एकता वर्मा
मानसी संभावनाओं की कवयित्री हैं। इनकी कविताओं में युवा हृदय की उत्तेजनाएँ हैं। उनकी कविताएँ एक आधुनिक हुई, शिक्षित, शहरीकृत हुई कामगार महिला के उन अनुभवों को दर्ज करने से बनी हैं, जो आगे आने वाली नई पीढ़ियों के लिए जीवन सूत्र दे सकने की क्षमता रखती हैं। वे अपनी दृष्टि से प्रेम को खोज रही हैं, वे अपने दुख दर्ज करवा रही हैं, वे नए परिवेश में पितृसत्ता की पहचान कर रही हैं, वे राजनैतिक व्यवस्थाओं के अमानवीय हो जाने का विरोध करने का जोखिम उठाती हैं, वे अपने पीछे छूट गए लोक को सूटकेस में बांधे फिरती हैं, वे युद्ध जैसे विषयों पर मानव सभ्यता को प्रश्नांकित करती हैं। उनकी कविताएँ नए दौर की पितृसत्ता और जन विरोधी व्यवस्था वाली दुनिया में एक स्त्री नागरिक के अधिकारपूर्ण दखल से पैदा हुई धमक को दर्ज करने वाली हैं।
स्त्री लेखन ने संघर्ष की लंबी परंपरा के बाद अपना एक सौंदर्यबोध गढ़ा है। यह सौंदर्यबोध अधिक मानवीय है, शोषण से अधिक मुक्त है, और स्त्री की अस्मिता के प्रति अधिक सचेत है। हालाँकि कई बार नयापन एक खुरदरापन लेकर भी आता, उसमें बौद्धिकता का भार कुछ अधिक हो जाता है। मानसी उसी यत्न से कमाए सौंदर्यबोध को अपनी कविता में उतारती हैं। उसके खुरदरे किनारों को बहुत यत्न से चिकना भी करती हैं। उनके ये छोटे प्रयास नवीनता की अनगढ़ता में सहजता भरते हैं, यह मानसी की सौंदर्य दृष्टि की सार्थकता है। पहली कविता में वे काम से थककर लौटी स्त्री के सौंदर्य को पारंपरिक रूप से भिन्न लेकिन बहुत मोहक दर्शाया गया है जो एक स्त्री के साथ प्रेम में भी है। इस कविता में पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं के टूटने की आवाज़ें आती हैं। वे विमर्श को, प्रेम को और उनसे जुड़ी लैंगिक भाषा संरचना में ज़रूरी सुधार करती हैं। एक स्त्री का स्त्री के लिए प्रेम, और स्त्री भाषा का सामान्य भाषा के रूप में स्थापना दोनों अहम और ज़रूरी मुद्दे हैं। वे कहती हैं,
वह सोते हुए बिलकुल सुंदर नहीं लगती
थकी हुई लगती है जैसे रात भर चलने के बाद चाँद कुंभलाकर सो रहा हो।
इस नायिका को देखकर अनायास निराला की पत्थर तोड़ती नायिका की याद आती है। यहाँ मानसी उसके श्रम की महत्ता और सौंदर्य की स्थापना के आगे चलकर नींद पर जाकर रुकती हैं। श्रम के इतिहास में काम और आराम के घंटों को निर्धारित करने का एक संघर्षमयी इतिहास रहा है। मानसी की थकी हुई प्रेमिका का नींद में होना, और उस बिंब को कविता के लिए चुना जाना ऐतिहासिक संघर्ष की याद दिलाता है, हालाँकि आगे चलकर इसी कविता में ही जब वो कहती हैं ‘इस लड़की को शहर से दूर भेज दिया जाना चाहिए जहाँ काम के घंटे अब भी निर्धारित नहीं हुए हैं’ तो वे इस ऐतिहासिक संघर्ष के वर्तमान स्वरूप को भी दिखाते हैं जो पूँजीवादी व्यवस्था में और क्रूर हो चुका है। इसी तरह एक अन्य कविता ‘बारिश का अर्थ’ में वे बारिश के सौंदर्य को उलट-पुलट कर रख देती हैं। गाँव की एक स्त्री जिसके हिस्से पूरी गृहस्थी की व्यवस्था है, उसके लिए, उस बारिश का क्या अर्थ हो सकता है, जिसको पुरुष कवियों ने बहुत रूमानी माना, वे लिखती हैं-
‘टुटही बटलोई में इकट्ठा होता पानी/ आधी डूबी चारपाई/ गेंहुआ नाग/ अंकुरता गेंहू
तपती हुई देह ओढ़े गोद में सिमटता मेरा बच्चा
कौन सा कवि है तेरी किताब में नोनी
जिसको यह मौसम सुंदर लगता है।”
मानसी अपनी कई कविताओं में कवियों को कटघरे में खड़ा करती हैं क्योंकि इन कवियों की बात में उनकी अपनी बातें अनुपस्थित दिखाई पड़ती हैं, अपने दुखों की अनुपस्थिति दिखाई पड़ती है, उन प्रतिबद्धताओं और यथार्थ की कमी दिखाई पड़ती है, जिनको पूरा करने की ज़िम्मेदारी मानसी की कविताएँ उठा रही हैं।
साहित्य त्रासदियों को, अन्याय को किस तरह याद करता है, किस तरह भूले जाने के विरोध में रहता है उसका उदाहरण मानसी की ‘केदारनाथ सिंह के लिए’ कविता में देखा जा सकता है। कोविड महामारी में रेल की पटरियों पर खून में सनी रोटियों की स्मृति हमारे युग की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक थी। उस दृश्य को लगभग बड़ी सहजता से पचा डालने की युग की क्षमता उससे भी बड़ी विडंबना थी। उस दृश्य को मानसी इस तरह बीत जाते देखना नहीं चाहती हैं। वे अपनी कविताओं में उसे दस्तावेज़ीकृत करती हैं, वे कहती हैं-
“देखो न कवि उन्हीं अवशेषों पर पड़ी हैं वह रोटियाँ
जिनकी खोज में शहर गए थे।”
यहाँ सिर्फ़ भावुकता और विडंबना के चित्र खींचकर नहीं रुक जाती हैं बल्कि आगे उस त्रासदी के घटने की तहों तक जाती हैं, उसके लिए ज़िम्मेदार व्यवस्थाओं को पहचान करती हैं।
जो रोटी खोजने आए हुओं के ‘सर को कुचलती हुई, धड़धड़ाकर निकल जाती है।’ मानसी अपनी कविता में एक शिक्षित, शहरीकृत आधुनिक स्त्री की नज़र लेकर आती हैं जो अपने समय की राजनीति को बखूबी समझती है और हाशिए पर खिसकाए जाने से इंकार करती है।
पुरुषों की बनाई इस दुनिया में निकली औरतों के क़िस्सों से भरी हैं मानसी की कविताएँ, जो नवीन सौंदर्यबोध खोज रही है, गढ़ रही है, चुनौतियाँ पहचानकर उनकी हास्यास्पदता को दिखा रही है। पितृसत्ता और मर्दानगी का जटिल समीकरण समझा रही हैं। मानसी उस पुरुषवादी नज़रिए पर निशाना साधती हैं जो पितृसत्तात्मक रहते हुए भी पितृसत्तात्मक कहलाया जाना नहीं पसंद करता इसलिए प्रगतिशील होने के लबादे में बाहर निकलता है। वह दिखाने भर को आज़ादी ‘देता’ है किंतु असल में ऐसा नियंत्रण चाहता है जहां विद्रोह करने की संभावनाएँ भी नज़र न आएँ। इसी का मखौल उड़ाते हुए मानसी कहती हैं-
“आज़ाद हो तुम
मेरी जान
उड़ो
वहाँ वहाँ, जहां मैं तुम्हें उड़ता देखना चाहता हूँ।”
मानसी की कविताओं में यात्रा बहुत आती हैं। यह बिंब उस स्त्री के लिए स्वयं क्रांतिकारी है जिसके लिए पारंपरिक तरीक़े से देहरियों के भीतर रहना निर्धारित किया गया हो। मानसी जब ये यात्राएँ करती हैं तो अपने साथ-साथ अपना परिवेश लेकर भी चलती हैं। शहरी परिवेश के भीतर लोक की कविता कहते हुए एक कॉंट्रास्ट रचती हैं, इस सृजन में उनकी भाषा बड़ी तेज चमकती है। एक उदाहरण-
“इस कस्बे नुमा शहर में
बहुत ज़ोर से आषाढ़ आता है
कुटज के फूल लेकर मेघों से आग्रह करना पड़ता है
कि हटो, अब गेंहू को धूप दिखानी है!?
स्त्री लेखक का युद्ध को देखने का नज़रिया शोध का विषय है। इको फेमिनिज्म स्त्री को युद्ध के विरोध में खड़ा करता है। मानसी की कविता में युद्ध पर बात करने को बहुत कुछ है। युद्ध की अमानवीयता एक बच्चे को ख़ूँख़ार हत्यारों में बदल लेता है। वे कहती हैं,
युद्ध के आनन्दोत्सव के बाद …
क्या याद आता होगा उन लड़ाकों का चेहरा
जो उन लड़कों जैसे दिखते हैं।
इन युद्धों से मिलने वाले परिणामों में से एक है मनुष्य के भीतर से मासूम संवेदनाओं का ख़त्म हो जाना। मानसी इन मानवीय संवेदनाओं के ख़त्म हो जाने को मानवीय सभ्यता के ख़त्म हो जाने के चिह्न के रूप में देखती हैं इसलिए उनको बचाए रखने की चिंता में डूबी हुई कविताएँ कहती हैं। आगे ‘क्या तुमने उसे देखा है’ कविता में एक स्वीकारोक्ति आती है, एक बेटे की स्वीकारोक्ति जो अपनी माँ के सवालों से हताश होकर कह उठता है कि
मैं उसका बच्चा नहीं,
जंग से लौटा आदमी हूँ।
यह स्वीकारोक्ति स्त्री की मातृत्व से पैदा हुई चिंता से आगे जाकर, पुरुष की तरफ़ से होती है। मर्दानगी, हिंसा और शक्ति में डूबे पुरुषों के चित्रण से दूर, उदास, ग्लानि में डूबे, हार-गलती को स्वीकारते पुरुष को रचना इस कविता की उपलब्धि है।
पितृसत्ता और पूंजीवाद के बीच दबी भारतीय स्त्री का जीवन घर में क़ैद है। उसके सपने, उसका जीवन घर की चारदीवारी और परिवार के पालन-पोषण पर टिका है। घर के भीतर और बाहर कार्य करती स्त्री का श्रम किसी इतिहासकार ने दर्ज नहीं किया है। वैवाहिक विस्थापन से लेकर हो या स्त्री का घर से दूर होना, दोनों के साथ उसके घर संलग्न है। वैवाहिक विस्थापन स्त्री जीवन को कैसे बंधुवा मजदूर की स्थिति में देता है कि वह अपने साथ सिर्फ़ विस्थापित मज़दूर की तरह घर से दूर एक काम पर जाती है जिसे रोज़गार बिल्कुल नहीं समझा जा सकता। मानव मन अपने जैविक वातावरण को जीना चाहता है। बहुत सुदर चित्र में वह स्पष्ट करती कि “घर मेरे सूटकेस में बंद नहीं होता / और मैं रेलगाड़ी में बंद चली जाती हूँ काम पर।” वह वर्चस्वशाली सत्ताओं से दबे जीवन को संभावनाओं से देखती हैं, ये संभावनाएँ कविता में उड़ने के अर्थ में आती हैं, जहाँ तक संस्कारों की दृष्टि जाती है वहाँ जीवन भी पहुँच सकता है। एक बच्चे से लेकर परिधियों पर धकेली गई स्त्री के लिए उनकी कविताएँ सम्भावनाओं से भरे बाग रोपती हैं। वह लिखती हैं कि
“हम लिखेंगे,
ढेर सारी कविता
तुम्हें बरसाती कुकुरमुत्ता लगे या गदराया पलाश
हम लिखेंगे खूब,
शब्दों से पाट देंगे तुम्हारा आकाश।”
यह कविताओं का आकाश अपनी एक दुनिया बुनता हैं जिसमें पुरुषवादी और ब्राह्मणवादी सत्ताओं के प्रतिरोध से एक ऐसे समाज की स्थापना होती है जो जातिवादी भेदभाव से दूर स्त्रीमन के सुंदर आकाश सी मुक्त संस्कृति विकसित होती है। आगे वह लिखती हैं-
“और जब आकाश भर जाएगा हमारे नए उन्मुक्त शब्दों से ,
“जब धरती को ढक देंगे हम कविता से
फिर बुनेंगे अपनी नई दुनिया,
तुम्हारे शब्दों से आजाद।”
मानसी की कविताओं में स्त्री मन का सौंदर्य है और यह सौन्दर्य लैंगिक परिधियों की ग़ुलामी नहीं झेलता है, मूलतः स्त्री घर और उसके विस्थापन पर सुंदर कविताओं को अभिव्यक्ति देता है| वो पुरुषसत्ता के संस्कारों को तोड़ती हुई लिखती हैं कि
“पलट कर जवाब देना मुझे बहुत बेहतर लगता है,
बोतल में बंद एक अच्छी औरत होने के बजाय।”
कविताओं में प्रयुक्त बिम्ब अपने तीखेपन से पुरुषसत्ता पर चोट करते हैं। पुरुषसत्ता ने स्त्री को शील और आदर्श के संस्कार रूपी बोतल में बंद कर रखा है। इनकी कविताएँ पुरुषवादी आदर्श और व्यवहार को तोड़ना चाहती हैं और एक चेतनशील स्वतंत्र स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को स्थापित करती हैं। स्त्री जीवन के रोजमर्रा के संकटों को इन कविताओं में बहुत ही साधारण भाषा में अभिव्यक्त किया गया है-
“हमसे कहा गया गर्दन झुका कर चला करो
हम कमर के बल झुक गए”
‘सुख की परिभाषाओं में सबसे सरल उसका मेरा हाथ पकड़ लेना है’ पढ़ते हुए केदारनाथ की कविता ‘हाथ’ याद आती है। स्वच्छंद मन की आकृति में वह स्पष्ट करती हैं कि “मेरी उँगलियों का आदतन उसकी गर्माहट की ओर मुड़ जाना है।” यह सामाजिक बंधनों से मुक्त एक स्त्री की अभिव्यक्ति है। गाँव से शहरों तक के विस्थापन में मनुष्य सबसे पहले परम्परागत समय का संगीत और प्रकृति के दिव्य दर्शन खो देता है। वह ऋतुओं को पहली बारिश की बौछार के अतिरिक्त किताबों से जानने लगता है। जानता क्या है सिर्फ़ याद रखता है। आषाढ़ से सुकुमार मन नहीं भीगता बस बारिश का छाता रखना उसकी जिम्मेदारी हो जाती है। यह जिम्मेदारी ही हमे अपने से दूर करती है। श्रम, शिक्षा और रोजगार से पनपा विस्थापन मनुष्य को गाँव से दूर करता है। वह जंगल, नदी इत्यादि प्रकृति के बिम्बों से स्त्री मन को देखती हैं। स्त्री मन में खोहे बना दी गई हैं उनमें वह बार -बार आवाज लगा कर उस चेतना को जगाती हैं जहाँ से मानव मुक्ति का रास्ता निकलता है। प्रकृति के क़रीब जाकर वह कहती हैं कि-
“नदियाँ तक अपना नाम भूल जाती हैं
अगर ना पुकारो उनकी भाषाओं में
बदल लेती हैं अपना रास्ता”
मानव संस्कृति की ऐतिहासिक गवाह प्रकृति ही रही है। मनुष्य ने जो भी संस्कार, सभ्यताएँ निर्मित की और उनको जिस सत्ता संरचना से संचालित किया प्रकृति उसकी साक्षी रही है। गांव से शहर में आकर हम प्रकृति को याद करते हैं। गाँव की प्रकृति वहाँ की सत्ता संरचना को भूलकर हमें आकर्षित करती है। मानसी की कविताओं में विस्थापन से उपजी प्रकृति के प्रति ‘नॉस्टेल्जिया’ मानवीय आकृति में प्रस्तुत होती है। कविताओं को बहुत ही सरल और साधारण भाषा में जीवन की तरह प्रस्तुत किया गया है। बोलचाल के शब्दों में पुरुषवादी वर्चस्व की स्त्रीवादी व्याख्या प्रस्तुत करती हैं।
इस प्रकार मानसी मिश्र की कविताएँ संभावनाओं से भरी, संघर्षरत स्त्री जीवन की कविताएँ हैं। स्त्रीमन की ऐसी आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हैं, जिसमें संघर्ष जीवन का सौंदर्य है। पितृसत्ता ने स्त्री की जिस मिथकीय छवि को विकसित किया और जिसकी छवि का आदर्शीकरण समाज में स्थापित किया, मानसी उस छवि को यथार्थ के हथौड़े से तोड़ती हैं और स्त्री के वास्तविक जीवन-संघर्ष और शोषण को सिर्फ़ उजागर ही नहीं करती बल्कि स्त्री मन के उन कोमल दृश्यों को भी प्रस्तुत करती हैं जहाँ स्त्री ठहरकर साँस लेना भी चाहती है।
मानसी मिश्र की कविताएँ
1.
कहानियों में राजकुमारियाँ और अच्छी स्त्रियाँ सोते हुए बहुत ख़ूबसूरत लगती हैं
भोली और मासूम लगती हैं
पर मेरी गर्लफ्रेंड बिल्कुल ऐसी नहीं लगती
वैसे तो मैं उसे सोते हुए बहुत कम देख पाती हूँ
लेकिन वह सोते हुए बिल्कुल सुंदर नहीं लगती
थकी हुई लगती है
जैसे रात भर चलने के बाद चाँद कुम्हला कर सो रहा हो
डरी हुई लगती है
डरावनी भी लगती है
जैसे मेरे साँस लेने और सोचने के शोर से डिस्टर्ब हो कर उठ जाएगी
और फिर चिंता करने लगेगी
क्या इसके सपने भी चिंताओं से भरे हुए हैं
पूछने पर सिर्फ़ मुस्कुराती है
शायद मेरे अनाड़ीपन पर
चिंताग्रस्त इस पीली पीली लड़की को इस रंग-अर्थहीन ठूँठ जैसे शहर से दूर भेज देना चाहिए जहाँ काम के घंटे अब भी निर्धारित नहीं हुए है।
2. सुख की परिभाषा
सुख की परिभाषाओं में सबसे सरल
उसका मेरा हाथ पकड़ लेना है
सबसे प्राकृतिक
मेरी उंगलियों का आदतन
उसकी गर्माहट की ओर मुड़ जाना है
सरलतम सुख की खोज ही सबसे दुःसाध्य है।
3.
बिखरी हुई हूँ मैं घर के कई हिस्सों में
इसी लिए जब घर से निकलने का समय करीब आता है
तो समझ नहीं पाती कि suitcase में
घर का कौन सा हिस्सा रखूँ
कब तक घर सूटकेस में मेरे साथ चलेगा
कब मैं इसकी चख चख से परेशान होकर निकाल कर बाहर रख दूंगी
घर मेरे सूटकेस में बंद नहीं होता
और मैं रेलगाड़ी में बंद चली जाती हूँ काम पर।
4.
(केदारनाथ सिंह के लिए)
प्रिय कवि,
जब तुम बता रहे थे हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया के बारे में
तब मुझे याद आया,
‘जाना’ से ज्यादा खौफनाक है वह स्थिति
जिस से जाना पड़ता है
जैसे प्रेमिकाओं को जाना पड़ा ससुराल
इंसानों को जाना पड़ा शहर
रोटी की खोज में,बदलना पड़ा मजदूरों में
फिर वापस गांव
मनुष्यता के अवशेषों पर चलते हुए
देखो ना कवि
उन्ही अवशेषों पर पड़ी है वह रोटियां
जिसकी खोज में शहर गए थे
रोज स्थितियां बनती हैं
जो बेसब्र हो जाते हैं, वो चले जाते हैं
अपनी बेसब्री को बिछाकर सोते हैं
और व्यवस्था सर को कुचलती हुई, धड़धडा़ती निकल जाती है
समाचार का एक छोटा कोना
टीवी की पतली पट्टी पर चलती एक खबर
मन के पटल पर पल भर भी नहीं ठहरती
फिर भी कवि
लोग जाते हैं
और कोई भी यह नहीं पूछता क्यों जाना पड़ा?
5.
गर्मी हर जगह एक जैसी ही होती है
झुलसाने वाली, गर्म
ठंड हर जगह एक सी ही पड़ती है
जमी हुई, निर्मम
पर आषाढ़ हर जगह एक सा नहीं आता
जैसे दिल्ली में आषाढ़ नहीं आता
ना पहले दिन ना एक दिन
इस कस्बे नुमा शहर में
बहुत जोर से आषाढ़ आता है
कुटज के फूल लेकर मेघों से आग्रह करना पड़ता है
कि हटो, अब गेहूं को धूप दिखानी है
शहर ओढ़कर रखे इस जगह
पर अब भी बहुत कुछ कच्चा बच गया है
जहां आषाढ़ आ जाता है।
6.
आजाद हो तुम
मेरी जान
उड़ो
वहां वहां, जहां मैं तुम्हें उड़ता देखना चाहता हूं
मैंने जो मुट्ठी भर पंख दिए हैं न,
उन्हें लेकर उड़ो।
7.
बारिश का अर्थ:
धारा सार टपकता पानी
फर्श पर छोटे छोटे गड्ढे
टुटही बटलोई में इकट्ठा होता पानी
आधी डूबी चारपाई
गेंहुआ नाग
अंकुरता गेहूं
तपती हुई देह ओढे़ गोद में सिमटता मेरा बच्चा
कौन सा कवि है तेरी किताब में नोनी,
जिसको यह मौसम सुंदर लगता है।
8.
अगर मजाक में तुम्हें खटास लगी,
तो पलट कर जवाब मत दो,
उसका यह मतलब नहीं था।
जब शब्द और भाव तुम्हें कटु लगे,
तो पलट कर जवाब मत दो,
तुम्हें लगा वह कटु थे
तुम्हें फिर से सोचना चाहिए।
तो क्या हुआ अगर प्लेट टूट गई,
तो क्या हुआ अगर तुम घंटो खड़ी रही,
वह तुमसे प्यार करता है,
सच में प्यार करता है
उसका यह मतलब नहीं था|
अब मैं सोचती हूं फिर
मैं अपने जवाब का क्या करूं
क्या मैं इसे एक बोतल में बंद कर दूं ,
और समुद्र के सुदूर कोनों में बहा दूं
या फिर इन्हें दफन कर दूं
बहुत गहरे, किसी उथली कब्र में |
मैं सोचती हूं, बोतल तो अच्छी है लेकिन इस बोतल के मुँह में कपड़ा फसा देना चाहिए और उसके सिरे में आग लगा देनी चाहिए
पलट कर जवाब देना मुझे बहुत बेहतर लगता है,
बोतल में बंद एक अच्छी औरत होने के बजाय।
9.
क्या तुमने उसे देखा है,
तुम सा ही ऊंचा
बचपन में नाक टूट गई थी,
निशान रखे हुए हैं
भूरे बालों वाला,
बच्चों जैसा चेहरा है उसका,
बोलो ना, तुमने उसे जरूर देखा होगा
बहुत बोलता है चुप ही नहीं होता
उसकी हंसी होठों में नहीं समाती
क्या कोई सैनिक ऐसा नहीं था जो बहुत मुस्कुराता हो ?
मेरी मां मुझसे पूछे जा रही थी,
मेरे ही बारे में
क्योंकि उनका बच्चा मेरे ही बटालियन में था
मैं उसका बच्चा नहीं
जंग से लौटा आदमी हूं |
नाक पर छोटा सा निशान नहीं,
आंख से जाती हुई जबड़े तक लंबी रेखा है
उस रेखा के पहले का मेरा बचपन और बाद का आदमी आमने-सामने टकरा भी जाएं,
तो खुद को पहचान नहीं पाएंगे
मैं उसका हाथ थपथपा देता हूं,
‘कोशिश करता हूं ‘
और उसकी आंखें खुश हो जाती हैं|
10.
क्या मृत्यु जगह को भी घेर सकती है?
क्या जगहें मर जाती हैं ?
वे विलोपित हो जाती हैं शायद
अपने ही भीतर
कोई सायरन बजाती गाड़ी नहीं आती
कोई कब्र नहीं खोदता
कोई शोकगीत नहीं गाया जाता
या फिर खो जाती हैं
जैसे किसी पुराने कोट की तहों में जमी आवाजें हों
घर भूल जाता है
चिर परिचित नाम को प्रतिध्वनित करना
खिड़कियां रिक्त आंखों जैसे ताकती हैं विज़न में
यहां कोई नहीं आता लौटकर
क्या जगहें सचमुच मर जाती हैं
या फिर लौट जाती है वे
घायल जानवरों की तरह
अपनी ही खोह में, अपने बीहड़ में
चोट को सहलाने
खोई यादों को दुलारने
नदियां तक अपना नाम भूल जाती हैं
अगर ना पुकारो उनकी भाषाओं में
बदल लेती हैं अपना रास्ता
समय और कंक्रीट के साथ
पूजाघर बन जाते हैं जंगल का हिस्सा
उनके देव अंतर्मुख हो गए हैं
थक कर इंतजार में
और उनकी जगह ले चुके हैं चमचमाते प्रासाद
मृत्यु जैसी अंतिमता के सिवा
अब बचा ही क्या है यहां
नहीं यह कोई रूमानी मर्सिया नहीं है
एक अनिश्चित समय के सवालों का प्रख्यापन है।
11.
इतिहास लेखन की सारी कुंजियों में
और रटे रटाए तबीज़ों में
पुरालेख के दस्तावेजों में
कहीं तुम्हें नहीं मिलेगा
मृत्यु का इतिहास
हर जगह दर्ज है
इस सन् में
इनके द्वारा
बनी यह कदीम-ओ- अजीम जगह
पर ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा
इसकी मृत्यु का साल
कब इसकी रवायतों पर धूल जम गई
और कब उगी अमरबेल इसकी छत पर
हमने मर्सिया गाया
और निश्चित कर दिया
कि मृत्यु घट चुकी थी
हमने नियम माना
और फिर वैध कर दिया
अंतर्निहित अन्याय को
हमसे कहा गया गर्दन झुका कर चला करो
हम कमर के बल झुक गए
और फिर यह जगह मर गई
हां ऊंची इमारतें, अरगलाएं और घने पेड़ों की कतारें
वैसे ही दिखाई देती हैं
लेकिन अब यहां खाली कमरों और धूल से भरे लोगों के अलावा
कुछ नहीं बचा है।
12.
युद्ध के आनंदोत्सव के बाद,
मार्चिंग बैंड के घर लौट जाने पर
जब वो लाल और नीला उतार देते हैं,
अपनी पुरानी तहमद और पीली गंजी में,
क्या उन्हें अपने तेज ड्रम कान में गूंजते लगते हैं?
जैसे विजय ध्वनि सिर के अंदर से आ रही हो|
क्या याद आता होगा उन लड़ाकों का चेहरा,
जो उनके लड़को जैसे दिखते हैं
या फिर पीले फूल के गीत,
जो वह बचपन में सुनाया करते थे
या वह जानते हैं,
कि जिस आनंद के अतिरेक में उन्होंने छाती का पूरा बल लगाया, वह उनकी ही मृत्यु का था।
13.
हम लिखेंगे,
ढेर सारी कविता
तुम्हें बरसाती कुकुरमुत्ता लगे या गदराया पलाश
हम लिखेंगे खूब,
शब्दों से पाट देंगे तुम्हारा आकाश
शब्दों को बेमतलब किया तुमने
अब बेमजा़ भी कहने लगे हो!
किसी शब्द में कर्म भर नहीं पाए,
तो हम शब्दकर्म से ही पाट देंगे तुम्हारे बाग
उगाएंगे वहां खरपतवार,
जैसे अच्छा, बुरा, बहुत बुरा,
और फिर उससे भी खराब
कहां जाओगे हमारे कविताओं से भाग कर
हम और लोगों से भी लिखवाएंगे
मेहतर से,
डोम से,
चूड़ीहारिन से,
स्कूल जाने वाली लड़की से,
स्कूल से आकर रोपा जगाने वाली लड़की से भी।
और जब आकाश भर जाएगा हमारे नए उन्मुक्त शब्दों से ,
जब धरती को ढक देंगे हम कविता से
फिर बुनेंगे अपनी नई दुनिया,
तुम्हारे शब्दों से आज़ाद।
कवयित्री मानसी मिश्र, अंबिकापुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। उन्होंने स्नातक की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से की और राजनीति विज्ञान में एम.ए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से पूरा किया है। वर्तमान में वे जेएनयू के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ से पीएच.डी. कर रही हैं। उनकी शोध रुचियों में राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory), पश्चिमी राजनीतिक दर्शन, जेंडर तथा विशेष रूप से आदिवासी पहचान और नागरिकता के प्रश्न शामिल हैं। उन्हें हिंदी कथा-साहित्य में भी गहरी दिलचस्पी है।
सम्पर्क: ईमेल- manasi.surguja@gmail.com
टिप्पणीकार एकता वर्मा, जन्म: 24 अप्रैल 1996
हरदोई, उत्तर प्रदेश से। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय से विश्व साहित्य की अवधारणा और ‘वर्ल्ड लिटरेचर टुडे’ पत्रिका पर शोधरत।
सामाजिक एवं राजनैतिक मुद्दों में विशेष रुचि एवं उन पर लिखीं रिपोर्ट ‘न्यूज़क्लिक’, ‘मीडिया विजिल’ आदि में प्रकाशित।
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका TMYS review के ‘आदिवासी विशेषांक’ जून 23 अंक में कविताएँ प्रकाशित।
कई पत्रिकाओं में शोध-आलेखों का प्रकाशन।
‘रमा मेहता स्मृति लेखन पुरस्कार 2024’ से सम्मानित
संपर्क : ektadrc@gmail.com एवं everma.edu@gmail.com

