समकालीन जनमत
कविता

नीरज की कविताएँ समकालीन जटिलताओं की पुख़्ता शिनाख़्त हैं

विजय राही


समकाल को समझे बिना कविता को समझना दुष्कर है। कोई भी कवि समय सापेक्ष परिस्थितियों को उजागर करता हुआ आगे बढ़ता है या यूँ कहें कि उसकी रचना में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसका युग भी दृष्टिगोचर होता है। इस सदी के कवि भी कविता में समाज, देश और मानवता की सामूहिक चिंताओं को व्यक्त कर रहे हैं और इस समय को दर्ज़ कर रहे हैं। सदी की कविताओं ने लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना और समाज की जड़ताओं को तोड़ने की कोशिश की है। अगर विचार किया जाए कि क्या वाकई में दुनिया इतनी मानवीय और संवेदनशील हो चुकी है जो तमाम मध्यकालीन विसगंतियों को पीछे छोड़कर मनुष्य को मनुष्य की तरह और मनुष्य से इतर जीवन को भी जीवन समझा जाए। जिस दुनिया में आधुनिक मूल्यों की बात हो रही है, क्या वे सबके लिए हैं ! इस सदी की कविताओं में उपस्थित विचारोत्तेजना, आक्रोश और असंतोष आदि महत्वपूर्ण तत्व समकालीन यथार्थ को अधिक मर्मस्पर्शी बनाते हैं। समकालीन क्रूरताओं और विसगंतियों को व्यक्त करने‌ के लिए डिटेल्स (ब्यौरे) भी इस कविता का एक टूल्स है।

हम तत्कालीन परिवेश में जिन घटनाओं को देखकर बैचेन होते हैं, उन सब जटिलताओं को कविता के फॉर्म में लिखना आसान नहीं है। लेकिन आज के कवियों ने ऐसी तमाम घटनाओं को भी मनुष्यता की गहरी चिंता के रूप में लिखा है। कवियों की प्रतिबद्धता और पक्ष उनकी कविताओं से स्पष्ट हैं।

युवा कवि नीरज आज के समय के ऐसे ही महत्वपूर्ण और प्रतिबद्ध कवि हैं। वे कोई बीच का रास्ता नहीं तलाशते, न ही रोमानीयत से क्रूरताओं को ढँकते हैं बल्कि कवि होने की जिम्मेदारी को समझते हुए पूरी ईमानदारी और साहस के साथ समकालीन यथार्थ को सम्पूर्ण आवेग के साथ व्यक्त करते हैं।

युवा कवि नीरज की ये कविताएँ समकालीन हिन्दी कविता के परिदृश्य में एक गहरी संवेदनशीलता, सामाजिक चेतना और व्यक्तिगत अनुभवों के मिश्रण को प्रस्तुत करती हैं। नीरज की कविताएँ मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती हैं और शहरी मध्यवर्गीय जीवन, सामाजिक असमानता, अस्तित्व बोध, मृत्यु, बुढ़ापा, स्मृति, प्रेम, हिंसा, राजनीति, पूँजीवाद, बाज़ार जैसे विषयों को गहनता से उकेरती हैं। ‘एक बदहवास पुकार’ में बुढ़ापे की त्रासदी को दर्शाया गया है। यह कविता स्मृतियों का आख्यान है।
“हर वक़्त उसे पुकार की चाह है/जिसमें वो किसी को आवाज देना चाहता है।”

यहाँ व्यक्ति अपने खोए हुए दिनों और मित्रों को याद करता है। यही बुढापे की मातृभाषा है।
“उसकी आँखों में अगली कविता के बोल हैं।”

एक कविता ‘महानगर में हत्या’ शहरी जीवन में धार्मिक-सामाजिक क्रूरताओं की शार्पनेस और सत्ता की विफलताओं को उजागर करती है।
“मुझे उस हत्यारे पे दया आती है/जिसके हाथ में चाकू था उस रात/और जुबान पर किसी डरे हुए ईश्वर का नाम”

यह कविता मध्यमवर्गीय शहरी जीवन संवेदनहीनता को भी चित्रित करती है, जहाँ किसी इंसान की मृत्यु केवल एक घटना बनकर रह जाती है।
“कवि तब मरा / जब उसने जीवन सोचना चाहा।”

‘अकाल में इच्छाएँ’ कविता विश्वव्यापी चिंताओं और इन्सानी जीवन के जद्दोजहद की कविता है।
“सबके अपने निर्माणाधीन नियम है” इस पंक्ति के गहरे संकेत हैं। कवि इसी कविता में आगे कहता है-“हम रोज़मर्रा के उसी अकाल में जी रहे हैं / और रोज़ नई-नई इच्छाएँ जोड़ रहे हैं।”

‘मेरे लिए कौन’ अस्तित्व बोध के साथ अस्तित्व हीनता ओर अजनबीयत के भाव की कविता है। उत्तरों के प्रश्नवाचकों के भावार्थ बढ़ जाना इसी का परिचायक है। ‘तुम्हारी याद के दो स्वप्न’ प्रेम और आशा की कविता है, जो आत्मिक स्तर पर पाठक को जोड़ती है। ‘केमिस्ट’ कविता पूँजी और बाजार व्यवस्था का पोस्टमार्टम करती है, जिसमें एक संवेदनशील आदमी न चाहकर भी इसका हिस्सा बनता चला जाता है और वह सिर्फ मूकदर्शक रह जाता है आख़िर में वह अपराधबोध के सिवा कुछ नहीं कर पाता।
“मेरे हाथ में खून नहीं लगा / मेरी वजह से वह आदमी नहीं मरा / इसके बजाय …

नीरज की कविताएँ व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर संवाद करती हैं। वे न केवल व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में हैं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं और उनकी विसंगतियों पर भी टिप्पणी करती हैं।

नीरज फार्मासिस्ट हैं और उनकी भाषा पर उनके क्षेत्र का प्रभाव हैं लेकिन यह भाषा सहज और प्रतीकात्मक है, जो पाठक को भावनात्मक और बौद्धिक स्तर पर प्रभावित करती है। कवि की प्रत्येक कविता अलग-अलग दृष्टिकोण से जीवनानुभवों को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करती है, फिर भी सब में एक तत्व निरंतर मौजूद है, वह है – उदासी।

नीरज की कविताएँ मुहावरों और प्रतीकों से समृद्ध हैं। वे रोजमर्रा की वस्तुओं और अनुभवों को प्रतीक बनाकर और ब्यौरों का इस्तेमाल कर कविता निर्मित करते हैं। चाकू और महानगर, ये हिंसा और शहरी उदासीनता के प्रतीक के रूप में व्यवस्था की क्रूरता को उजागर करते हैं। इस तरह प्रतीकों के माध्यम से नीरज सामान्य अनुभवों को असामान्य अर्थ प्रदान करते हैं, जो उनकी कविता को बहुस्तरीय बनाता है। हालाँकि, कुछ स्थानों पर भाषा अत्यधिक प्रतीकात्मक और घनी हो जाती है, जो सामान्य पाठक के लिए समझने में जटिल हो सकती है मगर फिर भी‌ यह घनत्व कविता की गहराई को बढ़ाता है।

नीरज की कविताएँ जीवन के कठिन सवालों से जूझने को मजबूर करती हैं और पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती हैं। कुल ज़मा ये कविताएँ समकालीन समाज और व्यवस्था की कठोर सच्चाइयों को सामने लाती हैं, जो कवि की सामाजिक चेतना को भी दर्शाती हैं। इस युवा कवि को बहुत शुभकामनाएँ।

नीरज की कविताएँ

1. एक बदहवास पुकार

कैल्सियम के गोलियों के टूटने की आवाज़ भारी मालूम पड़ती
हड्डियों की चट्ट आवाज़ में करीब पचहत्तर वसंत की आवाज़
महँगे-महँगे  भाषणों से लदा था जीवन
महँगे -महँगे मनों में कोई विंटेज फैंटेसी सॉंस लेती रही,
जिस चॉंद को लिए कविताएँ लिखीं
उससे मुँह फेरकर उसके मुँह पर एक छत बना‌ डाली
एक आख़िरी कविता का इंतज़ार बूढापे का अहसास करवाती रहती
कुछ देर के लिए खिड़की पर उछल कर आया चाँद
कभी प्रेमिका-कभी पत्नी
कभी पुत्र-कभी पुत्री
तो कभी पोते-पोतियों, नाते-नतिनियों की शक्ल धरके चिढ़ाता रहा
तय तजुर्बात की शक्ल-ओ-सूरत उसे आइने से दूर ले गयी
पके बालों के रंग उसने उँगलियों से छुए और जाने

अब उसे डायरी खोने का मलाल इतना होता है
जितना उस डायरी के किस्सों में बसे
उन मित्रों को छोड़ते समय होना चाहिए था
कम समय है,
गोद में पन्ने लिए नहर के पगडंडियों तक चले जाता है
ऊॅंची कूद में हिस्सा लेता है
कबड्डी में चित करता है तो पहलवानी में बारी-बारी सबकी पीठ लगा देता है, डायरियाँ दोहराता है

चींटियों के शव गिनता जाता
आदमी के सिर हुआ
बहसों की सूरत में हर बार जीवन रख देता है, अक्सर हारता है या कभी कोई जान-बूझकर कर जिता जाता है
इस माने कि कहीं जाके गिले-शिकवे ख़त्म तो हों
लेकिन जहाँ आदमी, आदमी के जीने का महत्व नहीं बचा पाए
तो मृत्यु का शोर जोर से होता है
अब उसका सवाल
चींटियों के लिए कौन रोता है?

एक बेवा को सड़क पार करते देखता है, ठहर जाता है
अपना सिर टटोलकर ठिठक जाता है
उसे किसी रंग की खोज होती है
दो पाटों की जाँत अकेले बची तो दिवार के कोने लगा दी गई
कोई गाढ़ा रंग खोया है, यह तो जानती है दिवार
फिर भी उसने, उसे अपने रंगों के लिए अछूत माना
ख़ैर दिवारें..

बोलने पर फफक पडती है ज़बान
पिछली किताब की भूमिकाएँ हिला जाती हैं
अपनी झुर्रियों को खींचता है
किस तरह से यह नहीं पता लगता
किसी रोमांटिक याद को जी रहा है
या किसी अंत के ढलने की अवस्था का
रोज़ रोज़ जायज़ा लेता है (हो सकता है)
बूढ़ापा उसकी आँखों को छोड़ बाकी हर जगह हावी है
ठीक-ठीक नहीं पड़ रहे कदम से बूढ़ापे पर अतिक्रमण की फ़िराक,
यह किस तरह की उद्धम है
यह तो उसी के सिर-माथे
लेकिन आज की शाम उसके फ़िराक में संदिग्धता लौट आयी है
बात करते हुए उसने आँखों को कई बार मला है
फिर भी इस बात का कोई डर नहीं था तबतक
जबतक उसने ये नहीं कहा था कि
बहुत-सी ऐसी चीजें हैं
जिसमें मैं बूढ़ा नहीं होना चाहता था
लेकिन मेरे चाहने से क्या?

उसे सूखे देवदार को देखकर बचपन याद आता है
बचपन से कोई इच्छा बलवती आती रहती है
उसकी लाठी कौन-सी लकड़ी की बनी है
इस पर हर बार ज़मीन से पटककर
ठक-ठक करके कोई ज़वाब देता है
इच्छाएँ जब भी आती हैं उम्रें नहीं देखतीं
वो ज़वान होती हैं, हरी होती हैं
उसकी लाठी, उसका हाथ और देवदार इनसे मिलकर बने दिन के स्वप्न, जिनसे उसे इन दिनों डर लगा रहता है
उसे पुकार की चाह है
जिसमें वो किसी को आवाज़ देना चाहता है
और आवाज़ दिए जाने पर सरपट उस ओर भागने की कामना है बग़ैर लाठी के
मुझे उसके आवाज़ देने में दिलचस्पी है
उसकी ऑंखों में अगली कविता के बोल हैं
जो कहते हैं— उदास जाते हुए आदमी, आओ मेरे पास बैठो
मेरी बोली सुनो, मेरी भाषा समझो, उदासी को बग़ैर तवज्जो के रहने दो
और उसे मरने तलक ऐसे ही छोड़ दो, जियो ख़ूब जियो!

उसे कई भाषाएँ आती थीं
लेकिन इन दिनों उसके पास एक भाषा बची है
वो भाषा उसके सीलन लगे देह से चिपक गयी है
लेकिन मनोबल का खड़ा, एक भरा पूरा अनुभव भी
थामे जाने की अनिवार्यता मांगता है
अब जबकि मैं उसके बगल में हूँ , बैठा हूँ
तो कितनी ही देर चुप रह पाता वो
वो कभी लंबे-लंबे भाषणों में नहीं थका—
“मेरी आत्माएँ
मेरी भाषाएँ
इन सबमें मेरी मातृभाषा कहीं खो गयी है
अम्मा की याद आती है मगर उसकी बोली याद नहीं आती”
इतना कहके थक गया!

राख़ हुए एक अरसा बीत चुका है
हरेक रात
मैं सोचता हूँ कितनी आत्माएँ एक आदमी में हो सकती हैं?
भाषाओं को मैं उंगली पर गिन लेता हूँ
और बढ़ती हैं तो कॉपियों में लिखकर फिर जोड़ लेता
लेकिन आत्माएँ ?
उसे तो चाहिए उतना जीवन
जिससे गिना‌ जा सके
बहुत पन्ने पलटता हूँ इन दिनों , बहुत इंतजार करता हूँ
बहुत देर तक सुनने की कोशिश करता वो अंतहीन ध्वनि, जिसकी तलाश में वो छटपटाहट लिए बीत गया…

2. महानगर मे हत्या

मैंने उसे, उस तरह देखा
जिस तरह से उसे देखे जाने की अनिवार्यता
उसने कब की ख़त्म कर दी थी
उसका वही भेष
ख़ामोश क्रूरताओं ने उसे जो सिखाया वो इतना विकराल था कि किसी कविता में अटा नहीं
कोई जद्दोजहद उसकी ऑंखों में दौड़ती रहती
प्रचलित काँटों के बीच
ना जाने कौन-सी चुभन इतनी सख़्त हो गयी
ख़ैर,

मुझे उस हत्यारे पर दया आती है
जिसके हाथ में चाकू था उस रात
और जुबान पर किसी डरे हुए ईश्वर का नाम
जो ऐसे सैंकड़ों-हजारों अभिव्यक्तियों के ख़ून से रंगा अपनी विफलताओं से मुँह बचाए छिपता फिरता है

इसके दो रात पहले जब वो लौटा था
उसके हाथ कोई कागज़ था,
कलम की खोंस पर नज़र डाली तो लगा
कि हड़बड़ी में रखकर निकल आया था
उसके हाथों में स्याहियों का लिपा पुता कोई महाद्वीप था
जिसको मानो उसने हाल ही में खोजा हो
इतने उदास और मर-मर समय में
उसके पास जो कुछ भी था
शत-प्रतिशत उम्मीद जैसा ही कुछ रहा होगा

कवि विषय का मारा नहीं था
कवि व्यवस्थित मरा,
कवि तब नहीं मरा
जब उसकी कविताओं में मौतें खेल रही थीं
कवि तब मरा
जब उसने जीवन सोचना चाहा

मैंने उसे मरते देखा
और जाना कि चाकुओं की आवाज़ पर कोई जागता नहीं बल्कि और दुबक जाते हैं
किसी बिस्तर में काँटे नहीं लगे
सब क्रांति नाम के झूठे और लिजलिजे वाक्यों में लिप्त बेशर्म थे
सभी को नया सबेरा चाहिए था
सभी घुप्प अँधेरे में मृतात्मा
जिनके कानों में बारूदी रूईयाँ थीं
और आँखों में कुछ बंजर पत्थर के टुकड़े;
चाकू जब उसके सीने में था
उसकी आँखों में कोई छटपटाहट नहीं थी
वो उस आँख को जानता था
चाकू को भी शायद
और मृत्यु को कई-कई बार से सामने से देख चुका था

इतने बड़े महानगर में महा जैसा कोई एक कमरा न था
इतने कारीगरों और कामकाजियों के बीच
किसी ने किसी को बचाने का पेशा चुना ही नहीं
कवि तो केवल कवि था
वो एक पेशेवर क़ातिल
अफ़सोस
कवि अगर होता पेशेवर कवि तो बच जाता शायद!

3. अकाल में इच्छाएँ

जितनी जड़ें काटने को तय की गयी थी भारी मन से
उस ओछेपन को भी सरलता से कैसे पार किया जा सकता है
हम देख रहे हैं…
हमारे देखने में चौकन्नापन नहीं,
विरोध नहीं,
शिकायतें नहीं
और ना ही कोई सोच लौटती है
जिससे किसी और का ना सही तो कम से कम अपना ही कर पाते भला

हल से बॅंधे हुए बैल को पीठ देखने की फुरसत कहाँ ?
उसे डंडे की मार ही दुनियावी बोली लगती है
उसके सिर पर सींग भी हैं— यह बात वो पिछले कई वर्षों से भूला खेतों में जुता पड़ा है
आदमी अपना सबसे गहरा रंग अकाल में छोड़ता है
इस जनन में जो इच्छाएँ पैदा होती हैं
उनमें कोई सुरक्षित कोना‌ नहीं होता
उनमें कुछ और सोचने की, किसी और के लिए सोचने की विडम्बनाएँ नहीं होती
उनकी शक्ति केंद्र उनके इर्द-गिर्द ही होते हैं
जब मरने वालों की खेप बढ़ती जाती है
जीने वालों की सतर्कता अपनी गर्दन सँभालते हुए लगातार बढ़ती है
सतर्कता के कई रूप भी ख़तरनाक हैं
अधिकतर कारीगरी मनुष्यता के लिए उपलब्ध नहीं

एक स्मैकिए ने मुझे बताया था कि
नशा उतर जाने के बाद भूख बहुत ज़ोर की लगती है
और भूख बहुत ज़ोर लगने के बाद
तलब बहुत जोर की लगती है
पहली बार ऐसी तलब लगी थी तो किसी ने दया दिखाके
यह स्मैक मेरे हाथ में पकड़ाया था
उसके बाद भूख के जितने विभाजन हो सकते थे
मैंने नशे में किए
मानो या मानो उसमें लिप्त मैंने कईयों को लूटा
भागा और पकड़ा गया
छोड़ा और पीटा गया
लेकिन ज़िंदा रहा आख़िर और ज़िंदा ही बचना है
यही तो बौद्धिक होता है इस समय में

सबके अपने-अपने निर्माणाधीन नियम हैं
सबके सामने अलग-अलग नियम निषेध हैं—दिखाए जाते हैं
निःसंदेह वो हर बार वैसे नहीं मिलते
जैसा पिछली बार मिले थे
यह समय—लंबा समय
चुटकी भर समय होता गया
इस समय की चिंताओं में
अधिकाधिक सपाट बयानबाज़ी है

हम रोज़मर्रा के उसी अकाल में जी रहे हैं
और रोज़ नयी-नयी इच्छाएँ जोड़ रहे हैं

4. दोस्त तुम्हारी ज़रूरत पड़ेगी

उम्मीद और इंतजार बहुत भारी शब्द है
कुछ घटने की उम्मीद
और उसका इंतज़ार
मेरे लिए तो बहुत बोझिल है
सड़क तो सड़क है
काट लेती है दिन-रात
मैं नहीं हो सकता ऐसा कुछ
इसलिए मुझे तुम्हारे कंधों की ज़रूरत लगेगी

5. मेरे लिए कौन

मेरा सवाल ग़लत नहीं हो सकता है
मैं इसकी वर्तनी की जिम्मेदारी लेता हूँ
मैं अपने दोहराव को रोक नहीं सकता
मैं प्रेमी होने का दोष स्वीकारता हूँ

मुझे जिस बात की सबसे ज़्यादा फ़िक्र थी
उसका रुपांतरण मेरे सिर लग जाएगा
इसका अंदाज़ा था मुझे

मैं इस जीवन-बोध के साथ
ठंडी पड़ती श्वसन क्रियाओं के बल पर जीवित हूँ
ऐसे में अनवरत बेचैनियों के साथ जब कुछ बोलता हूँ
या कोशिश करता हूँ किसी सवाल के बाद ज़वाब के उद्दम की
तब मेरा सामर्थ्य कोलाहलों में बदल जाता है
और मेरे उत्तरों में प्रश्नवाचकों के भावार्थ बढ़ जाते हैं !

6. केमिस्ट

देह का कुछेक हिस्सा
कब एक बिमार संग्रहालय बन गया है
इसकी धक्क-सी याद मुझे तब आई
जब हृदयाघात का मरीज़ दवाओं के खरीददारी के बाद सड़क पर गिरा
और सड़क की गिट्टी डामर और मिट्टी से चिपका रह गया

अगली सुबह उन्हें (दवाओं को) लौटाने एक ग्यारह साल का बच्चा आया
जो कह रहा था अब हमें इनकी ज़रूरत नहीं
लौटा लो !

मेरे हाथ में ख़ून नहीं लगा
मेरी वजह से वह आदमी नहीं मरा,
इसके बजाय
मेरा दिमाग
मेरे हाथ में ख़ून लगे होने की संभावनाओं से उतरता हुआ
इस पर आ टिकता है
कि आख़िर वो आदमी मेरी वजह से बचा भी तो नहीं
इन संवादों में
कुछेकों वाक्य एक ज़ोरदार तमाचे हैं
मुझसे कमतर आदमी का सवाल कहीं ज़्यादा ज़रूरी और बुनियादी हो सकता है
मेरे उत्तरों पर तमाशबीन हुआ जा सकता है
तमाम मौतों से मैं चुपके से निकल सकता हूँ
और तमाम हत्याओं में ठीक ऐसे ही शामिल भी हो सकता हूँ

अटपटी लगने वाली बातें
कई बार जब इन सूरतों में आती हैं
तो ठहर जाती हैं
और इसे भगाने के फ़िराक में
बहुत भागता है आदमी।

7. तुम्हारी याद के दो स्वप्न

एक
(रात के)
कहीं किसी छोर पर
जाने कैसे मैं जमा रहा
उस बर्फ की तरह जिस की नियति में पानी होना था

मुरझाने का डर, आत्मा से निकले छींटों की ओर
जाते रहे कितने किश्तें
कितनी पूँजी!

आँख बंद करूँ तो छत भरभरा के गिर पड़ती है
याद से दबा एक मकान‌ पैर पटकता है
मैं देह के बुझने की कामना भी नहीं कर सकता
उफ्फ!!
मुझे कुछ उम्मीद है

हकीम कहते हैं बुरी आदत है:
दवा नहीं है निर्वात
होने में जीते रहने की

इसके साथ कि
पहेलियों में उत्तरों के बूझे जाने की बेला पर तुम लौटोगे
(उम्मीद पर)
इसीलिए इस समय सबसे सरल बोली है मेरी यातनाएँ
सबसे सही‌ हैं मेरे सवाल

वायदे के मुताबिक मैं कुशल मंगल की खेप ढोता हूँ
तुम्हारे ना होने पर
बेहतरी में जीने का एक अच्छा ढोंग
मुझमें एक सभ्य डर बनाता है

मेरे चीखने-चिल्लाने की जमीं फट गयी है
एक हरा पौधा ही मुझे इस झमेले से दूर रख पाएगा
लौट आओ!!!

दो
(दिन के)

मैंने भीगा आकाश देखा
जिस पर धरती बरस रही है

उँगलियाँ एक गाढ़े रंग में डूबी हुई हैं
एक आधे-अधूरे चित्र की टकटकी मेरी तरफ है
एक रंग‌ पूरा होने के लिए
एक पैर पर खड़ा है

चित्र बढ़ता है
चित्त रमा चला जा रहा है
एक सुंदर याद की पुनरावृत्ति
लगातार हो रही है

चित्रों के ढेरों स्पर्श मेरी
खींचे होंठों में
मची गुदगुदी का
स्वर बन चुके हैं

इस सजग संभावनाओं के बीच
मैं जिसे याद करता हूँ
प्यार करता हूँ
मैं उससे यह कह भी सकता हूँ
इसके लिए खुश हूँ

यह एक सुंदर समय है
जिसके लिए यह जानी जाती है
और यकीनन
वह महबूब खूबसूरत होगा
जिसके वजह से यह समय सुंदर है।

8. शिनाख़्त

ताजा मरे हुए आदमी की देह कम ठंडी होती है
बजाय उसके, जिसकी लाश कई दिन बाद मिली हो

ब्रेकिंग न्यूज पत्रकार की गुमशुदगी का
आज इक्कीसवाँ दिन है और यह इक्कीसवीं शताब्दी है

सच बोलकर जीने का ख़तरा कल भी था
आज भी है (और बढ़ा है)
कल भी लगा रहेगा

देर तक टुकुर-टुकुर निहारता है सिपाही
फटे चेहरे को अपनी लाठी से इधर-उधर हिलाते-डुलाते
एक हाथ से नाक दबाए इंस्पेक्टर को गरियाता है
(मन में )
अभी नहीं पची थी उसकी फेमस कचौरी की प्लेट,
एक भयानक बदबू से परेशान उसके चेहरे से सवाल उठ रहे थे उसी हवा में

कभी अचानक नहीं आती सड़न
धीरे-धीरे नाक में घुसती है और हाजम़ा खराब कर देती है

सिपाही बटुवा तलाशता है बशर्ते मिल जाए कोई कार्ड/पहचान-पत्र
या कोई फोटो या पैसा
बहरहाल,
बटुवे के अंदर पूरा देश हाथ मार रहा है
कुछ हाथ नहीं लग रहा है

सिपाही नाक पकड़े लाश उठवाता है , ले आता है मुर्दाघर
सरकारी मुर्दाघर!
जहाँ अपना मुर्दा निकलवाना भी बहुत गुर्दे का काम है

कोई झोलझाल नहीं है
सुविधा-शुल्क है
भरिए! मोहर लीजिए! जाइए!

नाले का नाम बदलने से नाले की सफाई है
स्वच्छ भारत का इरादा….इरादा..
गुनगुनाइए!

दरोगा के पान के पीक के साथ आदेश आता है
इस नंग-धड़ंग लाश की जाँच की जाए
आस-पास के थानों में खोजा जाए कोई और रपट गुमशुदगी की
शाम तक मुकर्रर की जाए इसकी जगह

ज़्यादातर रपट थाने के दरवाजे के आने के पहले
लात मार के लौटा दी जाती हैं
ऐसे में पत्रकार की गुमशुदगी का कोई जिम्मेदार नहीं
उसकी हत्या का कोई कारण नहीं होगा
सिवाय इसके कि वह जानता रहा होगा छत्ते के रसों पर कौन-सी जीभ का लसराता निशान है
और ना ही कोई रपट होगी

आख़िर में बचता है अख़बारी पोस्टरबाजी
पूरे देश में फलता-फूलता प्रिय गोरख-धंधा
पढ़ी-लिखी जा सकने वाली अफीम जिसमें छापी जाती है इन दिनों
एक चटक मिज़ाज नेता के चमकदार जूतों के बगल में बची जगह
उसी के कोने में
जहाँ आसानी से नज़र भी ना जाए, वहीं प्रेस-विज्ञप्ति होती है—
“गत दो दिन पहले प्रशासन को एक लावारिस लाश मिली है,
जिसके दाएँ हाथ पर यह फलां निशान बना हुआ है , फोटो संलग्न है
जिस किसी का भी परिचित हो कृपया आके शिनाख़्त कर लें
फलां थाना,फलां निवेदक”

जब गाड़ी पर
दरवाजे पर
छतों पर
लटकते या चिपकते हुए निशान से
औकात और बिरादरी का पता आसानी से लग ही जा रहा है
तो हो सकता है शिनाख़्तगी भी जल्द हो जाए
हालाँकि यह दो अलग-अलग दृश्य हैं
पर आजकल देखने के तरीके में
बुनियादी ख़ामी हो चली है तो चलता है….

9. आँखों के सामने

एक नाटकीय विस्थापन
सलीकेदार दिनचर्या का भ्रम
तय नींद और कंबलों-चादरों-तकियों के साथ जीना हो रहा है
इनके बीच
जब-जब पलकें झपकाता हूँ
ऑंखों के भीतर चल रहे किसी एक रंगमंच के पर्दे गिरते हैं
और ठप्प हो जाता है संवाद और संगीत
जीवन के दु:स्वप्न
पैरों के नीचे कुचले चींटियों के शव की तरह
ख़ून की कम मात्रा लिए
पक्के दाग़ के जैसे आत्मा की सफेदी पर छप जाते हैं
अब मैं इस दोष के साथ जिऊँ- मरूँ
या क्रमवार पछताने के लिए हाथ-पैर पटकूँ
इससे क्या बन जाएगा ?
अब जैसे यही ले लो
इसी कविता को
इसे शुरू करते हुए जो मैंने सोचा था
जिसके लिए सोचा था
वह ख़बर, वह बात अब थोड़ी पुरानी हो गयी
और बताया जाय तो कल से आज की स्थिति और बद्तर है;
लोग इससे दो कदम आगे बढ़ चुके हैं
वो तैयार दिखते हैं और बद्तर के लिए
मैं बद्तर
यह कविता भी,
मेरी आँखों के सामने जो बदहवासी फैली हुई है
वो बहुत-सी आँखों से ग़ायब है
ऐसे दृश्यों के सामान्य होने का चलन
डराता है
सभी डरिए, ये ज़रूरी है…

10. हॅंसी

जितने गुणनखण्ड मेरे दुःख में चले आए
मुझे उसके सौवें भाग तक का भी कोई साथी मिल जाता
जो अगले मौसम तक बना रहता मेरे साथ
तो इस पूरी जिंदगी के लिए
मेरी जितनी शिकायतें हैं, दूर हो जातीं
अब ऐसे अकेले हॅंस भी रहा हूँ  तो कितनी देर हॅंस पाऊॅंगा
कितना दुगुना कर पाऊॅंगा?

11. जो मेरी याद में हैं

मुझे मेरी इच्छाओं ने जिस तरह घेरा है
उनसे मैं भय खाता हूँ
अकेली चिड़िया को एक नज़र भर देखने के बाद
अकेलापन-अकेलापन दोहराता हूँ

मैंने पलटकर नहीं देखा
वो जिस डाल पर बैठी है, उस पर और भी जगहें हैं
मैं उस मौजूदगी की संभावनाओं से दूर हूँ

खींची-खिंचाई बहस के बाद आदमी कहता है—
मरने पर झंझट ख़त्म हो जाएंगे
हो सकता है मैं जब मरूँ तो
मेरी सारी इच्छाएँ ख़त्म हो जाएँ

सारी बातें निर्विवाद हो जाएँ
पर एक बात और मुझे खाती है
जो मेरी याद में हैं
जिन्होंने मेरी जगहें बचा कर रखी हैं
जिनकी संभावनाओं का मैं चेहरा हूँ
उनका क्या ?

मरने से पहले
मैं उस एक याद में पलटकर देखना चाहता हूँ

12. डिटैच्ड

जिन
खिड़कियों
दिवारों
दरवाजों
के पीछे आते थे हसीं सपने,
सेंधमारी के बाद
वहॉं नींद के बारे में
सोचना भी
मुहाल हो जाएगा

१३. सही बेला में वापसी

अपने तय पतों के बावजूद सही चौखटों तक
ना पहुँचने का मलाल
धीरे-धीरे उनके शब्दकोश के उन सभी शब्दों को निगल जाएगा
जिन-जिन में थोड़ी उम्मीदें बची हैं

एक बहके साथी का हाथ पकड़, कसकर डाँट-डपटकर लौटाना
इस समय जंग जीतने जैसा काम है

जंगल सूख रहा है
तो उस जंगली फूल का शुक्रगुजार होना ज़रूरी है
जो खिल आया है
जिसका कोई नाम नहीं

चाँद-तारों का
आज की कविता से पलायन के बाद
बची-खुची
खूबसूरत जगहों, चीजों और क्रियाओं को
अगर बचाना है
तो यही सही बेला है वापसी की


कवि नीरज, जन्म – 12 मई 2000
शिक्षा : वर्तमान में डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय से हिंदी से एमए

आजमगढ़, उत्तर प्रदेश, पेशे से फार्मासिस्ट।
कुछ कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल्स पर प्रकाशित

संपर्क: kumneeraj005@gmail.com
मोबाइल: 9119820081

टिप्पणीकार विजय राही, युवा कवि-लेखक
दौसा (राजस्थान)
हिन्दी-उर्दू के साथ-साथ राजस्थानी भाषा में समानांतर लेखन।
प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग्स और वेबसाईट्स पर कविताएँ-ग़ज़लें, आलेख प्रकाशित।

सम्प्रति-
राजकीय महाविद्यालय, कानोता, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी) के पद पर कार्यरत
संपर्क सूत्र- +919929475744
ईमेल – vjbilona532@gmail.com

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