समकालीन जनमत
कविता

नीलाम्बुज सरोज की कविताएँ जन आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हैं

सुमन कुमार सिंह


समकालीन हिंदी कविता का स्वर बहुरंगी है। यह रंग ठीक ‘हिंदी-सा’ है। यह इसलिए भी कि यह देश के हर कोने, हर भाषा, हर पीढी़ की अभिव्यक्ति है। इसलिए स्वर व अनुभूति की व्याप्ति का अंतर भी दिखता है।

नीलांबुज सरोज कम लिखने, कम छपनेवाले एक ऐसे कवि हैं जो समकालीन कवियों की कतार में शामिल हैं। इनकी कविताएँ कोई अलग या विशिष्ट पहचान की लालसा से प्रेरित नहीं दिखतीं। बावजूद इसके समकाल की कड़ियों को मजबूत जरूर करती हैं।

आज जहाँ हिंदी कविता में एक बड़ा हिस्सा मनोग्रंथियों, कुंठाओं व निज आकांक्षाओं के स्वर में रची-बसी-बहकी जा रही है, वहीं देशकाल की चिंताओं व जन आकांक्षाओं को बड़े सहज व मीठे स्वर में नीलांबुज सरोज व्यक्त करने का धैर्य रखते हैं।
नीलांबुज अपनी एक छोटी-सी कविता में जब कहते हैं कि,
“नहीं / मेरे देश में रवायत नहीं है / काँटों के मेलों की / यहाँ सभी स्वर हैं वादी / विवादियों के नहीं हैं हम आदी।” तब दरअसल वे एक ऐसी परम्परा व संस्कृति की ओर उंगली उठा रहे होते हैं जहाँ जीवन-व्यवहार व मूल्यों के बीच काफी विसंगतियाँ हैं।

‘चलो मुगल गार्डेन चलें’ कविता बड़ी सहजता से यह सब व्यक्त करती है। यह कवि अपने समय की चिंताओं व चुनौतियों से टकराती पीढी़ के साथ चलता दिखता है। तभी यहाँ त्रिपुरा में मारे गये नौजवान ‘नीडो’ के लिए वेदना है, तभी अरुणा शानबाग, शर्मिला ईरोम व कवि विद्रोही के संघर्षों की अनुभूतियाँ हैं। यहाँ सीधा आक्रोश मुखर नहीं है, बल्कि व्यंग्य व आलोचना की नुकीली तीक्ष्णता है। इस वजह से कवि का साहस दु:स्साहस बनने से बच जा रहा है।

जब कवि अब्दुल कलाम से संवाद करता है कि, “मनुस्मृति के इस देश में / तुम गीता नहीं बाँचते तो कैसे जीवित रहते / त्रिशूल, गदा, फरसा,बरछी व भालेवाले भगवानों के देश में / मिसाइल बनाकर ही जीवित रहा जा सकता है कलाम! / तुम अगर वोट बैंक के प्रतीक न होते तो / तुम्हें भारतरत्न नहीं, कोई चार्टशीट मिलती कलाम!”

‘परकाया’ कविता की इन पंक्तियों के सहारे कवि ने वर्तमान सत्ता की सांप्रदायिक विभाजनकारी नीतियों पर न सिर्फ सवाल उठाया है बल्कि व्यामोह में फँसे अल्पसंख्यक समुदाय को वोटबैंक बनने से आगाह भी किया है। इस कवि को पढा़ जाना चाहिए।

 

नीलाम्बुज सरोज की कविताएँ

1. नीडो के लिए

(नीडो तानिया अरुणाचल प्रदेश का वह लड़का था जिसे उसके बालों के रंग और नार्थ ईस्ट की पहचान की वजह से दिल्ली में भीड़ के हमले में मार दिया गया था। 2013 में)

मेरे मरहूम दोस्त !
तुम्हारे बालों का क्या रंग था?

तुम्हारी बोलती सी आँखें मुझे सोने नहीं दे रहीं …
तुम्हारा चेहरा मिलता है मेरे किसी भाई से ,
किसी पड़ोसी से
मेरे किसी दोस्त से ,
मेरे देश के किसी मेहनती किसान से ,
किसी निरीह मजदूर से,
मेरे देश के किसी भावी खिलाड़ी से…

और तुम्हें मार दिया गया!

देश साउथ एक्स में भी है
देश लाजपत नगर में भी है
देश लिट्रेचर फेस्टिवल और सिने शो में भी है थोड़ा थोड़ा,

देश तो तवांग में भी होगा
देश तो होगा कछार में भी
देश तो त्रिपुरा के सिलाचरी बॉर्डर पर भी है।

देश मस्त है, देश शर्मिंदा है, देश डरा हुआ है, देश क्षुब्ध है।

कितना अलग है तुम्हारा और मेरा देश नीडो!

मेरे ज़िंदा दोस्त!
तुम्हारे बालों का रंग कैसा भी था,
तुम्हारे लहू का रंग तो लाल है न!
मेरे भी लहू का रंग लाल ही है।
देश का क्या रंग है?
शर्मिंदगी का क्या रंग होता होगा?

तुम्हारे सपने जब 2000 किलोमीटर से भी ज्यादा
दूरी तय करके गए थे राजधानी में,
उनको तो पंख तक ठीक से न लग पाये थे,
और तुम्हें बेदर्दी से मार दिया गया!

धरने थे, रैलियाँ थीं, नारे थे
रिपोर्ट थी, एन जी ओ थे, थाने थे।
नहीं थी तो इंसानियत,
नहीं था तो वो जज़्बा
जो रंग को नहीं आत्मा को देख लेता है।

मैं तुमको नहीं जानता दोस्त!
लेकिन तुमको बहुत सारा जान गया हूँ अब,

तुम्हारे बहाने थोड़ा सा जान गया हूँ खुद को
थोड़ा सा राजधानी को
थोड़ा सा रंग को
थोड़ा सा ख़ून को। (त्रिपुरा, 2013)

 

2. साँवली लड़कियाँ

क्या तुमने कभी देखा है उषाकाल के आकाश को?

क्या खेतो में पानी पटाने पर मिट्टी का रंग देखा है?

शतरंज की मुहरें भी
पा जाती हैं जहां बराबरी का हक़

उस जम्बूद्वीप भारत में क्या तुमने,
किसी साँवली लड़की को
देखा है कभी गौर से ?

उन्हें काजल की तरह आँखों में बसाया नहीं गया
कलंक की तरह ढोया गया
शर्म की तरह ढाँपा गया
बुरी नीयत की तरह छिपाया गया

उन्हें फेयरनेस क्रीम से लेकर
सीमेंट की बोरी तक
बेचा गया।

लूटा गया
काला सोना बताकर
उन्हें कूटा गया
काली मिर्च समझकर।

उनके चेहरे की किताब पर
लगाया गया मेकअप का कवर।

दीपशिखा नहीं
उसकी कालिख समझा गया।

साँवली लड़कियां!

उग आती हैं बाजरे की कलगी की तरह
पक जाती हैं गेंहू की बालियों-सी,
छा जाती हैं रात की मानिंद
जल थल आकाश कर देती हैं एक
और अपने आगोश में समेट लेती हैं
पूरी पृथ्वी को।

उन्हें खोजना हो तो
विज्ञापनों में नहीं
देखना किसी लाइब्रेरी की चौखट पर
या धान के खेत में बुवाई करते हुए
या रुपहले पर्दों के पीछे
नेपथ्य में ।

उन्हें ढूंढों
उन कहानियों और कविताओं में
जिन्हें कभी पढ़ा या गाया नहीं गया .

वहांँ मिलेगी तुम्हें वह साँवली लड़की
जिसकी आँखों में तुम्हें शायद दिखे
उसके दर्द का वह उद्दाम आवेग
जिसे उसकी मुस्कराहट के बाँध ने
थाम रखा है .

 

3. अरुणा शानबाग के लिए

मर गयी अरुणा शानबाग
एक खबर है आज के अखबार में
उसी के आसपास छपे हैं कई विज्ञापन
मसलन लकी ड्रा , बम्पर सेल, दाग अच्छे हैं …

होते होंगे दाग़ अच्छे वाक़ई
वरना बेदाग़ होकर हुआ है कोई महान?
सभ्य समाज की स्वच्छ चादर पर
चालीस साल पुराने दाग जैसी अरुणा
अब अच्छी है !
ठीक हुआ मर गयी ‘उसी लड़की’ की तरह …

लेकिन नहीं नहीं !
जब तक जीवित थी , ज़िंदा थी
“जिंदा लाश” नहीं मैडम !
जिंदा प्रेरणा थी वह लाखों की …
लेकिन बम्पर सेल का क्या ?
“अरे ! उसको ज़रा होल्ड पे लो”.

ऐसे ही कभी अखबार के पहले पन्ने पर
सुर्खियाँ बनी होगी इरोम शर्मिला,
ऐसे ही लगती रहेगी बम्पर सेल
लेते रहेंगे हम सेल्फी
और मर जाएगी इरोम.

क्या इरोम और अरुणा अलग-अलग हैं ?
पता नहीं मुझे तो लकी ड्रा की चिंता है…

देश का लकी ड्रा बना रखा है
यारों ने इन दिनों
और देश की महिलाओं को कूपन
जिन्हें जहाँ मर्ज़ी वहां करो स्क्रैच
और फेंक दो !
इसी तरह मर जाएगा एक दिन
एक गुमनाम-सा विक्षिप्त कवि ‘विद्रोही’
“तो हमें क्या ?
हमारी तो बम्पर सेल का वक़्त आ गया है”…
विद्रोही जो कहता फिरता है
कि वह “बड़ा तगड़ा कवि है
जा के मरेगा वसंत में…”
लेकिन हे मेरे कवि !
इस बम्पर सेल की प्रलोभित जनता ने
तुम्हें हर मौसम में मारा है .
ठीक इरोम और अरुणा और एक्स वाई जेड की तरह .

तो साहेबान ! खबर ये थी कि
“मर गयी अरुणा शानबाग
बयालीस साल की बेहोशी के बाद”
लेकिन खबर ये होनी चाहिए थी कि
हमारा भारत महान
इन बयालीस ख़ामोश और बेहोश सालों के बाद भी
न जाने कितनी इरोम और सीमा आजादों पर
करता रहा अत्याचार
और ‘विद्रोही’ जो पहले
रमाशंकर यादव भी हुआ करता था,
को तो कर डाला विक्षिप्त!

“ख़बर तो येई होनी चाइये थी
पन सम्पादक जी ने होने नई दी जी”
“हाँ जी इन जैसों का मरना-मुरना
तो लगा ही रहता है …
देखो ज़रा ये ब्रेकिंग न्यूज़ आ रही है –
“…” , “!!!”

इन्हीं काले और कमोबेश अच्छे दिनों में
मेरी कुछ छात्राएं पढ़ रही हैं नर्सिंग
जिन्होंने पहले किसी नर्स अरुणा का
शायद नाम तक न सुना हो.
मैं क्या कहूँ उनको ?
मैं उन्हें बस इतना कहूँगा
कि विद्रोही बनो तुम, इरोम और अरुणा बनो तुम,
मीडिया के लिए दूसरी खबर नहीं,
आतताइयों के लिए चेतावनी बनो तुम.

 

4. परकाया

डॉ कलाम!
अच्छा हुआ आप चले गए।
अच्छा हुआ आप हिन्दू ह्रदय सम्राटों के पैरों में बैठ गए
अच्छा हुआ आप साईँ बाबा और शंकराचार्यों के आशीर्वाद के ओट तले रहे
वरना अगर आप गए होते और किसी राह
तो कहलाए होते मुल्ला कलाम।
लगते आप पर ‘कटुवा’ होने के कड़वे आरोप
और अरिंदम चौधरी टाइप के लोग नहीं बुलाते आपको।
डॉ कलाम!
आप वोट बैंक थे भले आप न मानें या न जानें।
भगत सिंह !
इस देश में तुम्हारी फ़ोटो लगाकर
तुम्हारे ज़मीर बेच देने वालों के बीच
कलाम और भला कैसे जीवित रहते?
मनुस्मृति के इस देश में
तुम गीता न बांचते तो कैसे जीवित रहते ?
त्रिशूल, फरसा, गदा, बरछी और भाला वाले भगवानों के देश में
मिसाइल बनाकर ही वैज्ञानिक हुआ जा सकता है कलाम!
माफ़ करना कलाम
तुम अगर वोट बैंक के प्रतीक न होते तो
तुम्हे भारत रत्न नहीं कोई चार्जशीट मिलती
कलाम!
तुमने देश के लिए बहुत कुछ किया
लेकिन देश को राष्ट्र बना दिया जाता है यहाँ
मुल्क़ और वतन की बात मत करो
वरना उठा कर फेंक दिए जाओगे धनुषकोटि…

 

5. सिपाही के नाम सन्देश

(कैफ़ी आज़मी साहब की नज़्म “हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा” सुनते हुए)

ओ मेरे बंधु, सखा , मेरे साथी!
और कहो क्या हाल चाल है
तुम न कहोगे हमें पता है ।

हमें पता है किस मुश्किल से
तुमने अपने ख़्वाब बुने थे
दीवाली में घर जाने के ।

पिंकी की गुड़िया बाकी थी
बिट्टू की चिड़िया बाकी थी
माँ बाबा की आँखों में तो
आशा के थे दीप जल रहे !
पत्नी जिसने कुछ दिन पहले
ना जाने कैसी हालत में
करवा चौथ का व्रत रखा था
उसकी भी कुछ आशाएं थीं ।

सरहद पर गर जंग छिड़ी हो
फिर तुम दिल पर पत्थर रखकर
इन बातों से ऊपर उठकर
वर्दी तुरत पहन लेते हो !

रंग , दिवाली, छठ पूजा हो
ईद हो या गुरुपरब या क्रिसमस
सब कुछ वो झंडा होता है
जिसे तिरंगा सब कहते हैं।

उसी तिरंगे के कुछ बेटे
इसी देश में इधर उधर हैं
वर्दी भी वो नहीं पहनते
ना ही कभी बन्दूक उठाई
लेकिन वो भी अपने घर से
दूर रहे हैं मेरे भाई
वो भी तुम्हें देते हैं दुआएं

उसी तिरंगे के कुछ बेटे
खेतों में हल चला रहे हैं
स्वाभिमान से जीने खातिर
मौत को गले लगा लेते हैं
वो भी तुमको ख़त लिखते हैं

कुछ बेटे तो और दलित हैं
जिनके पास ज़मीन नहीं है
जिनका जीवन नरक रहा है
वो भी अपने दर्द भुला कर
तुमको कुछ सन्देश लिखेंगे

कुछ बच्चे छः सात बरस के
जो तुमको नायक हैं मानते
अपनी पॉकेट मनी बचाकर
ग्रीटिंग तुमको भेज रहे हैं

ओ मेरे बंधु ! सखा मेरे साथी
इन सबके बारे में सोचना
नहीं अकेला खुद को पाना
और अकेले गर हो जाओ
तब भी ख़ुशी का साथ निभाना।

(कुछ दिन पहले की डायरी से)

 

6. दशावतार गांधी जी

क्या कहते हो, मूरत वाले ? फोटो वाले गांधी जी?
सब गाँधी से बड़े हैं भैया नोटों वाले गांधी जी।

5 से लेकर 500 तक तुम्हीं मिले हो गांधी जी
तुम ‘नृसिंह’ हो, दीवारों से भी निकले हो गांधी जी।।

‘मछली’ की शल्कों से ज्यादा रूप तुम्हारे गांधी जी
सत्याग्रह का पी जाते हैं सूप तुम्हारे, गांधी जी

रिश्वत में तुम, उपहारों में, घोटालों में गांधी जी
तीन डगों में नापी धरती, तुम ‘वामन’ हो गांधी जी।

न्यायालय में चले तुम्हारा बड़ा सहारा गांधी जी ,
न्याय बना है ‘कछुआ’ तुमसे, बड़ा जुलुम है गांधी जी।

डूब गई थी ये धरती जब सच्चाई के सागर में ,
बन मीडिया ‘वराह’ इसे, तुमने उबराया गांधी जी।

हिंसा का व्यापार तुम्हीं से, बना फेरारी गांधी जी ,
फरसा जैसी काम कर रही लट्ठ तुम्हारी गांधी जी।

सत्य, अहिंसा को अखंड वनवास मिला है गांधी जी,
राम बिक रहे रावण के दरबार, गिला है गांधी जी।

तेरी ही ‘मुरली’ पर नाचे ‘गौतम’, ‘टाटा’, ‘अंबानी’
शेयर मार्केट बैठ, तुम्हीं तो घर-घर व्यापे गांधी जी

‘कल्कि कोएलचिन’, ‘राणावत’ ,’अक्षय कुमार’ के प्यारे हो
गिरगिट से भी ज्यादा हैं अवतार तुम्हारे गांधी जी।

‘नमो नमो’ हम करते केवल रोज मनाते गांधी जी,

पंद्रह लाख मिले जल्दी से यही दुआ है गांधी जी।

 

7. लापता

कुछ पता नहीं चलता
शम्बूक के कटे हुए सिर का
छींटे तो पड़े होंगे रक्त के !
कहाँ हैं वो ?
क्या धो दिया गया उन्हें सोमरस से ?
या यज्ञ की वेदी के नीचे दबा दिया गया ?

क्या हुआ शबरी का
जूठन खिलाने के बाद ?
क्या राम ने दे दी उसे
वृद्धावस्था पेंशन ?
कहाँ दबी होगी उसकी फ़ाइल ?

और तो और
ना जाने कहाँ है
एकलव्य का कटा हुआ अंगूठा भी ,
नहीं दीखता ‘गुरु द्रोणाचार्य’ वाले
मेट्रो स्टेशन पर भी
या द्रोणाचार्य की किसी तस्वीर में ?

कहाँ गए ऐसे लोग ?
कहाँ गयी उनकी स्मृतियाँ ?

ठहरो !
धरती हिल रही है
और
पाताल तोड़ कर कोई
निकल रहा है बाहर !!!

 

8. चलो मुगल गार्डन चलें

नहीं –
मेरे देश में रवायत नहीं है
काँटों के मेलों की।
यहाँ संगीत में भक्ति है, अध्यात्म है
सभी स्वर हैं वादी
विवादियों के नहीं हैं हम आदी।
यहाँ साहित्य में मूल्य हैं, आंदोलन है, विद्रोह है
जीवन में छल है , पलायन है, मोह है
कला में अमूर्तन है, नोवन्मेष है , रंग है
व्यवहार में ही हाथ ज़रा तंग है।
इबादत है, पूजा है, बंदगी है
तो क्या हुआ अगर थोड़ी से गंदगी है?
और साथी! क्या मज़ाक करते हो ,
हमारे यहाँ सपनों, पंछियों और बच्चों को
नहीं लिया जाता गंभीरता से ।
चलो मुगल गार्डन चलें।

 


 

कवि नीलाम्बुज सरोज, जन्म 07/07/1983, असम। प्रारंभिक एवं स्नातक शिक्षा बलिया (उत्तर प्रदेश) से प्राप्त की। तत्पश्चात 2004-06 के दौरान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के भारतीय भाषा केंद्र से एम.ए. (हिंदी) किया, जहाँ निराला पर विशेष अध्ययन रहा। दिल्ली विश्वविद्यालय से नजीर अकबराबादी की कविताओं पर एम.फिल. किया तथा आगे जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र से सामासिक संस्कृति और आज़ादी के बाद की हिंदी कविता विषय पर पी-एच.डी. शोधकार्य प्रारंभ किया।

2010 से 2019 तक केंद्रीय विद्यालय संगठन में पी.जी.टी. हिंदी के रूप में केरल, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और पंजाब में अध्यापन एवं रंगकर्म से जुड़े रहे। सितंबर 2019 से वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा (भोजपुर, बिहार) में हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।

वर्तमान में ‘हिंदी फिल्मी गीतों में उत्तर भारतीय हिंदी समाज का बदलता स्वरूप (1947 से 2000 तक)’ विषय पर शोधरत हैं। शोध-आलेख, आलोचना, कविताएँ, ग़ज़लें, समीक्षाएँ और रिपोर्ताज़ जैसी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

सम्पर्क:  मोबाइल- 70441 78071,

ईमेल id: thenilambuj@gmail.com

 

 

टिप्पणीकार सुमन कुमार सिंह,  जन्म : 23जनवरी,1972 में बक्सर जिला के भटौली गाँव में । शिक्षा : एम.ए.(हिंदी), बी.एड.,
पी-एच.डी.(रामवृक्ष बेनीपुरी की गद्य शैली का स्वरूप व विन्यास ),
हिंदी और भोजपुरी के युवा साहित्यकार। पत्र-पत्रिकाओं में हिंदी तथा भोजपुरी में समय-समय पर कविताएँ, कहानियाँ, समीक्षाएँ तथा आलेख प्रकाशित। ‘महज़ बिंब भर मैं’ पहला हिंदी काव्य संकलन, बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ।

संप्रति : डीएवी.प.स्कूल में शिक्षक ।

 संपर्क :  बी.एस.डीएवी.प.स्कूल, मील रोड,
         आरा- 802301
          बिहार ।
• मो.नं.-8051513170

 

 

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