समकालीन जनमत
कविता

कुमार लव की कविताएँ शब्दों तथा दृश्यों का सुंदर समन्वय हैं

चित्रा पंवार


‘कविता वह सुरंग है जिसके भीतर से मनुष्य एक विश्व को छोड़कर दूसरे विश्व में प्रवेश करता है’ यकीनन हिंदी के महान कवि व लेखक रामधारी सिंह दिनकर ने यह बात यूँ ही तो नहीं कही होगी।
प्रत्येक कविता अपने में एक नया विश्व, एक नई दुनिया है, विश्वास न हो तो कविताओं में उतर कर देख लीजिए!
फिलहाल मैं आपको लेकर चलती हूँ कुमार लव की कविताओं की दुनिया में–

‘एक माँ की उनासीवीं आह’, इस कविता में
कवि स्वतंत्रता दिवस के बहाने देश को एक माँ के रूपक में प्रस्तुत कर रहे हैं जो अब उनासी साल की बुजुर्ग हो चली है, लाचार है, हालातों के हाथों ज़ख्मी है, प्रदूषण, हत्या, बेरोजगारी, आपसी वैमनस्य, ख़राब बुनियादी व्यवस्था के कारण दुःखी है, जो पीड़ा तथा क्रोध के तीव्र आवेग में कह उठती है–
‘बधाई उन ऊंची अलमारियों के लिए
जहाँ तुम्हारा भविष्य चुपचाप सो रहा है
धूल ओढ़े
कभी ध्यान से देखना पास से–वह जले हुए वादों की राख है
मेरे बच्चों के भूले–बिसरे सपनों का मलबा है।’

वहीं ‘वोट चोरी, अध्याय दो–सत्य की सभा से’, कविता देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर लिखी गई कविता है, जब एक जागरूक नागरिक, साहसी कवि अपने समय की आँख में आँख डालकर सवाल–जवाब करता है तो उसकी बात अपने आप में एक तेज़ धार हथियार की तरह काम करती है–
लोग सुनें, लोग देखें
और वही तय करें –
अपराध किसका
और मैं कौन…”

‘बानू मुश्ताक को पढ़ते हुए’, कविता लिखते हुए कवि एक स्त्री के रचना संसार से उसके जीवन संसार में प्रवेश करने का प्रयास करते हुआ दिखाई देता है, जिसमें स्त्री जीवन की चुनौतियों, संघर्षों, लड़ाइयों तथा भावनात्मक जमीन की उठापटक के साथ–साथ सवालों–जवाबों के समंदर में डूबने उतरने की कोशिशें सफल होती दिखाई पड़ती हैं, एक बानगी यहाँ देखिए –
‘आपकी नज़र लिस्ट से हटती है
और मोबाइल की नीली रोशनी पर टिक जाती है
एक ख़बर है –किसी और शहर की,
किसी और आप जैसी औरत की,
जिसने कल बोलने की हिम्मत की थी..!

बांग्ला के सुप्रसिद्ध कवि जीवनानंद दास की सुप्रसिद्ध कृति, ‘बनलता सेन’ पर आधारित कविता ‘चिड़िया के घोंसले सी आँखें’ शिल्प, कहन, गति, लय तथा कविता कहलाए जाने के अन्य मानकों पर एक सुंदर कविता कही जा सकती है।
श्वेता शिरसाट जो उगते सूरज से बस कुछ ही कदम बाद चलना शुरू करती है और दिन के तमाम उतार–चढ़ावों से गुजरते हुए शाम के उस बिंदु को पा लेती है जो उसे उसकी आँखों में बने घोंसले तक लेकर जाता है, श्वेता शिरसाट की आँखें हर एक उस लड़की की कहानी है जो दिन की उजली धूप सरीखी है।

‘दीवारें अब समुद्र तट हैं ’ घर का समुद्र जैसा पानीदार, दीवारों का समुद्र तट तथा फर्श का रेत सा नम होने की कविता है।

‘तालाब चोर’ प्रकृति की अनछुई निर्मलता को बचाने का सुंदर उपक्रम रचती हुई कविता है, हाँ इस कविता में कुछ जगहों पर अनावश्यक विस्तार दिखाई पड़ते हैं जो सही दिशा की तरफ जाते–जाते पाठक को चकमा देकर अचानक बगल से गुज़र जाते हैं और पाठक कविता का जो सिरा छूट गया है उसे पकड़ने के लिए एक बार फिर कविता को दो–तीन पंक्ति ऊपर से पकड़ने के लिए दौड़ पड़ता है। फिर भी कुल मिला कर इस कविता को नज़रंदाज नहीं किया जा सकता है।

नई व्यंजना कविता में अज्ञेय लिखते हैं–
‘तुम जो कहना चाहोगे विगत युगों में कहा जा चुका’

माना कि सब कुछ पूर्व में ही लिखा/ कहा जा चुका है परन्तु उस पूर्व में कहे गए, लिखे गए के कहने के अंदाज हमेशा नए होंगे, जितनी बार, जितने लोग जो भी पूर्व में कहा गया, लिखा गया दोहराएंगे वह नया होगा और उस नए का पूरा–पूरा होगा जो उसे कह रहा/लिख रहा होगा।
हर एक कविता, हर एक कहानी, हर बार किया गया प्रेम पहले से बिल्कुल अलग और सबसे पहले कहे गए जितना ही नया एवं मौलिक होगा।
कुमार लव शब्दों तथा दृश्यों के कवि हैं, आशा करती हूँ कवि के शब्द मारक पंक्तियों में ढलते रहेंगे तथा कुमार लव इसी प्रकार सुंदर शब्द भंडार तथा दृश्यों से जरूरी कविताएँ रचते रहेंगे, मेरी शुभकामनाएं!

 

कुमार लव की कविताएँ

1. एक माँ की उनासीवीं आह

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ, मेरे बच्चो।
एक और वर्ष बीत गया।
बधाई हो।

बधाई कि तुमने तैरना सीख लिया
मेरी उन नगरियों में जो पंद्रह मिनट की बारिश में डूब जाती हैं।
बधाई कि मेरी काँपती पहाड़ियों की सिलवटों में
घर सी लिए हैं तुमने,
और उस कीचड़ को जो निगल जाती है तुम्हें पूरा
बस एक हादसा कह आगे बढ़ जाते हो —
अनसुनी कर मेरी पुकार, भुला कर मेरे आँसू।

सलाम है तुम्हारे उन प्राणों को
जो राख भरे आसमान से
खींच लाते हैं ऑक्सीजन।
सलाम उस जज्बे को
जिससे रोज सुबह उड़ा देते हो मुझे
धुएँ का एक नया कफ़न।

मैं फूली नहीं समाती तुम्हें कतारों में खड़ा देख,
वोट देने को,
फिर चाहे गौधूलि में
खो जाती हो तुम्हारी आवाज।

बधाई उन ऊँची अलमारियों के लिए
जहाँ तुम्हारा भविष्य चुपचाप सो रहा है
धूल ओढ़े।
कभी ध्यान से देखना पास से — वह जले हुए वादों की राख है,
मेरे बच्चों के भूले-बिसरे सपनों का मलबा है।

उनासी साल।
तुम कितने कुशल हो गए हो
मेरे सुंदर, जख्मी शरीर पर जीने के।
मेरी टूटी हड्डियों, रिसते घावों पर चलने के।
स्वतंत्रता दिवस मुबारक हो।
आखिर तुम मुझे कितनी सहजता से सह लेते हो।

2. वोट चोरी

पहला अध्याय: अशांत साम्राज्य

कहो, हे लोकतंत्र की आत्मा—
तुम, जो करोड़ों दिलों की धड़कन हो,
तानाशाहों के अंत की घोषणा हो,
और वह शपथ हो
जो हमने रक्त-भीगी, लंबी रातों में ली थी।

तुम, जो आधी रात के शंखनाद से जन्मीं,
जिसका कोमल शासन समय पर भी है भारी,
जिसका सिंहासन सोने का नहीं
बल्कि उस भरोसे का बना है
जो आम-से हाथों को आम-सी धूल से उठाता है।

आज मेरी आवाज में बोलो,
मेरे शब्दों से खोलो
वे पतली ज़ंजीरें
जो चुपचाप चढ़ गई हैं
इस देश पर।

उस घाव को दिखाओ—
जो न रिसता है, न भरता है,
उस फुसफुसाहट-सी चोरी को
जो धीमी, गहरी, और अदृश्य है।

क्योंकि उन कक्षों में,
जहाँ पवित्र अंक सोते हैं
और गंभीर रहस्य छिपाए जाते हैं,
वहाँ एक परछाईं उतर रही है,
एक संदेह पनप रहा है,
और कुछ बहुत जरूरी ओझल हो रहा है।

मैं साँस तो ले रहा हूँ—
पर क्या यह साँस मेरी अपनी है?
नींव के पत्थरों में एक कंपन दौड़ रहा है।

कहो, हे आत्मा—
कैसे एक अदृश्य हाथ
पूरे देश का भविष्य चुरा ले जाता है।

एक प्रहरी था इस साम्राज्य का—
कइयों में एक—
न ताज, न सम्मान,
बस यह दायित्व कि पलक झपके बिना देखे।

दिन उसकी पीठ पर बोझ-से चढ़ते,
रातें कागज़ों की गंध और
स्याही के धब्बों में डूब जातीं।
कभी आँखें जलतीं,
कभी उँगलियाँ सुन्न हो जातीं—
पर संदेह का वज़न
हर घड़ी थोड़ा और बढ़ जाता।

जब सब सोए थे,
या धूप सेक रहे थे,
वह डूबा था
परछाइयों और
निराशा के दस्तावेज़ों में।

नामों की सूचियाँ,
हर शहर की गिनती—
जैसे साम्राज्य की नदियाँ
समुद्र की ओर बहती।

वहाँ उकेरी पटकथा में मिली
एक गहरी असंगति—
आवाज़ की जगह सन्नाटा,
नामों की जगह एक प्रेत की गूँज।

एक सूक्ष्म दोष
जो नज़र न आए,
मशीनरी के हृदय में
छिपी एक व्याधि।

गणित पक्का—
पर आत्मा खोखली—
राष्ट्र के गीत में एक खोखली ताल।

वह अकेला
संदेह का हाथ थामे,
चल पड़ा फुसफुसाते सवालों के पीछे।

और फिर—
एक छोटे-से धागे ने
मानो किसी अदृश्य करघे में
पूरा षड्यंत्र बुन कर दिखा दिया।

उसने चुना—
ज़मीन का एक सादा-सा टुकड़ा,
जहाँ कारखाने गूँजते हैं,
धूल भरे बाज़ार और तपती गलियाँ हैं।

वहीं, दस्तावेज़ों के पहाड़ में,
उसने देखी —
स्याही और झूठ से जन्मी एक परछाईं
जो डाल आई वोट चार बार।

फिर सैंकड़ों, हज़ारों—
भूतों की सेना,
जिनका घर कागज़ पर था,
पर किसी सड़क पर नहीं।

दस हज़ार मतदाता—
जिनका कोई ठिकाना नहीं,
पर जो थे एक मत।

और एक झोंपड़ी—
जहाँ चार लोग भी न सो पाते,
पर जिसमें समाई थीं
सौ आत्माएँ।

झूठ इतना निडर
कि नक़ाब भी न ओढ़े।

प्रहरी के हाथ अब सबूत था—
वैद्य के हाथ चाकू,
काट कर अलग करे
सड़ते अंग राष्ट्र-तन से।

दूसरा अध्याय: सत्य की सभा

सभा जुटी—
रेशमी वस्त्र, गंभीर मुख,
साम्राज्य के स्तंभ,
ज्ञानी और प्रभावशाली सभी।

प्रहरी उठा—
चेहरा गंभीर मुखौटा,
हाथ खाली।

वाणी धीमी, साफ़, नपी-तुली—
जैसे कोई वैद्य
राजमहल की नब्ज़ टटोलता।

“महाराजगण—
आप देखते हैं यह शरीर,
यह राष्ट्र हमारा।

चेहरे पर विजय की चमक,
साँस गहरी, अंग निर्मल—
पर मैं वह हूँ
जिसने इसकी कलाई थामी,
और वह ज्वर-पत्र देखा
जिसे आप अनदेखा करते रहे।

एक छिपा रोग है—
जो अँधेरों में पलता है।
हड्डी गलाता
रक्त पतला करता है,
भरोसे की कोशिका में
चाकू भोंक देता है।”

मौन छा गया।

साम्राज्य का उच्च पुरोहित उठा—
चेहरे पर तनाव,
आँखें पत्थर।

उसने कहा—
“इस रूपकों की भाषा का यहाँ क्या काम?
नई बोतल में भर ली तुमने पुरानी शराब तमाम।
हम नियम की भाषा बोलते हैं—
सही-ग़लत तय करते हैं
क़ानून के बल पर,
भावनाओं से परे।

तुम्हारे शब्द कोरी गप हैं,
प्रमाण बस स्वप्न—
जब तक उन्हें
कानूनी धारा में बाँधा न जाए।

यदि सत्य है—
काली स्याही से लिख कर दो,
शपथ लो,
परिणाम सहो।

और अगर हिम्मत नहीं
तो क़बूलो कि झूठ है।
निर्णय तुम्हारा है—
शपथ लो या भूल सुधारो।”

प्रहरी उत्तर देता,
उससे पहले ही
सिंहासन से एक प्रभु गरजा—

“महाराज सही है!
यह ग़द्दार है—
जनता की पसंद को नहीं मानता,
आज़ादी की आवाज़ दबाना चाहता है।

खेल हारकर पासे को दोष देता है,
राष्ट्र को रुलाता है
भरोसा धूल में मिलाता है।”

एक और उठा—
होंठों पर उपहास—
“ग़द्दार नहीं,
बस पप्पू।

देशद्रोह नहीं—
बस एक मज़ाक।
इसका प्रमाण?
किसी नाटक की पटकथा।”

प्रहरी सुनता रहा—
तूफ़ान के केंद्र में शांत,
संकल्प अडिग।

वह मुड़ा
सुनहरे आसन, उपहास,
और कानूनी चाल से परे।

सभा से परे—
लोग थे कुछ खड़े
उनकी आँखों में प्रतीक्षा,
संदेह,
आग।

“मेरा वचन ही मेरी शपथ है—
मुक़दमा आज शुरू होता है—
पर तुम्हारे दरबार में नहीं—
हर गाँव,
हर धूल भरी पगडंडी पर।

लोग सुनें, लोग देखें,
और वही तय करें—
अपराध किसका,
और मैं कौन।”

 

3. बानू मुश्ताक को पढ़ते हुए
स्वर्ग में
एक बाग़ है
कई तरह के गुलाब हैं वहाँ
और है एक हरी घास का मैदान
पंछियों के गीतों से भरा

वहाँ, आज सुबह,
फूलों की महक के बीच
घास पर लेटे
धूप सेंक रहे हैं
भगवान

और आप…
कुर्सी के कोने पर सिमटी हैं
लकड़ी की एक बाँह को यों जकड़े
जैसे कोई डूबता पकड़ता है तिनका।

बंद खिड़की के शीशे से
छन कर आती एक फाँक रोशनी में
काँप रहा है आपका हाथ
और उसमें थमा सरकारी कागज़,
चमक रहे हैं काले अक्षर।
अक्षर
जो चुभते हैं आपके हाथों में
बिछाते हैं एक मैदान, काँटों का,
सिर्फ आपके लिए।
आपका खून बहाने के लिए।

उन काँटों के बीच बैठा है एक माली : ‘समझौता’।
कोर्ट की लाल मोहर के नीचे – भद्दा, काला, मोटा।
फाइल नंबर 2847/2025
न्यायाधीश के हस्ताक्षर
और आपकी मौत का हुक्म।

लौटना होगा आपको
उस घर की ख़ामोशी में
जहाँ बर्तनों की खनक में
दब जाती है आपकी आवाज,
होंठों पर ही मर जाती है
आपकी हर बात।
जहाँ बासी हवा में
सीलने लगी हैं आपकी हड्डियाँ।
जहाँ दीवार पर, सुनहरे फ्रेम में
लटकी है आपकी डिग्री –
मास्टर ऑफ़ आर्ट्स।
और ठीक नीचे, मेज़ पर,
कागज़ के एक टुकड़े पर,
आपकी ही लिखाई में:
लौकी।
धनिया।
जीरा।

आपकी नज़र लिस्ट से हटती है
और मोबाइल की नीली रोशनी पर टिक जाती है।
एक ख़बर है – किसी और शहर की,
किसी और आप जैसी औरत की,
जिसने कल बोलने की हिम्मत की थी।
फिर दूसरी।
तीसरी।
चौथी।
हर शहर में हैं आप।
हर ख़बर के नीचे
हज़ारों सवालों की भीड़ है,
हज़ारों उँगलियाँ उठी हैं:
‘कपड़े क्या थे?’
‘घर से निकली ही क्यों?’
‘ज़रूर उसी ने उकसाया होगा।’
‘औरत होकर…’
‘शर्म नहीं आती…’
‘माँ-बाप ने क्या सिखाया…’

स्क्रीन बंद होने तक
सबक़ हो जाता है पक्का :
चुप्पी ही आपका ज़ेवर है,
चुप्पी ही आपका कवच।

और उस कवच के पीछे से
आपकी ख़ामोश नज़र उठती है,
आसमान की तरफ़
उस बाग़ की तरफ़
और आप सोचती हैं…

हे भगवान,
जो धूप
आपकी पीठ सेंक रही है,
क्या उसकी एक भी किरण
इस सीलन भरे कमरे तक नहीं आ सकती?
क्या आपके बाग़ के गुलाब इतने नाज़ुक हैं
कि बर्तनों की खनक नहीं सह सकते?
आपके पंछी इतने डरपोक हैं
कि मेरी आवाज़ सुन कर उड़ जाएँ?
आपने अपने लिए घास का मैदान चुना,
और मेरे हिस्से में
कागज़ पर उगे ये काँटे लिख दिए?
आपने अपने लिए महक चुनी
और मेरे लिए बस सीलन छोड़ दी?
आख़िर आप भी तो
एक पुरुष ही हैं।

अगले जन्म में आप किसी की बेटी बनना।

4. चिड़िया के घोंसले सी आँखें
(जीवनानंद दास की बनलता सेन पढ़ते हुए)

भोर के धूसर कुहासे में
उगते सूरज से बस कुछ कदम पीछे
निकलती है मुंबई की श्वेता शिरसाट—
जैसे हज़ारों साल से चल रही हो इसी सड़क पर,
विदर्भ की अँधेरी रात से, या सिंधु के किसी उजड़े तट से।

उसका ऑटो नहीं, कोई लोहे का थका हुआ कीट है
जो रेंगता है ब्रेक लाइटों की लाल पंक्ति में।
उन दानवी लाल आँखों में
समय—पिघले हुए सीसे सा—रुक जाता है;
और उसकी रीढ़ पर चढ़ता है दर्द—
युगों से सोए ठंडे सर्प सा।

वह बुनती है घड़ी की टिक-टिक में
वक़्त के पंखों की सरसराहट,
मशीनों के रुदन में उसे सुनाई देती है
किसी भूली हुई नदी की आहट।

धूल और धुएँ के कण—
वे कण नहीं, बीते जन्मों की राख हैं,
जो धीरे-धीरे भर रहे हैं उसकी आँखों को।

धीरे धीरे बदल रही हैं वे आँखें
चिड़िया के घोंसले में,
इकट्ठा हो रहे हैं
दर्द और थकान के तिनकें,
जले हुए सपनों के रेशे।

भूखे गड्ढे खा जाते हैं उसकी नींद
हर लमहे में भर जाती है
इंजन की कर्कश ध्वनि।

ट्रैफिक के हॉर्न नहीं, यह तो किसी आदिम पक्षी का क्रंदन है
जो पत्थर और कंक्रीट के जंगल में खो गया है।
ऑटो की पतली छत के पार से जो बरसता है,
वह सूरज नहीं,
अंगार है।

शाम ढलते मिट जाती है दिन भर की थकान,
पर उसकी आँखों में बना वह घोंसला…
वह नहीं मिटता।
वह बन गया है उसकी पहचान
उसका चेहरा —
किसी प्राचीन शिला पर उकेरे चित्र सा।

5. दीवारें अब समुद्र तट हैं
किसी शांत रात को
दीवार पर कान लगाकर सुनना
एक हल्की, तालबद्ध आवाज़ आएगी
उठती-गिरती लहरों की।

यह शहर चोरी का है।
इसकी सीमाएँ एक घाव हैं
बाँधों का, और एक भरोसे का।
वह भरोसा धीरे-धीरे टूट रहा है।
रातों को अब चक्कर काटता है यहाँ
सागर का भूत।

वह भूत साथ लाता है गंध, नमक की
सूखे तट पर रखे गीले पत्थर की
एक खुशबू जो भर देती है हर कोने को
आपके घर के।
जैसे उसी का हो घर, वही हो मकानमालिक।

फिर तख्तों के नीचे से उठती है
खारे पानी की सड़न
जो मिटा देती है पुराने कागजों की,
पुरानी लकड़ी की सीधी-सादी महक।

उस गंध में छिपा है
एक ठंडा, गहरा इंतज़ार।

कमरे की चुप्पी बदल जाती है-
गायब हो जाता है इंसानी यादों का वजन
उसकी जगह ले लेती है
समुद्रतल में छिपी
कोई ईश्वरीय शक्ति,
कुछ कथुलु-सा।

बढ़ती ठंड के साथ
गाढ़ी होने लगती है हवा
किसी गुफा के मुँह जैसी नम।

धीरे-धीरे दीवारें उतारने लगती हैं अपनी खाल,
उभरने लगते हैं नीले छाले,
फूले प्लास्टर से रिसने लगता है
खारा पानी।

और दीवार की खाल के पीछे से
झाँकता है कुछ
गहरा काला –
ज़िंदा अँधेरे सा।

आप पीछे हटते हैं।
आपकी एड़ी धँस जाती है।
जहाँ फर्श था,
अब गीली रेत है।
आपके घर ने भुला दिया है
वह नाम जो उसके आगे लिखा था।
और आप खड़े हैं उस तट पर
जो आपके फर्श से कई मीलों दूर था,
सदियों से इंतज़ार कर रहा था,
आज का।

आपके घर की हवा में तैर रही हैं
कुछ पारदर्शी मछलियाँ,
कुछ जेलीफिश,
दूधिया रोशनी से भरी।

और आपका अस्तित्व
घुल रहा है
लहरों में नमक सा।

और आप खुश हैं।
संतुष्ट हैं।

6. तालाब चोर
दुनिया एक बजबजाई हुई-सी चीज़ हो गई है – रघुवीर सहाय

शहर बस एक बेरंग खाका बनकर रह गया था—
जहाँ कोनों में कटी हुई इमारतें और खोखले वादे थे।
जब से बाज़ार के नीचे से ज़मीन खिसकी थी,
मानो हर चीज़ का अस्तित्व ही डूब गया था।

उसके लिए—उस चालीस वर्षीय आदमी के लिए,
जिसने कभी सिनेमा के लिए डरावनी कहानियाँ रची थीं,
और रचे थे ऐसे व्यंग्य जो नंगी हड्डियों पर चाबुक-से बजते थे—
जीवन अब एक धुंधला, मौन नाटक बनकर रह गया था।

उसके पास बस इतना बचा था कि दिन कटते रहें।
और बचा था समय; इतना कि वह देख सके
कि कैसे उसके अस्तित्व के अकेले कमरे की अकेली खिड़की पर
धूल जमा होती है।

उसकी आँखें, जो कभी कहानियों के लिए मसाला ढूँढ़ती थीं,
अब बस बर्बादी के मंज़र देखती थीं।

पर फिर उसे वह तालाब मिला।
जैसे किसी भूले हुए देवता ने प्रकृति के कैनवास पर
अनायास ही रंग बिखेर दिए हों।
वह उसके जीवन का सबसे अद्भुत दृश्य था।

टेढ़ा-मेढ़ा सा, जैसे कोई नीलम वाला हार टूटा हो।
एक ओर, पुराने पत्थर की सीढ़ियाँ हो रही थीं विलीन
उसके शीतल रहस्य में,
जैसे आमंत्रण दे रही हों किसी दूसरी, बेहतर कहानी में प्रवेश का।

दूसरी ओर, गुलाबी मुख वाले शांत कमलों का एक झुरमुट था—
हर फूल चुपचाप मुँह बाए खड़ा था
इस धूसर संसार के विरुद्ध एक मौन विरोध में।

उसने निश्चय किया—वह इस सौंदर्य को चुरा लेगा।
सिर्फ देखना भर काफी नहीं था, इस पर उसका अधिकार होगा।

इस निर्णय के पीछे कोई उतावला आवेग नहीं था।
यह विचार उसके मस्तिष्क में वैसे ही उतरा,
जैसे किसी अच्छी कहानी का अंतिम दृश्य उतरता है।
जैसे कोई कंकड़ तालाब की गहराई में चुपचाप बैठ जाए।

यही उसकी अंतिम रचना होगी।
वह बस इसी के लिए बचा हुआ था।
चारों ओर फैली निराशा के विरुद्ध विद्रोह,
उसका निजी विद्रोह।

वह, जिसने कभी काल्पनिक राक्षसों और सामाजिक भूतों से लड़ाई लड़ी थी,
अब इस तरल शांति को चुराएगा।

शुरुआत उसने बड़े उपकरणों से नहीं की—
आख़िर उसके पास था भी क्या?
बस एक घिसा हुआ कोट, कुछ टूटे हुए कप,
और वह विशाल, खाली सूटकेस
जो कभी फ़िल्म फ़ेस्टिवल के सपने लेकर घूमता था।

नहीं, उसने शुरुआत की अपने हाथों से—
उन्हीं हाथों से जिन्होंने कभी भय और हास्य की दुनिया रची थी।

वह मुँह-अँधेरे तालाब के पास पहुँचता,
जब शहर की साँसें धीमी पड़ जातीं।
वह पत्थर की उन सीढ़ियों पर बैठ जाता
जो सीधे सौंदर्य के हृदय में उतर रही थीं
और एक प्याला, फिर दूसरा,
पानी की साफ़, ठंडी सतह में डुबोता।

हर बूँद एक पिघले हुए रत्न की तरह चमक उठती।
कमल चुपचाप देखते रहते।

वह इन कीमती बूँदों को एक पुराने थर्मस में भरता।
भरता प्लास्टिक की बड़ी-बड़ी बोतलों में,
जिन्हें उसने शहर की गली-गुलियों से खोज निकाला था।

वह हर बोतल को उसी श्रद्धा से साफ़ करता,
जिससे वह तालाब को देखता था।
यह कोई लूट-पाट नहीं थी, बल्कि एक पवित्र काम था—
तालाब की आत्मा का स्थानांतरण।

दिन हफ़्तों में बदलते गए।
हर सुबह उसे अपनी तपस्या में डूबा हुआ पाती।
थर्मस और बोतलें जल्द ही अपर्याप्त साबित हुईं।

तब उसने अपने उस सूटकेस को कुछ बदल लिया।
कभी उसमें लगा था एक भूले हुए जीवन के फूलदार कपड़े का अस्तर।
अब उसमें लगा गलियों से इकट्ठे किए प्लास्टिक के टुकड़ों से बना अस्तर।
सटीकता से टेप लगाकर जोड़ा हुआ।
और तैयार हो गया उसका विचित्र, जादुई बर्तन।

धीरे-धीरे, वह तालाब की लय और उसके मिज़ाज को समझने लगा:
कैसे तितलियाँ अपने इंद्रधनुषी पंखों में सुबह की ताज़ी रोशनी भर लेती थीं,
कैसे उसकी परछाई पड़ते ही मेंढक अपनी ही छपाक में शरण लेने के लिए कूद पड़ते थे,
और कैसे कमल की पंखुड़ियाँ धीरे-धीरे खुलती थीं।

वह भी उन्हीं की तरह कोमल होने की कोशिश करता।
अगर कोई कीड़ा उसके हाथ से चिपक जाता,
तो वह उसे धीरे से वापस घटते पानी में छोड़ देता।

वह सिर्फ़ पानी नहीं चुरा रहा था;
वह उसके साथ उसकी चमक, उसके प्रतिबिंब
और उसकी ठंडी आह को भी चुरा रहा था।

तालाब धीरे-धीरे सिकुड़ने लगा।
पानी की सीमा इतनी पीछे हट गई
कि पत्थर की सबसे निचली सीढ़ी भी पीछे छूट गई।
नीचे की नरम, नम मिट्टी उजागर हुई,
जो पुराने रहस्यों और एक मौन उदासी से महक रही थी।

वह क्षणों का संग्रहकर्ता था, शांति का संचायक,
जो एक-एक कण को बड़ी मेहनत से सहेज रहा था।

फिर वह दिन आया जब सूटकेस भरा हुआ लगा—
सिर्फ़ पानी से नहीं, बल्कि एक बेहद गहरी, छुपी हुई ख़ामोशी से।

वह गड्ढा जो कभी तालाब था,
अब बस गीली मिट्टी का एक नम दाग था,
जो अपने पुराने स्वरूप की याद में सिसक रहा था।
कुछ कमल के पत्ते कागज़ के बिखरे हुए टुकड़ों की तरह पड़े थे।

उसने वह सब ले लिया था जो वह ले सकता था,
जितना उसका सूटकेस—उसका वह असंभव जहाज़—ढो सकता था।
वह इतना भारी था कि उसका घिसा हुआ हत्था
और उसका अपना कमज़ोर बदन झुक गया।

उस सूटकेस को उठाना महज़ उसकी इच्छाशक्ति का ही कमाल था,
दिव्यता की ओर एक अंतिम छलांग।

वह भोर से पहले के अँधेरे में चला,
एक झुका हुआ आदमी,
एक ऐसा खज़ाना लिए जो किसी भी चोर की कल्पना से परे था।

नींद भरी आँखें मलता शहर अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता था
कि वह क्या ढो रहा है;
कि एक पूरा तालाब सिमटकर एक राज़ बन गया था,
एक सूटकेस में छिप गया था,
अपनी धीमी धड़कन लिए।

उसका कमरा—उसके अकेलेपन की गूँज से भरा—इंतज़ार कर रहा था।
काँपते हाथों से और इतनी श्रद्धा से कि वह लगभग भय में बदल रही थी,
उसने सूटकेस को पुराने तख़्त पर रखा।

कोई बड़ा तामझाम नहीं, कोई जश्न नहीं।
बस उसने सूटकेस खोल दिया।

और तालाब ने—या उसकी आत्मा ने—एक लंबी साँस छोड़ी।
फूलदार अस्तर से एक चमकती हुई धुंध उठी,
जो अपने साथ गीली मिट्टी और कमल की महक लिए हुए थी।

धीरे-धीरे, जादू की तरह,
उसकी अकेली खिड़की से आती मद्धिम रोशनी में,
उसके फ़र्श का एक हिस्सा चमकने लगा,
फिर गहराने लगा और तालाब बनने लगा।

कोई गंदा पोखर नहीं, बल्कि उस दिव्यता का एक सटीक प्रतिबिंब—
वही टेढ़ा-मेढ़ा नीलम रूप,
सीढ़ियों की स्मृति लिए एक हल्का निमंत्रण –
गहराई में उतरने का।

कमल भी वही थे, अपनी पारदर्शी, हल्की चमक लिए,
उस चारदीवारी में खिले हुए।

कमरे का तालाब, ज़ाहिर है, वह असली तालाब नहीं था।
इसमें काँच जैसे पंखों वाली तितलियाँ नहीं थीं,
न ही मेंढक अपने खुरदरे प्रेम-गीत गाते थे।

पानी, भले ही साफ़ था, पर उसका स्वभाव कुछ बदला हुआ था।
पहले वह पूरा आसमान निगल जाता था,
तूफ़ानों में झूम-झूम नाचता था;
उसकी शांति में एक शक्ति छुपी थी।

अब पपड़ियाई हुई दीवारों और फफूँदियाए हुए फर्नीचर के बीच
वह बस एक चुप्पी ओढ़े हुए था।

यह तालाब की याद थी, एक बोतल में बंद गूँज।
पर उसे, उस चालीस वर्षीय आदमी को,
यह सब कुछ नज़र नहीं आया।

उसके लिए—उस आदमी के लिए जिसने बड़ी मेहनत से
दिव्यता का एक टुकड़ा अपनी बेचैन ज़िंदगी में उतारा था—
यह बिल्कुल सही था।

वह घंटों उसके किनारे पर बैठता,
धूल भरे तख़्त पर जो अब एक तट बन गया था,
और उस प्रतिबिंब में प्रकृति का महान विस्तार देखता।

वह अपनी उँगलियाँ तालाब में डुबोता,
वही पुरानी शीतलता महसूस करता,
और उसे यक़ीन हो जाता कि सारा ब्रह्मांड उसकी मुट्ठी में है।

उसने सौंदर्य चुराया था।
और उसकी नज़रों में वह और भी निखर आया था। ◆

 

 


 

कवि कुमार लव, जन्म: 1/4/1986, खतौली, उत्तरप्रदेश। शिक्षा: हैदराबाद और दिल्ली।  स्कूल प्रशासन, निवेश-प्रबंधन, विश्व-भ्रमण जैसे विविध विषयों पर कंटेन्ट-लेखन। प्रकाशन: अँग्रेज़ी में ‘म्यूज इंडिया’ में प्रकाशित होने के साथ ही हिंदी की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविता प्रकाशन। सम्प्रति: IT प्रोजेक्ट मैनेजर, ज़ेनसार टेक्नोलॉजीज़ , पुणे, महाराष्ट्र।

ईमेल: kummarluv@gmail.com, मोबाइल: 7718845147

प्रकाशित पुस्तकें: https://www.amazon.in/stores/Kumar-Luv/author/B0CS4P3559

 

टिप्पणीकार चित्रा पंवार, पता– गांव– गोटका, मेरठ, उत्तर प्रदेश।
संप्रति– अध्यापन ।
साहित्यिक यात्रा – अनेक पत्र पत्रिकाओं तथा कई साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित ।
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की प्रकाशन योजना के अंतर्गत ‘दो औरतें ’ नाम से कविता संग्रह प्रकाशित।
संपर्क सूत्र:– chitra.panwar20892@gmail.com
7068629236

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