अजय दुर्ज्ञेय
कंचन सिंह की कविताओं से यह मेरी संभवत पहली मुलाक़ात है और पहली ही मुलाक़ात में उनकी कविताओं के विषय और विषयगत वेदना ने मुझे गहरा प्रभावित किया है। उनकी कविताओं में एक ऐसी अनुभूत और मौलिक सच्चाई है जिससे चाह कर भी ना तो मुँह फेरा जा सकता है और ना ही उसका सामना किया जा सकता है। सामना न करने का अर्थ यही है कि हम प्रतिदिन इन्हीं सवालों को, इन्हीं परिस्थितियों को आज भी न केवल जन्म दे रहे हैं बल्कि उन्हें खाद-पानी देते हुए पोषित भी कर रहे हैं और इसीलिए कंचन सिंह की कविताएँ, कविताएँ कम और सवाल अधिक हैं। ऐसे सवाल- जो पूछे ही जाने चाहिए।
जैसे अपनी एक कविता में कंचन सिंह कहती हैं-
तुम किसकी बेटी हो? किसकी बहन हो?
किसकी पत्नी हो या कि
किसकी माँ हो?
हमसे हमेशा ऐसे ही सवाल पूछे गए।
और इस कवितांश के माध्यम से कंचन सिंह हमसे एक बहुत ही ज़रूरी सवाल पूछती हैं कि कब तक स्त्रियाँ अपनी पहचान के लिए भी, अपने नाम के लिए भी किसी अन्य पुरुष पर निर्भर रहेंगी? आखिर क्यों एक स्त्री किसी की पत्नी, किसी की बहन, किसी की माँ, किसी की पुत्री से इतर एक स्त्री नहीं हो पाती? इन पंक्तियों में ही नहीं वरन कंचन सिंह की अधिकतर कविताओं में भी ऐसे ही स्त्री की अपनी निजी पहचान को स्थापित करने की छटपटाहट है, स्त्री-मुक्ति के स्वर हैं।
एक अन्य कविता- ‘चार लोग क्या कहेंगे’- भी इसी प्रकार की एक कविता है जिसमें कंचन सिंह उन तथाकथित चार लोगों की परवाह किए बिना अपनी पहचान और अपने अधिकारों के लिए स्त्रियों को खड़े होते, लड़ते देखना चाहती हैं। वे चार लोग कौन हैं? वस्तुतः वे चार लोग हम ही हैं और इसीलिए कंचन सिंह की कविताओं का सामना करना हमारे लिए बेहद मुश्किल है। इसके इतर – ‘उस लड़की को सोने’ दो और ‘बारिश में भीगती स्त्री’ आदि कविताएँ भी स्त्री मन की प्रखर अभिव्यक्ति हैं।
कंचन सिंह की कविताएँ परिस्थितियों का केवल विवरण मात्र नहीं है वरन उनमें प्रतिकार और परिस्थितियों को बदलने की एक सतत बेचैनी भी है। वह परिवर्तन को लेकर कृत संकल्प हैं। उन्हीं के शब्दों में-
मेरी पहचान
अलग से दर्ज की जाए
मैं किसी की परछाई नहीं हूँ
अपनी राख से उठकर मैं यहां तक आई हूँ!
मैं कंचन सिंह के उज्जवल भविष्य के प्रति आश्वस्त हूँ और उन्हें अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ और चाहता हूँ कि वह अपनी कविताओं के माध्यम से हमसे ऐसे ही तीखे और ज़रूरी सवाल पूछती रहें।
कंचन सिंह की कविताएँ
1. मेरी पहचान अलग से दर्ज की जाए
तुम किसकी बेटी हो? किसकी बहन हो ?
किसकी पत्नी हो या कि
किसकी माँ हो?
हमसे हमेशा ऐसे ही सवाल पूछे गए
हमारा होना किसी और के होने से तय हुआ
हमारा नाम हमारी पहचान के लिए
नाकाफ़ी रहा
बचपन को संस्कारों में ढाला गया
हमारी हँसी को रोका गया
उठने, बैठने, चलने सब पर
टोका गया
हमारी पूरी देह पर नियम चस्पा कर दिए गए
और आत्मा पर सिलवटें पड़ती रहीं
जिसकी परवाह किसी को नहीं थी
लेकिन मैं जोर से कहना चाहती हूँ
कि मैं उस मिट्टी से बनी हूँ जो सिर्फ़ बर्तन नहीं बनती
आग भी सहती है
मैंने जितना जीवन जिया है
अपने ज़ख़्मों को ख़ुद ही सिया है
मेरी पहचान
अलग से दर्ज की जाये
मैं किसी की परछाई नहीं हूँ
अपनी राख से मैं उठकर यहाँ तक आई हूँ !
2. हम हर सुबह फिर से जीना शुरू करते हैं
नाखून
रोज़ घिसते हैं
और यह देह भी घिसती है
प्रतिदिन समय की खुरदरी सतह पर
नाखूनों के कोरों में
फँसी रहती है ज़िन्दगी जैसे फाँस
चाहे जितना भी जतन करो कसक बची रहती है
हमारे नाखूनों पर लगा रंग फैशन नहीं है
यह हमारे घिसे हुए सपनों की
एक पतली-सी परत है
हर पॉलिश के नीचे एक अधूरी चीख़ होती है
हर चमक के पीछे एक घुप्प अँधेरा
हर मुस्कराहट के पीछे
किसी देह से रगड़ खाई थकान होती है
हम अपने नाखून काटते हैं
जैसे अपने भीतर उग आए क्रोध
प्रतिकार और दुख को सभ्यता में ढाल रहे हों
लेकिन ये नाखून फिर उग आते हैं
चुपचाप बिना पूछे
ठीक उसी तरह
जैसे हम हर सुबह फिर से जीना शुरू करते हैं
3. चार लोग क्या कहेंगे
चार लोग क्या कहेंगे
यह वाक्य
वैताल की तरह सदियों से हमारे कंधों पर रहा
सपनों और आजादी के बीच दीवार चिनते रहे
यही चार लोग
इनका काम हम पर नजर रखना और राय बनाना है
ये धरती-आकाश-पताल हर जगह हैं
ये सड़क किनारे गुमटी में बैठे हुए हैं
और चमगादड़ की तरह
पेड़ से उलटे लटके हुए हैं
ये अपनी कब्र से उठकर भी
हमारे बारे में अपनी राय देने चले आते हैं
बिटिया जवान हो गई ब्याह कर दो जल्दी से
घर वालों को कुछ लड़कियों के उदाहरण से
समझाते हैं
मोबाइल में वीडियो, रील्स
और न्यूज दिखाते हैं
यही चार लोग देह को लरियाई नजर से देखते हैं
और यही चरित्र की कुर्सी पर बैठकर
अदालत लगाते हैं
जब तक चुप रहो या उनके मन की करो
तो ‘अच्छी’ कहलाते रहो
जवाब दे दो
‘ज़्यादा पढ़ लिख गई हो’ का ताना पाओ
बदज़ुबान, बदचलन और फेमिनिस्ट समझी जाओ
4. सड़क पर बारिश में भीगती स्त्री
बारिश में भीगती हुई पैदल चल रही है एक स्त्री
सड़क के किनारे पर उसके कदमों के साथ
छपाक-छपाक कर रही है दुनिया
कंधे पर झुका बैग और हथेली में भीगा टिफ़िन
भीगे बालों से टपकती बूंदें
उसके चेहरे से फिसलते समय की तरह
धीरे-धीरे ढल रही हैं, घुल रही हैं भीतर
ऑफिस से लौटी है वह थकी हुई
पर उसके कदम थकान को धोते हुए
चलते जाते हैं
छप-छप करते हुए
लोग देख रहे हैं आँखों से, इरादों से
छाते के नीचे से
मोबाइल कैमरे के पीछे से
कुछ छज्जों से
कुछ बाइक की रफ्तार थामकर
कुछ बस की खिड़की से
कुछ सिर्फ आँखों से नहीं अपने भीतर के अंधेरे से भी
कुछ की आँखों में सवाल हैं और कुछ में सिर्फ़
गीली देह की कल्पनाएँ
लेकिन वह स्त्री
इस सब से बेख़बर
जानती है नज़र और निगाह में फर्क
सुन लेती है छींटों के पीछे की फुसफुसाहटें
फिर भी उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता है
वह हवा में दोनों हाथ फैलाए तेज़ करती है कदम
बारिश की लय में कोई गीत गुनगुनाते हुए भीगती चली जा रही है
वह चलती चली जाती है इस कविता की नायिका बनकर
बस अपने आप में भीगती, सिहरती और हँसती हुई
उसे घर पहुँचने की कोई जल्दी नहीं है
उसका आत्मविश्वास उस पर
एक अदृश्य छाते की तरह तना हुआ है
5.धूप में खड़ी लड़की
वह धूप में खड़ी थी
उसने कोई छाया नहीं ढूँढी
उसने अपना दुपट्टा अपने सिर पर रख लिया
बस का इंतज़ार करते हुए
सूरज उस पर सीधा बरस रहा था
सवालों की बौछार की तरह
बदलियाँ रिश्तेदारों की तरह दूर खड़ी देख रही थीं
शुभेच्छुओं ने कहा-
‘तुम्हें छाँव में जाना चाहिए’
उसने सोचा ‘क्या उसे धूप से डरना चाहिए?’
उसकी त्वचा पर अतीत का एक लेप था
तपन और संघर्ष का
और आत्मा के भीतर धीरे-धीरे पके
एक विश्वास का
वह पसीने की तरह लगातार बहती रही
पलाश की तरह खिलती रही
और जब शाम हुई
तो धूप उस लड़की के साथ
एक मुस्कान लिए बस से उतरती दिखी
6. खिड़की पर उम्मीद होती है
वापसी के पहले
माँ खोल देती है खिड़कियाँ
बंद कर लेती है किवाड़
घर पहुँचते ही सबसे पहले मैं
झाँकती हूँ खिड़कियों से
मुझे देखते ही माँ खोलती है किवाड़
एक चुंबन के साथ छिपा लेती है अपने आँचल से
फिर उतारती है मेरे सिर से लोगों की
बुरी नज़रों को
मैं पूछती हूँ
‘माँ क्यों बंद कर लेती हो किवाड़
जबकि तुम्हें पता है कि
मैं आ रही हूँ
क्या मेरा आना तुम्हें अच्छा नहीं लगता ?’
तब कहती माँ-‘नहीं मेरी बिटिया!
तेरा आना ही तो मुझे सबसे अच्छा लगता है
मैं किवाड़ नहीं बंद करती
बंद करती हूँ अपना इंतज़ार’
फिर एक लंबी साँस के साथ माथा चूमते हुए
कहती है -‘मेरी बिटिया!
याद रखना दरवाज़े पर रहता है इंतज़ार
और खिड़की पर हमेशा उम्मीद रहती है।’
7. उस लड़की को सोने दो
गौरैया,
उसके सिरहाने न फुदको
सारा तामझाम रखकर, थककर
वर्षों बाद ऐसे सोयी है
वह तुम्हारी आवाज़ को भी ओढ़कर
सो जाएगी
हो सके तो
अपनी छोटी चोंच से
उसके बुरे सपने आहिस्ते-आहिस्ते चुग लो
उसे आज दिन भर कुछ नहीं चाहिए
न चाय, न अख़बार
न ही किसी सवाल का कोई उत्तर
आज के दिन
वह कुछ भी साबित नहीं करना चाहती
उसने अपना फ़ोन स्विचऑफ़ कर दिया है
और उसे बस एक नींद चाहिए
एक ऐसी नींद
जिसमें कोई उसे पुकार न सके
जहाँ सपनों की तलाश में उसे भटकना न पड़े
सुनो गौरैया!
फ़िलहाल यह पृथ्वी भी
उसके स्वप्न के अनंत में तैरती एक गेंद है
जिसे एक लंबी उछाल के लिए
किसी और पृथ्वी का सहारा चाहिए…
कवयित्री कंचन सिंह, जन्मतिथि –17/08/2002, जन्मस्थान चित्रकूट, शिक्षा: स्नातक –गोस्वामी तुलसीदास राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय कर्वी, चित्रकूट। परास्नातक – CMP डिग्री कॉलेज प्रयागराज (इलाहाबाद विश्वविद्यालय)। स्त्री विमर्श तथा समकालीन मुद्दों की कविताओं में सक्रियता ।
सम्पर्क: मेल–singhkanchanckt123@gmail.com, मोबाइल: 7307426448
टिप्पणीकार कवि अजय ‘दुर्ज्ञेय’। कन्नौज (उत्तर-प्रदेश) के एक छोटे से गाँव सीहपुर में 21 जून 1998 को जन्म। जवाहर नवोदय विद्यालय से इंटर तक की पढ़ाई और तत्पश्चात काशी विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातक। वर्तमान में इग्नू से परास्नातक उत्तरार्ध के छात्र। बहुजन विचारधारा से जुड़ाव और बुद्ध-फुले-अम्बेडकर की त्रयी से प्रेरणा लेते हुए कविता-लेखन में सक्रिय।
सम्पर्क- 9119845665

