कविता कृष्णपल्लवी की कविताएँ बाहरी कोलाहल और भीतरी बेचैनी से अर्जित कविताएँ हैं

कविता

विपिन चौधरी


साहित्यिक एक्टिविज्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाने वाली पोस्टर-कविता, हमेशा से विरोध प्रदर्शनों का अहम् हिस्सा रही हैं. सबसे सघन समय में सृजनात्मक तौर पर निखरने वाली विधा कविता, उत्पीड़न और बर्बर समय में टॉर्चलाइट का काम करते हुए सबसे आगे निकलती है.
एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर युवा कवयित्री कविता कृष्णपल्लवी का रचनात्मक संसार सकारात्मक दृष्टिकोण को अपनी कविताओं में जगह देता है, जो तमाम तरह की जीवन-विसंगतियों के बावजूद आश्वस्ति और उम्मीद का वातावरण रचती हैं.
कविता कृष्णपल्लवी की कविताएँ, कविता के लोकतंत्र  का वह मानचित्र दर्शाती हैं  जिनमें प्रकृति की छटा, प्रेम की निर्मलता या संवेदनाओं  की  कोमलता ही नहीं आह्वान का तेज़, प्रतिरोध की ऊर्जा और संघर्ष का स्वेद सबका हिस्सा है.
दिन-रात सामाजिक संचेतना को अनुभूति के स्तर पर अपने भीतर समाहित कर सक्रिय तौर पर डटी रहने वाली युवा कवयित्री  कविता कृष्णपल्लवी के करीब  हमेशा एक कार्यकर्ता जैसी कठिन दिनचर्या और रूखा सामाजिक यथार्थ अपनी उपस्थिति बनाए रहता है.
उसके करीब ही कलम को कागज़ पर तिरछा रख  लगातार चिंतन, मनन कर अपनी भावनाओं को दर्ज़ करती हुई कवयित्री यह जानती है कि चलना चाहे इसी कंकड़-पत्थर के रास्ते पर सीने की आद्रता में ज़रा भी आंच नहीं आने देनी है.
“प्यार को जाना-समझा आहिस्ता-आहिस्ता
विश्वासघातों और फरेबों की मारक चोटें झेलकर
चुपचाप अपनी ही गलतियों और आधे-अधूरे और
अव्यक्त प्रेमों की अकथ पीड़ा झेलते हुए,
सुलगते हुए धीरज के साथ !” ( बर्बर समय में सीखना प्यार करना)
कवयित्री के पास बाहरी कोलाहल और भीतरी  बेचैनी दोनों के  लिए एक अर्जित अभिव्यक्ति है.  एक्टिविज्म जीवन को संघर्ष की निगाह से देखता है जहाँ लगातार टकराहट की गुंजाइश बनी रहती है और इस जीवन-व्यवस्था  में  भीतर की  नमी को खोने की बहुत  गुंजाइश है. लगातार भीतरी-बाहरी संघर्ष बहुत सारी चीज़ों को इस क़दर बिखरा देता है कि उसे समेट कर काव्यात्मक संवेदना की शक्ल देना थोड़ा कठिन जान पड़ता है पर कवयित्री इस कठिनता को अधिक सरल बनाती है, इसकी पुष्टि के लिए उनकी इस कविता अंश पर  दृष्टिपात करें।
” हम जब फिर से पहुँचते हैं किसी पुरानी जगह,
वह वहां नहीं होता
हर बार जुदाई अपने ढंग की अकेली होती है
हर अलगाव का अपना अलग तरीका और सलीका होता है
हर नारा नये कंठों से नया होकर उठता है जिस आकाश में
वह गुज़रे दिनों का आकाश नहीं होता
और जो क्रान्ति पुरानी क्रान्तियों से सीखकर डग भरती है ज़मीन पर
वह ज़मीन नयी होती है जो उसे एक नयी शक्ल देती है” (सपनों का जीवन)
क्या एक एक्टिविस्ट कवयित्री अपनी सक्रिय रचनात्मकता से  लगातार आत्मकेंद्रित होते जा रहे कविता-संसार के उस गैप को भरने  का  काम करती है जो आधुनिक समय में तेज़ी से विस्तार ले रहा है?
स्वयं के आत्मसाक्षात्कार के बाद समावेशी दृष्टिकोण से जीवन को देखना एक अलहदा तरह की गंभीरता ला देता है और उसका रिफ्लेक्शन  कविता के रचनात्मक व्यक्तित्व में साफ दिखता है. सुरक्षित सेफ्टी प्लेटफार्म  पर बैठ कर  सृजन करने वालों से  अलग कवयित्री अपने अस्त-व्यस्त जीवन को कविता  की  संवेदना में  सुव्यवस्थित करती हैं.
स्त्रीवादी संचेतना से लैस कवयित्री  प्रेम के ऊपर जमी काई साफ़ कर कई चीज़ों से अवगत करवाती हैं. उनकी कविता बताती है कि स्त्री ने प्रेम करने का सलीका पितृसत्तात्मक व्यवस्था में सांस लेते हुए ही सीखा है. वह अपने प्रेम में कुछ अधिक ही स्त्री हो जाती है और पुरुष प्रेमी को
तमाम दोषों-अवगुणों से आज़ाद कर देती है. उसे प्रेम रूपी भ्रम से बाहर निकलने में काफी वक़्त लगता है. प्रेम में  वह दिवास्वप्नों में गुम रहती है और खुद को भूलती जाती है.
दरअसल स्त्री प्रेम में भी शोषित होती है और इस बात से अनजान रहती है, ठीक उसी तरह से जैसे  उसे पति, पिता और भाई की फटकार भी प्रेम के अंतर्गत ही मीठी-मधुर लगती है.  कवयित्री को ऐसे प्रेम और ऐसी प्रेम कविताओं से परहेज़ है.
“अब आवे कोई ऐसी नयी लहर
कि नक़ली प्रेम कविताओं का पाखण्ड भी मिटे
और दुनिया की वे कुरूपताएँ थोड़ी और
नंगी हो जाएँ जिन्हें मिटा दिया जाना है
प्रेम कविताओं में सच्चाई और प्रेम को
प्रवेश दिलाने के लिए “ (स्त्रियों की प्रेम कविताओं के बारे में एक अप्रिय, कटु यथार्थवादी कविता)
कवयित्री की रचनाशीलता का विवेक उसकी अंतरसंवेदना के शिल्प में इतनी  साफ़गोई से घुल जाता है  कि यथार्थ की कड़वाहट एक तरफ हो जाती है. एक्टिविज्म में सृजनात्मकता की आवश्यकता को कविता कृष्णपल्लवी
जैसे कवि पूरा करते हैं और उनसे ही कविता का वह चक्र पूरा होता है जिसमें प्रेम, मिलन, जुदाई, हर्ष, विषाद, संवेदना के साथ प्रतिरोध भी समान रूप से विद्यमान हैं.

कविता कृष्णपल्लवी की कविताएँ

(1) सपनों का जीवन

कुछ भी नहीं होता दो बार।
हर घटना अकेली होती है और हर सपना भी।
दो बार वही प्यार नहीं होता।
पुराना प्यार यदि वापस भी लौटे तो वही नहीं रह जाता ।
वही चुम्बन दुहराया नहीं जाता ।
हम जब फिर से पहुँचते हैं किसी पुरानी जगह, वह वही नहीं होती।
हर बार जुदाई अपने ढंग की अकेली होती है ।
हर अलगाव का अपना अलग तरीका और सलीका होता है।
हर नारा नये कंठों से नया होकर उठता है जिस आकाश में
वह गुज़रे दिनों का आकाश नहीं होता
और जो क्रान्ति पुरानी क्रान्तियों से सीखकर डग भरती है ज़मीन पर
वह ज़मीन नयी होती है जो उसे एक नयी शक्ल देती है।
हम जिस देश-काल को जीते हैं वह अगले ही पल इतिहास हो जाता है।
लगातार किसी सपने का पीछा करने में ही जीवन है
धड़कता-थरथराता हुआ अविराम।

(2) बर्बर समय में सीखना प्यार करना

(मैं भी चाहती थी
प्यार करने की कूव्वत हासिल करना !
और हम सभी जानते हैं कि
ऐसा कैसे होता है !
आहिस्ता-आहिस्ता !
— मैरी ओलिवर)

….

मैं भी चाहती थी
प्यार करने की कूव्वत हासिल करना
एक बर्बर हत्यारे समय में जीते हुए ,
पकते और सीझते हुए,
कुछ सपने और मंसूबे बुनते और गुनते हुए !
पहले मैंने छोटे सपने देखे,
छोटी-छोटी यात्राएँ कीं
और मुझपर कायरता, स्वार्थ और लिसलिसेपन में लिथड़े
पटवारियों-मुनीमों जैसी शक्लों और दिलों वाले लोगों के
प्रेम-संदेशों की बारिश सी होने लगी I
फिर मैं एक लम्बी यात्रा पर निकल पड़ी
और नदियों-सागरों-पहाड़ों-घाटियों
रेगिस्तानों और हरियाले मैदानों में भटकने लगी I
वहाँ मैंने देखा कि जीवन पर क्या बीत रही है
और एक लम्बे समय तक प्यार को भूल
लड़ने की कूव्वत हासिल करती रही I
लड़ना ही जब जीवन हो गया
तो मैंने फिर सोचा इसी जीवन में प्यार करना
सीखने के बारे में I
पूछा मैंने पानी से, मिट्टी से, पेड़ों से, परिंदों से,
नींद से, स्मृतियों से, पूर्वज कवियों से, यायावर गायकों से
और युद्ध भरे दिनों के संगी-साथियों से
प्यार करने की कूव्वत और हुनर के बारे में
और जो कुछ भी जान पायी
उसे सहेजने और बरतने के लिए
दूर दहकते ढाक के जंगलों के भीतर गयी,
खदानों और कारखानों तक गयी
देस-देस भटकती रही
और प्यार की यह शर्त हासिल करती रही कि
अनथक अहर्निश हर उस चीज़ से नफ़रत करती रहूँ
जो मनुष्यता के ख़िलाफ़ खड़ी है !
यूँ हृदयहीन कापुरुषों-महापुरुषों से दूर होकर,
जड़ता, विस्मृति, समर्पण और सहनशीलता के विरुद्ध
जूझते हुए अविराम
प्यार को जाना-समझा आहिस्ता-आहिस्ता
विश्वासघातों और फरेबों की मारक चोटें झेलकर
चुपचाप अपनी ही गलतियों और आधे-अधूरे और
अव्यक्त प्रेमों की अकथ पीड़ा झेलते हुए,
सुलगते हुए धीरज के साथ !

 

(3) स्त्रियों की प्रेम कविताओं के बारे में एक अप्रिय, कटु यथार्थवादी कविता

आम तौर पर स्त्रियाँ जब प्रेम कविताएँ लिखती हैं
तो ज़्यादातर, वे भावुकता से लबरेज
और बनावटी होती हैं क्योंकि
उनमें वे सारी बातें नहीं होती हैं
जो वे लिख देना चाहती हैं और
लिखकर हल्का हो लेना चाहती हैं |
इसलिए प्रेम कविताएँ लिखने के बाद
उनका मन और भारी, और उदास हो जाता है |
स्त्रियाँ जब अपने किसी सच्चे प्रेमी के लिए भी
प्रेम कविताएँ लिखती हैं
तो उसमें सारी बातें सच्ची-सच्ची नहीं लिखतीं चाहते हुए भी |
शायद वे जिससे प्रेम करती हैं
उसे दुखी नहीं करना चाहतीं
या शायद वे उसपर भी पूरा भरोसा नहीं करतीं,
या शायद वे अपनी ज़िंदगी की कुरूपताओं को
किसी से बाँटकर
और अधिक असुरक्षित नहीं होना चाहतीं,
या फिर शायद, वे स्वयं कपट करके किसी अदृश्य
अत्याचारी से बदला लेना चाहती हैं |
स्त्रियाँ कई बार इस डर से सच्ची प्रेम कविताएँ नहीं लिखतीं
कि वे एक लंबा शोकगीत बनने लगती हैं,
और उन्हें लगता है कि दिग-दिगन्त तक गूँजने लगेगा
एक दीर्घ विलाप |
स्त्रियाँ चाहती हैं कि एक ऐसी
सच्ची प्रेम कविता लिखें
जिसमें न सिर्फ़ मन की सारी आवारगियों, फंतासियों,
उड़ानों का, अपनी सारी बेवफ़ाइयों और पश्चातापों का
बेबाक़ बयान हो, बल्कि यह भी कि
बचपन से लेकर जवान होने तक
कब, कहाँ-कहाँ, अँधेरे में, भीड़ में , अकेले में,
सन्नाटे में, शोर में, सफ़र में, घर में, रात में, दिन में,
किस-किस ने उन्हें दबाया, दबोचा, रगड़ा, कुचला,
घसीटा, छीला, पीसा, कूटा और पछींटा
और कितनों ने कितनी-कितनी बार उन्हें ठगा, धोखा दिया,
उल्लू बनाया, चरका पढ़ाया, सबक सिखाया और
ब्लैकमेल किया |
स्त्रियाँ प्रेम कविताएँ लिखकर शरीर से भी ज़्यादा
अपनी आत्मा के सारे दाग़-धब्बों को दिखलाना चाहती हैं
लेकिन इसके विनाशकारी नतीज़ों को सोचकर
सम्हल जाती हैं |
स्त्रियाँ अक्सर प्रेम कविताएँ भावनाओं के
बेइख्तियार इजहार के तौर पर नहीं
बल्कि जीने के एक सबब, या औज़ार के तौर पर लिखती हैं |
और जो गज़ब की प्रेम कविताएँ लिखने का
दावा करती कलम-धुरंधर हैं
वे दरअसल किसी और चीज़ को प्रेम समझती हैं
और ताउम्र इसी मुगालते में जीती चली जाती हैं |
कभी अपवादस्वरूप, कुछ समृद्ध-कुलीन स्त्रियाँ
शक्तिशाली हो जाती हैं,
वे प्रेम करने के लिए एक या एकाधिक
पुरुष पाल लेती हैं या फिर खुद ही ढेरों पुरुष
उन्हें प्रेम करने को लालायित हो जाते हैं |
वे स्त्रियाँ भी उम्र का एक खासा हिस्सा
वहम में तमाम करने के बाद
प्रेम की वंचना में बची सारी उम्र तड़पती रहती हैं
और उसकी भरपाई प्रसिद्धि, सत्ता और
सम्भोग से करती रहती हैं |
स्त्रियाँ सच्ची प्रेम कविताएँ लिखने के लिए
यथार्थवादी होना चाहती हैं,
लेकिन जीने की शर्तें उन्हें या तो छायावादी बना देती हैं
या फिर उत्तर-आधुनिक |
जो न मिले उसे उत्तर-सत्य कहकर
थोड़ी राहत तो मिलती ही है !
सोचती हूँ, एस.एम.एस. और व्हाट्सअप ने
जैसे अंत कर दिया प्रेम-पत्रों का,
अब आवे कोई ऐसी नयी लहर
कि नक़ली प्रेम कविताओं का पाखण्ड भी मिटे
और दुनिया की वे कुरूपताएँ थोड़ी और
नंगी हो जाएँ जिन्हें मिटा दिया जाना है
प्रेम कविताओं में सच्चाई और प्रेम को
प्रवेश दिलाने के लिए |
**

(4) इक्कीसवीं सदी के उजाड़ में प्यार

बात वर्षों पुरानी है !
जो मुझे बहुत चाहने लगा था
उसने भी तंग आकर घोषित कर दिया एक दिन कि
आने वाले दिनों की एक
अंधी प्रतीक्षा हूँ मैं I
और यह उससे भी बहुत-बहुत पहले की बात है I
जब मेरी आत्मा के पंख उगने लगे थे
तो मैंने किसी धूमकेतु से
प्यार करना चाहा था
पर मुझसे प्यार करना चाहता था
क़स्बे का घंटाघर
या कोई शाही फरमान
या कोई सजावटी साइन बोर्ड
या पंक्चर लगाने की दूकान के बाहर पड़ा
कोई उदास, परित्यक्त टायर I

जिन दिनों तमाम क़रार ढह रहे थे,
वायदे टूट रहे थे
और धीरज के साथ सपने कूटकर
सड़कें बनाई जा रही थीं,
मैं किसी पुरातन प्रतिशोध की तरह
जंगलों में सुलग रही थी I
फिर सूखे पत्ते धधक कर जलने लगे
और एक लंबा समय आग के हवाले रहा I
जलते हुए रास्ते से एक बार फिर मैं
प्यार की खोज में निकली
पर तबतक बहुत देर हो चुकी थी I
तब सपनों के अर्थ बताने वाले लोग
सड़कों पर मजमे लगा रहे थे,
दार्शनिक ताश के पत्ते फेंट रहे थे,
वैज्ञानिक सिर्फ अनिश्चितता के बारे में
अनुमान लगा रहे थे
और महाविनाश को लेकर
साइन्स फिक्शन लिख रहे थे,
मार्क्सवाद के प्रोफ़ेसर पंचांग बाँच रहे थे
और कविगण उत्तर-सत्य का आख्यान रच रहे थे
या देवकन्याओं के बारे में
अलौकिक वासनामय कविताएँ लिख रहे थे
और सोच रहे थे कि क्या अमर प्रेमी भी
कभी पा सके थे एक वास्तविक स्त्री का दिल ?

अगर कहीं थोड़ा-बहुत प्यार
शायद बचा रह गया था
तो बेहद मामूली,
नामालूम चेहरों वाले चन्द
आम नागरिकों के पास
पर उसे भी खोज पाना
इतना आसान नहीं था !

(5) एक देश में कविता की चमत्कारी लोकप्रियता की जादुई कहानी

एक देश था |
उस देश में कविता धीरे-धीरे इतनी लोकप्रिय हो चली थी, इतनी लोकप्रिय हो चली थी
कि काला बाजारिये, प्रॉपर्टी डीलर, हवाला व्यापारी, कमीशन एजेंट, चार्टर्ड एकाउंटेंट, वकील, बीमा एजेंट,
तस्कर, हलवाई, पंसारी, शेयर बाज़ार के खिलाड़ी, भंडवे, रंडियों के दल्ले, जेबकतरे, हत्यारे, बलात्कारी,
सड़क के गुंडेऔर दंगाई तक कविता लिखने लगे थे |
यह लोकप्रियता कविता को रातोंरात हासिल नहीं हुई थी |
इसमें एक लंबा समय लगा था |
शुरुआत कुछ यूँ हुई कि देश की राजधानी और कई प्रांतीय राजधानियों में कविताओं के भव्य आयोजनों में
गणमान्य अतिथि के रूप में नेता और व्यापारी और ठेकेदार और पेट्रोल पम्पों के मालिक
जो शिक्षा, संस्कृति और समाज-कल्याण के कई ट्रस्ट चलाते थे, आने लगे |
फिर सरकारी जलसों में गंभीर कविताएँ लिखने वाले कवि गण आमंत्रित किये जाने लगे |
फिर सरकार ने कवियों-लेखकों-कलाकारों के लिए कई भव्य प्रतिष्ठान बनवा दिए |
आरक्षित सीटों पर मनोनीत होकर कुछ कवि-लेखक संसद के उच्च सदन तक भी जा पहुँचे |
फिर उनके लिए विशेष तौर पर कई उपाधियाँ दी जाने लगीं,
कई पद सृजित हुए और कई पीठ स्थापित हुए और कई वजीफ़े भी दिए जाने लगे |
कवियों की संगत संक्रामक सिद्ध हुई |
उनकी संगत में कई नेता आये जो अपने भाषण-लेखकों और सचिवों से
यह ज़िद करने लगे कि वे भी कविता लिखेंगे |
भाषण-लेखकों ने लिखीं बड़ी मेहनत से कविताएँ,
कुछ निजी सचिवों ने भी लिखीं |
कविता का असर ऐसा था कि अवकाश-प्राप्ति के बाद की संभावनाओं का संधान करते हुए
कैबिनेट सचिव ने भी लिख डालीं कुछ कविताएँ |
फिर मुख्य सचिव और अन्य सचिवों और उप-सचिवों ने, कई कमिश्नरों और कलक्टरों ने और
पुलिस के कई आला अफसरों ने और सेल्स टैक्स और इनकम टैक्स जैसे कई विभागों के
कई उच्च अधिकारियों ने भी लिखीं और कविताओं की बाढ़ ला दी |
अफसरों के निकट संपर्क में रहते थे जो दलाल और व्यापारी,
वे भी कविताओं की दुनिया में हाथ-पैर मारने लगे |
आलम यह था कि मरदाना कमजोरी की दवाओं के विज्ञापन भी कविता की भाषा में छपने लगे |
यहाँ तक कि ताक़त और पैसे की दुनिया में विचरने वालों के
कुत्ते भी कविता की दुनिया में विचरने लगे |
एक पुलिस अफसर जो एक मुख्य मंत्री के आदेश पर हर रात कुछ फ़र्जी एनकाउंटर करता था
और घर लौटकर सितार पर राग तिलक कामोद बजाता था,
वह अब घर लौटने के बाद कविताएँ लिखने लगा |
जितना अधिक ताक़तवर लोग कविताएँ लिखने लगे,
उतना ही अधिक उनके निकट के कवि लोग उनके कुत्तों की तरह हो गए,
इतना कि कवियों और कुत्तों में अंतर करना मुश्किल होता गया |
उधर उस देश में लोगों का जीना दूभर हो गया था,
सडकों पर वर्दीधारियों की गश्त थी, उन्मादियों की भीड़ थी और गलियों में बहता हुआ लहू था
और भय था और अँधेरा था और चीखें थीं
और गाँव के गाँव, शहर के शहर जेलखानों में तब्दील हो चुके थे |
पर सत्ताधारी अपनी और अपने कवियों की कविताई की बदौलत
मनुष्यता को बचाए हुए थे |
तब सत्ता के शीर्ष पर बैठा था एक पुराना अनुभवी हत्यारा
जिसका ख़ास सलाहकार भी एक घुटा हुआ विकट अपराधी था |
तो कविता की धूम उस हत्यारे तक पहुँची
जिसके पास सत्ता की निरंकुश ताक़त थी
और सड़कों पर, जिसके एक इशारे पर कुछ भी कर गुजरने को तैयार उन्मादियों की भीड़ भी थी |
सहसा सबसे ताक़तवर उस शख्स को लगा कि एक चीज़ है जो उसके पास नहीं है |
वह भी कविता लिखने को मचल उठा |
उसके लिए ढेरों कविताएँ लिखी गयीं |
कुछ लिखीं कैबिनेट सचिव ने, कुछ मुख्य सचिव ने, कुछ मुख्य न्यायाधीश ने, कुछ चुनाव आयोग के प्रमुख ने,
कुछ केन्द्रीय ख़ुफ़िया महक़मे के आला अफसर ने
और कुछ साहित्य-कला के केन्द्रीय प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कवि ने |
देश के सबसे ताक़तवर आदमी का छपा एक बेजोड़ ताक़तवर कविता-संकलन
और अनूदित हुआ देश की अड़तालीस और दुनिया की एक सौ अड़तालीस भाषाओं में |
विद्वज्जनों के बीच कविता उन्माद, देशभक्ति, अंध-विश्वास और विवेकहीनता की तरह प्रतिष्ठित हुई |
पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा हुई |
सड़कों पर जो घूम रही थीं हत्यारों की टोलियाँ,
उनमें शामिल अभागे लोग
कविता के महात्म्य से उतना ही अपरिचित बने रहे
जितना हत्या के शिकार लोग |

(6) साधारण के पीछे का रहस्यमय-रोमांचक गुप्त असाधारण

किचन के बर्तनों में, डिब्बों और शीशियों में कुछ ढूँढ़ते हुए
वह खुद भी नहीं जानती कि क्यों उसे लगता रहता है
कि वह कुछ षड्यंत्र कर रही है
दीवारों के ख़िलाफ़
या कि सुकूनतलब ज़िन्दगी के ख़िलाफ़ |
वह नहीं जानती कि क्यों सुबह सहसा याद आये
अपने बीस वर्षों पुराने प्यार के बारे में
वह इससमय फिर सोचने लगी है अनायास
जो वह सबसे छुपा लेने में सफल रही थी |
वह अभी भी चाँद से आधी रात को
कुछ गुफ़्तगू करने के बारे में सोचती है
और उसका पति बिस्तर में उसका इंतज़ार करता है
जल्दी से सेक्स करके सो जाने के लिए
क्योंकि कल सुबह उसे जल्दी उठना है
और कई ज़रूरी काम निपटाने हैं
दफ़्तर जाने से पहले |
वह खुद से भी छुपाती रहती है
अपने बेहद ख़तरनाक इरादों को,
पागलपन भरी योजनाओं को,
अविश्वसनीय मंसूबों को
और भोर की उड़ान के सपनों को |
जब वह सबसे विश्वसनीय और निरीह लगती है
तब उसके ज़ेहन में सबसे भयंकर साज़िशें
सुगबुगा रही होती हैं |
जब वह एकदम पालतू लगती है
तब वह एक मोटर बोट लेकर
सुदूर समुद्र में निकल जाने के बारे में
भरोसे के साथ सोच रही होती है |
घर को सजाते-सँवारते समय वह उसे
डायनामाइट से उड़ा देने के बारे में सोच रही होती है |
बच्चों के बारे में वह अक्सर सोचती है कि
उन्हें उड़ने के लिए सही समय पर बाहर धकेल देगी
जैसे पक्षी अपने बच्चों के साथ करते हैं |
इधर जबसे वह कुछ पढ़ने-लिखने लगी है,
एक लायब्रेरी में बैठने लगी है,
एक फिल्म क्लब की सदस्य हो गयी है,
थियेटर करने के बारे में सोचने लगी है फिर से,
कुछ धरना-प्रदर्शनों में जाने लगी है
और घर से बाहर अपनी दुनिया फैलाने लगी है,
बहुत कुछ अजीब खयालात आने लगे हैं
और अजीब घटनाएँ घटने लगी हैं |
हालाँकि यह अभी अपवाद है
पर अपवाद भी अगर समय से
मौत के शिकार न हो जाएँ तो कालान्तर में
अपने विपरीत में बदल जाते हैं
और आम प्रवृत्ति बन जाते हैं|
कभी-कभी तो आधी रात को अचानक उठकर
वह याद करने लगती है कि
यह जो मोटा, भदभद, तुंदियल
बिस्तर पर चित्त पड़ा
नाक से घनगर्जन कर रहा है
मूँछों को फड़फड़ाता हुआ,
यह कौन है और यहाँ कर क्या रहा है !

(युवा कवयित्री कविता कृष्णपल्लवी का जन्म गोरखपुर, उत्तरप्रदेश में हुआ। राजनीतिक विज्ञान से एम.ए. किया है। लगभग 2 दशक से मज़दूरों और महिलाओं के सवालों पर कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हैं। 2006 से कविताएँ लिख रही हैं। विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी लेखन।
सम्पर्क: [email protected]

टिप्पणीकार विपिन चौधरी समकालीन स्त्री कविता का जाना-माना नाम हैं। वह एक कवयित्री होने के साथ-साथ कथाकार, अनुवादक और फ्रीलांस पत्रकार भी हैं.)

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