अनुराग यादव
कविता भावों का एक संसार निर्मित करने की संभावना स्वयं में समेटे रहती है, उसे आवश्यकता होती है एक सहृदय पाठक की | प्रियंका यादव की कविताएँ इस सम्भावना को अपनी सरल और व्यवस्थित प्रस्तुति के माध्यम से बलवती करती हैं | उनकी कविताओं की रचना प्रक्रिया को देखते हुए ‘सुमित्रानंदन पंत’ जी की निम्न पंक्तियाँ याद आती हैं-
“वियोगी होगा पहला कवि,
आह से उपजा होगा गान।
निकलकर आँखों से चुपचाप,
बही होगी कविता अनजान|”
प्रियंका की कविताएँ प्रेम में स्त्री-मन की उधेड़बुन से रूपाकार ग्रहण करती हैं, वे कहती हैं-
“बहुत सम्भाल कर
रखी हुई चीज़
जरूरत के वक़्त
नहीं मिलती
वैसे ही तुम थे |”
परंतु इनकी विशेषता यह है कि इस उधेड़बुन से प्राप्त परिणामों के प्रति उनमें कोई अपराध बोध न होकर एक स्वीकार का भाव है। यह स्वीकार स्त्री के एक समूचा इंसान होने के भाव का स्वीकार है। कवयित्री स्त्री की इस यात्रा के उस मकाम तक पहुँचने की कामना व्यक्त करती है जहाँ पहुँचकर उसे अपनी यात्रा से अर्जित सफल-असफल अनुभवों के प्रति तृप्ति का अहसास मिल सके।
“प्रेम
यात्रा है
जिसकी मंजिल
मरीचिका की तरह होती है……
इस यात्रा में मैं
एक दिन
मीठे झील के किनारे
पहुंच ही जाऊंगी |”
प्रेम के आदर्श रूप को स्थापित करने के लिए ये कहा जाता है कि प्रेम में समर्पण आवश्यक है और वो समर्पण केवल स्त्री करेगी, परंतु कवयित्री इस धारणा से असहमत है वो कहती है-
“पुरुष प्रेम में समर्पण मांगता है
और स्त्री
पुरुषवादी अहम से मुक्त
एक प्रेमी”
समाज ने प्रेम में पुरुष की एक भूमिका निर्धारित कर रखी है जिससे पुरुष इस मानसिकता से ग्रसित हो जाता है कि एक स्त्री उस पर निर्भर है और उसे ही अपनी प्रेमिका का ध्यान रखना पड़ेगा | वर्तमान समय में हिंदी फ़िल्मों में ‘अल्फा मेल’ की धारणा भी इसी के आसपास की है | कवयित्री इस पुरुषवादी मानसिकता से मुक्त प्रेमी चाहती है |
प्रियंका की कविताएँ जहाँ एक तरफ प्रेम के उधेड़बुन को दर्शाती है वहीं दूसरी तरफ एक ऐसी गृहस्थ स्त्री की छवि प्रस्तुत करती हैं जिसके भीतर इच्छाओं का सागर व्याप्त है परंतु एक कुकर की सीटी उस सागर के सारे उफ़ान को शिथिल कर देती हैं-
“ भावनाओं की दहलीज़ पार कर
विचारों में डूबी स्त्री
सोचती है
उड़ने की
बादलों को पंखों में समेटने की
जल तरंगों को डिब्बियां में भरने की
समंदर उलीचने की
तभी
कुकर की सीटी बजती है
और बादल,डिब्बियां,समंदर सब हाथ से छूट जाते हैं|”
एक स्त्री ही इतनी सटीकता से स्त्री मन की इच्छाओं और उसके भीतर प्रेम को लेकर चल रहे उधेड़बुन को प्रकट करने में सक्षम हो सकती है | जिसकी अभिव्यक्ति के प्रयास से दृष्टि व्यापक बनती है और कविता की विषयवस्तु में विस्तार आता है, जिसका स्पष्ट उदाहरण प्रियंका यादव की कविताएँ हैं, जो व्यक्तिगत अनुभवों से जन्म लेती हैं और स्वयं में समाज में व्याप्त विसंगतियों की अभिव्यक्ति करने की विशेष क्षमता को प्राप्त करती हैं।
राजनीति एवं धर्म जो किसी समाज की दिशा निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं और शायद जिनकी अवधारणा जनता की भलाई के लिए अस्तित्व में लायी गयी थी, अब उनका उपयोग इनके कर्ता-धर्ता व्यक्तिगत लाभ के लिए करने लगे हैं | जिसके दुष्परिणाम जनता को वहन करने पड़ते हैं-
“जनता
तंबाकू की डिबिया है
जिसके एक ओर चूना दूसरी ओर तंबाकू है
सत्ता दोनों को मसलती है
ठोक पीट कर
होंठ के नीचे दबाती है
और थूक देती है|”
अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के क्रम में प्रियंका की भाषा पर पकड़ कहीं कहीं ढीली हो जाती है, जिससे कविता सपाटबयानी प्रतीत होने लगाती है, परंतु बिम्बों और प्रतीकों का उचित प्रयोग इसके प्रभाव को कम करता है | प्रियंका की कविताएँ एक गृहस्थ स्त्री के लिए समाज द्वारा बनाई दीवार में पहले तो एक सुराख़ करती हैं उसके बाद स्वयं की इच्छाओं और अधिकारों के प्रति सजग होकर उस दीवार को तोड़ने का एक सार्थक प्रयास करती हैं। प्रियंका के प्रयास को देखते हुए ‘दुष्यंत कुमार’ की निम्न पंक्तियाँ सार्थक प्रतीत होती हैं –
“कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों”
प्रियंका यादव की कविताएँ
1.दाह संस्कार
मेरे विचार . ….
रेगिस्तान की मरीचिका थे
हर बार यह उम्मीद रही कि
कुछ दूर और चलूं तो
पानी मिल जाएगा
पर
जब मेरे विचार
मेरे जीवित रहने के विरोधी बन गए
तब मैंने उनका दाह संस्कार कर दिया
और उसी आग से
अपनी रोटी सेंकी।
2.औरत
कुछ चीजों को
इस तरह रखा जाता है
जैसे वह फेंकी गई हो और
कुछ चीजों को
इस तरह फेका जाता
जैसे वह रखी गई हो।
3.दहलीज
भावनाओं की दहलीज पार कर
विचारों में डूबी स्त्री
सोचती है
उड़ने की
बादलों को पंखों में समेटने की
जल तरंगों को डिब्बियां में भरने की
समंदर उलीचने की
तभी
कुकर की सीटी बजती है
और बादल, डिब्बियां, समंदर सब हाथ से छूट जाते है।
4.मृत्यभोज
तुमने कभी प्रेम नहीं किया
धान बोती स्त्री के गीत नहीं सुने
गोद में नवजात शिशु की मुस्कान से
तुम्हारा मन पुलकित नहीं हुआ
अगर तुमने किसी एक को भी
एक क्षण रुककर महसूस किया होता
तो
तुम्हारे भीतर इतनी क्रूरता इतनी पशुता नहीं होती कि
तुम अपनों की मृत्यु पर
अपने भव्य भोज का आयोजन करते।
5.जंगल के देवता
यह समय
भव्य मूर्तियों वाली सत्ता का है
जहां निर्माण और विध्वंश के मूल में
मूर्तियां निवास करती हैं।
काश जंगल के रहनवासियों ने
मूर्ति बनाई होती जंगल के देवता की
तो शायद
जंगल बच जाते
चौराहे का
वो पेड़
इसीलिए बचा है कि
उसके नीचे छोटी सी मूर्ति है
जो इतनी शक्तिशाली है कि
शासक को रोक देती है।
6.पेड़
मृत्यु उपरांत
मुझे जमीन में गाड़ देना
कि
उस पेड़ पर
मेरा कोई अधिकार नहीं
जिसे मैंने लगाया नहीं
और
इस पेड़ को
मैं कटते नहीं देख सकती
जिसे मैंने लगाया है।
6.पेड़ और प्रेम
इस धरती पर
केवल दो ही खतरनाक तत्व है
न्यूक्लियर बम और धार्मिक ग्रंथ
न्यूक्लियर बम दूसरे स्थान पर है।
इनका उपयोग और प्रयोग बढ़ता जा रहा है
जबकि पेड़ और प्रेम
उस बिंदु पर है
जहां गिनती खत्म होती है।
7.रानी मधुमक्खी
राजनीतिक दल
असल में मधुमक्खियों का झुंड है।
यह झुंड
रानी मधुमक्खी के मूड पर चलता है
अगर उसे किसी पर गुस्सा आया
तो सारी मधुमक्खियां
डंक मारना शुरू कर देती है।
8.चूना और तंबाकू
जनता
तंबाकू की डिबिया है
जिसके एक ओर चूना दूसरी ओर तंबाकू है
सत्ता दोनों को मसलती है
ठोक पीट कर
होठ के नीचे दबाती है
और थूक देती है।
9.जरूरत के वक़्त
बहुत संभाल कर
रखी हुई चीज
जरूरत के वक़्त
नहीं मिलती
वैसे ही तुम थे।
10.मीठे झील के किनारे
प्रेम
यात्रा है
जिसकी मंजिल
मरीचिका की तरह होती है
जहां भ्रम के सिवा
कुछ नहीं
फिर भी वहां
पहुंचना चाहते हैं।
वहां पहुंच कर
प्यास नहीं बुझती
पर एक और मरीचिका
दिखाई पड़ती है
उस ओर जाने को फिर लालायित होते है
भ्रम कायम रहता है।
ईश्वर!
मेरे इस भ्रम को
कायम रखना
इस यात्रा में मैं
एक दिन
मीठे झील के किनारे
पहुंच ही जाऊंगी।
11. अंतरिक्ष की घटना
अंतरिक्ष की
विशाल घटनाओं का अध्ययन कर
वैज्ञानिक
रात को जब
प्रेम कविता पढ़ता होगा
तब दोनों में अंतर कैसे बता पाता होगा ?
प्रेम के वृहत्तर और सूक्ष्मतर
अनुभव को
शब्द कहां से देता होगा
तब वह अंत में मान लेता होगा कि
अंतरिक्ष की घटना ज्यादा सरल है।
12. चूड़ी और क्लिप
गर्मी का मौसम
मुझे पसंद नहीं
कूलर और पंखे के शोर से
मैं परेशान हो जाती हूं
किताबों के पन्ने
फड़फड़ फड़फड़ उड़ने लगते हैं
उड़ने से रोकने के लिए
मैं चूड़ियों का
पेपरवेट बना लेती हूं
क्लिप से बालों को नहीं
पन्नों को बांधती हूं।
सचमुच
चूड़ी और क्लिप
जब बदन से उतरकर
किताबों से बंध जाते हैं
सौंदर्यबोध और संघर्षबोध
चुपचाप मुस्कुराते हैं।
13. हमारी किताबें
पुरुष प्रेम में समर्पण मांगता है
और स्त्री
पुरुषवादी अहम से मुक्त
एक प्रेमी।
दरअसल प्रेम पुरुषवाद का विरोधी है
और पुरुषवाद प्रेम का
इसलिए हमारी किताबों में
पुरुष स्त्री का विरोधी है पूरक नहीं।
शायद यही कारण है कि
समर्पित और अहम मुक्त प्रेमी
समाज विद्रोही बन जाते हैं।
कवयित्री प्रियंका यादव, जन्म 20.04.1994, भिलाई। शोधार्थी, हेमचन्द विश्वविद्यालय, दुर्ग। कुछ पोर्टल्स पर कविताएँ प्रकाशित
पता: जिला दुर्ग
भिलाई छत्तीसगढ़ 490026
सम्पर्क: मोबाइल-7389671089
ईमेल- py2919578@gmail.com
टिप्पणीकार अनुराग यादव नवोदित कवि हैं। जन्मतिथि 26 सितंबर 2001. अनुराग, अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हैं। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रामनगर और बाराबंकी से पूर्ण की है। इनका स्नातक हंसराज कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी से वर्ष 2022 में पूर्ण किया तथा 2024 में हिंदू कॉलेज दिल्ली यूनिवर्सिटी से परास्नातक की शिक्षा पूर्ण की है । इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं।
सम्पर्क: 6386080963

