रौशन कुमार
रत्नेश की कविताएँ मानव जीवन में होने वाली उथल-पुथल समेत समकालीन वक्त की समस्याओं एवं चुनौतियों को ज़रूरी ढंग से रेखांकित करतीं हैं। उनकी कविताओं में एक निडरता और सच्चाई है जो सत्ता को आईना दिखाने का काम भी करतीं हैं।
इनकी कविताएँ जनजीवन में व्याप्त निराशाओं को व्यक्त करने के साथ-साथ आशा के दीप जलाने का काम भी करतीं हैं। सदियों से व्याप्त सामाजिक कुरीतियों पर इनका काव्यात्मक प्रहार प्रशंसनीय है।
इनकी कविता ‘बाहरी लोग’ एक सफल काव्यात्मक प्रयास है बाहरी और आंतरिक के बीच व्याप्त तनाव को प्रदर्शित करने का। इस कविता में प्रवासियों और शरणार्थियों के जीवन का मार्मिक चित्रण भी है। वहीं कविता ‘कबाड़ीवाला’ सत्ता के खोखले प्रयासों और वायदों का व्यंग्यात्मक तरीके से पोल खोलने का काम करती है।
‘तुम्हारे लिए मैं बस दुआ कर सकता हूँ’ इस कविता से कवि ने बताने की कोशिश की है कि अगर हमारे परिवार, समाज और देश का माहौल ज़हरीला होगा तो हम अपनी भावी-पीढ़ी से अमृत वर्षा की कल्पना नहीं कर सकते हैं। ‘हम एक ऐसे मुल्क़ में रहते हैं’, कविता में कवि ने लोगों और सत्ता के यथार्थ चरित्र का चित्रण किया है।
‘हत्या कोई विकल्प नहीं है’ कविता से कवि अन्यायपूर्ण व्यवस्था का पोल खोलते हुए नज़र आते हैं उनकी इस कविता को पढ़ते वक्त कई बार आप भावुक हो जाते हैं। ‘जरूरी काम’ कविता से कवि ने हमें असामाजिक और मानव विरोधी तत्वों से दूर रहने की सलाह दी है।
‘सवाल’ कविता से कवि आशावादी होने के साथ-साथ मानव जीवन की सीमाओं का बखान भी करते हैं। ‘तुम शिक्षक नहीं हत्यारे थे’, ये महज़ कविता नहीं दलित छात्रों के साथ होने वाली निरंतर अपमान, उपहास, और शोषण का यथार्थ चित्रण है। जिस गुरु का कर्तव्य ज्ञान देने का हो वही अगर शोषण और अपमान की वज़ह बन जाए तो मन दुःखी हो जाता है और बदलाव के लिए आतुर हो उठता है।
सामाजिक सरोकारों समेत मानव मूल्यों का यथार्थ चित्रण करने वाले निडर और प्रतिभावान कवि रत्नेश को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
रत्नेश कुमार की कविताएँ
1.बाहरी लोग
चींटियाँ भूले से भी
सवार हो जाएँ किसी रेल में तो
अपनी जगह से कितनी दूर चली जाती हैं
कितने भूगोल,कितने समय,कितने मौसम
बदल जाते हैं
और फिर एक रोज़
कहीं उतरती हैं
तो देखती हैं एक नयी दुनिया है उनके सामने
एक दुनिया जिसमें
पिछली दुनिया के उठाये बोझ को
रखने की जगह ढूंढनी होती है पहले
फिर पिछली दुनिया के सामान से
नयी दुनिया के काम करने पड़ते हैं
याद की मिट्टी में बने घर की महक लिए
एक ऐसे घर में दाखिल होना पड़ता है
जहां पहले आत्मा बेदखल होती है
और फिर याद
फिर भी चींटियाँ हैं कि
नयी दुनिया को अपनी दुनिया बना लेती हैं
और अपनी दुनिया को सुन्दर
कितना ताज्जुब है न
एक दुनिया छोड़कर आये लोग
दूसरी दुनिया को प्यार करने लगते हैं
जबकि कुछ लोग अपनी दुनिया में ज़हर बोते हैं
और ऐसे लोगों को बाहरी कहते हैं
2.कबाड़ीवाला
यहां इस जगह
जहां मैं रहता हूं
एक बांसुरी की धुन सुनाई पड़ती है
बहुत ही मीठी
और जिंदगी में लिपटी हुई
जैसे एक बांसुरी की धुन को होना चाहिए
किसी भी सीमा से परे
कोई भी काम करते हुए
आप अचानक इसे सुन सकते हैं
एक फेरीवाला
बजाता फिरता है इसे
यहां की गलियों में
कई बार इसे सुनते हुए आप
किसी फिल्मी दृश्य की
याद करने लगते हैं
शायद काबुलीवाला
या राज कपूर की कोई फिल्म
एक आश्चर्य की तरह है यह
सुनने पर जिज्ञासा जागती है
कौतूहल में आप एक बच्चे की तरह
आवाज़ का पीछा करने लगते हैं
बेहतर संगीत की ख़ासियत है
वो सुनने वाले को समेटता जाता है
पर बांधता नहीं है
इसी तरह एक कबाड़ीवाला भी
गलियों में घूमता हुआ
अपनी टेर लगाता फिरता है
उसके पास इसका
एक रिकॉर्डेड वर्जन है
जिसे बार बार रिपीट मोड पे
बजाता रहता है
ऐसा आजकल देश के
ज्यादातर हिस्सों में आम हो गया है
उसकी एक ही ख़ासियत है
वो हर घड़ी बेचने की बात करता है
इतनी मजबूती और मुस्तैदी के साथ
वो कबाड़ बेचने की बात कहता है
कि आप उसे एक बेहतर खरीदार समझने लगते हैं
और अपने पास रखी हर एक चीज को
कबाड़ की नज़र से देखते हैं
अपने बेडरूम, ड्राइंग रूम,बालकनी,किचन,स्टोर
हर जगह आपको अथाह कबाड़ दिखता है
इधर कुछ एक सालों में
ऐसा बहुत ज्यादा दिखने लगा है
जैसे ये सरकार की कोई बेहतर योजना हो
मिनीमिलिस्ट होने का सबसे बड़ा पैरोकार
सरकार ही नज़र आती है
और ये योजना
सरकार की सबसे ज्यादा सफल और कारगर योजना
बहुत साल पहले
बहुत ही ज्यादा साल पहले
जिसको ये रोजगार का तरीका सुझा होगा
वो कोई बहुत ही रचनात्मक व्यक्ति रहा होगा
वरना बेकार सामान इक्कठा करना
कहीं से समझदारी का काम तो नहीं है
लेकिन आज इस योजना को
एक व्यक्ति लालकिले से अनाउंस करे
तो हो सकता है आप
अपने घर के किसी आईने के सामने जाएं
और खुद को शीशे में गौर से देखने लगें
ठीक वैसे ही
जैसे आप उस बांसुरी की आवाज का पीछा करते हुए
एक दिन बांसुरीवाले से मिलते हैं
एक बांसुरी खरीदते है
कुछ रोज़ साधने की कोशिश करते हैं
फिर अपने गढ़े बहानों का हवाला देते हुए
किसी कोने में फेंक देते हैं
और फिर किसी रोज़ आपको सुनाई देती है
एक आवाज़
“रद्दी,कागज,बैटरी,इनवर्टर,कूलर,पुराना सामन बेचो
रद्दी कबाड़ी वाले”
3.तुम्हारे लिए मैं बस दुआ कर सकता हूँ
बच्चे
फूल नहीं उगाएंगे
अगर परवरिश में
बारूद पाएंगे
लाशों की
महक सूंघने वाले बच्चे
लाशों की
महक को तरसेंगे
नफ़रत की धूल में
सने बच्चे
दुश्मनों के सिर से
फुटबाल खेलेंगे
रगों में ज़हर भरे बच्चे
मांओं के पेट फाड़
निकलेंगे
बिच्छुओं की तरह
बहुत मुश्किल है
ये भूल से भी कह पाना
कि बच्चे जो सीखेंगे
उससे अलग
कुछ और करेंगे
तुम जो चाहते हो
तुम्हारे बच्चे
हाथों में तलवार थामे
अमन के गीत गाएं
तुम पर सच में
दया आती है
तुम्हारे लिए
मैं बस
दुआ कर सकता हूँ
4.हम एक ऐसे मुल्क़ में रहते हैं
हम एक ऐसे मुल्क़ में हैं
जहां हर एक शख़्स
अपनी मौलिकता से वाकिफ़ है
और हर घड़ी थूक रहा है
मैंने देखा है अक्सर
राहगीरों को सड़क पे थूकते
पान की पिचकारियों से
पूरा शहर रंगते
और ये लिखते हुए
कि थूकना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
मैंने अक्सर देखा है
औलाद की करतूत के बाबत
दुनिया को बाप के नाम पर थूकते
और बाप को औलाद पर थुथकारते
प्रेम में धोखा खाये प्रेमी को
अपने माशूक के चेहरे पर
थूकते हुए तेज़ाब
हमारे मुल्क़ में थूकना किसी समाजसेवा से कम नहीं
उम्र भर धूप संग पसीना गारते
मजदूर-किसान
और सीने पर गोलियों की चादर ओढ़े
जवान पर
बहुत दुःख और अफसोस के साथ
थूका जाता है सरकारी मुआवज़ा
अक्सर दिखाई देता है
अपने वक़्त की सारी किताबें
दीमक के तरह,चाट गए प्रोफेसर
गुमराह करते हुए विद्यार्थियों को
थूकते हैं ज्ञान
‘वक़्त की दौड़ में मुश्किलों से लड़ने का एक तरीका है=
अमरीका भाग जाओ
या हो जाओ
यूरोपियन यूनियन का सदस्य
वैश्वीकरण के दौर में देश का कोई अस्तित्व नहीं
और संस्कृतियों का तो लोप हो चुका है’
दीवारें तोड़कर बाहर आती लड़कियों के ख़ौफ से
बौखलाये मर्द
थूक रहे हैं कुंठाएं
हम अक्सर देखते हैं
कि धर्म का धतूरा खाए
बदन पे मिर्जई ओढ़े
या कन्धे पे रामनामी डालने वाले
आसमां में रहने वाले
या जमीन पर बिचरने वाले
बहरूपिये के नाम पर
एक ऐलान करते हैं
और आस्था खून थूकने लगती है
थूकना भी जैसे कोई विज्ञान या कला है
मैंने देखा है अक्सर
कि कैसे नदी थूक देती है अचानक बहुत सारा पानी
कैसे धरती थूकने लगती है लावा
कैसे तेल के कुएँ
थूक देते है बेवजह
‘मुनाफे का हजारों लीटर तेल’
कैसे उत्तरोत्तर बढ़ती जी.डी.पी. में
उत्पादों की कमी
मंहगाई थूकने लगती है
कैसे लूट की आग नहीं पचा सका नेता
थूक देता है दर्जनों घोटाले
कैसे सत्ता परिवर्तन के दौर में
सरकारें थूकती हैं वायदे
ठीक वैसे ही
जिंदा रहने के लिए इस मुल्क़ में
हमें सीखना है थूकना
क्योंकि थूकना वाकई हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
5.हत्या कोई विकल्प नहीं है
हत्या कोई विकल्प नहीं है
मगर मेरे दोस्त!
मुझे कई बार लगता है कि इस व्यवस्था के सीने में
मैं अपने पुरखों का वही फावड़ा उतार दूँ
जिससे मैंने अपनी उम्रों के छिलके उतारे हैं
और इस कवायद में
मेरी जिंदगी कुफ़्र हो गयी है
वो व्यवस्था
जिसे बर्दाश्त कर पाना
मेरे पुरखों की सबसे बड़ी मुश्किल रही
घूर पर पले और पल कर मजूर हो गए
रोटियाँ हलक से उतरीं
तो खून में सनी हुई
उम्र तो कभी पूरी जियी ही नहीं
और मौत
मौत
इसी व्यवस्था का
अनचाहा उपहार रही
उस व्यवस्था में मज़लूम होकर जीना
और जिंदा रह जाना
एक ही विकल्प बचा रहा मेरे पुरखों के पास
जिंदा रहने की ललक से भरे मेरे पुरखे
जीते रहे और भागते रहे
खेत से खेत,गाँव से गाँव,शहर से शहर
मेरे पुरखे खाली हाथ नहीं भागे
कोरी उम्मीद लेकर भागे
भागे कि भागकर बचा लेंगे
एक अदद मुट्ठी भर सांस
जिसमें चैन से उतरेगी
रोटी हलक के नीचे
नींद आँखों में
और सुकून सीने में
मगर इस मुल्क़ में बेहयाई
हरामखोरी का चोला ओढ़कर
गाँव से गाँव और शहर से शहर भागती है
वो मांस के लोथल और रोटी के टुकड़े को
लूटना ही नहीं चाहती
उसके चीथड़े भी कर देना चाहती है
और सबसे बड़ी बात है
कि वो इसमें कामयाब हो जाती है
इस मुल्क़ में ये कामयाबी सीधी-सपाट नहीं होती
सिक्कों की खनखनाहट में
सबसे ज्यादा उफान मारती हैं जाति की बांछें
गरीबी और लाचारी अर्थव्यवस्था की गड़बड़ी से नहीं उपजतीं
वो उपजतीं हैं जाति और भेद के ज़हर से
जहां गोरों की जांघ में तेल लगाते हैं काले
और जाति के वीर्य से उपजती है घृणा
भेद की परतें महज एक जिस्म में सांस नहीं लेतीं
वो अक्सर जिस्म और कपड़े बदलती रहती हैं
विभेद की सबसे बड़ी ख़ासियत है
वो उदारता का चोला पहन के राज करती है
वो सिपाही को शहीद कहती है
अफसर को वफादार,अर्दली को कर्मठ
मजूर को योद्धा और मज़लूम को भाई
वो व्यवस्था का ऐसा जाल बुनती है
जिसमें फंसकर जीना उम्रें सीख जाती हैं
मगर जब जाति और रुपयों की मिलीभगत में
जिंदगी महामारी हो जाती है
तो जीना पहाड़ हो जाता है
जहां सैनिक गोलियां खाते हैं
मजूर फ़ाक़े
और मज़लूम लाठियां
इस मुल्क में सबकुछ ऐसे ही चलता है
सदियाँ इतिहास बन जाती हैं
और इतिहास माथे का तिलक
जिसपर इस दोगले इतिहास से उकताया इंसान
मन भर थूक देना चाहता है
पर उससे भी नहीं मिटती ये कालिख
इस व्यवस्था से शरीफ बनकर लड़ो तो क़त्ल करती है
गरीब बनकर लड़ो तो रोटियाँ नहीं देती
अमीर बनकर लड़ो तो साथ नहीं बिठाती
और वकील बनकर लड़ो तो दलील सुनती तक नहीं
मैं इसके कानों में ठूंस देना चाहता हूँ अपनी आवाज़
मैं इसके अंतड़ियों तक पहुँचाना चाहता हूँ अपनी चीख
मैं इसके नसों में धकेल देना चाहता हूं अपने सदियों के दर्द
मैं अपने खलिहानों पे चाहता हूं अपना हक़
मैं अपनी मिट्टी पे चाहता हूं अपना हक़
मैं अपने पुरखों के जांगर का हिसाब चाहता हूं
मैं इससे नहीं चाहता अपनी निज़ामत
मैं इससे निजात चाहता हूं
मैं इसे ख़त्म कर देना चाहता हूँ
हत्या वाकई कोई विकल्प नहीं है
मगर मेरे दोस्त!
मुझे बारहां यही लगता है कि इस व्यवस्था के सीने में
मैं अपने पुरखों का वही फावड़ा उतार दूँ
जिससे मैंने अपनी उम्रों के छिलके उतारे हैं
और इस कवायद में
मेरी जिंदगी कुफ़्र हो गयी है
6.ये समय किसका है
प्यार करिए और भूलिए
अपने सीने और ज़हन में
बची रह गई
कैफ़ियत को कुरेदिए
और पूछिए बार-बार
खुद से
नींद डराती तो नहीं
सपने सताते हैं क्या
रात के दूसरे पहर
एक शख़्स दहाड़े मारकर रोता है
उसके आंसू पोछने
उसके पास कोई नहीं होता
प्यार का भूखा
अकेला शख़्स
मसीहाई पर थूकता है
आंखों में बच्चों सी ख्वाहिश लिए
देखता है किसी के साथ को
ये समय किसका है
ये एहसास किसका है
कौन है यहां
जो ग़ुबार भर रहा है
तलाश भूल रही है अपना रास्ता
उम्मीद सांस तोड़ रही है
उसका प्यार उसे दे दो
उसका भी प्यार दे दो
जिसकी इजाज़त दरकार हो तुमसे
अपने सीने के बाईं तरफ
वक़्त के सीने के बाईं तरफ
प्यार रहने दो
बहानों को अलविदा कहो
एक शख़्स
तुम्हारे हिस्से में
मोहब्बत के फूल फेंकता है
तो सहेजो उसे
वो फूल
कहीं पड़े सूखते रहते हैं
तुम बुहारते हो उन्हें
अपनी जगह साफ़ करते हो
दुनिया
तुम्हें वाकई बुरा नहीं लगता
7.जरूरी काम
उनसे घृणा मत करिए
उनपर दया कीजिए
जो बार – बार
ध्वजा और हथियार
लहराकर कहते हैं
“धर्म खतरे में है”
उनके जयघोष पर
चुप हो जाइए
किसी दूसरे
धर्म वाले के साथ
इंस्टाग्राम पर
सेल्फी डालिए
चार लाइक ज्यादा लीजिए
(किसी पॉलिटिकल स्टंट की तरह नहीं)
बड़े बड़े नारों में
देश को मत देखिए
छोटे छोटे कदम लीजिए
चांद या मंगल पर चढ़ने से पहले
नेता को ठेंगा दिखाइए
उनको चीखने दीजिए
चीखते हुए मरने दीजिए
जात और धर्म की दौड़ में
कूदने से परहेज कीजिए
आग में जलिये
कि जमीन छेंकिए
(उनके नारों की तरह)
पर याद रखिए
खायेंगे तो रोटी ही
रोटी आसमान में नहीं उगती
रोटी के लिए जमीन चाहिए
और जमीन के लिए
जिसकी दरकार है
जनाब वो चीज़
रोज़गार है
8. दुहाई
दुहाई
बीते समय की दलील है
समय की निराशा
सूरज की तरह सुर्ख़ है
बादल बरसकर
सूख रहे हैं
समंदर जितने हैं
उससे ज्यादा
नज़र आते हैं
धरती अपनी परिधि
सिकोड़ रही है
ये मनुष्यता के विचार का
समय है
ये जीवन के विचार का समय है
दुहाई
प्राचीन बहस है
ऐसे समय में
तुम क्या करोगे
किसको तलब करोगे
किसकी दुहाई दोगे
9. सवाल
बादल टूटते हैं
तो पहाड़ को बचाता हूं
पहाड़ टूटता है
तो नदी की तरफ देखता हूं
नदी टूटती है
तो शहर की तरफ दौड़ता हूं
शहर टूटता है
तो घर की चिंता सताती है
घर टूटता है
तो अपने बारे में सोचने लगता हूं
अब
मैं टूट रहा हूं
10. तुम शिक्षक नहीं हत्यारे थे
तुम्हारे सीने में
प्रकाल भोंक के
चीर डालता
पेंसिल की नोक से
आंखे निकालता तुम्हारी
और दोस्तों के साथ
कंचे खेलता
अपनी मां-बहन के लिए
सुने हर एक गाली का
सूद-समेत
हिसाब लेता तुमसे
उत्तर प्रदेश के किसी चमटोल से
एक कवि नहीं
हत्यारा निकलता
राजस्थान की रेत से जो निकलता
वो तुम्हारी बस्तियों का
तिनका तक नहीं छोड़ता
तुम्हारे मुग़ालते से अलग
तुम्हारी मार खाने वाला
होशियार होकर भी
चमार कहलाने वाला
क्लास का वो बच्चा
असलियत में
इंतक़ाम की आग में
जल रहा था
पर उसने ना ही तुमसे
जवाब मांगा
ना ही पलटवार किया
चुपचाप तुम्हारी गलियां खाईं
और अपनी किताब पढ़ता रहा
इसी और इस जैसी
एक और किताब की बदौलत
वो जो कुछ हो सकता था
हुआ
पर तुमने आख़िरकार क्या किया
एक पांच साल के बच्चे को
स्कूल में पानी की टोंटी छूते देखा
उसके कान उमेटे
उसे पीटा
और उसे पीटकर
मार डाला
कवि रत्नेश कुमार, 07 दिसंबर सन् 1995 को वाराणसी, उत्तरप्रदेश में जन्म। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्रारंभिक, स्नातक और परास्नातक की शिक्षा। वर्तमान में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के समाज कार्य विभाग में ‘Major Women’s Protest Movement of 21st Century in North India and their Impact on Society’ विषय पर शोधरत। हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन।
ई मेल: rajratneshh@gmail.com
सम्पर्क: 7268920526
टिप्पणीकार कवि रौशन कुमार, जन्म: 10/3/2001, अंगार घाट, समस्तीपुर, बिहार. शिक्षा: परास्नातक, राजनीति विज्ञान, जेएनयू
सम्पर्क: ईमेल: raushangope@gmail.com मोबाइल: 7481887348

