समकालीन जनमत
कविता

संघमित्रा राएगुरू की कविताएँ सामाजिक और सांस्कृतिक संचेतना से सराबोर हैं

शिरोमणि महतो


उड़ीसा की युवाकवि संघमित्रा राएगुरू उड़िया व हिंदी साहित्य से जुड़ी हुई हैं। दोनों भाषाओं में उनका समानाधिकार है। वह मुख्य रूप से कविताएँ लिखती हैँ, साथ ही उड़िया और हिंदी मेँ परस्पर अनुवाद कार्य भी उल्लेखनीय है। वह अपने समाज और सांस्कृति के प्रति काफी सजग और संवदेनशील हैं।

अतएव उनके काव्यकर्म में उड़ीसा की समुद्ध सांस्कृतिक संचेतना का स्वतःस्फूर्त प्रस्फुटन है, जिसमें समकालीन संवेदनाओं का संघनन भी –
“सूर्य के चरण पखारनेवाला
चाँद के तालाब मेँ डुबकी लगाना चाहता है !
× × ×
कागज की छाती पर
शांति का सूरज उगा रही हूँ
इच्छित सूर्योदय के सपने बो रही हूँ”

एक स्त्री कवि होने के नाते संघमित्रा स्त्रियों की प्रत्येक अवस्था व मनोदशा से परिचित हैं। उनके तमाम दुखों-कष्टों व जीवन संघर्षों को समझती हैं, जो “बस छाती मे दबाये रखती है/जिसकी यंत्रणा की ठंडी बर्फ/और होठों पर सजाती है/ मुस्कान की तेजधार( एक ऐसी चुभन।/जिसे समझना मुशिकल है )” 

बावजूद इसके आज की स्त्री अपनी तमाम यातनाओं व यंत्रणाओं को झेलते हुए वह – “टूटती नहीं/
हरबार किसी को जोड़ते – जोड़ते/ थोड़ी – थोड़ी स्वयं को / नये आकार में ढाल लेती है।”

फिर भी स्त्रियों को इस उत्तर आधुनिक समय में पुरुषवादी वर्चस्व के समकक्ष स्वयं को स्थापित करने मे उनके अस्तित्व व अस्मिता को कई बार दमित होना पड़ता है, जो कवि के मर्मभेदक शब्दों में अभिव्यक्त हुआ है –

” मेरी हरी – भरी इच्छाएँ हरबार
उनके चूल्हे की लकड़ी बन जाती हैं “

स्रियों के जीवन में प्रेम का बड़ा महत्व होता है, और उसका अहसास भी काफी गहन, और उसकी व्यंजना सबसे अलग-अद्वितीय!
कवयित्री के प्रेम की अनुभूति व व्यंजना भी अलग अनुपम है-
” मेरी हँसी में, मेरे आँसुओं में,
कथा में कविता मे,
यहाँ तक खामोशी के घास – गापीचों में,
प्रेम चलता फिरता रहता है “

संघमित्रा की सोच और चेतना का विस्तार केवल स्त्री जीवन के संघर्षों तक ही सीमित नहीं है, अपितु व्यष्टि से समष्टि तक का फैलाव है। वह अपने समाज और देश की समस्याओं-विद्रुपताओं पर भी दृष्टि डालती हैं तथा उनके प्रभावों को भी बखूबी परखती हैं। मसलन, आज भूख एक बड़ी समस्या है, जिसके प्रभावों की एक मार्मिक अभिव्यक्ति द्रष्ट्रव्य है-
” सपनों में रोटी का स्वाद लिए
भूख से लथपथ मन
हर सुबह सूरज की हत्या कर देता है
रात चाँद की बलि चढ़ा देता है “
ऐसे ही, देश और दुनिया में घटित घटनाओं और बदलावों पर प्रस्तुत एक सूक्ष्म व कटु विवेचन-
” हवा को थैली मे भरकर
किलो के दाम बेचने का दौर है
नदी को सीमाओं में बांधकर
बोतलो में भरने का ज़ोर है “

वास्तव में संघमित्र राएगुरू का रचनाकर्म उनके साहित्य के प्रति समर्पण, संचेतन, और समकालीन अनुभवों व संवेदन का फलन है, जो हिन्दी कविता के फलक को एक नूतन वितान देता है…!

 

संघमित्रा राएगुरू की कविताएँ

 

1. जलता रहे एक दिया

जलता रहे एक दिया,
उजास से भर दे आंगन, द्वार, दीवार,
मन की जंग को घिस-घिस कर चमका दे,
हर बार लौटे वह त्यौहार।

पवन के प्रहार में,
तूफानों की मार में,
मिट्टी, कंकड़, पत्थर की कठोरता में,
बुझ जाए यदि,
तो भी हृदय में जलता रहे
फिर से जलाने का संकल्पित दिया।

जलना ही धर्म है,
परत-दर-परत जलकर
अंधेरे को जलाना ही धर्म है।

स्वयं ना जले तो,
कैसे पहचानेंगे अंधकार?
कैसे छू पाएंगे
उस आदिम प्रकाश के नगर को?
कैसे जगमगाएगी जीवन-अयोध्या?
कैसे रक्त में खिलेगा
राम नाम का पावन कमल?

यदि दीये के नीचे अंधेरा है,
तो रहने दो,
बस यही आराध्य रहे—
आलोक के मोह में
उम्र भर जलता रहे एक दिया।

 

2. रोटी की ख़ुशबू में

सपनों में रोटी का स्वाद लिए,
भूख से लथपथ मन हर सुबह
सूरज की हत्या कर देता है,
रात चाँद की बलि चढ़ा देता है।

युगों से, अनगिनत टुकड़ों में,
नदी की छाती पर बहता रहा है वह—
पर क्या कोई जानता है?

कोई नहीं जो उसे पानी से छानकर
परित्यक्त कुल का सहारा दे,
कोई नहीं जो उसके कण-कण को
निर्माल्य की महानता में अभिमंत्रित करे।

रोटी के टुकड़े पर नाम लिखने की चाह में,
भूख से सना मन कुछ भी कर सकता है,
बार-बार मृत्यु को जीवन के चरणों में
समर्पित कर सकता है।

हाँ, भूख से सना मन
खोया रहता है रोटी के सपनों में।

इस पहर का सपना,
उस पहर के सपने से समांतर चलकर
भूखे पेट को सौदे पर मजबूर करता है।
यह रक्त का शोषण करता है,
स्वयं को स्वयं से काटकर
लहूलुहान कर देता है—
ऐसा घाव, जहाँ कोई मरहम नहीं।

उफ़्फ़…
दुनिया जो चाहे सोचे,
जो भी कहे—
भूखा किसी की परवाह नहीं करता,
वह भाव-अभाव और लज्जा से परे,
किसी को भी भिक्षुक बना सकता है।

इंद्रधनुष भी रंगहीन हो जाता है,
जब पेट में भूख घर कर लेती है।

इतिहास साक्षी है—
आँसुओं से पत्थर,
अफ़सोस से संघर्ष,
और अपनी कोख से जन्मे बच्चे से भी
भूख हर बार जीत जाती है।

तुम पूछ सकते हो—
“कैसे?”
और मैं
एक लोटा जल की तरह
गिरकर बह सकती हूँ जवाब में।

हर बार जब
अख़बार की सुर्खियाँ
मेरी आँखों से टकराती हैं,
मैं हवा से मुट्ठी भर ऑक्सीजन माँगती हूँ
साँस लेने के लिए।

उतनी ही बार, कहीं न कहीं,
कोई भूखा अपने हाथों
अपना बच्चा बेचकर
भूख को चुपचाप विदा करने का रास्ता
ढूँढ लेता है।

भूखा मन
हमेशा भागता रहता है
आटे की अट्टालिका की ओर,
नहाता रहता है
एक रोटी की ख़ुशबू में।

 

3. लो!

ये,
आसमान खिसक जाने का वक्त है,
पृथ्वी धँस जाने का समय है।
हवा को थैली में भरकर
किलो के दाम में बेचने का दौर है,
नदी को सीमाओं की कैंची से काटकर
फाइलों में दफनाने का वक्त है।

मैं तो बस एक कलम थामे खड़ी हूँ,
शब्दों को सिपाही बना,
अपने ही खिलाफ़ अपनी जंग लड़ रही हूँ—
और तुम?
मेरी कलम से हिसाब माँगते हो!
अच्छे-बुरे के तराजू तौलकर,
प्रेम के पूजाघर में
घृणा का श्रृंगार करते हो!

ये,
देह से देह उतर जाने का समय है,
आत्मा के हनन का वक्त है।
फूल-भ्रूण की हत्या कर,
तितलियों के पंख काटने का समय है।

मैं,
कागज़ की छाती पर
शांति का सूरज उगा रही हूँ,
इच्छित सूर्योदय के सपने बो रही हूँ—
और तुम?
मुझे चुप रहने के सौ बहाने दे रहे हो!
झूठे प्रेम की आड़ में
अपने स्वार्थ की वॉकिंग स्टिक तराश रहे हो!

तोड़-फोड़ और तहस-नहस करने की कला
सबको आती है—
कभी तो रचने का साहस करो!
विभाजन से सिंहासन हथियाना
अब पुराना हो चुका—
कभी जोड़ने की ताक़त को परखो!

ये,
सब कुछ होते हुए भी
शून्य होने का वक्त है,
समाज को छलकर
सामाजिक कहलाने का दौर है।

मैं,
स्याही में साँस भर रही हूँ,
मरने से पहले
ज़रा जीना सीख रही हूँ—
और तुम?
बेमतलब सवाल उठाकर
अनचाहे जवाब गढ़ रहे हो!

लो! वही सवाल अब मैं तुमसे पूछ रही हूँ—
“कविता किसे कहते हैं?
कवि कहकर किसे पुकार रहे हो?”

 

4. अच्छी लड़की

अच्छी लड़की को
ग़ुस्सा नहीं आता,
रूठना नहीं आता,
ना कोई हक़ जताना आता है,
ना अभाव दिखाना आता है।

बस छाती में दबाए रखती है
सिसकती यंत्रणा की ठंडी बर्फ,
और होंठों पर सजाती है
मुस्कान की तेज़ धार—
एक ऐसी चुभन, जिसे समझना मुश्किल है।

पहचान की सूखी मिट्टी,
अजनबी आसमान के नीचे,
कमर तोड़ती ऋतुएँ,
झुलसाती तेज़ हवाएँ—

इन सबके बीच
अपनी ‘हाँ’ और ‘ना’ को घोंटते हुए,
बार-बार वह बेचती है
खुद को—
किसके लिए?

रास्ते हैं,
पाँव भी हैं,
कारण है,
ठिकाना भी है

फिर कौन-सी क़सम ने उसे बाँध दिया,
कि वह विद्रोह न कर सके,
ख़ुद से दूर रहे,
अपनी आवाज़ दबाए रखे?

 

5. क्या पता, पंछी को क्या पसंद है…

शिकारी बिछाता है छल का जाल,
पंछी की चोंच में जगती है लालच।
अचरज है! फिर भी,
भूख उसे खींच लाती है—
नई जंजीरों की ओर,
नई पीड़ाओं की ओर।

लालच से अंधी आँखों को
सिर्फ़ दाना दिखता है—
ना अग्नि की भयंकर लपटें,
ना उबलते स्रोतों की भाप,
ना शिकारी के खून के निशान—
बस, भूख का सुनहरा मृगतृष्णा।

आसमान का आज़ाद पंछी
धीरे-धीरे झुकता है नीचे,
एक तरफ़ दाने की मोहक चमक,
दूसरी तरफ़ बीते खतरों की गूँज।

शिकारी चाहता है पंछी,
पंछी चाहता है दाना,
और बीच में तना है महीन जाल
दो भूखों को जोड़ता,
एक अदृश्य धार।

इस धार के इस ओर भी अंधेरा,
उस ओर भी अंधेरा।

पंछी अगर चाहे—
तो आसमान की ऊँचाइयों में उड़ सकता है,
या फिर—
दाने की लालसा में
खुद ही दाना बन सकता है।

क्या पता, पंछी को क्या पसंद है…

 

6. मुझे छू लेने से

मैं कभी प्रेम को तलाशती नहीं—
तलाशने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी अब तक।
प्रेम… हर बार ख़ुद ही मुझे ढूँढ़ लेता है।

मेरी हँसी में, आँसुओं में,
कथा में, कविता में—
यहाँ तक कि ख़ामोशी के घास-गलीचों में भी
प्रेम चलता-फिरता रहता है।
मुझे महसूस करता है,
स्वप्न-सा पलकों पर सजता है,
हर बार मुझ पर निशाना साधता है।
पर उसे कुछ भी हासिल नहीं होता—

प्रेम में पाने को होता ही क्या है?
मिट्टी, हवा, पानी के अपनेपन के बदले
हमने अब तक दिया ही क्या है?

वे कहते हैं— “तुम रहस्य हो।”
तो क्या सचमुच मैं रहस्यमयी हूँ?
जब मेरी कविता एक खुली किताब-सी,
जीवन एक सीधा वृक्ष-सा,
दाम पारदर्शी…
तो यह रहस्य कितने दिन टिकेगा?

वे कहते हैं—
“सूर्य के चरण पखारने वाला,
चाँद के तालाब में डुबकी लगाना चाहता है।”
मैं कहती हूँ—
“पिंजरे का पंछी आसमान नहीं माँगता,
पर प्रेम होते ही
वह पिंजरे को मात दे देता है।”
क्या वे मेरी बात समझ पाए होंगे?

प्रेम… प्रेम ही बना रहे!
अधिकार की चाप,
तेल-नमक की गठरी,
भाग्य की सीमाएँ,
देह-दाह की तपन,
आशा-प्रत्याशा की धक्का-मुक्की—
इन सबके बीच
प्रेम हर रोज़ एक कब्र बनता है।

और उस कब्र पर
सिर्फ़ दो आँसू, एक फूल…
बस उतना ही तो रखा जा सकता है।

रहने दो—
तुम्हारा प्रेम तुम्हारे ही हृदय में रहने दो।
मैं अब प्रेम को प्रेम कहना ही छोड़ दूँ।

क्योंकि
जब प्रेम, प्रेम से टकराता है—
दया नदी रक्त की धार बन जाती है।
कहीं न कहीं कलिंग का युद्ध छिड़ जाता है,
और कोई अशोक कह उठता है—
“बुद्धं शरणं गच्छामि!”

प्रश्नों में उलझती है यशोधरा,
ज़िंदगी के पन्ने
हमास बच्चों के निरीह रक्त से लाल हो जाते हैं।

जानते हो?
कोई पद्मावती प्रेम में डूब कर न मरती,
तो चित्तौड़ का दुर्ग इतिहास में दर्ज नहीं होता।
इतिहास हमेशा लहू से लिखा जाता है—
वो युगांतकारी, युगप्रवर्तक बूँद-भर लहू—
प्रेम के बिना और किसका हो सकता है?

मैं प्रेम नहीं तलाशती।
प्रेम को तलाशने की कभी आवश्यकता नहीं पड़ी।
पेड़, पौधे, पर्वत, मिट्टी, बालू, पत्थर—
सब प्रेम बन जाते हैं,
सिर्फ़ मुझे छू लेने से।
और वे सब यही कहते हैं—
“प्रेम… तुम हो।”

 

7. अन्या – १

अन्या—
टूटती नहीं,
बल्कि हर बार किसी को जोड़ते-जोड़ते
थोड़ी-थोड़ी स्वयं को
नए आकार में ढाल लेती है।

मिट्टी काँपे— तो भूचाल।
पवन गरजे— तो तूफ़ान।
पानी बहे उन्मुक्त— तो बाढ़।
इन तीनों की भाषा
वह मौन होकर पढ़ चुकी है
धैर्य के अक्षरों से लिखी एक प्राचीन पुस्तक में।

क्या नहीं सुन पाती वह
डर की धीमी, अदृश्य आहटें?
क्या नहीं पढ़ पाती
प्रेम की ओट में लिखी गईं
धोखे की लिपियाँ?
क्या नहीं देख पाती
नज़रों की सतह पर जमे
राजनीति के मकड़ी-जाल?

जानती है वह—
और फिर भी स्वीकारती है।
वह जानती है
कैसे तूफ़ानों की झुर्रियाँ
एक साड़ी में समेटनी होती हैं,
कैसे उजली रहनी होती है
उसके भीतर की पृथ्वी
जब बाहर चारों ओर
प्रलय बरस रहा हो।

पत्थर बन जाना—
उसकी मंज़िल नहीं।
वह फूल में भविष्य देखती है,
एक ऐसी कोमलता में
जो वज्र को भी थका दे।

जिस स्त्री के भीतर
प्रतीक्षा का समुद्र हो—
वह कब कमज़ोर होती है?
फूल जानता है
कि उसकी मौन गंध भी
साम्राज्य हिला सकती है।
क्या वह अपनी क्षमता से अनभिज्ञ है?

अन्या—
सिर्फ़ एक नाम नहीं,
हर स्त्री के भीतर खिलता
एक मौन फूल है—
हर दीवार पर टंगा
एक निडर आईना—
जो तुम्हारी कमज़ोरियाँ नहीं,
तुम्हारा असली चेहरा दिखाता है।

 


कवयित्री डॉ संघमित्रा राएगुरु (जन्म: 9 अगस्त 1983) समकालीन हिंदी और ओड़िया साहित्य की एक सशक्त, बहुचर्चित और द्विभाषी कवयित्री, अनुवादक हैं। उन्होंने ”रामायण और महाभारत के मुख्य स्त्री पात्रों में नारी चेतना का तुलनात्मक अध्ययन” विषय पर शोध कर हिंदी साहित्य में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है।

इनकी साहित्यिक यात्रा ओड़िया और हिंदी, दोनों भाषाओं में समान रूप से प्रभावशाली रही है। उनकी नौ ओड़िया काव्य-संग्रहों और तीन हिंदी काव्य-संग्रहों—’रोशनी की खातिर’, ‘कुछ घूंट चाँद के’, और ‘साड़ी की उम्र’- प्रकाशित हैं।

अनुवाद के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है। उन्होंने प्रेमचंद जैसे युगप्रवर्तक लेखक की कालजयी कृतियों को ओड़िया भाषा में अनुवाद कर उन्हें नवीन आयाम प्रदान किए हैं। साथ ही कई प्रसिद्ध उपन्यासों का ओड़िया में सफल अनुवाद कर उन्होंने साहित्यिक सेतु का कार्य किया है। उनके इस अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें भारत के माननीय उपराष्ट्रपति द्वारा ‘श्रेष्ठ अनुवादक पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

सम्पर्क: raigurusanghamitra93@gmail.com

 

टिप्पणीकार शिरोमणि राम महतो, जन्म तिथि: 29जुलाई 1973, डाॅक्टरेट की मानद् उपाधि से सम्मानित।

संप्रति: अध्यापन तथा ‘महुआ’ पत्रिका का संपादन। कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित ।

प्रमुख प्रकशित पुस्तके : उपेक्षिता (उपन्यास) 2000, कभी अकेले नही (कविता संग्रह) 2007, संकेत–3(कवितओं पर केंद्रित पत्रिका)2009, भात का भूगोल(कविता संग्रह) 2012, करमजला ( उपन्यास)2018, चाँद से पानी( कविता संग्रह) 2018 । झारखण्ड की समकालीन कविता (संपादन) 2021, समकाल की आवाज़ (चयनित कविताएँ ) 2022, सभ्यता के गुणसूत्र (कविता-संग्रह)2023.

सम्मान: नागार्जुन स्मृति राष्ट्रीय सम्मान ,बिहार। सव्यसाची सम्मान , इलाहाबाद, परिवर्तन लिटेरचर अचीवर्स आवार्ड,नई दिल्ली। जयशंकर प्रसाद स्मृति सम्मान, रांची।

कुछ भारतीय भाषाओं – मराठी, सिंधी, ऊर्दू, उड़िया, गुजराती,संथाली सहित अंग्रेजी, नेपाली में रचनाओं के अनुवाद प्रकाशित ।
सम्पर्क- नावाडीह, बोकारो
झारखण्ड-829144
मोबाइल-9931552982

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