समकालीन जनमत
कविता जनमत

भाषा के अनोखे बर्ताव के साथ कविता के मोर्चे पर चाक चौबंद कवि कुमार विजय गुप्त

नवनीत शर्मा


इस कवि के यहां अनाज की बोरियों का दर्द के मारे फटा करेजा नुमायां होता है…। यह उन शब्दों की तलाश में है जो डूबते के लिए तिनका बन सकें…। वह शहर की जलेबीनुमा देह में चाश्नी बन कर दौडऩे की कुव्वत रखता है…। उसकी निगाह में दीवार घड़ी नितांत नए अंदाज में समय का घटना दर्ज करती है…।

वह खंबे के शीर्ष पर टंगी घिरनी में देश को ढूंढ़ता है…। वह उसकी गुमशुदगी का पर्चा छपवाना चाहता है…। अब ऐसे कवि से आप कैसी भाषा की अपेक्षा करते हैं? क्या यह विकल आत्मा छंद में अपनी बात कहेगी? क्या गुरु गंभीर शब्दों में अपनी बात कहेगा? जाहिर है, वह खिलंदड़ेपन का सहारा लेगा।

देश दुनिया और मनुष्य के भीतर के मानस पर गहरी नजर डालने वाला यह कवि कुमार विजय गुप्त है जो जिंदगी की जद्दोजहद के बावजूद भाषा के अनोखे बर्ताव के साथ कविता के मोर्चे पर चाक चौबंद रहता है…। हर दम।

शब्दों की फिजूलखर्ची के इस क्रूर दौर और कहे हुए को दोहराने-तिहराने के युग में कुमार विजय गुप्त के कवि से मिलना उस सवाल का जवाब ढूंढऩा है कि आखिर नया क्या लिखा जा रहा है। कुमार विजय गुप्त बेहद संवेदनशील और महीन आब्जर्वेशन के कवि हैं। उनके लिए कविता बुद्धि विलास का मंच या पांडित्य की जुगाली का माध्यम नहीं है…यहां कविता युग की हर घटना को अपनी दृष्टि से सहेज लेने की पीड़ा है।

इस कवि की पहुंच यथार्थ के उन कोनों तक है, जहां रोशनी अचानक नीम रोशनी और नीम रोशनी अंधेरे में परिवर्तित होने लगती है। लेकिन दुष्यंत ने जैसा कहा था,
देखिए उस तरफ उजाला है
जिस तरफ रोशनी नहीं जाती….

अन्न के सड़ते दानों के लिए कवि कहता है …

किसने बलात उतार लिया उन्हें बीच सफऱ में ही

किन क्रूर पंजों ने कर दिया उन्हें क्षत-विक्षत

कि पड़े हैं वे विकल जमीं पर हतप्रभ आकाश के नीचे

कि काले पड़ गये हैं उनके शरीर सौष्ठव

हाय ! मारे दर्द के फटा पड़ा है बोरियों का करेजा !

अब किसी को बोरियों को बोरियां ही समझना है तो अलग है वरना व्यंजना और जहां तक ले जा रही हैं, वहां सिर्फ रोया जा सकता है।

जब कवि कुछ शब्दों की तलाश में है तो इसीलिए है कि वह कुछ ऐसे शब्द ढूंढऩा चाहता है जो उसकी बात को ठीक समय पर, ठीक जगह पहुंचाएं…। क्योंकि वह शब्दों में व्याप्त सेंस ऑफ फ्यूटिलिटी से जूझ रहा है…और जो लोग शब्दों का यह हाल कर रहे हैं, उन्होंने कैसा मंजर पैदा कर दिया है :

हैरत हुई उन प्रकाण्ड शब्द-विदों पर
जिन्होने बहा दी शब्दों की तिलस्मी गंगा
और प्यासे जन चिल्लाते रहे.. शब्द.. शब्द

कवि बेशक चोरी हुई कविता के लिए मर्सिया पढ़े, बेशक वह शब्दों की खीज की बात करे….मुझे अगर कुमार विजय गुप्त कहीं मुकम्मल दिखते हैं तो वह कविता है कहां हो मेरे देश…।

यह करुण पुकार हर उस व्यक्ति की है जो देश से बेपनाह मोहब्बत करता है…। जिसे पता है कि देश है क्या। इस कविता में विसंगतियों पर प्रहार भी है, कवि की करुणा भी है और समय के प्रश्नों से टकराने का साहस भी।

‘तुम्हें ढूंढ रहा मैं
संसद को घेरे उन खूबसूरत शफ्फाक़ पायों के पास
जिनसे टिके बैठे मिल सकते हो तुम
चिंताओं से घिरे हुए किसी आम आदमी की तरह
तुम्हें ढूंढ रहा मैं
अदालत की पहली सीढ़ी के नीचे
जहाँ तुम गिरे मिल सकते हो मर्माहत
मुकदमा हार चुके किसी बेगुनाह की तरह’

समय के प्रश्न सबके पास हो सकते हैं। वे किसी की बपौती नहीं लेकिन बड़ी बात को यूं कहने का अंदाज कुमार विजय गुप्त की शिनाख्त बनता है :
मैं तुम्हें ढूंढ रहा हूँ मेरे देश
उन किसानों की लटकी हुई जीभों में
जिनकी हत्या-आत्महत्या पर हो रही माथापच्ची
तुम्हें ढूंढ रहा मैं
उन स्त्रियों की संज्ञा-शून्य आँखों में
जो शिकार हुई है विक्षिप्त-विकृत वासनाओं का

यही कविता अंत तक आते-आते कुछ ऐसे सवाल पूछती है जो निरुत्तर करते हैं, कवि यह सवाल सबसे बड़ा सवाल बन कर उभरता है :

कभी सोचता हूँ
कि बंटवा डालूँ तुम्हारी गुमशुदगी के पर्चे
कि कोई लाकर सौंप दे मुझे मेरा देश
परन्तु क्या छपवाऊं उस पर्चें में
कि जाने कैसा है तुम्हारा रंग-रूप
जाने कैसी है तुम्हारी कद-काठी कैसे परिधान
कि बोल भी सकते हो या नहीं तुम अपना नाम

कुमार विजय गुप्त नौकरीपेशा और परिवार के आदमी हैं, यारबाज़ हैं…. न तीन में न तेरह में हैं…इसलिए वह सब कहते हैं जो कहा जाना चाहिए। आइए…समय के शम्मादान में अपनी सूरत इन कविताओं के बहाने देखें।

कुमार विजय गुप्‍त की कविताएँ

 

1. सड़ रहे अन्न के दाने

अन्न के उन दानों को
पहुंचना था जरूरतमंद की थालियों तक
उतरना था निवाला बनकर भूखे हलकों में
बनना था उनके सफ़ेद अन्तः को रक्त लाल
दीखना था उन्हें नयी उर्जा की शक्लों में

कि उन दानों ने तय किया था
अंखुआने से लहलहाने तक का सफ़र
कि उन्होंने सुने थे खून-पसीने के गीत
कि सपनों के सुंदर साकार थे वे
कि उम्मीदों के रसमय आकार थे वे

किन्तु हाय !
किसने बलात उतार लिया उन्हें बीच सफ़र में ही
किन क्रूर पंजों ने कर दिया उन्हें क्षत-विक्षत
कि पड़े हैं वे विकल जमीं पर हतप्रभ आकाश के नीचे
कि काले पड़ गये हैं उनके सौष्टव शरीर
हाय ! मारे दर्द के फटा पड़ा है बोरियों का करेजा !

न पंछी चुग रहे हैं
न गिलहरियाँ न बकरियाँ ही मुंह लगा रही हैं
मानो उन दानों पर नहीं लिखा है किसी का नाम
जबकि कुछ शातिर कीड़े ढूंढ रहे उनमें अपने हिस्से

मिटटी और पानी के बीच
सड़ रहे ये अन्न के दाने महज़ दाने नहीं हैं
कुव्यवस्था के चक्रव्यूह में घिरकर
मारे गए किसान के शरीर हैं विदीर्ण अपघटित !

 

2. तलाश रहा मैं कुछ शब्द ऐसे ….

कहाँ से शुरु करुँ कि नहीं मिल रहे शब्द

उन चंचल वाचाल ऑंखों से शुरु करुँ
जो बह रही थीं निः…शब्द
और बॉधने के लिए नहीं थे मेरे पास शब्द
या शुरु करुँ उन आदरणीय दिवंगत से
जिनको अर्पित करने थे श्रद्धा के दो शब्द-सुमन
पर देर तक अवरुद्ध रहा मेरा गला

शब्दहीनता की एक स्थिति वह भी रही
जब अर्से बाद मिला था मेरा दोस्त जिगरी
और हर्षातिरेक में मैं रहा बावला

मेरे शब्द प्रबल हैं या मेरी कोमल भावनाएं
शब्दों को लेकर मुझमें इतने अंतर्द्वंद
और उधर शब्दों का इतना वितंडा

उधर… उस तरफ शब्द
पत्थरों की तरह फेंके जा रहे
तीलियों की तरह घिसे फेंके जा रहे
तीर तलवारों की तरह चलाये जा रहे
और इस वीभत्स मारा-मारी आपाधापी में
लहूलुहान शब्द चीख पुकारते रहे शब्द.. शब्द

कहीं शब्दों को शाक-सब्जियों की तरह तोले जा रहे
कहीं माल-मवेशियों की तरह हंकाये जा रहे
तो कहीं मछलियों की तरह फांसने शब्दों को ही
बडी साफगोई से बुने जा रहे शब्द-जाल

कहीं शब्द हैं तो अर्थ नहीं
अर्थ हैं तो भावनाएँ नहीं
भावनाएँ हैं तो संभावनाएँ नहीं

हैरत हुई उन प्रकाण्ड शब्द-विदों पर
जिन्होने बहा दी शब्दों की तिलस्मी गंगा
और प्यासे जन चिल्लाते रहे.. शब्द.. शब्द

आखिर कहाँ हैं वे शब्द
जो डूबते के लिए बन सके तिनके

न शब्दों की तिज़ारत करने
न ही करने शब्दों की बाज़ीगरी
तलाश रहा मैं कुछ शब्द ऐसे
जिनसे शुरु कर सकूँ मैं वह व्यथा अनकही…

 

3. झूठ-मूठ

हरेक झूठ की एक मूठ होती है
जिसे मजबूती से पकड़े रहता है झूठ
जिधर भी जाता साथ लिए चलता है
जैसे हत्यारा हर वक्त साथ रखता है
अपना प्रिय हथियार

बड़े ही जतन से झूठ
नक्काशीदार बनाकर रखता है मूठ को
बताता फिरता है इसकी अपरिहार्यता
मूठ में भरता है सौंदर्य का सम्मोहन

मूठ थामने से पहले
झूठ उतार देता है अपना पुराना सफ़ेद लिबास
धारण कर लेता है रंग-बिरंगा चमचम चोला
जिसमें बड़ा भव्य और दिव्य दीखता है झूठ
अकड़ते हुए अत्याधुनिक तानाशाह की तरह

झकाझक दिन के घुप अँधेरे में
थामे हुए मूठ निकलता है झूठ
सरेआम द्विखंडित कर देता है सचमुच को ;
सच और मुच अलग-अलग छटपटाते हैं
और हम आँख मूंदे ,बाजू से गुजर जाते हैं !

4. शुक्रिया शहर !

इसी अजनबी शहर में कभी
दुरदुराया गया चौतरफा
टोव्वाता रहा कुत्ते-सा दुम दबाये

प्रदूषित हवाओं से छाना
फेफड़ा-भर ऑक्सीजन
कृत्रिम लाईटों से निकाल ली
आँख-भर रोशनी

यहीं देखा छक्के का सातवाँ पहल
यहीं पाया आठवां रंग
यहीं बितायी जुम्मे-जुम्मे के बीच नौवीं रात
यहीं चखा दसवां रस
यहीं बढ़ा ग्यारहवीं दिशा की ओर …

यहीं पर सींखी संकेताक्षरों जैसी भाषा
भाषा के भीतर की भाषा
भाषा के आजू-बाजू की भाषाएँ

नाले जैसे बजबजाते इसी शहर में
ढूंढ लिया लात धरने भर की जगह
आंतनुमा घुमावदार गलियों में
साबूत रह गया जोंक-सा चिपका हुआ

शुक्रिया शहर !

अब दौडूंगा तुम्हारी जलेबीनुमा देह में
चासनी की तरह मिठास बनकर .

5. घोड़े दौड़ रहे हैं

दौड़ाये राजे रजवाड़ों ने
दौड़ाये सामंतों सुल्तानों ने
दौड़ाये साहूकारों जमींदारों ने
और अभी भी दौड़ाये जा रहे घोड़े

हरेक ऋतुओं में दौड़ रहे घोड़े
हरेक दिशाओं में दौड़ रहे घोड़े
कि उनके थूथनों पे लगा है जिन्दा लहू
उनके खुरों में फंसी मासूम चीखें

रौंद रहे खेत-खलिहान
उजाड़ रहे बाग-बगीचे
झुग्गी झोपड़ियों तक को नहीं वख्श रहे
बेलगाम दौड़ रहे घोड़े

आकाश में देवतागण
छतों पे बुद्धिजीवीवृन्द
नाले के किनारे भीड़ भेंड़ दीन हीन
हाथभर की दूरी से गुजर रहे घोड़े

सर्द और निस्तब्ध रात
नालों टापों के उन्माद का सही वक्त
घोड़ों ने झोंक दी है सारी शक्ति

इधर दौड़ रहे घोड़े
उधर खुश हैं घुड़सवार
कि जहां तक दौड़ जायेंगे घोड़े
वे सारे होंगे उनके अपने
गोया यह धरती, घरती नहीं
उनका रेस ग्राउंड हो !

6. चोरी हो गयी कविता के बारे में

देखिये , उधर देखिये
वही है चोरी हो गयी मेरी कविता
देखिये, चोर ने कैसे चिपका दिया है अपना नाम
आधिपत्य जमाये कैसा मुस्कुरा रहा वह शातिर
कैसा मज़ा ले रहा बधाइयों की बरसात का
चोर कहीं का !

किससे कहूँ , कैसे कहूँ , पेशोपेश में हूँ
इतना चिलप्पों मचाना भी ठीक नहीं
लोग कहेंगे मुझे ही सावित करने के लिए
शिकायत में इधर-उधर हुआ तो उल्टा मुझ ही पर करेंगे शक
टाल भी सकते हैं,चलो आपकी कविता का उपयोग तो हो रहा है !

अजीब उलझन है
क्या मेरी कविता सचमुच उस चोर की हो गयी है !

देखिये , उधर देखिये
कैसे मेरे शब्द मेरी ओर याचनापूर्वक टुकटुक ताक रहें हैं
जैसे अपहृत बस की खिड़कियों से झांकते होंगे दहशतज़दा लोग
देखिये , कैसे मेरी पंक्तियाँ अपनी बाहें फैला रहीं हैं मेरी ओर
दो पंक्तियों के बीच की भावनाएं मार रहीं जोर
मेरे ज़ज्बात से लिपट कर रोने के लिए
और शीर्षक तो जैसे चीख-चीख कर पुकार रहा हो मुझे !

अजीब ढीठ चोर है
मेरी ओर तकता तक नहीं ,जैसे मुझे जानता भी नहीं ,
उफ्फ ! किस थाने जाऊं, रपट लिखाऊं !

पता नहीं कैसा सलूक करेगा वह शातिर मेरी मासूम कविता के साथ
जबकि मेरी आत्मा रो रही है इधर
चोरी हो चुके नवजात शिशु की माँ की तरह !

7. दीवार-घड़ी

ठीक नीचे लटका था
दिन-दिनांक व मुलायम चेहरेवाला कैलेंडर
पीठ पीछे मकड़ी बुन रही थी संबंधों के जाले
ऊपर ‘ कुम्हरवा ‘ ने बना रखा था घरौंदा
जबकि जरा हटकर
दीवार के जिस्म पर रेंग रही थी इक छिपकली
एक बेखबर फतिंगे पर घात लगाये

दीवार के सीने में ठुकी थी दर्द भरी इक कील
बेपर्द बाहर धड़क रहा था दीवार का दिल
हमारी साँसों की लड़ियों से संगत करता हुआ

इस उपहार को पाने से ज्यादा खुश थे हम
इसे सिरहाने के ठीक सामने दीवार पर टांगकर
कि वक्त को कब्जे में रखना
यक़ीनन है ख़याल एक खुशनुमा

उन तीन काँटों को देखते रहे हम
करते रहे समझने की कोशिश
वक्त के चंचल मिजाज़ को
जबकि, समय था कि सरकता रहा सतत
कभी पैरों के नीचे से
कभी सर के ऊपर से
तो कभी शरीर के अगल – बगल से
छुआ-छुई खेलता हुआ

वैसे भी , समय कोई मदमस्त हाथी नहीं
कि संचालित रहे गजारे की नोक के आगे
कि समय तो होता हवा-सा बहता
रौशनी की पीठ पर सवारी गांठता
मुट्ठियों की गिरफ़्त से परे

कि अचानक इक रात
छितरा गये तीनों के तीनों कांटे
जैसे भागती भीड़ के बीच चित्त पड़ी कोई लाश

अलबत्ता, उस वक्त दीवार पर
न थी वह शातिर छिपकली
न ही वह मासूम फतिंगा
कैलेण्डर में मुस्कुराता रहा
सिर्फ वह मुलायम चेहरा !

8. इस वर्ष भी …..

बीते वर्ष की तरह इस वर्ष भी
बड़े ही विश्वास के साथ तुम बिछाओगे शब्द-जाल
मौसम व जीभ की लार के हिसाब से
बिखेरकर वायदों के लुभावने दाने
छिपकर करोगे इन्तजार हमारे फंस जाने का ;
हम आयेंगे इस वर्ष भी
परन्तु रट्टू तोते की तरह जाल पर बैठेगे नहीं
बल्कि ढूंढ निकालकर करेंगे तुम्हें बेनकाब !

बीते वर्ष की तरह इस वर्ष भी
टेबोगे तुम भीड़-भड़क्केदार जगह
डमरू डमडमाकर जमाओगे मजमा
सांप-बिज्जी का खेल दिखाओगे
फिर बेचने निकालोगे सर्प-दंश-काट की ताबीज ;
हम आयेंगे इस वर्ष भी
परन्तु अपने साथ लेकर कुछ विषैले सांप
कहेंगे तुम्हें अपने पर ही जांचने ताबीज !

बीते वर्ष की तरह इस वर्ष भी
तुम सजाओगे हमारे खिलाफ चक्रव्यूह
इसके दरवाजों पर खड़े करोगे
दुर्योधन….जयद्रथ….शकुनि जैसे विवाद
खौफ़नाक खूनी इरादे लिये ठोकोगे ताल ;
हम आयेंगे इस वर्ष भी
परन्तु गर्भ में रह जगाए रखकर मां को
पिता से चक्रव्यूह वेधन के सारे गुर सीखने के बाद !

9. कहाँ हो मेरे देश ?

तुमसे मिलने की एक बेचैनी-सी तारी है मुझमें
मेरे देश, तुम कहाँ हो ?

तुम्हें ढूंढ रहा मैं
मस्तक ऊँचा कर लहरा रहे तिरंगे में
उसकी तीन पट्टियों के रंग में
उसके अशोक चक्र की तीलियों में
उसकी रस्सी के लिपटे हुए धागों में
खंबे के शीर्ष पर टंगी उस घिरनी में भी
जिसके सहारे ऊपर-नीचे सरकाया जाता है तिरंगा

तुम्हें ढूंढ रहा मैं
संसद को घेरे उन खूबसूरत शफ्फाक़ पायों के पास
जिनसे टिके बैठे मिल सकते हो तुम
चिंताओं से घिरे हुए किसी आम आदमी की तरह
तुम्हें ढूंढ रहा मैं
अदालत की पहली सीढ़ी के नीचे
जहाँ तुम गिरे मिल सकते हो मर्माहत
मुकदमा हार चुके किसी बेगुनाह की तरह

तुम्हें ढूंढ रहा मैं
नगरों-महानगरों में वहाँ के ऐशो-आराम में
तुम्हें ढूंढ रहा मैं
मलिन बस्तियों में उसकी दुखती हुई रगो में

मैं तुम्हें ढूंढ रहा भोर के उज़ास में
मैं तुम्हें ढूंढ रहा धुंध-धुएं-धूल में
मैं तुम्हें ढूंढ रहा घुप्प अँधेरे में

मैं तुम्हें ढूंढ रहा हूँ मेरे देश
उन किसानों की लटकी हुई जीभों में
जिनकी हत्या-आत्महत्या पर हो रही माथापच्ची
तुम्हें ढूंढ रहा मैं
उन स्त्रियों की संज्ञा-शून्य आँखों में
जो शिकार हुई है विक्षिप्त-विकृत वासनाओं का

तुम्हें ढूंढ रहा मैं
उन भूखे बच्चों के कपोलों पर आंसू के सूखे धब्बों में
जिन्हें मां ने सुला दिया है भेड़िये का डर दिखाकर
तुम्हें ढूंढ रहा मैं
उन भटके नौजवानों के दिल-दिमाग में भी
जिनके लिये देश हो सकता है किसी एलियन जैसा

वाद और वादों के कूड़े-कर्कट को
उलट-पलट कर ढूंढ रहा मैं तुम्हें
कि कहीं इसकी सड़ांध में दम तोड़ तो नहीं रहे तुम !

मैं तुम्हें ढूंढ रहा हूँ मेरे देश
पोस्टरों में जुमलों में झंडों में नारों में
खबरिया चैनल की बौद्धिक बहसों में
उन लाठियों में भी ढूंढ रहा मैं तुम्हें
जो भांजी जा रहीं हर असहमति पर

देशप्रेम और देशद्रोह की सीमा-रेखा के बीच
कहीं अदृश्य खड़े तो नहीं तुम भौंचक !

इन दिनों
मुकम्मल होने से पहले उचट जाती है मेरी नींद
किसी अनहोनी की आशंका में
घर का कोना-कोना छान मारता हूँ
झांकता हूँ घर से बाहर आस-पड़ोस
कि उस अज्ञात डर के पीछे कहीं छिपे तो नहीं तुम !

कभी सोचता हूँ
कि बंटवा डालूँ तुम्हारी गुमशुदगी के पर्चे
कि कोई लाकर सौंप दे मुझे मेरा देश
परन्तु क्या छपवाऊं उस पर्चें में
कि जाने कैसा है तुम्हारा रंग-रूप
जाने कैसी है तुम्हारी कद-काठी कैसे परिधान
कि बोल भी सकते हो या नहीं तुम अपना नाम

कभी सोचता हूँ कि करवा दूँ मुनादी
कि लौट आओ चले आओ मेरे पास
कि तुमपर गर्व करना चाहता हूँ
चाहता हूँ मर-मिटना तुम पर
ओ मेरे प्यारे देश !

10. पत्थर की पीड़ा

नींव में बोया हुआ सुंदर सपना नहीं मैं
पक्की छतों में पैवस्त वरदहस्त नहीं मैं
सड़कों में दफ़न राहगीरों का सुख नहीं मैं
राह में ठुकराया गया लावारिस पत्थर नहीं मैं
न ही , सिर उठाये खड़ा मील का कोई पत्थर मैं

पहाड़ी नदी में लुढकता हुआ गोल रूपाकार नहीं
पहाड़ से टूटकर गिरता घायल अनगढ़ आकार नहीं
तराश कर उभारी गयी कलात्मक कृति नहीं
मेहनतकश की भूख से तोड़ा गया टुकड़ा नहीं
पूजन किये जानेवाला पत्थर तो हरगिज़ नहीं !

मुझे गौर से देखो मह्सूसो मेरी वेदना
किसी सिरफिरे हाथ से चलाया गया पत्थर हूँ मैं
कि विश्वास का शीशा चकनाचूर हुआ है अभी-अभी
गौर से पहचानो मेरा लाल रंग बाहरी
कि निर्दोष लहू से नहलाया गया है मुझे अभी-अभी !

11. ट्रेन में ताली

अन्य तालियों से बिल्कुल अलग थी वह ताली

उस एक ताली में
आह्लादित करनेवाली कोई बात नहीं थी
न ही कोई उन्माद था उसकी ध्वनि में
जोश जैसा कोई स्वर तो हरगिज़ नहीं था

वह महज एक ताली थी
जिसकी कोई आवृति नहीं थी
जिसका कोई कोरस नहीं था
गूंज अनुगूँज प्रतिगूंजों से महरूम थी वह
इसलिये उसमें संगीत की कोई गुंजाइश नहीं थी

सिर्फ़ ‘ ठक ‘ जैसी अकस्मात आवाज नहीं थी वह
बल्कि सायास बजायी गई थी सिर्फ़ तल्हत्थियों से
जिसमें एक धमक थी मुकम्मल खनक से लबरेज़

ट्रेन में बजी उस एक ताली से
चौकन्नी हो गयी आसपास की हवा
बाहर की ख़ूबसूरत दृश्यावलियों में खोयी नज़रें
छिपने लगीं अचानक इधर-उधर
गतिशील जीवन में एक गैरजरूरी दखल थी वह ताली !

उस एक ताली के बाद
दूसरी, तीसरी, फिर चौथी ताली भी बजी
ठीक उस पहली ताली की ही तरह
किन्तु अलग-अलग दिशा और कोण लिये हुए
अलग-अलग चेहरे के सामने
कुछ नितांत जरूरी सवालों के जवाब तलाशती हुई

दरअसल भिन्न-भिन्न हथेलियों से बजी
वे विभिन्न किस्म की तालियाँ थीं
जिनकी आर्तनाद और वेदनाएं एक ही जैसी थीं
मानो अलग-अलग होकर भी वे एक ही ताली हों !

उन तालियों ने ओढ़ रखे थे कुछ शरीर
जो न पूर्ण पुरुष थे , न ही पूर्ण स्त्री
स्त्रियोचित लिबास में लिपटे हुए
प्रकृति की अधूरी कल्पना थे वे शरीर उपेक्षित
जिन्हें ईश्वर की अक्षम्य भूल भी कहा जा सकता है

तालियाँ चुमकार रहीं थीं
आशीष रही थीं बच्चों को
जो उनके निजी जीवन में कहीं भी उपस्थित नहीं थे
जबकि कहीं-न-कहीं से छलक रहा था उनका वात्सल्य

उस एक ताली के उपरान्त वह ताली
आगे पसार रही थी अपनी हथेलियां
थोड़ी शरारत थोड़ी उद्दंडता पूर्वक
परन्तु उनमें भी कुछ मजबूरियाँ थीं कुछ विवशतायें थीं
जबकि उस वक्त कुनमुना रही थीं हमारी भरी हुई जेबें

महज़ एक ताली से हम सभी निबट रहे थे जैसे-तैसे
मानो हमारे सुरमय सफ़र में कोई बेसुरी तान हो वह !

अब जबकि
वह ताली हमारी आँखों से ओझल हो चुकी थी
और किसी आपदा से निबटने के बाद इत्मीनान-से थे हम
कि यकायक फिर से बजने लगी वह ताली
सामने दृश्य बनकर हमारी देह के इर्द-गिर्द
अपनी खोयी हुई गूंज, अनुगूँज और प्रतिगूंजों के साथ !

12. चौराहे पर इंतज़ार

ठीक उसी जगह, उसी चौराहे पर खड़ा हूँ मैं
जहाँ पर आने का तुमने भरोसा दिया था
वादा किया था मुझे साथ लेकर आगे बढ़ने का

तुमने कहा था कि यहाँ से फूटते हैं कई रास्ते ;
पहले मुझे भी यही लगा था, जब आठ रास्ते दिखे थे
फिर भ्रम ज़रा भभरा ,अरे ये तो चार हैं
अंततः देखकर हुआ हैरान कि ये तो महज दो हैं
दो विरोधी विकल्प एक दूसरे को परस्पर काटते हुए
जिनके कटान बिंदु पर खड़ा हूँ मैं किंकर्तव्यविमूढ़

तुमने मुझे समझाया था
कि ये सारे रास्ते मेरी तरफ आयेंगे
मेरी खिदमत में मेरे समक्ष नतमस्तक
जबकि अब यह साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है
कि ये रास्ते भाग रहे हैं मुझसे दूर बहुत दूर

मैं देख रहा हूँ कि इस चौराहे का चारो कोना
मेरी ही ओर मुखातिब हैं प्रश्नचिन्ह की तरह
एक हँस रहा है दूसरा शांत क्लांत
तीसरा रो रहा है जबकि चौथा काफी गुस्से में
उन्हें भी तुम्हारा ही इंतज़ार है !

मेरे चारों ओर दुनिया चाक-सी चक्कर खा रही है
भीड़-ही-भीड़ है बेतहाशा भागमभाग
मानो यह जिंदगी, जिंदगी नहीं कोई रेस हो !

मेरा सर चकरा रहा है यहाँ खड़े-खड़े !

यह सही है कि यहाँ से बहुत कुछ दिख रहा है
सत्ता का ऊँचा शीर्ष , न्याय का झुका हुआ तराजू
सुन्दर इमारतें ,चौड़ी सड़कें, मनमोहक बाग-बागीचे
सभ्य सुशील मासूम चेहरे , दृश्य-अदृश्य बहुत कुछ ;
किन्तु तुम नज़र नहीं आ रहे !

मैं उसी चौराहे पर खड़ा हूँ बिजुकेनुमा एक बुत के पास
तुम्हारे ही इंतज़ार में विकल बेकरार
और हाँ, यह बता दूँ मेरे साथ खड़ा है सारा-का-सारा देश!

___________________

(कवि कुमार विजय गुप्त
स्नातक (विज्ञान)
जन्म :1966 में
करीबन सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएं , कुछ लघुकथाएं भी
मात्र एक काव्य पुस्तिका खुलती हैं खिड़कियां 1998 में
सम्प्रति : रेल सेवा
email : [email protected])

टिप्पणीकार नवनीत शर्मा 22 जुलाई, 1973 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्‍मे नवनीत ग़ज़लगो हैं, कविताएं भी लिखते हैं। एक कविता संग्रह 2016 में बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित। आजकल हिमाचल प्रदेश में एक राष्‍ट्रीय दैनिक के राज्‍य संपादक हैं। ईमेल : [email protected])

 

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