समकालीन जनमत
कविता

पल्लवी की कविताएँ संवेदना की परिपक्व भाव-भूमि पर रची गई हैं।

प्रज्ञा गुप्ता


पल्लवी की कविता स्त्री-स्वातंत्र्य, विद्रोह और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को रूपक और प्रतीकों के माध्यम से बहुत ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविताओं में स्त्री अस्मिता, स्मृति की गहनता और प्रेम की महत्ता दार्शनिकता के साथ अभिव्यक्त है। पल्लवी की कविताएँ स्वीकार और प्रतिरोध की सुंदर अभिव्यक्ति हैं। यह कविताएँ स्त्री की आत्म-सत्ता, संघर्ष, प्रेम और स्वायत्तता की अत्यंत संवेदनशील अभिव्यक्ति हैं। पल्लवी की कविता में स्त्री की भावनाओं एवं चेतना के पन्नों को तलाशने की कोशिश है, इन कविताओं में विज्ञान, दर्शन, अनुभव एवं भावनाएँ एक साथ संगुम्फित हैं। पल्लवी की कविता प्रेम के पुनर्पाठ हैं। वह स्त्री को सामाजिक ढांचे से मुक्त होने का आह्वान करती हैं। पल्लवी अपनी कविता में स्त्रियों पर थोपे गए विचारों, नियंत्रणों और परंपराओं के विरुद्ध उनके प्रतिकार को एक व्यापक सामाजिक बदलाव के रूप में देखती हैं और लिखती हैं –
“किसी दिन हिरण
समर्थ होकर
अपना जंगल बनाएंगे
वहां नहीं होगा प्रवेश
हिंसा के वंशजों का”

पल्लवी की कविताएँ यह उम्मीद देती है कि वह दिन बहुत ही सुंदर होगा जब स्त्री अपनी अस्मिता के साथ एक नया संसार बनायेगी।पल्लवी की कविताएँ संवेदना की परिपक्व भाव- भूमि पर रची गई हैं। कवयित्री के लिए प्रेम क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि प्रेम उसके लिए जीवन को समृद्ध करने वाली शक्ति है। वह चाहती है कि प्रेम निजी ना रहे, बल्कि विरासत के तौर पर अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित हो। ‘प्रेम की वसीयत’ कविता में कवयित्री घोषणा करती है कि

मैं जीवन में प्राप्त
प्रत्येक संभावना में
तुम्हें प्रेम करना चाहती हूँ
तुम अपनी उपस्थिति से
उसे चतुर्गुणित करना
हमारा यह मिलन
बन जाए काव्य
जिसे देख और पढ़ कर
हमारी बेटी
मुग्ध होती रहे
बेटे को लगे
ऐसे ही प्रेम करना चाहिए।

पल्लवी अपनी कविता में आज के समय को लेकर सजग हैं। वह इस बात को बार-बार चित्रित करती हैं कि आधुनिक युग में प्रेम कैसे व्यापार बन गया है। आज प्रेम, बाज़ार और विज्ञापन की वस्तु बनकर अपनी मौलिकता खो रहा है। वह इस बात की ओर इंगित करती हैं कि प्रेम साहित्य, सिनेमा और धर्म में एक लोकप्रिय विषय है और आज के समय में प्रेम को उपभोग में तब्दील किया जा रहा है-
“धर्म बेचना हो किसी पंडे को
या फिर करवाना हो विज्ञापन किसी उत्पाद का
सब कामों में प्रेम का सहारा लिया जाता है”

उनका मानना है कि प्रेम आज के युग में जीवित अनुभव नहीं बल्कि बीता हुआ अतीत बनकर रह गया है। वह कहती है ‘स्मृति बन जाना प्रेम की नियति होती जा रही है’। ‘यथारूप’ शीर्षक कविता में पल्लवी महज प्रेम की नहीं बल्कि उपभोक्तावादी युग की समीक्षा करते नजर आती हैं। प्रेम के माध्यम से वे मानवीय संबंधों, मूल्यों पर भी विमर्श करती हैं। उनका मानना है कि प्रेम को जीवित रखने के लिए हमें उसकी मूल प्रकृति को समझना जरूरी है। प्रेम वह नहीं जो हमें बदलने की कोशिश करें, बल्कि प्रेम वह है जो यथारूप यथावत् स्वीकारे जैसे प्रकृति हमें मूल रूप में स्वीकारती है।

कवयित्री की अवधारणा स्पष्ट है की सभ्यता और संस्कृति शक्ति से नहीं बल्कि करुणा से विकसित होती हैं। वह यह स्पष्ट करती हैं की प्रेम केवल ताप नहीं बल्कि वह शीतलता है जो जीवन को संगीतमय बनाती है। अपने कविता ‘व्याकुल वसुंधरा’ में कवयित्री पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा के माध्यम से प्रेम, शांति, विनम्रता और मानवीय आकांक्षाओं का गहन रूपक रचती हैं और प्रेम की शीतलता को महत्व देती है-
इसीलिए पृथ्वी
कोलाहल से मुक्त
खाली समय पाते ही
चन्द्रमा के पास
चुपचाप चली आती है
शांति,
कोमलता,
शीतलता और
प्रेम की तलाश में |

‘पापा और स्वप्न’ कविता में कवयित्री व्यक्ति के अस्तित्व स्वतंत्रता एवं विकास को अलग तरीके से परिभाषित करती है दुनिया के अधिकांश पिता यह चाहते हैं कि उनकी बेटी अपना अस्तित्व बचाते हुए चले और अपनी उपस्थिति समाज में दर्ज करें। पिता और बेटी के रिश्ते को भावनात्मकता एवं बौद्धिकता के साथ कवयित्री प्रस्तुत करती हैं, जहाँ एक पिता अपनी बेटी को कहते हैं
‘मेरी दुलारी!
तुम भी, जो- जो मना किया जाय
वही वही करना
वही चेतना के बीज हैं।‘

कवयित्री का यह मानना है कि ‘जहाँ नकार नहीं, वहाँ स्वीकृति मुर्दा है’ और ‘गिरना और उठना ही वास्तविक विकास है’ यह पंक्तियाँ कवयित्री के जीवन दर्शन की सहज अभिव्यक्ति हैं।

पल्लवी स्त्री को मात्र पीड़िता नहीं बल्कि निर्माता और स्वामिनी के रूप में पुन:परिभाषित करती हैं। जब वह कहती है –
‘मैं चली जाऊंगी दूर देश
बेची हुई बकरी के साथ
पाले हुए मेमने की तरह’

तो यह पंक्तियाँ स्त्री की सामाजिक स्थिति का दिग्दर्शन कराती हैं, जहाँ लड़की की स्थिति बेहद कारूणिक है जैसे बकरी का बिक जाना बेबसी है साथ ही मेमने का उस बेची हुई बकरी के साथ चला जाना नियति है। इसी तरह की नियति स्त्री के साथ आज भी कायम है। लेकिन कवयित्री का प्रतिरोध स्पष्ट है वह कहती है –‘मैं अकेली नहीं जाऊंगी /जाने से पहले लगाऊंगी सेंध’। सेंध लगाने के माध्यम से वह यह कहना चाहती हैं कि जब कोई स्त्री चली जाती है तो वह अपने साथ स्मृति, भाषा और दृष्टि लेकर जाती है और एक रिक्त स्थान छोड़ जाती है। पल्लवी की कविताएँ स्त्री अनुभवों को गहराई से अभिव्यक्त करती हैं।

पल्लवी की कविताओं में आत्मकथात्मकता है जहाँ वह अपने विचारों को दर्शनिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। उम्मीद है कि पल्लवी अपनी संवेदना की भाव-भूमि पर और सरल एवं सहज होकर कविताएँ रचें।

 

पल्लवी की कविताएँ

1. यथा – रूप

सबको याद हैं, प्रेम कविताएं
प्रेम पर आधारित उपन्यास
संभवतः सबसे ज्यादा पढ़े गए
आज कल फिल्मों में
प्रेम का बड़ा चलन है।
धर्म बेचना हो किसी पंडे को
या फिर करवाना हो
विज्ञापन किसी उत्पाद का
सब कामों में प्रेम का
सहारा लिया जाता है।
बहुत खर्च होता है प्रेम
इस महंगाई में।
इसीलिए सबके दिल रीते हुए हैं
रिश्तों से गायब हो गया
बाजारीकरण होने से।
मुक्ति फिर भी संभव है।
हम भाग सकते हैं
इस बाजार से दूर
कहीं किसी पर्वत या नदी के पास
जहां फल, फूल, पत्ते मिलें
समुद्र खुद दे दे मछलियां
बिना मोल के।
लेकिन हमारी पूरी ताकत
पड़ी बेड़ियों की सुरक्षा में व्यय हो रही है।
तभी कहीं सरगम नहीं
कोई काव्य जीवंत नहीं
सब चित्र यांत्रिक और
सब आशिक स्मृति में खोए हैं।
स्मृति बन जाना प्रेम की
नियति होती जा रही है।
जो प्रकृति को स्वीकार नहीं
उसे यह चक्र
स्वतः बाहर फेंक देता है।
विलुप्त हो गए
जिनकी उपस्थिति यहां
प्रासंगिक नहीं।
जो कुछ अवांछनीय है
टिक ही नहीं सकता यहां।
यदि संशोधन इतना अनिवार्य होता
अब तक लागू हो चुका होता
तुम पर
अनुकूलन का सिद्धांत।
तुम्हें तुम्हारी
खुदरंगी निखार रही है
इसका सीधा मतलब है
प्रकृति ने तुम्हें, सहर्ष स्वीकारा है;
पूरी जीवंतता से।
तुम्हें तलाश करनी चाहिए उसकी
जो तुम्हें स्वीकार करे
प्रकृति की तरह
तुम्हारी संपूर्णता में।
यथावत,
यथारूप;
प्रकृति – स्वरूप।
तुम स्वागत करना उसका
जो तुम्हारे जीवन में
बारिश कर दे प्रेम की
व्यापार, बाजार, प्रचार से परे।

2. दूसरे के भरोसे

मैं चली जाऊंगी, दूर देस
बेंची हुई बकरी के साथ
पाले हुए मेमने की तरह।
तुम मुझे आंसुओं से लिखा
पत्र समझो
जो यथार्थ पहुंचाता है
पढ़ने वाले की अश्रु – मिश्रित आंखों
भाव – कंपित कपोलों से
लार भरे गले तक ।
लेकिन याद रखना
मैं अकेली नहीं जाऊंगी
जाने से पहले लगाऊंगी सेंध
फिर तुम्हारी
आवाज़ से तराशे शब्द
तुम्हारी मौलिक जीवन – दृष्टि
स्मृति में सहेजे,
इसी जीवन में जीती
तुमसे तुमको चुराती जाऊंगी।
जैसे दूसरे के भरोसे
विदा की जाती है, बेटियां।
वैसे ही तुमको भी
मुझे विदा करना पड़ेगा।

3. व्याकुल वसुंधरा

भौतिकी का मत है –
जहाँ से प्रकाश आयेगा
वहीँ से आएगी ऊष्मा;
प्रकाश और ऊष्मा अन्योनाश्रय हैं |
लेकिन मैं सोचती हूँ –
पृथ्वी क्यों बार- बार
मुँह फेर लेती है सूर्य से
आख़िर,
प्रकाश तो उसको भी चाहिए |
संभवतः भौतिकी का यह
पदार्थवादी नियम
चंचल वसुंधरा को
स्वीकार नहीं |
वो चाहती है, प्रेम।
बार – बार आती है
चंद्रमा के पास
शीतलता की तलाश में।
ताकि रुक सकें घासों में
ओस की बूँदें;
सूर्य- श्रापित उल्लू को
दिखे अपना जगत,
गा सकें माँएँ लोरियाँ ।
थके पथिक को भी
विश्राम मिल सके।
ये सब
शीतलता में ही संभव है।
ताप से कहां उठा है संगीत ?
जिन लोगों ने प्रेम को
गर्माहट से परिभाषित किया
वो अवश्य ठन्डे प्रदेश के
निवासी रहे होंगे |
नहीं तो परम स्वतंत्रता देने वाले
रामानंद को
हजारी क्यों कहते आकाश- धर्मा
सूर्य- धर्मा भी कह सकते थे |
दरअसल सूर्य
अपने प्रकाश का मोल लेता है
कभी पसीने,
कभी पैरों में आए
छालों के रूप में
और मोल लेने वाले
नहीं कर सकते प्रेम |
ऊष्मा अंततः
विनाशक होती है
कभी- कभी सूर्य ऊष्मा लिए
भ्रमर्थ मेघावृत होता है |
कबीर और तुलसी
एक साथ सूर्य की गर्मी में नहीं
आकाश की
मुक्त शीतलता में ही हो सकते हैं |
चंद्रमा प्रकाश पाता है, लोक से
उसमें है दंभ नहीं
कोई दुराग्रह छू नहीं गया है
ऐसा ही आदमी होता है
शीतल |
होती है सम्भावना
आकाश – धर्मा होने की |
इसीलिए पृथ्वी
कोलाहल से मुक्त
खाली समय पाते ही
चन्द्रमा के पास
चुपचाप चली आती है
शांति,
कोमलता,
शीतलता और
प्रेम की तलाश में |

4.मेरा पता

मुझसे मिलने के लिए
कभी फ़ोन नहीं करना
मैं जहाँ से गुज़री
वापस लौटी ही नहीं
इसलिए साथी राह नहीं देखना
चिट्ठी- सब बेकार क्योंकि
मेरा ऐसा कोई पता नहीं |
मुझे देखना
सुनना
या मिलना हो
तो किसी संघर्षरत स्त्री के
आत्म- सीकरों में
सहज मिल जाऊँगी
महसूस करती उसके
दोहरे संघर्ष को |
मेरा पता किसी किशोरी के
प्रेम- पत्र लिखते हुए
प्रेमी के प्रति
कोमलतम भाव में है |
पुरुष- प्रेम से बहुत पहले
कर गयी हूँ कूच
क्योंकि दावेदारी पसंद हूँ
अतिक्रमण- वादी नही
इसलिए तुमको
पत्र प्राप्तकर्ता के पास न मिलूंगी |
प्रेमी से हुई प्रेमिका की उम्मीदों में
मैं पालथी मारे बैठी हूँ |
प्रेमी की अरुचि और पति की वितृष्णा से
चोट खायी हर स्त्री के
व्यर्थता- बोध से भरे मन में
मैं उदास मिल जाऊँगी |
व्याकुल मन को जीतकर
इच्छाशक्ति से नव निर्माण के लिए
सब तोड़ती हुई स्त्री के पास मेरा
सार्वकालिक ठिकाना है |
क्योंकि मुझे प्रेम लोक में
रहने की आदत है
प्रेम निर्माण है
सबसे बड़ी क्रान्ति है
हर क्रान्ति, सृजन
ध्वंस से ही करती है |
पहले वो तोड़ता है
सामाजिक – व्यवस्था को
शास्त्रानुमोदन को
अपने निज चयन का
ऐलान किया करता है |
इसलिए दुनिया के ऐलानियों में
मुझे, मेरा आत्म- संगीत मिलता है |
क्योंकि चुनाव ही
जीवन का भाष्य कर
नये अर्थ देता है |

5. प्रेम की वसीयत

शांत उपवन में सुनाई पड़े
कोई मधुर – तान
या किसी लेखक को
बहु- प्रतीक्षित उपन्यास का
छोर मिल जाए।

अथवा मिल जाए
माघ की बूंदों को
गुलाब की महक,
बसंती बयार को
चमेली की संगत।

ठीक उसी तरह मिली
मेरे मन को कल्पना का
मूर्त – रूप बनकर
मेरे हर खालीपन को
भर दिया
किसी ने
नवागत शिशु के आगमन की तरह।

उम्र के प्रवाह से उपजी
परिपक्वता को
बाल – सुलभ मुस्कान ने
चंचल बना दिया।

तुम मुझे सहसा
एक दिन नहीं मिले
तुमसे हुआ
पहला संवाद याद नहीं।

याद है तो इतना कि
मिलते ही लगा
तुमसे ही मिलना था।

कितने ही संवाद हुए
मिलने से पहले
परिचय से पहले।

बात करते हुए लगा
इसीलिए
सीखी गई थी, भाषा।

आँखें और कान
तुमको पाकर
सार्थक हुए ।

आज कल मेरा हृदय
लंगड़ी का खेल खेलता है
कभी स्नेह से भर जाता है
कभी प्रेम से।

कभी मचल उठता है
आलिंगन को
तो कभी
दुलारना चाहता है।

मैं जीवन में प्राप्त
प्रत्येक संभावना में
तुम्हें प्रेम करना चाहती हूं।
तुम अपनी उपस्थिति से
उसे चतुर्गुणित करना।

हमारा यह मिलन
बन जाए काव्य
जिसे देख और पढ़कर
हमारी बेटी
मुग्ध होती रहे।

बेटे को लगे
ऐसे ही प्रेम करना चाहिए।

6.पापा और स्वप्न

तुम आ तो गई हो, सब की तरह
सबकी तरह रोई
किलकारी और हंसी।
बाल खुजाए,
बना बनाया बाल उकस दिया।

बचपन की क्रियाओं की
पुनरावृति
हल्का- पन मानी जाती है।

मैं चाहता हूं,  तुम दोहराती रहो।
दरअसल बचपन का खो जाना
सामाजिक समझौते की पुष्टि है।

मुझे तुम्हारा गिरना भी पसंद है
क्योंकि, आलंबन- हीन शिशु
केवल गिरता नहीं,
फिर से उठता भी है ।

फिर से चलता भी है;
गिरना और उठना ही
वास्तविक विकास है।

मुझे याद है, लोग बच्चों को
कुछ करने से मना नहीं करते
वो जानते हैं,
जो मना किया जाता है
बच्चे वही – वही करते हैं।

मेरी दुलारी!
तुम भी, जो- जो मना किया जाए
वही वही करना।
वहीं चेतना के बीज हैं।

तुमको कसने का प्रयास होगा
लोग तुमसे, तुमको छीनकर
तराशने का लोभ देंगे
तुम नहीं मानना।

वो तुमको धीरे से अनगढ़ कहेंगे
तुम मुस्कुरा देना।

तुम को कुछ स्वीकार से पहले
अस्वीकार करना चाहिए
क्योंकि जहां नकार नहीं
वहां स्वीकृति
मुर्दा है।

तुम्हारा होना
तुम्हारे बचपन में निहित है
इसलिए तुमको मैं
हमेशा नव- जात देखना
चाहता हूं।

वही कपोल जो छूने से मलीन
अनैच्छिक स्पर्श से
क्रोध प्रकट करने का तेवर।

अपनी जिद में डटने वाली
उत्सुकता और उत्साह से
सब जानने की चाह
और असंतोष
से भरी हुई चेतना।

जबरन किसी के पकड़ने में
कठोर- प्रतिकार की शक्ति

यही सब मेरे पास
तुमको देने के आदर्श हैं।

याद रखना पापा की ये बात
“तुम आ तो गई हो, सब तरह
लेकिन उपस्थिति दर्ज करना ।“

7. संक्रमण

सबको खलती है उसकी
इच्छा – शक्ति।
शेर को भी खलता होगा
हिरन का भागना।
दर’असल हिरण का भागना
शेर के प्रति विद्रोहात्मक हिंसा है।

जिन स्त्रियों को होती है
छटपटाहट और करती हैं
थोपे हुए विचार के
प्रतिकार का साहस
समाज उनको
बद- चलन कहा करता है।

ठीक उसी तरह जैसे
मिलिट्री – कैंप के
बाहर से निकलता
अपने विचारों में
खोया हुआ दार्शनिक
अफसरों को
बद – चलन नज़र आता है।

बद – चलन नहीं होना
परेड में शामिल होना है।

जिनको फूलों में पड़े ओस से
अधिक सुंदर लगता है
हाथों में आया फूल
वो ही बाद में उसका
इत्र बनाते हैं।

और स्वत्त्व के नाम पर
करते रहते हैं
फूलों की हत्या।

किसी दिन हिरण
समर्थ होकर
अपना जंगल बनाएंगे।
वहां नहीं होगा प्रवेश
हिंसा के वंशजों का ।

एक – एक करके ही
समूह बनता है।
एक – एक करके ही
आजादी आती है।
एक – एक करके ही
लोक तंत्र खड़ा होता है।
एक – एक करके ही
संक्रमण होता है।

एक – एक करके ही
आबाद होंगी,
स्त्रियां।

ये संक्रमण बहुत प्यारा होगा।


 

कवयित्री डॉ पल्लवी
शिक्षा – प्रारंभिक शिक्षा, पार्वती बालिका इंटर कॉलेज, दोहरी घाट से प्राप्त करने के बाद वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय से स्नातक तथा हिन्दी साहित्य में परास्नातक के बाद पूर्वांचल विश्वविद्यालय से ही ‘इक्कीसवीं सदी की हिंदी साहित्य महिला कथाकारों के कथा साहित्य में नारीवादी चिंतन का विश्लेषणात्मक अध्ययन’ विषय वस्तु पर शोध कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। कुछ पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित।

सम्पर्क: पता- दोहरीघाट, जिला- मऊ, उत्तर प्रदेश, पिन कोड – 275303
ईमेल – dr.pallavidoharighat@gmail.com

टिप्पणीकार प्रज्ञा गुप्ता का जन्म सिमडेगा जिले के सुदूर गांव ‘केरसई’ में 4 फरवरी 1984 को हुआ। प्रज्ञा गुप्ता की आरंभिक शिक्षा – दीक्षा गांव से ही हुई। उच्च शिक्षा रांची में प्राप्त की । 2000 ई.में इंटर। रांची विमेंस कॉलेज ,रांची से 2003 ई. में हिंदी ‘ प्रतिष्ठा’ में स्नातक। 2005 ई. में रांची विश्वविद्यालय रांची से हिंदी में स्नातकोत्तर की डिग्री। गोल्ड मेडलिस्ट। 2013 ई. में रांची विश्वविद्यालय से पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2008 में रांची विमेंस कॉलेज के हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति ।

संप्रति “ समय ,समाज एवं संस्कृति के संदर्भ में झारखंड का हिंदी कथा- साहित्य” विषय पर लेखन-कार्य।

विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित।
प्रकाशित पुस्तक- “ नागार्जुन के काव्य में प्रेम और प्रकृति”
संप्रति स्नातकोत्तर हिंदी विभाग रांची विमेंस कॉलेज रांची में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत।
पता- स्नातकोत्तर हिंदी विभाग ,रांची विमेंस कॉलेज ,रांची 834001 झारखंड।
मोबाइल नं-8809405914, ईमेल:  prajnagupta2019@gmail.com

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