सन्ध्या नवोदिता
रोशन टोप्पो आदिवासी जमीन के कवि हैं. आज भी आदिवासियों को अपनी बात अपने ही देशवासियों तक पहुँचाने के लिये अपनी भाषा की जगह हिन्दी या अंग्रेज़ी का सहारा लेना पड़ता है जो उनकी मूल भाषा नहीं है, इसमें वे साँस नहीं लेते, हँसी मज़ाक नहीं करते.
आज भी हर भाषा का अनुवाद होना आम बात नहीं है, हो सकता है निकट भविष्य में तकनीक की उन्नति के साथ हमें कविता अपने मूल भाव में किसी भी भाषा में पढ़ने को मिल सके.
किसी दूसरी भाषा में अपने आत्मीय पल की बात कहना दुरूह प्रक्रिया है. हम अपनी भाषा में जीते और साँस लेते हैं, भाषा हमारी स्मृतियों का निर्माण करती है. स्मृतियाँ मूक नहीं होतीं, वहां बहुत से आत्मीय वाक्य और अपनत्व के भाव रहते हैं जो अपनी मातृभाषा में विचरण करते हैं. ऐसे में हिन्दी हो या कोई अन्य भाषा, स्वयं को ठीक ठीक व्यक्त करना चुनौती है. न सिर्फ दूसरी भाषा में कहना बल्कि कविता के शिल्प, विशेषणों में बात कह पाना आसान तो नहीं ही होता.
इस तौर पर रोशन टोप्पो का स्वागत किया जाना चाहिये कि वे अपनी मूल सदरी, कुरुख (जिनके बारे में हिन्दी भाषी कम ही जानते होंगे ) भाषा के साथ ही हिन्दी में भी रच रहे हैं.
कुरुख एक द्रविड़ भाषा है, जिसे ओराँव और किसान जनजाति के लोग बोलते हैं. इसकी अपनी लिपि भी है. अब इस भाषा को बोलने जानने वाले कम होते जा रहे हैं. सदरी इंडो आर्यन भाषा है. इसकी स्थिति भी कुरुख जैसी ही है.
इसके अलावा टोप्पो के पास उड़िया भाषा बोली जाती है. इस तरह कई भाषाओं की सीमा लाँघ कर वे हिन्दी के अपेक्षाकृत बड़े समुदाय में दाखिल होते हैं. रोशन ने अपनी मातृभाषा में भी रचा है. उनके व्यक्तित्व पर बात करना इसलिये भी ज़रूरी है कि आईआईटी भुवनेश्वर से इंजीनियर होने के बाद भी वे अपने गाँव, आदिवासियत और अपने लोगों के प्रति जिम्मेदारी नहीं भूले हैं.
वे अपनी कविताओं में आदिवासी समाज के अंतहीन संघर्षों को रचते हैं और उन्हें स्वर देने के साथ ही आगे बढ़ने और अपने जीवन में रौशनी लाने के लिये जागरूक करते हैं. वे अपने समुदाय से उन्हीं की भाषा में संवाद करते हैं, स्वास्थ्य, तकनीक, पत्रकारिता से जुड़े मामलों पर वीडियो बनाते हैं.
रोशन अपनी कविताओं में आदिवासी परम्परा और विरासत, देसीपन को स्वर देते और संरक्षित करते हैं. उन्हें पता है कि आज बाज़ार सब कुछ निगल रहा है, कमजोर को तो सबसे पहले खत्म किया जाएगा . हम में से कई लोग अपनी परम्परा पर काम करते हैं. लेकिन अगर रोशन की उम्र जान लें तो उनकी समझ चकित करती है. इसे ऐसे भी देख सकते हैं कि हिन्दी क्षेत्र में व्यक्तिवाद ज्यादा है जबकि आदिवासी समष्टि में जीते हैं, बाज़ार से बचे रहने के फायदों में एक यह है.
रोशन गाँव को बहुत याद करते हैं इसलिये नहीं कि वे अब हमारी तरह शहरीकरण से ऊब गये हैं, बल्कि गाँव उनकी जीवन शैली है. वे गाँव से निकलने वाली पहली पीढ़ी के हैं. उनका बचपन, मिट्टी और खपरैल का घर – उसकी बरसात से टपकती छत से भी उनको मधुर लय सुनाई देती है, जो बूंदे कोनों में रखी बाल्टी और हांडी में गिरती हैं. दादी कहती हैं रात की बातों में ये बूंदें भी हिस्सा लेती हैं.
इन कविताओं की ज़मीन गाँव के परिवेश की है. इनमें चिड़िया है , सरई के फूल की घनी याद है, मेहमान के प्रति गहरा आदर है. आदिवासी जीवन की कविताएं बड़ी सहज और सरल होती हैं. इनकी भाषा बहुत अलंकारिक नहीं होती, बातों को घुमा फिरा कर हज़ार तरह से नहीं कहा जाता. उनका जीवन भी बहुपरतीय नहीं होता. लेकिन नई सभ्यता के दबाव में अब यह सब बदल रहा है.
जिन समाजों में औद्योगीकरण हुआ है उनके जीवन में अलग तरह की जटिलताएं हैं जो भाषा और उनके व्यवहार में परिलक्षित होती हैं.
एक ऐसे समय में जब खनिजों के अंधे दोहन के लिये पहाड़ खोदे जा रहे, जंगल काटे जा रहे, रोशन की दुनिया अपने गोइलो गाँव से रोशन है – वही उनका आसमान है. वहां का हर पेड़ उनका भगवान है, टोला लामजीरा उनकी धड़कन है.
‘टोप्पो एक चिड़िया है’ – कविता सुन्दर बन पड़ी है. जब सूखे से त्रस्त जमीन पर एक चिड़िया आयी, जहाँ उसकी छाया गिरी वहीं से जल फूटा, जिस पेड़ पर वह चिड़िया बैठती थी उसे अब काटा नहीं जाता वह पूज्य हो गया. मनुष्य ने चिड़िया का कुल अपना लिया. यह वह आदिवासी विरासत है जो सचमुच पेड़, धरती, चिड़िया, पानी के साथ सह अस्तित्व में जीती है.
रोशन आदिवासी जमीन से आकर आधुनिक भारत के उस हिस्से में शामिल हुए हैं जो बाजारवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित है. आने वाले समय में इसका असर उनकी रचनाशीलता पर नज़र आना चाहिये. उनके सृजनात्मक संसार में जीवन की दुरुहताएं, वैश्विक संकट, पहली दुनिया और नव उपनिवेशवाद के दबाव भी शामिल होंगे, ऐसी आशा है .
आदिवासियत के पक्ष में खड़े होना हम सबकी बड़ी जिम्मेदारी है जो आधुनिक सभ्यता का पहला निशाना है. देशी और विदेशी बड़ी पूँजी के जाल को समझना कविता और साहित्य की भी ज़रूरत है क्योंकि आदिवासियत तभी रह पायेगी जब आदिवासी संस्कृति रहेगी.
रोशन टोप्पो की कविताएँ
1. डहर (रास्ता)
चल पड़ा था भीड़ के साथ,
कंधों पे था दिखावे का ताज।
रंग-बिरंगी पोस्ट्स, झूठी मुस्कान,
अंदर खाली, बाहर तूफान।
सोचा था यही है लाइफ का स्टाइल,
रातें जग के, सुबहें बिना फाइल।
पर दिल ने पूछा एक रात यूँ ही —
“क्या सच में यही है तेरी कहानी सही?”
स्क्रीन की चमक में खो गया फ़ोकस,
रिल्स की दुनिया में गुम हो गया पर्पस।
पर जब आई ख़ामोशी की आवाज़,
तब समझ आया — मैं ही हूँ अपना राज़।
अब नहीं दौड़ना हर ट्रेंड के पीछे,
न ही चाहिए लाइक्स के मीठे चीखे।
अब चलूँगा उस “डहर” की ओर,
जहाँ सुकून मिले, ना हो कोई शोर।
छोटे कदम, लेकिन इरादे बड़े,
अब नहीं मुड़ना बीते पड़े।
जहाँ मेहनत हो, सीख हो गहरी,
वहीं है असली “वाइब”, वहीं है सच्ची रहगुज़री।
रास्ता आसान नहीं होगा शायद,
पर नकलीपन से तो बेहतर ही लगेगा हर साइड।
“डहर” वो है जहाँ तू असली हो,
ना नकाब, ना दिखावा — बस तू हो।
2. महुआ फूल
याद है बचपन के दिन,
जब महुआ के फूल चुनते।
वो मीठी महक,
जो हवा में घुल जाती,
और दादी की कहानियाँ,
जो फूलों संग सजी होतीं।
किशोरावस्था में,
महुआ के फूलों से
जमीन पर गिरते रस
को बटोरते थे।
फिर आया जवानी का दौर,
शहर की चकाचौंध में
महुआ की यादें,
साथ लेकर चला।
आज भी जब महुआ के फूल देखता हूँ,
तो गाँव की मिट्टी, वो महक,
और बचपन की हंसी,
सब याद आ जाती है।
महुआ का फूल सिर्फ फूल नहीं,
वह यादें हैं, जो हमेशा
दिल के कोने में बसि रहेंगी।
3. याद है बचपन
याद है बचपन के वो दिन
जब मिट्टी में खेलते, हँसते थे।
गाँव की गलियों में भागते
और धूल से मस्ती करते थे।
फिर स्कूल की घंटी बजी,
नए दोस्त मिले, नई बातें सीखी।
किशोरावस्था आई, खेतों में
माँ-बाप का हाथ बंटाया।
शहर की ओर रुख किया,
पढ़ाई, नौकरी, नए अनुभव
लेकिन दिल में बस रहा गाँव,
हर पल, हर याद।
आज 25 साल का हूँ,
पर वो बचपन की मासूमियत
कभी भूला नहीं।
गाँव ने ही सिखाया
वही असली जीवन है।
4. गाँवों के जीवन
सुबह के सूरज संग
खेतों में हल चला,
गाय-बैल की घंटियाँ
और किसान की हंसी खुशी।
दोपहर को बकरी के बाड़े में
बच्चों की खिलखिलाहट,
महुआ के पेड़ तले
बुजुर्गों की कहानियाँ।
शाम को कुँए से पानी,
और चूल्हे पर रोटियाँ,
रात की चाँदनी तले
थकी दैवे खाट पर सोई।
सपनों में फिर से
खेत, टोकां और डोंड,
धर्मेश ने दी रात की शांति,
और जीवन यूँ ही चलता रहा।
5. सरई का फूल
याद है मुझे वो वसंत के दिन,
जब सरई के पेड़ों पर फूल खिलते थे।
सफेद-सफेद कोमल पंखुड़ियाँ,
जैसे धरती पर स्वर्ग उतरते थे।
हम नंगे पाँव दौड़ते थे,
गिरते-पड़ते सरई के फूल बीनते थे।
एक झोला भरकर लाते थे,
और उसे माँ को गर्व से दिखाते थे।
वो मीठी गंध, वो ताज़ा हवा,
जो सिर्फ गाँव की सुबहों में मिला करती थी।
दादी कहती —
“सरई का फूल पूजा में चढ़ता है,
जैसे बचपन का प्रेम ईश्वर से जुड़ता है।”
खेतों की मेड़ पर बैठकर,
हम फूलों को हवा में उड़ते देखते थे।
हर पंखुड़ी में जैसे कोई कहानी बसती थी,
बचपन की भोली-सी रवानी हँसती थी।
अब जब कहीं साल का पेड़ दिखता है,
तो रुककर उसे देर तक निहारता हूँ।
मन में वही पुरानी सी तस्वीर उभरती है —
फूलों के संग बीता मेरा बचपन झरता है।
सरई का फूल सिर्फ एक फूल नहीं,
वो मेरी जड़ों की खुशबू है,
गाँव की मिट्टी में लिपटी हुई वो याद है,
जो दिल के किसी कोने में हमेशा महकती है।
6. खपरैल (खपर) का घर
याद है मुझे वो बचपन का घर,
मिट्टी की दीवारें, ऊपर खपर की छत।
बारिश की बूँदें जब गिरती थीं उस पर,
तो एक मधुर-सी लय बनती थी हर रात।
छत से टपकती बूँदें,
और कोनों में रखे बाल्टी, हाँडी,
दादी कहती — “रात की बातों में
ये बूँदें भी हिस्सा लेती हैं प्यारी।”
सर्दी की धूप में,
हम उस छत पर आम सुखाते थे।
खपर के ऊपर पाँव रखकर,
आसमान से बातें करते थे।
घर छोटा था, पर दिल बड़ा,
हर कोना था किसी याद से भरा।
रसोई में माँ की खुशबू थी,
और आँगन में पिता की परछाईं।
चूल्हे की आँच पर पकती थी
मिट्टी की हाँडी में दाल,
और छत के ऊपर बैठकर
सपनों का बनता था भाल।
अब तो सीमेंट के घर हैं ऊँचे,
पर वो सुकून नहीं मिलता वहाँ,
जो खपर के घर में,
टूटती छत के नीचे मिला था यहाँ।
खपर का घर अब शायद ढह चुका है,
पर उसकी ईंटों में बचपन मेरी साँस लेता है।
हर झरती टाइल के साथ आज भी
कुछ यादें बरसती रहती हैं चुपचाप।
7. टोप्पो (एक चिड़िया है)
पुरखे गोत्र उत्पत्ति की कई कहानियाँ सुनाते हैं—
हे बहन!
तुम क्यों मेरी बात नहीं सुनती?
मैं तुम्हारी ही
छाँव में जन्मा हूँ —
बरगद की सबसे ऊँची डाल से
जहाँ तुम
घोंसला बनाकर
पहली बार गाई थीं —
जब
सूखे जंगल में
धूप कांप रही थी
और
नदी कहीं नहीं थी —
तब
एक चिड़िया
आसमान में चक्कर काटती रही
तीन दिन, तीन रात —
चौथे दिन
जहाँ उसकी छाया गिरी
वहीं
ज़मीन गीली हुई,
एक स्रोत फूटा।
जिसने
उस जल से पहला घूंट पिया —
उसका नाम पड़ा: टोप्पो।
फिर
जिस पेड़ पर वह बैठती थी,
उसे कोई नहीं काटता
जिस धुन में वह गाती,
उसे हर जनजाति
संरक्षण कहती।
उस दिन से
मनुष्य और चिड़िया
एक कुल के हुए।
8. मेहमानी
गाँव के उस छोटे से घर में,
जब कोई मेहमान आता था,
तो घर नहीं,
मानो पूरा दिल सज जाता था।
आँगन में दौड़ते बच्चे,
माँ की हँसी में मिठास,
पिताजी की पगड़ी सीधी होती,
और चूल्हा जलता हर साँस।
थाली में परोसते थे
सिर्फ़ खाना नहीं,
बल्कि अपनापन,
जिसमें स्वाद था रिश्ते का,
और गंध थी चूल्हे की माँ की थकन का।
महमान आते थे खाली हाथ,
मगर छोड़ जाते थे
एक दुआ, एक हँसी,
और अलमारी में रखी जाती थी
उनकी याद —
गुदड़ी के साथ।
छोटा घर था,
पर दिल बड़ा।
एक रोटी कम हो जाती,
पर हँसी कभी कम नहीं होती।
आज शहर में
डायनिंग टेबल है,
AC की ठंडी हवा है,
पर वो मिट्टी वाली पंगत नहीं,
वो पत्तल में परोसी आत्मीयता नहीं।
मेहमानी अब होटल में होती है,
रसीद के साथ।
पर गाँव में,
वो सिर पर बोझ नहीं,
दिल पर ख़ुशबू होती थी।
9. मेहमान की विदाई
चार दिन कैसे बीत गए,
पता ही नहीं चला।
जिस आँगन में हँसी गूँजती रही,
आज वहाँ एक ख़ामोशी पसरा चला।
भोर की बेला,
अलसायी-सी हवा,
और दरवाज़े पर खड़ा
वो बाँधता है अपना बस्ता।
माँ चुपचाप रुमाल में
पराठे बाँध रही है,
और आँखें चुपचाप
भीतर कुछ ढूँढ रही हैं।
पिताजी ने सिर पर हाथ रखा,
बोले — “फिर जल्दी आना बेटा…”
पर आवाज़ थोड़ी भारी थी,
जैसे शब्दों में कुछ और छिपा था।
बच्चे अब उतने चहकते नहीं,
बस दूर से हाथ हिलाते हैं।
दादी की आँखें भर आईं,
और चुपके से एक सिक्का थमाया —
“रख ले, सौभाग्य बढ़ेगा।”
छोटा-सा घर
फिर से थोड़ा और खाली लगने लगा।
वो खपरैल की छाँव,
आज कुछ और उदास झुकने लगी।
साइकिल की घंटी बजती है,
और धूल उड़ती है पीछे।
पर उस धूल के साथ
बहुत कुछ छूट जाता है —
स्मृति, अपनापन,
और मेहमान का हँसता चेहरा।
10. मेहनत का फल
सुबह की पहली किरण से पहले
जो जागता है,
खेत में हल नहीं,
ज़िंदगी को जोतता है।
पसीने की बूँदें
जब माथे से गिरती हैं,
तब किस्मत की ज़मीन
चुपचाप सींची जाती है।
हर ठोकर, हर हार,
एक नई राह दिखाती है,
सिर्फ़ मंज़िल का नाम नहीं होता मेहनत में,
रास्ता भी खुद बनता है।
कभी खेतों में,
कभी किताबों के पन्नों में,
कभी किसी मशीन के शोर में —
जो दिन-रात अपना सपना पालता है,
वो एक दिन समय से पहले
सूरज बनकर निकलता है।
लोग कहेंगे —
“किस्मत थी इसकी”,
पर किसे दिखती है वो रातें,
जब चूल्हा ठंडा था
पर आँखों में आग जल रही थी।
मेहनत का फल देर से मिलता है,
पर जब मिलता है,
तो सिर ऊँचा और दिल भर आता है।
क्योंकि वो फल सिर्फ़ सफलता नहीं,
वो हर आँसू का उत्तर होता है।
12. सोना गांगपुर
किस्सों में सुना था एक नाम,
“गांगपुर” — जो था कभी स्वाभिमान।
नदी, जंगल, पहाड़ और खेत,
इस धरती की थी अपनी ही रीत।
राजाओं की छाया,
और जनजातीय गाथाएँ,
हर पत्थर पर लिखी थी
किसी वीर की कथाएँ।
गूँजते थे नगाड़े जब पर्व होता था,
हर त्यौहार में
जैसे प्रकृति खुद नाचती थी।
ये वो भूमि थी जहाँ
न कोई छोटा, न कोई बड़ा,
हर दिल में बसता था
अपनापन बड़ा।
अब वो गांगपुर सुंदरगढ़ बन गया है,
नाम बदला है, पर आत्मा वही है।
अब भी सरई फूल यहाँ खिलते हैं,
अब भी ढोल-नगाड़े बाजते हैं।
स्कूल के बच्चे, खेतों के जवान,
और जंगल की राह में
चलते हैं सपनों के इंसान।
सोना गांगपुर अब भी सोना है,
वो मिट्टी अब भी गंध देती है,
जिसने जन्म दिया था संघर्ष को,
और सींचा था अपनी संस्कृति को।
गांगपुर कोई भूगोल नहीं,
वो तो आत्मा है इस अंचल की।
नाम चाहे बदल जाए,
गौरव नहीं बदलता।
14. सरहुल परब
बसंती हवा जब बौर लेकर आती है,
साल के फूल जब झूमते हैं शाखों पर,
तब गूँजता है गाँव में —
“सरहुल आया रे!”
धरती माँ के चरणों में
फिर से आस्था का दीप जलाया रे।
सरना थान के चारों ओर
गोते लगाता है विश्वास,
पुजारी उठाता है जल,
और माँ धरती को करता है प्रणाम।
पत्तों से सजी टोपी,
साल फूलों का हार,
नाचते हैं जवान,
गाते हैं प्रकृति का प्यार।
ढोल की थाप पर
जब झूमती है धरती,
तो लगता है जैसे —
ईश्वर खुद उतर आया हो सरना की छाँव में।
सरहुल कोई त्योहार नहीं,
वो एक ऋतु का स्वागत है,
एक जीवन-दर्शन है
जो सिखाता है —
प्रकृति के साथ जीना,
उसे माँ की तरह पूजना।
माँड़-चावल की खुशबू,
महुआ की मिठास,
और हँसी के उस पार
हर चेहरा होता है एक विश्वास।
सरहुल में न सिर्फ़ फूल चढ़ते हैं,
बल्कि रिश्ते, संस्कृति और यादें भी ताज़ा होती हैं।
यह पर्व नहीं, पहचान है —
हमारी जड़ों की, हमारी साँसों की।
15. मेरा गाँव — गोइलो
कच्ची ज़मीन, गीली माटी,
जहाँ हर सुबह गूंजती थी मेरी माँ की बाती।
वहीं से चला था मैं नंगे पाँव,
वहीं बसा है मेरा सपना — मेरा गाँव।
गोइलो मेरा पहला आसमान था,
जहाँ हर पेड़ मेरा भगवान था।
टोला लामजीरा, मेरी धड़कन है,
हर पत्थर, हर मोड़, मेरी पहचान है।
लांजी की गलियाँ, पूर्णापानी की बूँदें,
लालकादीपा की छाँव, बचपन की यादें।
हर कोना गुनगुनाता है बीते लम्हों को,
जैसे मिट्टी ने अपने सीने से लगाया हो।
कभी इस धरती पर सिर्फ़ काँच की तरह कीचड़ था,
ना सड़कें, ना बिजली, ना कोई चमकता सपना था।
लेकिन मैंने देखा…
कैसे धीरे-धीरे उम्मीदें उगने लगीं,
टायरों की जगह ट्रैक्टर चलने लगे,
अंधेरे में पहली बार बल्ब जलने लगे।
मैंने देखा वो पहला खंभा गड़ते हुए,
हां, मैंने देखा वो पहला खंभा गड़ते हुए,
जिसने गाँव को रोशनी दी,
मैंने देखा वो पहली मोबाइल टावर,
जिसने हमें इस दुनिया से जोड़ा।
मैंने देखा अपना गाँव बनते हुए —
कच्चे सपनों से पक्की सड़कों तक,
माटी से मेहंदी तक,
ख़्वाबों से हक़ीक़त तक।
मैं रोशन टोप्पो हूँ —
लेकिन सच कहूँ, जो रोशनी है,
वो तो मेरी मिट्टी से आई है।
मैंने नहीं, मेरे गाँव ने मुझे बनाया है।
इस गोइलो की गोद में खेला, गिरा, सँभला,
इस गोइलो की गोद में खेला, गिरा, सँभला,
जो सिखाया, वो किसी स्कूल में नहीं मिला।
यह गाँव सिर्फ़ जगह नहीं,
ये मेरी आत्मा है — मेरा पहला घर, मेरा पहला प्रेम।
यह गाँव सिर्फ़ जगह नहीं,
ये मेरी आत्मा है — मेरा पहला घर, मेरा पहला प्रेम।
कवि रोशन टोप्पो राउरकेला (सुंदरगढ़), ओडिशा से हैं। कविताएँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। भाषा: हिंदी, सदरी, कूँड़ूख (सादे, संवेदनशील एवं लोक भाव से जुड़ी शैली)
विशेष रुचि: आदिवासी परंपराओं, लोक-संस्कृति, युवा चेतना और प्रकृति पर लेखन।
सम्पर्क: 7008231900
टिप्पणीकार संध्या नवोदिता
कवि, लेखक, पत्रकार, अनुवादक
इलाहाबाद / दिल्ली

