खुशबूदार बासमती मालिक के परिवार के लिए।

चुकामुका नीचे जमीन पर बैठे सुकट काका
साहेब और मालकिन के सामने जहां वे बैठे सोफा पर ले रहे थे चाय की चुस्की और सहसा याद आई मालकिन को
वह कनकटही कप
जिसे सम्भाल रखा था उन्होंने सुकट काका को चाय देने के लिए।

 

4. हड़प नीति

जिंदा है लार्ड डलहौजी
बेशक ना हो जिंदा
पर जिंदा है उसकी नीति
लेकिन बदल गया है उसका रूप
वह हड़प लेता था बिना वारिस का राजपाठ
पर आज के डलहौजी
हड़प लेते है बहुजनों के नायकों को
ना कभी गांधी पटेल के विचारों के समर्थक
क्योंकि पता है उनको
उनके जो नायक थे वे हैं अब खाली कारतूस
नहीं रह गए वे किसी काम के
ना रह गयी प्रासंगिक उनकी प्रतिस्थापना
ना ही उनके एकांगी विचार
जो नहीं रहे बहुजनों के हितकर कभी
इसलिए आज के डलहौजी
कभी गांधी तो कभी अंबेडकर
कभी पटेल तो कभी कर्पूरी
कभी जोती बा फुले तो कभी सावित्री बा फुले
कभी बिरसा मुंडा तो कभी टैगौर
कभी तिलका मांझी तो कभी जगदेव बाबू
सबकी मना रहे हैं जयंती
बना रहे हैं उनकी बड़ी बडी मूर्तियाँ
कर रहे हैं आयोजित बड़ी बड़ी सभाएँ
लेकिन कभी नहीं अपनाते उनकी विचारों को
यदि मानते सच में पटेल को तो
यही हाल होता किसानों का
मानते यदि अम्बेडकर को
तो देते ना बराबर का प्रतिनिधित्व
देते न सबको समान अवसर
मानते गांधी को तो देते न शांति का संदेश
मानते जगदेव को तो देते सौ में नब्बे की हिस्सेदारी
मानते जोति बा और सावित्री बा फूले को
तो मुक्त करते मानसिक गुलामगिरी से
और स्थापित करते समतामूलक समाज
मानते बिरसा को तो होता अबुआ दिशुम अबुआ राज
तभी तो डल्हौजी के हड़प नीति पर
कहा था जेम्स ह्यूम ने
जिसकी लाठी उसकी भैंस
तब कम्पनी सरकार थी अब
कॉरपोरेट सरकार।

 

5. जाल

अरे ओ शिकारी!
तुम्हें कहाँ रहती है याद अपना आखेट
जो बना हैदराबाद विश्वविद्यालय का
रोहित वेमुला
एक तेजस्वी शोधार्थी
जो तुम्हारे आतंक से हो चुका था खाली
बेशक उसने अपने कृत्य को खुद बताया था कायराना
लेकिन तुमको तो होगा ही पता
कैसे करते हो तुम विवश अपने शिकार को
करने के लिए आत्महत्या ताकि कोई दूसरा टक्कर ना दे
तुम्हारी स्वप्रचारित योग्यता को
तुम्हारा जानलेवा जाल तलाशता है प्रतिभाओं को।

कहाँ नहीं है यह तुम्हारा जाल
धरती से आकाश तक गाँव से संसद तक पाठशाला से विश्वविद्यालय तक बिछा दिया अब उसे मेडिकल कॉलेज में
भील पुत्री डॉ. पायल तड़वी बनी मृगया
तुम्हारे जाल में उलझकर कर ली अपनी इहलीला समाप्त
तब जाके खून भरे मुँह से किया तुमने अट्टहास।

ओ शिकारी। तुम हो बेहद मायावी
अपने बदसूरत चेहरे पर लगा रखा है सुंदर सुंदर चेहरा
मानो कितने हो भोले भाले
लेकिन दिल मे भरा रहता है घृणा का मवाद
दिमाग में साजिशों का है अम्बार
खूब पढ़ा है तुमने एट्रोसिटी का पाठ जिसको मारक तरीके से करते हो प्रयोग
गाइडेड मिसाइल की तरह
जो गिरता है अक्सर बहुजनों के प्रतिभाशाली विधार्थियों पर।

एक बार फिर तुमने फेंक दिया है जाल
बिल्कुल नए किस्म का प्रीमियर संस्था आईआईटी में
इस जाल में जातीय घृणा थी पहले से
अब तो उसमें टांक दी है धार्मिक घृणा भी
अव्वल दर्जे से पास होना ही
फातिमा लतीफ का बन गया दुश्मन
आखिरकार जाल ने दम लिया तब
लतीफ ने आत्महत्या कर ली जब।

देखो! अपना घिनौना कृत्य
जो देते हो अंजाम अपने जाल से
शिकार हुए बालमुकुंद भारती, मनीष
है इसकी लंबी फेहरिस्त इस जाल के कारण मरने वाले
अनिल मीणा, विपिन वर्मा, डेल्टा मेघवाल पूछते हैं एक ही सवाल
हमारी जान तो ले ली सैथिल, मनीष को क्यों दी मृत्यु अकाल ?
न जाने कितने होनहारों का हरते रहे प्राण
अपनी साजिशी जाल से।

अब तुम गुरुकुल से निकल
आ पहुँचे हो बड़े बड़े विश्वविद्यालयों में मेडिकल इंजीनियरिंग कॉलेजों में
अन्य शैक्षिणिक संस्थाओं में
विभिन्न कार्यालयों में अब तुम्हें नहीं चाहिए केवल अँगूठा
अब तुम्हें चाहिए इंसान के प्राण
देखकर वंचितों की आत्महत्या
मिलता है चैनों-सुकूँ तुम्हें।

6. अमीबा !
तू कहां नहीं पाया जाता
नदी, तालाब, पोखर में
मीठे जल की झील में और खोखर में
पानी के गढ्ढे में और खाई में
गीली मिट्टी और गीली हरी काई में।

अमीबा !
तू जन्मजात है परजीवी
आत्मकेंद्रित, महीन आत्मजीवी
संवेदनहीन, हृदयहीन और रंगहीन
जिस रंग में ढलना चाहते हो
ढल ही जाते हो
क्या दाहिना, क्या बायां
मिलते अपना निवाला
सीधा निगल जाते हो।

अमीबा !
साबित हो गया कि
ऊर्ध्व गमन में तुम हो माहिर
खेल करते हो जैसे हो कोई साहिर
तू रोगकारी और विकारी
भरी है तुझमें केवल मक्कारी
इतनी बेशर्मी के बावजूद
अपने को बना रखे हो देवता*

*प्रोटियस ग्रीक शब्द है जो अमीबा से जुड़ा है जिसका अर्थ है समुद्री देवता।

 

 7. लिखो साथियों !

लिखो भाई कि कलम अब तुम्हारे हाथ आई है।
अपने इतिहास को करो जीवंत
जो अब तुमने ताकत पाई है
लिखो भाई कि एक एक सच उजागर हो
लिखो इसलिए भी कि झूठ का पर्दाफाश हो
लिखो बहनों
बताओं कैसे तुम्हें दोयम दर्जे का इंसान समझा गया
लिखो किसानों अपनी दासता
कि किस कारण आत्महत्या जारी है
लिखो वंचितों कैसे तुम्हें मिली मुफलिसी
और अमीरों के घर धन संचित हुई
लिखो हमारे लोकगायकों
कैसे तुम्हारे गीत-धुन वे चोरी करते हैं
और अपने को महान घोषित करते हैं
लिखो कवियों
उन आलोचकों की सोच को
जो अपने अहंकार में रहते हैं
लिखो मजदूरों
मालिकों के शोषण को
लोगों की मानसिकता को
जिसने तुम्हें अपने ही देश में बना दिया प्रवासी
लिखो बनिहारिनों
उस शोषण को जो वे तुम्हारे साथ होता है
लिखो भट्टा मजदूरों
क्या क्या तुम्हारे साथ गुजरता है
लिखो विद्यार्थियों
विश्वविद्यालय के उन कुकर्मो को जिसके कारण रोहित वेमुला मरता रहता है
लिखो आमजन अपने कलम से सत्ता द्वारा गुमराह किये जाने के झूठ
और नेता के झूठे आश्वासनों को
लिखो बेरोजगारों किसने तुम्हारे हिस्से को बदल दी है भक्ति में
लिखो साथियों उन सब को जो छोड दिये गए असली इतिहास में
लिखो मेरे आदिवासी भाईयो और बहनों
कैसे किया जा रहा है
बेदखल जल जंगल जमीन से
लिखो साथियों लिखते जाओ
क्योंकि इतिहास शेर का होता है
हिरण का नहीं
पर साथियों आज है कलम तुम्हारे हाथ में
आज तुम ही शेर हो
करो लड़ाई साथ में।

 

8. पूर्णिमा और बुद्ध

नीलमणि के विस्तृत थाल में
स्वर्ण कुसुम सम
अपनी सोलहों कलाओं से उदित
पूर्णिमा का स्निग्ध चांद।

शुक्ल पक्ष का अंतिम दिन
फिर कृष्ण पक्ष
और रात्रि धीरे धीरे
निशीथ काल की ओर होगी अग्रसर।

आज तो पूर्णिमा का चांद
सर्वकलाओं से परिपूर्ण
शीतल रश्मियां समभाव से
वितरित हैं धरा पर
मां की तरह चंद्रमा
शीतलता और वात्सल्य से सराबोर।

पूर्णिमा का चांद
तब भी हुआ था उदित
समस्त कलाओं के दीप्त
चन्द्रमंडल का प्रकाशपुंज।

जन्म हुआ बुद्ध का
शीतलता और पूर्णता के साथ
पूर्ण छवि और पूर्ण सौंदर्य
सब कुछ पूर्णता के साथ।

पूर्णिमा की ही रात थी जब
ज्ञान को उपलब्ध हुए बुद्ध
उरवेला में निरंजना नदी के तट पर
ज्ञान भी पूर्णता के साथ।

विदा हुआ बुद्ध पूर्णिमा की रात्रि
बुद्ध का परिनिर्वाण पूर्ण है
जैसे उनका जन्म पूर्ण
पूर्णिमा प्रतीक ही है पूर्णता का
सम्बोधि होना पूर्ण है।

 

9. लोक की शक्ति

कितनी शक्ति है लोकगीतों में
समझना है तो चित्त शांत कर के सुनो
सेनानीग्राम* की उन महिलाओं का समवेत स्वर में गाये उस गीत को
कितना प्रभावशाली
कितना प्रेरक
बदल कर रख दिया
जिसने जीवन राग
ला दिया जड़ता में गतिशीलता
शरीर रूपी वीणा के तार को
इतना ना कसो कि टूट जाए
इतना भी ना छोड़ो ढीला कि
उससे सुर ना फूट पाए
गांव की महिलाओं के इस गीत ने
भर दी एक नई ऊर्जा
सिद्धार्थ गौतम के मन मस्तिष्क में
खोल दिया ज्ञान चक्षु
महाकारुणिक के
ऊपर से सुजाता का पायस
ग्रहण कर जान लिया कि
नहीं होगा उद्धार
मानव का जप तप से
किसी दार्शनिक विवादों के गप से
ना शरीर सुखाने वाले तप से
तब से गौतम चिंतन मनन में अनुबद्ध हुए
जाग कर ही सिद्धार्थ से बुद्ध हुए।

*आज का बकरौर ग्राम, फल्गु नदी के पार, बोध गया के निकट

 

10. इस दौर में सवाल

जिन्हें करना है सवाल
वे लगे हैं आकंठ चरण चुंबन में
जिन्होंने खड़े किए सवाल
वे जिंदा बचे नहीं
उनके मौत के लिए
तैयार किया गया वह सब कुछ जो
उनको ले जाए जेल की सलाखों के पीछे
और फिर क्या
जेल गए तो ‘अंडासेल’ में
जहां प्रयोग किये गए प्रताड़ना के समस्त हथकंडे।

सवाल करना इस दौर में
वस्तुत: ईशनिंदा हैं
जिसकी सजा कई तरह से होना तय है
देशद्रोह, लिंचिंग या फिर बहुत कुछ
या फिर सीधा दनादन गोलियों की बौछार
समाप्त ईहलीला कुछ ही सेकंड में।

होना था जिन्हें सलाखों के पीछे
होना था जिनको आजीवन कारावास
होना था जिन्हें अंडा सेल में
या होनी चाहिए थी जिन्हें फांसी
होता है उनका भव्य स्वागत
ढोल नगाड़ों से
फूल मालाओं से
अंगवस्त्र से
मिलता है उन्हें तमगा
सच्चे राष्ट्रभक्त का।

 

11. विश्व कविता दिवस पर

ताकि सार्थक हो कविता
हिंसा का माहौल है आज
पूरी दुनिया में
शांति स्थापना के नाम पर
शासक अपने अहंकार से
आतंकी अपने कुकृत्य से
पदाधिकारी अपनी कुर्सी से
राजनेता अपने कुचाल से
शिक्षक ज्ञान के मद से
मीडिया धनकुबेरों के इशारे से
फिर भी, कवि हिंसा के विरुद्ध खड़ा है।

नफरत की ज़मीन हो रही है मजबूत
शिकार हैं औरतें और बच्चियां
नन्हें बच्चें और बुजुर्ग
निशक्त और दुर्बल
गरीब और अनबोलते
साधनहीन और निरीह
कभी जाति के नाम पर
कभी धर्म के नाम पर
कभी मजहब के नाम पर
फिर भी, प्रेम के पक्ष में खड़ा है कवि।

संकट है प्रकृति पर
रोज टूट रहीं हैं सीमाएं
ग्लोबल वार्मिंग की
खतरे में है नदी और जल स्रोत
खतरे में है मौसम खुद भी
हवा जहरीली है जानलेवा
प्रदूषण नित नये मुकाम पर
पारिस्थितकी अनियंत्रित
कारण इंसान का भोग
फिर भी, प्रकृति को संकट से उबारने में लगा है कवि।

कवि सत्तासीन नहीं
कवि पदाधिकारी नहीं
कवि कथावाचक नहीं
कवि राष्ट्राध्यक्ष नहीं
कवि किसी आतंकी संगठन का प्रमुख नहीं
कवि के हाथ में है कलम
ह्रदय में संवेदना
खड़ा है विरुद्ध में
हर तरह के हिंसा, नफ़रत और भेदभाव के
खड़ा है पक्ष में
प्रेम, अहिंसा और मानवता के
चाह है प्रकृति उबरे हर संकट से
ताकि सार्थक हो
उसकी कविता।

 

12. बुद्ध विलुप्त हो गए लोक से

बैचैन करता है यह प्रश्न
आखिर बुद्ध लोक से कैसे विलुप्त हो गए
प्रश्न तो बनता है यह
आखिर कैसे लोक से बुद्ध विलुप्त हो गए
पर बहुत विचारने के बाद मन में आता है
क्या यह सच है
कि वे विलुप्त हो गए
या उनको विलुप्त कर दिया गया?

सवाल बिल्कुल वाजिब है
क्या किसी को इस बात का भान ही नहीं
भोजपुरी की माटी में जन्में बुद्ध
महाभिनिष्क्रमण इसी मिट्टी में
फिर ऐसा क्या था
जो लोक से बाहर हो गए बुद्ध
जबकि धर्मचक्र प्रवर्तन भी इसी माटी में
फिर भी बुद्ध लोक में नहीं।

उसी माटी के कण कण में उनके कदम पड़े
जहां जहां कदम पड़े उनके
प्रमाण भी मौजूद है अब भी
कुछ स्तूप खड़े हैं वहीं आज भी
कुछ अशोक स्तंभ भी वही है खड़े
जिसको आज भी गांव की औरतें
लउर बाबा बता कर उसे पूजती हैं
फिर भी बुद्ध गायब हैं लोक से ?

आखिर कौन थे वे लोग
जिन्हें भाया नहीं बुद्ध का वह संदेश
जिसमें है दया, करुणा, ममता, मानवता
प्रेम, शांति और समानता।

आखिर कौन थे वे लोग
जो चाहते नहीं थे अपनाना
बुद्ध का मध्यम मार्ग
परलोक की जगह इहलोक की बातें।

आखिर कौन थे वे जो
मानवता के थे दुश्मन
जिन्हें प्यार है अपनी जाति से
मतलब नहीं था उन्हें सहानुभूति से।

आखिर कौन थे वे लोग
जिन्होंने तर्क की जगह अंधविश्वास फैलाया
प्रतीत्यसमुत्पाद के बातें छोड़
लोगों को अज्ञानता में भरमाया

इतना छोटा सवाल नहीं है यह
सदियां लगा दी उन्होंने
बनकर प्रच्छन्न बौद्ध
जारी रखा एक युद्ध
बुद्ध के विरुद्ध
फिर बुद्ध विलुप्त कर दिए लोक से।

अब वही लोग रोना रोते हैं पीट पीट कर छाती
बुद्ध लोक से गायब हैं
पर मैं कहता हूं बुद्ध का लोक वैश्विक है
कुआं के मेढ़क की तरह
बुद्ध को यहां मत ढूंढो,यहां के लोक में
क्योंकि यदि बुद्ध यहां नहीं हैं
तो उसके कसूरवार भी तुम ही हो।

 

13. बुद्ध की धरती

श्रावस्ती नगरी के परकोटे के बाहर
सहेठ के टीलों से ढँका गया
बौद्ध साहित्य का प्रसिद्ध जेतवन विहार
निकल आया सबके सामने
खुदाइयों में
हुई जेतवन की पहचान
मिला सबसे अकाट्य प्रमाण
सहेठ की खुदाइयों में मिले
एक ताम्रलेख था पहचान
कनौज के गहड़वाल नरेश
गोविन्दचन्द्र द्वारा दिया सम्मान।

दबा दिया गया था इसको
एक सन्दूक़ में रखकर
एक कमरे की नींव में
जिसपर है एक अभिलेख
छह गाँवों की आय का दान
‘पवित्र जेतवन’ के महाविहार महान
बुद्ध भट्टारक थे जहां भिक्षुसंघ के प्रधान।

इतिहास है तो अवश्य सामने आएगा
जिसका कुछ नहीं वह मिथकीय गुण गाएगा
जेतवन का वास्तविक इतिहास है सामने
जिसके हैं कई मायने
कोसल की राजधानी से विख्यात श्रावस्ती का हुआ पुनरुद्धार

परकोटों के बाहर निकल कर
मानो श्रावस्ती के जेतवन में
टीले से बाहर निकल कर बुद्ध बोल रहे हों:
“न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचन।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो ।।”*


 

कवि डॉ. संतोष पटेल, जन्म – 4 मार्च, 1974,बेतिया, बिहार। शिक्षा : पीएच-डी(विषय: भोजपुरी साहित्य में दलित चेतना के स्वर, इग्नू नई दिल्ली) संपादक – भोजपुरी ज़िन्दगी, सह संपादक – पूर्वांकुर (हिंदी – भोजपुरी ), साहित्यिक संपादक – डिफेंडर (हिंदी- इंग्लिश- भोजपुरी), रियल वाच ( हिंदी), उपासना समय (हिंदी), झेलम न्यूज़। भोजपुरी कविताएँ एम.ए. (भोजपुरी पाठ्यक्रम, जे पी विश्वविद्यालय ) में चयनित “भोजपुरी गद्य-पद्य संग्रह-संपादन – प्रो शत्रुघ्न कुमार। सदस्य – भोजपुरी सर्टिफिकेट कोर्स निर्माण समिति, इग्नू, दिल्ली।

प्रकाशन –
भोजपुरी
1.भोर भिनुसार (भोजपुरी काव्य संग्रह मैथिली भोजपुरी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा प्रकाशित),
2.अदहन ( भोजपुरी कविता संग्रह)
3.अछरंग ( भोजपुरी कविता संग्रह)
4. अपने देसवा निक बा ( भोजपुरी कहानी संकलन)
5. अनबोलता ( भोजपुरी काव्य संग्रह)
6. भोजपुरी साहित्य के विविध आयाम, शोधात्मक निबंध, मैथिली भोजपुरी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा प्रकाशित

हिंदी
1.शब्दों की छाँव में (हिंदी काव्य संग्रह),
2.जारी है लड़ाई (हिंदी काव्य संकलन),
3.नो क्लीन चिट (हिंदी काव्य संग्रह)
4.कारक के चिन्ह (हिंदी काव्य संग्रह)
5.अमीबा ( हिंदी काव्य संग्रह)
आलोचना
6.छायावाद के प्रवर्तक ( हिंदी आलोचना)
7. बेड़ियों को तोड़ने की सजा( हिंदी काव्य संग्रह)

सम्प्रति:
सहायक कुलसचिव( असिस्टेंट रजिस्ट्रार), दिल्ली कौशल व उद्यमिता विश्वविद्यालय, दिल्ली सरकार, नई दिल्ली।

पता – आर जेड एच 940 राजनगर -2 पालम कॉलोनी नई दिल्ली-110077
संपर्क 9868152874
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टिप्पणीकार नीलाम्बुज सरोज, जन्म 07/07/1983, असम। प्रारंभिक एवं स्नातक शिक्षा बलिया (उत्तर प्रदेश) से प्राप्त की। तत्पश्चात 2004-06 के दौरान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के भारतीय भाषा केंद्र से एम.ए. (हिंदी) किया, जहाँ निराला पर विशेष अध्ययन रहा। दिल्ली विश्वविद्यालय से नजीर अकबराबादी की कविताओं पर एम.फिल. किया तथा आगे जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से सामासिक संस्कृति और आज़ादी के बाद की हिंदी कविता विषय पर पी-एच.डी. शोधकार्य प्रारंभ किया।

2010 से 2019 तक केंद्रीय विद्यालय संगठन में पी.जी.टी. हिंदी के रूप में केरल, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और पंजाब में अध्यापन एवं रंगकर्म से जुड़े रहे। सितंबर 2019 से वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा (भोजपुर, बिहार) में हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।

वर्तमान में ‘हिंदी फिल्मी गीतों में उत्तर भारतीय हिंदी समाज का बदलता स्वरूप (1947 से 2000 तक)’ विषय पर शोधरत हैं। शोध-आलेख, आलोचना, कविताएँ, ग़ज़लें, समीक्षाएँ और रिपोर्ताज़ जैसी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

सम्पर्क:  मोबाइल- 70441 78071,

ईमेल id: thenilambuj@gmail.com

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