समकालीन जनमत
कविता

कविता कादम्बरी की कविताएँ अपने समय के संघर्षों के आब और ताब को दर्ज करती हैं

विशाखा मुलमुले


एक तारे के होने भर से नहीं रहता खाली आसमान , हमारी खोजी नजरें आसमान में खोज ही लेती है वह तारा । इसी तरह कविता कादम्बरी  ने अपने कवित्व में संघर्ष की दीप्ति का एक तारा खोज लिया है ऐसा तब प्रतीत होता है जब वह देखती हैं / कहती हैं अपनी प्रथम कविता मनुष्य होने के नियम में जयकारे करते असंख्य हाथों के बीच प्रतिरोध में तनी तुम्हारी इकलौती मुट्ठी …

कविता कादम्बरी जी की कविताओं में प्रतिरोध , प्रश्न , संज्ञान , बयान , नई पहल एवं स्त्री विमर्श के स्वर मिलते हैं ।

‘देवताओं के बरक्स मनुष्य’ से प्रेम कविता एक सुगठित , सुचिंतित कविता है । यह कविता सामयिक भी है एवं समय सीमा के बंधन से परे भी है । हर मनुष्य के जीवन में कभी न कभी ईश्वर बनाम मनुष्य / मानवता का प्रश्न उठता ही है और ईश्वर से हम यदाकदा मानवीय होने का आग्रह भी करते हैं ।

इस कविता की अंतिम पंक्तियां –
एक मनुष्य से करती हूँ प्रेम/और उसके देवता हो जाने की कल्पना से डरती हूँ /बेहद डरती हूँ  विमर्श के लिए अनेक द्वार खोल देती है ।

‘ऊपरवाला’ भी इसी आब एवं ताब की कविता है । इसमें ईश्वर के पैरोकार बने ब्राह्मण वर्ग और ब्राह्मणवादी सोच का विरोध  है जिन्होंने कर्मकांडों के आड़ में आम जनमानस को सदियों तक लूटा / गुमराह किया ।
ईश्वर का ईश्वर बने रहना ( मानवीय न होना ) तथा मनुष्य का ईश्वर बन जाना दोनों ही सूरतों में ईश्वरत्व की सीरत के लिए एक बड़ा ख़तरा है ।

‘मछली के पंख’ एवं ‘गिद्ध और गौरेया’ कम शब्दों में स्त्री विमर्श को बख़ूबी प्रस्तुत करती है। मछली के पंख में जहां हुनरमंद स्त्री को दूसरे हुनर के बोझ तले दबोचा गया वहीं गिद्ध और गौरेया में उसकी काबिलियत को स्त्री के जामे में फिट कर , स्त्री होने के आड़ तले अन्य से कमतर बताया गया । मतलब चित भी उनकी पट भी उन्हीं की ही और स्त्रियां चारों खाने से चित्त । यही हकीकत भी है हम कितनी ही स्त्री विमर्श की बात करें समाज की सोच का दायरा अभी बहुत संकुचित है , अभी बड़ी लड़ाई बाकी है ।

‘मेरे बेटे’ कविता क़ाबिलेगौर एवं काबिलेतारीफ़ है । इसमें कवि ने भावी पीढ़ी को समझाइश के तौर पर अनेक सूत्रात्मक वाक्य दिए हैं जिन्हें भावी पीढ़ी संग हम भी , सम्पूर्ण मानव जाति भी अमल करें तो अनेक छोटे-बड़े  विकार और अहम के युद्ध अपने आप ही समाप्त हो जाएंगे । कवि को इस कविता के लिए साधुवाद ।

अनेक कविताओं पर बात की जा सकती है  ‘मुहावरे’ कविता भी ऐसी ही कविता है या इन्हें कविता न कहकर मुहावरों के दायरों को तोड़फोड़ करते प्रश्नों की कतार कहना अधिक उपयुक्त होगा । मुहावरों पर कवि की एक अलग दृष्टि है । जिसमें कवि मन वंचितों और शोषितों के संग खड़ा दिखता है ।

सभी कविताएँ वास्तविकता के धरातल से उपजी है वायवीय नहीं है । समय की बर्बरता को वे चीन्ह रहीं है और अपने घोषणापत्र में कह रहीं हैं कि बाज़ार के स्वप्नीले मायाजाल में फंसने से बेहतर है हकीकत की भूमि का बंजर रहना । यह हताशा का स्वर है ।

अंतिम कविता में तमाम ऊहापोह से निकलकर वह सकारात्मक होती हैं और स्त्रियों से कहती हैं बाजारवाद की दुनिया में रमे रहकर सितारों की जगमग में खोकर जीवन में उपस्थित रीयल हीरो ( सबसे शानदार पुरुष कविता ) को न खो दें क्योंकि अब पितृसत्तात्मक गलियारों से निकलकर उन शानदार पुरुषों के लौटने का समय है ।

कविता अपनी कलम की धार पैनी रखें , ख़ूब रचें । उन्हें मेरी शुभकामनाएँ ।

 

कविता कादम्बरी की कविताएँ

 

1. मुहावरे

एक
चलते-चलते चप्पलों का घिस जाना एक मुहावरा है
जो लागू नहीं होता उन पाँवों पर
जिनमें चप्पलें नहीं हैं
हैं बस बिवाइयाँ
जो घिसती नहीं हैं
बस रिसती हैं।

 

दो
खिचड़ी का पकना भी एक मुहावरा है
जो लागू नहीं होता उन घरों पर
जहाँ दाल-चावल कभी एक साथ नहीं जुटता है
पकती-गलती है देह
किसी और की थाली के लिए।

 

तीन
गज़ भर की छाती होना भी एक मुहावरा है
जो लागू नहीं होता उन छातियों पर
जिनमें बिन बारादरी वाले बेहद तंग और अँधेरे दिल बसते हैं
जिनमें नहीं रह सकते दो भाई भी एक साथ
पड़ोसी की फिर बात ही क्या।

 

चार
सीने पर मूँग दलना भी एक मुहावरा है
जो लागू नहीं होता उन सीनों पर
जो सालों की दलन के बाद भी नहीं हुए हैं चाक
जिनके पेट पर अभी भी बैठा है लोढ़ा लिए एक भूत
और पीठ पर गहरे घावों के बावजूद
जिन्हें करवट बदलने का ख़याल तक नहीं है।

 

पाँच
जल में रहकर मगर से बैर करना भी एक मुहावरा है
जो लागू नहीं होता है उन मछलियों पर
जिन्होंने खोल दिया है मोर्चा
अपने घर पर हुए मगरमच्छ के क़ब्ज़े के ख़िलाफ़।

 

2.देवताओं के बरअक्स मनुष्य से प्रेम

बाज़ार में बहुत चेहरे हैं देवताओं के—ढोते हुए नकली शाश्वत मुस्कान
जबकि मनुष्यों के चेहरे कुम्हला जाते हैं
अनगिनत पाँवों की रिसती बिवाइयाँ देखकर

मैंने छुई हैं देवताओं की मरमर-सी तराशी हुई कठोर भुजाएँ—
हथियारों से सुसज्जित मगर जड़
जबकि मनुष्य अपने हथियारविहीन हाथ हवा में लहराता है
अत्याचारी तोपों के ख़िलाफ़

मैंने देवताओं के चिरयुवा चेहरों को बेहद क़रीब से देखा है
गलतियाँ न करने के मद से भरे—
पूरे ब्रह्मांड की रौशनी
अपने आभामंडल में लेकर घूमते हुए

जबकि मनुष्यों के चेहरे
ग़लतियों की रेखाओं से भरे हुए
हो जाते हैं बूढ़े
और अपराधबोध और प्रायश्चित में कांतिहीन

मैंने देवताओं को देखा है चढ़ावों पर गदगद होते हुए
जबकि मनुष्य भूख से बिलबिलाते हुए भी
मुफ़्तख़ोरी से भरी कोठार ठोकर से लुढ़का देता है

मैंने देवताओं को देखा है अमर
मगर अन्याय के लिए आँखें मूँद
आराम-शैय्या पर लेटे हुए निस्पृह
जबकि मनुष्य मौत की संभावनाओं के बाद भी संघर्ष में कूद पड़ता है

मैंने देवताओं को देखा है अभंग मगर प्रेम से दूर
स्तुति से प्रसन्न हो करते हुए कृपा
जबकि मनुष्य टूट जाने की नियति
और दुत्कारे जाने की आशंका देखकर भी
बिखरने तक करता है प्रेम

आज के समय में जबकि मनुष्य होना एक मिथक है
देवताओं से घिरी हुई मैं
उन्हें मनुष्य हो जाने को घुड़कती हूँ

उनकी उपेक्षा करते हुए
एक मनुष्य से करती हूँ प्रेम
और उसके देवता हो जाने की कल्पना मात्र से
डरती हूँ,
बेहद डरती हूँ।

 

3.ऊपरवाला

उनकी हवस बढ़ी तो उन्होंने पत्थर गढ़
ऊपर वाले की जयकार की

ख़ुद लिखा और कहा

कि ऊपरवाले ने लिखा है

ख़ुद बोला और कहा
कि महान ऊपरवाला बोलता है

हमारी स्त्रियों को हथिया लिया और कहा
कि ऊपर वाले की सेवा में

हमारी ज़मीनें क़ब्ज़ा लीं और कहा
कि ऊपर वाले का न्याय है

भूखे की आख़िरी रोटी भी माँग ली और कहा
कि ऊपर वाले के लिए दो

जन्मने पर दुनिया में आने का कर वसूला और कहा
कि ऊपर वाला रास्ता देता है

मर जाने पर कफ़न पर उगाही की और कहा
कि ऊपर वाला मोक्ष देगा

वे जादूगरों की तरह
प्रारब्ध की कहानी सुनाकर
हाथ की सफ़ाई करते हुए
हमारे हक़ की रोटी अपनी थाली में सरकाते रहे
और हमने इस चमत्कार पर भी तालियाँ बजाईं

उन्होंने अनाज अपने गोदाम में भरे और भूख को दुधारू गाय
और उसकी लात को स्वर्ग की चाभी बता
हमारी चौखट पर बाँध दिया

ठग शक्ल से पहचान ही लिए जाएँ तो ठग कैसे
हम ज़हरख़ुरानी के शिकार की तरह
धुँधले चेहरों में ऊपर वाले को खोजते रहे

जो उनके अफ़ीम के खेतों में खड़ा बिजूका भर है
जो उनका ज़िरहबख़्तर है
जिस पर न्याय की हर तलवार टूट जाती है

और आख़िरकार
जो उनकी जूती है
उखड़ जाए तो कीलें ठुकवा दी जाती हैं
काटने लगे तो तेल पिला दिया जाता है
और काम न आए तो बदल दिया जाता है

हमारी गर्दन, उस पर उनकी जूती और उस जूती में उनके पाँव की पहेली में

ऊपर वाला कौन है यह बूझना इतना कठिन तो नहीं था।

 

4.मछली के पंख

मैं बाज़ नहीं
मछली पैदा हुई
तैरने का बेमिसाल हुनर लेकर

हिक़ारती नज़रों ने कहा
मुझे नहीं आता उड़ना
मैं नहीं देखती आकाश

मेरी बेहतरी के लिए
मेरे फ़िनों पर बाँध दिए
पत्थर के बड़े
और नक़्क़ाशीदार पंख

मैं आकाश देखते हुए
पानी में ही दबोची गई
और भी आसानी से।

 

 

5. मेरे बेटे

मेरे बेटे
कभी इतने ऊँचे मत होना
कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो
उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ
न कभी इतने बुद्धिजीवी
कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग
इतने इज़्ज़तदार भी न होना
कि मुँह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो
न इतने तमीज़दार ही
कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी
इतने सभ्य भी मत होना
कि छत पर प्रेम करते कबूतरों का जोड़ा तुम्हें अश्लील लगने लगे
और कंकड़ मारकर उड़ा दो उन्हें बच्चों के सामने से
न इतने सुथरे ही होना
कि मेहनत से कमाए गए कॉलर का मैल छुपाते फिरो महफ़िल में
इतने धार्मिक मत होना
कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ
न कभी इतने देशभक्त
कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको
कभी इतने स्थायी मत होना
कि कोई लड़खड़ाए तो अनजाने ही फूट पड़े हँसी
और न कभी इतने भरे-पूरे
कि किसी का प्रेम में बिलखना
और भूख से मर जाना लगने लगे गल्प।

 

6. गिद्ध और गौरैया

गिद्ध उड़ा
आसमान तक पहुँचा
सबने पंख देखा
ताक़त होने की दाद दी

गौरैया उड़ी
आसमान तक पहुंची
सबने जिस्म देखा
हल्के होने की बात की

 

7. सबसे शानदार पुरुष

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों की नायक रही उनकी सरल हृदय माएँ
उन्होंने बनना चाहा उनसा ही
प्रेमी और उदार

दुनिया के सबसे शानदार पुरुष
अपनी उदास दुल्हन लेकर लौटे
भावुक और उदास
स्वागत में खड़े रिश्तेदारों से
चुराते रहे नज़रें
पोछते रहे अपनी आंखें

दुनिया के सबसे शानदार पुरुष
अपनी बहनों के बालों में तेल डालते हुए
सुनाते रहे उन्हें
पहाड़, नदी, जंगल, प्रेम
और संघर्ष की गाथाएं

दुनिया के सबसे शानदार पुरुष
गोद में रख अपनी स्त्री के थके-रूखे पाँव
उकेरते रहे उनपर लाल-लाल फूल
अपने हृदय के गाढ़े राग से

दुनिया के सबसे शानदार पुरुष
गूथते रहे गजरे, बनाते रहे चोटियां, लगाते रहे फूल
और अपनी स्त्री के नाखूनों को
इंद्रधनुष के रंगों से रंगते रहे

दुनिया के सबसे शानदार पुरुष
चिट्ठी के मौन में भी सुन सके
लिखने वाले की कराह
और रात-दिन का हिसाब किए बगैर अपनी देह छीलकर की
सबसे कठिन यात्राएं

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
पर्दे के महानायकों की गूंजती आवाज़ों की नकल नहीं की
उन्होंने सावधानी से चुनी
सबसे मीठी लोरियां
और उन्हें घोल लिया अपनी आवाज़ में

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
अपने जानवरों की सींगों में तेल चुपड़कर उनपर नहीं बांधे अपने-अपने धर्म के झंडे
उन्होंने उनके घायल पके खुरों से
साफ किया मवाद,निकाले कीड़े
और बदलते रहे पट्टी

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
अपनी स्त्रियों की देहयष्टि पर
नहीं लिखी कोई कविता
उन्होंने लिखा उनके बस्ते पर
उनके सूर्य से दीप्त सांवले माथों पर
और उनकी अन्याय के खिलाफ तनी मुट्ठियों पर

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
अपनी मांसल भुजाएं आकाश में लहराकर
बादलों को नहीं दी चुनौती
उन्होंने मिट्टी खोदी, गोबर चाला
धूल में लिथड़े, पानी ढोये, बीज बोए और बाड़ लगाई

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
न्याय और समानता पर
नहीं दिए ओजस्वी भाषण
मुट्ठियाँ तान-तान कर

उन्होंने अन्याय के खिलाफ
हर संघर्ष में थामी
धू-धू धधकती मशालें
और झुलसा ली
अपनी करीने से सजी मूंछे

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
प्रेम किया अथाह मगर
प्रदर्शन की कला नहीं सीख पाए बाजार से

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों पर
उनके चुप्पे प्रेम के बदले
लगते रहे आरोप, मिलती रही झिड़कियां, बरसते रहे ताने

हम स्त्रियाँ

जो ग्रीक देवताओं की विशाल मूर्तियां
अपने हृदय में स्थापित कर
मुक्ति की बात करती हैं

हम स्त्रियां
जो बाजार के सुर में सुर मिलाकर भी
क्रांति के गीत गाना चाहती हैं

हृदय पर भारी पथरीली भुजाओं का बोझ लेकर
कैसे पाएंगी मुक्ति ?

बाजार के झंडे लहराते हुए
कैसे गाएंगी क्रांति के गीत ?

हमें मुक्ति की चाह से पहले
खंडित करना होगा
अपने गर्भगृहों में स्थापित
इन पथरीली मूर्तियों को

घिसकर छोटी करनी होंगी मांसल भुजाएं
और विशाल देहयष्टि वाली
पौरुष की परिभाषाओं को

खारिज करना होगा
रूप-रंग, शक्ति और सामर्थ्य के
नकली पैमानों को

कि हम शानदार स्त्रियां
जिस सुंदर दुनिया के सपने देखती हैं
उनमें
अब तक विस्थापित रहे
दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों के
लौटने का समय है

 

8. मनुष्य होने का नियम

पक्षी होने के नियम के विरुद्ध
दुनिया के सारे पक्षी
ऊंचाई से गिरकर मर जाने के भय से
अपने पंख नोच लें
और लोटने लगें किसी तानाशाह के कदमों में

मछली होने के नियम के उलट
दुनिया की सभी मछलियां
डूबकर मर जाने के भय से
छोड़कर भाग जाएं
अपने तालाब, नदियां और समंदर

तो क्या बहुसंख्यक होने भर से
बदल जायेगा
पक्षी या मछली होने का नियम?

कायर, क्रूर और मदांध भीड़ के बीचो-बीच
अकेले खड़े तुम
और तुम्हारी भंगिमा में अभय

प्रेम और स्वायत्तता पर तुम्हारा अखंड विश्वास
और जयकारे करते असंख्य हाथों के बीच
प्रतिरोध में तनी तुम्हारी इकलौती मुट्ठी

तुम्हें देखती हूँ तो लगता है
कि बहुसंख्यक अपवादों के बीच
इकलौता खड़ा है
मनुष्य होने का सार्वकालिक नियम

 

9. बंजर देह

मिट्टी की देह बंजर ही रह गई
मैंने नहीं स्वीकारे बीज
धतूरे के,

कितने ही बाजार से लौटे प्रेमियों ने
रोपने चाहे अपने ओठों के गुलाब
मेरे माथे पर,

मैंने उनके हाथ देखे
वो किसान नहीं थे

और उनकी देह
इत्र के भभके से भरी हुई थी

मेरी मिट्टी ने
नहीं दी उन्हें
एक रोप की भी जगह

बच्चों का भूख से मर जाना जब रोज़मर्रा की ख़बर हो
तब बाजार की बेहयाई ही है
गुलाबों की खेती

मेरी मिट्टी ने रास्ता देखा
धान के बीज से भरे
एक किसानी हाथ का

मेरे माथे ने प्रार्थना की
कि छूट जाएं कुछ चिन्ह उनपर
एक किसानी गीत के

लेकिन
धरती के भू-मानचित्र पर कोई किसान बचा हो तभी तो लौटे!

धरतीखोरों ने उन्हें ढकेल दिया है रेगिस्तानी गड्ढों में
भू-मानचित्र की सीमाओं के बाहर

और अब मेरे माथे पर उग आईं
बड़ी-बड़ी दरारें
बंजर होने का मेरा आखिरी घोषणापत्र हैं

 

10. बर्बर

जिन्हें आप कई युग पीछे छोड़ आये थे
वो बाजार की तरफ से लौटकर
यक-ब-यक पूरे दल बल के साथ
अत्याधुनिक हथियारों से लैस
हमारे आगे खड़े हो गए हैं

वो तर्कविहीन होकर बस गोलियों से नहीं देते हैं जवाब
पहले वो शान्ति स्थापना के तर्क देते हैं
उनके पास विभिन्न रंगों की धर्म ध्वजाएं हैं
वो उलटबासियों में बातें करते हैं
वो हत्या और बलात्कार करने के बाद
आसमान की तरफ उठाते हैं
अपने खून सने हाथ
और अपनी भीगी पलकें

बर्बर सिर्फ बर्बर नहीं हैं अब
बहुत ज़्यादा सभ्य, बहुत ज़्यादा धार्मिक
और बहुत ज़्यादा शांति पसंद हो गए

 

 

कवयित्री कविता कादंबरी
सहायक प्राध्यापिका, शिक्षा पीठ, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया, बिहार
जन्मतिथि: 04/02/1984
निवास: फ्लैट नंबर 101, ब्लॉक-ई, प्यारा घराना कॉम्प्लेक्स, चंदौती मोड़,गया, बिहार -823001
मोबाइल नंबर:7258810514

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और मध्यकालीन इतिहास विषय में परास्नातक।काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षाशास्त्र विषय में शोध करने के बाद से दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के शिक्षापीठ में शिक्षणरत एवं शिक्षा के सांस्कृतिक वर्चस्ववादी स्वरूप पर सवाल खड़ा करते हुए एक जनपक्षधर शिक्षा व्यवस्था के लिए प्रयासरत।

 

टिप्पणीकार विशाखा मुलमुले, कविताएँ , लेख और लघुकथाएं लिखती हैं। जन्म 23/7 /1979 को उज्जैन में हुआ और कोरबा, छत्तीसगढ़ में शिक्षा हुई । विशाखा मूलतः मराठी भाषी हैं और हिंदी में कविताएँ लिखती हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताओं के अन्य भाषाओं में भी अनुवाद  प्रकाशित हो चुके हैं. तीन साझा काव्य संकलनों में इनकी कविताएँ हैं ।
सुधीर सक्सेना जी की चुनिंदा कविताओं का डॉ सुलभा कोरे जी के मार्गदर्शन में इन्होंने मराठी में अनुवाद किया है । प्रकाशित पुस्तक का नाम है ” अजूनही लाल आहे पूर्व ” (अभी भी लाल है पूर्व)
संपर्क:[email protected]

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