मयंक खरे
डॉ. सबीहा रहमानी की कविताएँ केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे एक वैचारिक प्रतिरोध, सामाजिक दृष्टि और सांस्कृतिक पुनर्पाठ की कोशिशें हैं। इन रचनाओं को पढ़ते हुए यह स्पष्ट होता है कि कवयित्री सामाजिक यथार्थ के प्रति बहुत सजग हैं। वे कविता को केवल कलात्मक माध्यम नहीं बल्कि हस्तक्षेपकारी औज़ार के रूप में बरतती हैं। उनकी कविताओं का ताना-बाना वर्तमान सामाजिक व्यवस्था पर सवालिया निशान भी खड़ा करता है।
इन कविताओं में विषयों की विविधता सशक्त और विचारोत्तेजक है।युद्ध का प्रचार, मातृत्व के आयाम, संविधान की गरिमा, प्रेम और प्रकृति के साथ आत्मीय रिश्ते और लोकतंत्र की विडंबनाएँ शामिल हैं।
विशेष रूप से ‘शोर ही शोर’ और ‘संविधान की साख’ जैसी कविताएँ सत्ता, राष्ट्रवाद, पितृसत्ता और जनतंत्र की चीरफाड़ करती हुई दिखाई देती हैं।
डॉ. रहमानी की भाषा स्पष्ट व सहज है। वे अलंकारों और भाषिक चमत्कारों के पीछे नहीं भागतीं, बल्कि उनके लिए कविता विचार की सीधी और प्रखर अभिव्यक्ति है जिसे हर तबके का पाठक पढ़ और जुड़ सके। ‘मैं’ बारम्बार मुस्कुराई’ कविता में कई दिनों बाद घर लौटने पर बगीचे के पेड़ पौधे ही नहीं घर की हर वस्तु जैसे सानिध्य की कृतज्ञता से खिल उठती हैं-
मुझे सुनाई दी एकाएक
हरसिंगार की खिलखिलाहट
चंपा के चेहरे में छा गई बहार
हौले-हौले मुस्कुरा रहे थे बेला और सदाबहार
हवा के झोंको के साथ लहराते हुए
कर रही थी मीठी नीम और तुलसी जैसे झुककर सलाम
‘प्रेम क्या है’ कविता में अपने प्रेमी से सामाजिक विरूपताओं के बरक्स साहस और बराबरी के मूल्यों की अपेक्षा प्रेम को उसके उदात्त तक ले जाना सुंदर है। ‘बुद्ध की स्त्री’ जैसी कविताएँ हमारे सामाजिक ढाँचे की गहरी पितृसत्तात्मक जड़ों को खोलती हैं।
“पर वहीं यदि कोई स्त्री
आधी रात को घर-बार
छोड़ कर जाती है
तो वह चरित्रहीन हो जाती है”
यह केवल आरोप नहीं, बल्कि एक लंबी ऐतिहासिक विसंगति की व्याख्या है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. रहमानी स्त्री विमर्श को किसी सीमित परिभाषा में नहीं बाँधतीं, बल्कि उसके अनकहे पक्षों को सामने लाने का साहस करती हैं।
’76वाँ गणतंत्र दिवस’, ‘संविधान की साख’ और ‘जंगल में जनतंत्र’ में वे लोकतंत्र की शुचिता की चिंता करती हैं। विशेष बात यह है कि इन कविताओं में केवल रोष या आलोचना नहीं है, एक चेतावनी और समाधान की आकांक्षा भी है।
‘माँ नहीं रही’ कविता भावुकता और स्मृति की एक गहरी नदी है:
“माँ जैसा शीतल, ठंडा
मटके का पानी नहीं रहा…”
ऐसी सूक्ष्म और आत्मीय प्रतीकों से बनी कविता जीवन के उस खालीपन को पूरी सच्चाई के साथ कह जाती है, जो माँ के जाने के बाद हम सबके जीवन में होता है।
डॉ. सबीहा रहमानी की कविताओं को समकालीन हिंदी कविता की धारा में सजग और सच बोलती आवाज़ की तरह देखा जा सकता है। हालाँकि अभी उन्हें लम्बा सफर तय करना है, लेकिन उनकी कविताओं में सामाजिक सच्चाई से टकराने का साहस है और यही साहस उन्हें उनकी कविताओं में और बेहतर कसावट व शिल्प के लिए उकसाता रहेगा।
सबसे महत्वपूर्ण है आलोचना के जोखिम को उठाने की ईमानदारी। वे कहीं नारेबाज़ नहीं हैं, बल्कि बेहद संतुलित, भावुक और विचारशील रचनाकार हैं। उनके काव्य में स्त्री-विमर्श, लोकतंत्र, सत्ता-प्रवृत्तियाँ, और संवेदनशील निजी अनुभव एक-दूसरे से टकराते नहीं, बल्कि साथ-साथ चलते हैं।
हाल ही के दिनों में डॉ. सबीहा रहमानी की किताबें ‘चीख’ व ‘हम गुनहगार औरतें’ बेहद चर्चित रहीं। उन्हें अपने साहित्यिक सफ़र के लिए शुभकामनाएँ।
सबीहा रहमानी की कविताएँ
1. शोर ही शोर
अंदर से बाहर तक बस
शोर ही शोर मारो…मारो
धर्म पूछ कर मारो
मारो अपने ज़मीर को मारो
मार डालो इंसानियत को
बदले की आग में
फूंक डालो सब कुछ
जारी है इस समय
इंसान को हैवान बनाने की
पुरज़ोर अपील ।
एक तरफ आतंकवाद का
मुंह तोड़ जवाब देकर
सिरफिरे आतंकवादी राष्ट्र पर
क़हर बरपाती हमारी
हिंद की जांबाज सेना
सरहद पर शहीद होते सिपाही
युद्ध का उदघोष
चहुंओर से उठती
सायरन की आवाज़ें
घर की चारदीवारी में बैठे
दिन-रात सोशल मीडिया पर तैनात
युद्ध के घोर पक्षधर ऑनलाइन सिपाही
युद्ध… युद्ध…युद्ध
बस युद्ध के लिए ललकार रहे हैं
हमारा चतुर्थ स्तंभ युद्ध का शंखनाद कर
जय..जयकार में लगा है
इस शोर के अतिरिक्त
बम धमाकों, सायरन की आवाज़ों
और चील कौवों की कायं…कायं…
में कहाँ सुनाई देती हैं किसी को
शहीद की मांँओं की सिसकियां
भाईयों से जुदा हुई बहनों की चीखीं
और सिंदूर उजड़ने से
तड़पती बिल्खती पत्नियों का रुदन
स्वार्थ की रोटियां सेंकते
जबरन युद्ध का आह्वान करते
लोग बन जाते हैं आंख के अंधे
और कान के बहरे
यह सब कुछ देखकर
मन बहुत अशांत है
मेरे अंतस में दबा
आंसुओं का समंदर
छटपटा रहा है
वो बाहर आना चाहता है
मैं रोना चाहती हूँ
बहुत रोना चाहती हूँ
2. मैं मुस्काई बारम्बार
तीन दिन बाद
वापस लौटी थी मैं घर
मुझे लगा
मेरे बिना बहुत उदास था घर
चारों ओर छाया था अंधेरा
अंधेरे से नहाए लग रहे थे
सभी दर-ओ-दिवार
लगातार घुप अंधेरे को झेल रहे घर में जैसे ही मैंने बत्ती जलायी
लगा जैसे चौंधिया गईं सबकी आंखें
लपलपाने लगीं कुर्सी–मेज़ की पलकें
घर के साज़-ओ-समान में हुई एक जुंबिश सी
खुशी की लहर दौड़ गई थी इधर से उधर
घर की चारदीवारी को रोशन कर
मैं तेज़ी से कदम बढ़ाती हुई पहुंची
अपने बैकयार्ड के गार्डन की ओर
भूखे-प्यासे से
मुरझाए हुए अनमने से खड़े थे पेड़
घर के सन्नाटे से बेहद आहत थीं
चिड़ियां और गिलहरियाँ
पाकर मेरी आहट
मानों वह खुशी से झूम उठीं
मैंने अब बुझाई
पेड़ पौधों की प्यास
मुझे सुनाई दी एकाएक
हरसिंगार की खिलखिलाहट
चंपा के चेहरे में छा गई बहार
हौले-हौले मुस्कुरा रहे थे बेला और सदाबहार
हवा के झोंको के साथ लहराते हुए
कर रही थी मीठी नीम और तुलसी जैसे झुककर सलाम
महसूस हुआ मुझे कि
कोई और भले ही मेरा मुंतज़िर नहीं था
मगर घर, उसकी खिड़की और दरवाज़े
मेरे रोपे गए पेड़-पौधे
गार्डन में बसेरा डाले चिड़ियाँ और गिलहरियाँ सभी शायद कर रहे थे शिद्दत से मेरा इंतज़ार
मैंने भी तीन दिन की थकान को
पल भर में उतार फेंका
नीचे बिखरे पड़े हरसिंगार के फूल
मुट्ठी भर कर उठाये और उनके लम्स से
मुस्काई बारम्बार…..।
3. एक कविता पढ़ी
एक कविता पढ़ी एक पुरूष का
बुद्ध होना कितना
आसान
पर कभी, किसी युग में
कोई स्त्री बुद्ध हो ही नहीं सकती ।
पुरूष रात में
सोई हुई पत्नी और पुत्र को
छोड़ कर जाता है
तो कहते हैं
वह भगवान थे
परम ज्ञान की प्राप्ति हेतु
सर्वस्व त्याग कर चले गए
और वही बुद्ध कहलाए
पर वहीं यदि कोई स्त्री
आधी रात को घर-बार
सोए हुए पति और बच्चे को
त्याग कर जाती है
तो वह चरित्रहीन, पतिता
कुलटा और कलंकिनी
हो जाती है वह कभी
बुद्ध नहीं हो पाती है ।
4. मां नहीं रही
मां नहीं रही
मानो पूरी दुनिया नहीं रही
घर घर सा नहीं रहा
न ही रही वैसी रौनक
सोंधी मिट्टी की खुशबू नहीं रही
खाने में मां जैसी
फूली गोल रोटी नहीं रही
दाल में तड़का
सब्ज़ी में वैसा नमक नहीं रहा
मां जैसा शीतल, ठंडा
मटके का पानी नहीं रहा
मां नहीं रही
नहीं रहा वो ममत्व
रिश्तों की भीड़ मगर
मां जैसा स्नेह नहीं रहा
मां नहीं रही तब जाना
कि क्या होता है
मां का जाना
पैरों तले ज़मीन और
सिर पर सायबां नहीं रहा
अपार ऐश्वर्य भोग
फिर भी मां नहीं रही
मानो दुनिया नहीं रही ।
5. 76 वाँ गणतंत्र दिवस
सुनो देशवासियों
तुम्हें मालूम है आज हमारा
७६वाँ गणतंत्र दिवस है ?
हाँ यह बिल्कुल सत्य बात है
भारत के अस्तित्त्व की पहचान है
गणतंत्र हमारा अमिट, अजर और अमर है
यह है सिरमौर्य हमारा ।
लेकिन…
सुनो ! सुना है
इतिहास बदलने की तैयारी है
क्या यह सम्भव है ?
अतीत को मिटाकर
वर्तमान और भविष्य की रूपरेखा
बनाना निरर्थक है
इतिहास गवाह है कि हमारी
साझी शहादत ही असल साझी विरासत है
इसी हिमालय समान संविधान से फूटती हैं
तमाम अविरल धाराएं फिर जाकर उसी में समा जाती हैं
संविधान हमारी इस विरासत की नीव है ।
और इस नींव रूपी विरासत को मिटाना नामुमकिन है
हिमालय की तरह तना खड़ा था, खड़ा है और
खड़ा रहेगा यह संविधान और गणतंत्र दिवस
हम पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस को आज़ाद हुए थे
फिर छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ पचास को
विश्व का सबसे बड़ा
धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक संविधान बना
इस पर बहस का सवाल नहीं
बारम्बार सुधार की गुंजाइश के लिए
विमर्श अवश्य सम्भव है ।
6. क्या है प्रेम ?
प्रेम क्या है ?
ग़ालिब के अनुसार
एक आग का दरिया है
और डूब कर जाना है
कहत कबीरा
सुन भई साधु
प्रेम है एक भवसागर
खुसरो ने कहा यही
जो डूब गया
सो पार गया
जो पार गया
सो डूब गया
सुनो प्रेम का
दावा करने वालो
तुम्हारे लिए प्रेम क्या है ?
तुम्हारी अपेक्षाओं पर
मेरा खरा उतरना
लेकिन….
प्रेम अपेक्षा, उपेक्षा
शिकवे, शिकायतों का
खेल नहीं है
प्रेम है मुक्त करने की
अदभुत कला
किसी की उन्मुक्त हंसी
बचाने की सिद्धहस्तता
किसी रोते हुए के
आंसू पोंछ कर
उसके होंठों पर
मुस्कान बिखेरने की अदा
जानते हो तुम
प्रेम लेता नहीं कभी कुछ
प्रेम देता है पूर्ण समर्पण
बोलो तुम मुझसे
ऐसा प्रेम कर पाओगे ?
यदि हाँ….!
तब आना…
चुपके से छुप-छुपाकर नहीं
सरे आम आना
और कायरों की तरह नहीं
खुले आम मांग लेना
मेरा हाथ….
मैं मना लूंगी अपने
माँ-बाबा को….।
7.
( 1 )
मेरी इच्छा
मेरी इच्छा नहीं है कि
तुम मेरे लिए
तोड़ लाओ चांद तारे
गढ़वाओ ढेर भर गहने
कपड़े लत्ते जूता
चप्पल कुछ नहीं
मांगूगी तुमसे
नहीं दिखाना तुम मुझे
परियों के स्वप्न
न ही गूंथना मेरे
जूड़े में वेणी
बस मेरे हाथ में
एक किताब, पेन
डायरी देना
मुझे चाहिए मेरे हिस्से की
ज़मीं और फलक
मेरी आवाज़, हंसी
मेरे अपने ख़्वाबों को
मेरा ही रहने देना
रहना अगर इच्छा हो
मेरे साथ तुम
मगर मेरी वजूद के
आस-पास मुझे कोई
मंज़ूर नहींं
तुम, तुम रहना और
मुझमे “मैं” रहूँ बस
इतनी सी बात ही तो है
तुम्हें स्वीकार्य होनी चाहिए ।
(2)
हर दिवस हमारा साझा है
जितने सब हैं उतने हम भी
फिर क्या बाँटा है
हम तुम्हारा सम्मान करें
और तुम रखो हमारा मान
आधे हम और आधे तुम
तब सौ प्रतिशत होने पर
सब आधा-आधा चाहिए ।
8.
तुम्हारे और मेरे द्वारा
बोले गए शब्दों में
बड़ा अंतर है…
तुम कहते हो
तुम्हारे शब्दों का
कोई भाव नहीं
कोई तोल नहीं
बस तुम्हारी कमान से
निकले हैं यही काफी है
चाहे वो ग़लत हों या सही
बस तुम्हारे शब्द हैं…
लेकिन !!!!!!
मेरे गढ़े और कहे गए
शब्दों का तुम बहुत
मोलभाव करते हो
मुंह से निकले शब्दों की
बड़ी खींचतान करते हो
हर शब्द की लम्बी से
लम्बी व्याख्या कर डालते हो
यहाँ तक कि मेरे शब्दों का
पोस्टमार्टम भी करते हो..
अब बताओ क्यों है ये अंतर ???
कोई वाजिब उत्तर है तुम्हारे पास…।
9. जंगल में जनतंत्र
बड़े ज़ोर-शोर से जंगल में जनतंत्र की
हो रही है स्थापना, मतदान है आधार
इस बार चुनाव का बड़ा गरम है बाज़ार
हर पार्टी कर रही यही प्रसार और प्रयास
इस बार भैय्या वोटिंग सौ के पार
जंगल में हो रहा है मंगल
शेर और लोमड़ी सभी कर रहे हैं
अपने-अपने ढंग से प्रचार
चूहे इधर-उधर घूम-घूमकर कुतर रहे हैं
सबके बिछाये बिसाती जाल
खरगोश बेचारे बड़े शांत हैं अब कौन भला
सुनता है उनकी अमन-शांति की बात
बौद्धिकता की चादर ओढ़े
पुरस्कार और अलंकरण की रेस में
दौड़ते घोड़े हो गए अब बेकार
गधे बेचारे चर रहे हैं दौड़-दौड़ कर
इधर-उधर की बासी सूखी घास
इस आस में कि अबकि बार
उन्हें चरने को मिलेगी हरी-भरी
अपरम्पार घास ही घास
सभी लगे हैं इन्हें रिझाने में
क्योंकि इनके दम पर ही अब
जंगल में बनती है सरकार !!!!
10. संविधान की साख
मठ, तंत्र और क़िले
गढ़ने वालों जान लो
चाहे जितने मज़बूत
स्तंभ बना लो…
जितनी ऊंची
प्राचीरें गढ़ लो…
लेकिन अगर तुम्हारे
अत्याचार और अन्याय
की आंधी चलेगी तो
तुम्हारे मठों, तंत्रों एवं क़िलों की
नींव भी एक दिन अवश्य हिलेगी और
फिर ढहेंगे नफरत एवं हिंसा को
हवा देते ये मठ, महल और तंत्र
नहीं बचेगा कुछ भी शेष
न तुम और न तुम्हारा ज़ुल्म
इसीलिए ज़रूरी है
संविधान की साख व
लोकतंत्र के चारों स्तंभों को
मज़बूत करें
सौहार्द और देश की
गंगा जमुनी तहज़ीब को बुलंद करें
कवयित्री डाॅक्टर सबीहा रहमानी, विभागाध्यक्ष-समाजशास्त्र, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय बांदा, एम. ए., बी.एड., पी-एच. डी., एल.एल. बी। लेखिका, कवियित्री, संस्थापक/प्रबंधक चिराग़फाउंडेशन –बांदा एंव केदारनाथ अग्रवाल शोध संस्थान की सामाजिक सचिव।
प्रकाशन: संदर्भ पुस्तकें-भारतीय मुस्लिम महिला एवं सशक्तिकरण, बुंदेली संस्कृति क्षरण एवं संरक्षण, बुंदेली संस्कृति के संरक्षण के उपाय, बुंदेलखंड की दशा एवं दिशा, प्रौद्योगिकी एंव उत्तर-आधुनिक समाज, नये भारत में महिलाओं की भूमिका, समकालीन परिप्रेक्ष्य में स्त्री विमर्श। एक लघुउपन्यास ‘सुनो छोटी सी गुड़िया की लम्बी’, ‘काकी का कुनबा’ कहानी संग्रह आमेजन में उपलब्ध। ‘माटी’ पत्रिका की सह-सम्पादक। कई शोधपत्र प्रकाशित, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानी और कविताएँ प्रकाशित।
बेस्ट टीचर एंव महिला सशक्तिकरण सम्मान से सम्मानित। उत्तर-प्रदेश आर्ट एण्ड फैशन एकेडमी की ओर 2021 बेस्ट लेखक अवार्ड।
संपर्क: drsabiha.gdc@gmail.com
टिप्पणीकार मयंक खरे, कवि व आलोचक
संयोजक-प्रतीक फाउंडेशन-बाँदा
सम्पर्क: 9179359507

