प्रज्ञा गुप्ता
जयमाला की कविताएँ आज के समय की विडंबना एवं सच्चाई को मार्मिकता से सामने लाती हैं। इन कविताओं को पढ़कर हम यह सोचने के लिए मजबूर होते हैं कि हमारे आसपास कितनी उम्मीदें दम तोड़ रही हैं। जयमाला की कविताएँ उस ज्वलन्त सच को अभिव्यक्त करती हैं जिसे हम नज़रअंदाज़ करते हैं; ख़ास तौर पर युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखी उनकी कविताएँ राजनीतिक निर्ममता एवं मनुष्य की असहाय स्थिति को जिस मार्मिकता से चित्रित करती हैं वह प्रभावशाली बन पड़ी हैं।
आज के समय में अपने देश एवं समाज की विडंबनाओ के बीच बच्चों का जीवन कैसे सुंदर एवं सफल बने यह एक बड़ा सवाल है। ‘सवाल’ कविता 5 साल के बच्चे की आँखों में उपजे सवाल को सबके सामने जिस तरह से लाती है वह मार्मिक है।
एक आदमी घूमा रहा है कैमरा चारों ओर
एक आदमी माइक पर बोल रहा है
दुकानें जल रही हैं घर जल रहे हैं
‘घृणा की लहर में मणिपुर जल रहा है’।
अब यह घृणा क्या होती है भला ?
किससे पूछे वह सवाल
नहीं मिलता है उसे जवाब
नहीं मिलता है कोई जवाब !!!
यह पंक्तियाँ हमारे समय की विडंबना को उजागर करती हैं। वही ‘ईश्वर की मौत’ कविता में हिंसा का चित्रण करते हुए जयमाला यह ज़ाहिर करती हैं कि आज के समय में वैश्विक सत्ताएँ कितनी निर्मम हैं। सत्ता के लिए मनुष्य सिर्फ एक संख्या है जो हिंसा में कम हो जाते हैं।
जयमाला की कविताएँ मानवेत्तर जीवन का रूपक लेकर मनुष्य की बेचैनी और विस्थापन की कथा कहती हैं। यहाँ चिड़िया सिर्फ पक्षी नहीं बल्कि हर वह मनुष्य है जो हिंसा के डर से अपने घर आँगन से उखाड़ दिया जाता है । आज के समय की सच्चाई को जयमाला की कविताएँ मार्मिकता से एवं बेबाकी से सामने रखती हैं-
थक गई है चिड़िया
दुखने लगे हैं उसके डैने
कोई तो बताए आखिर
अब वह जाए किधर?
जयमाला की कविताएँ युद्ध के बाद के संसार का सच सामने लाती हैं। यह कविताएँ एहसास कराती हैं कि युद्ध तो ख़त्म हो जाता है लेकिन उसका दुख सदियों तक जीवित रहता है। इस चित्रण में भाषण या आरोप नहीं मनुष्य की पीड़ा है, करुणा है और जीवन की बची-खुची उम्मीद है –
खो गई गिलहरी की हँसी
धुँवे के बवंडर में
राख के बादलों से ढके
आसमान में सुराख ढूंढती हवा को
अब भी इंतजार है
गिलहरी के चिक् चिक् हंसी के
लौट आने का ……
जयमाला जब युद्ध की त्रासदी का चित्रण करती हैं तो उस दुनिया को भी सामने लाती हैं जहाँ मात्र इमारतें नहीं टूटती हैं बल्कि मासूम हँसी का भरोसा भी टूट जाता है। उनकी कविताओं की ख़ासियत है यहाँ युद्ध को किसी राजनीतिक बहस की नज़र से नहीं बल्कि एक बच्चे की नज़र से, माँ की नज़र से, मनुष्यता की नज़र से देखा गया है जिसकी पीड़ा पाठकों के दिल तक पहुँचती है।
‘बारूद’ कविता में जयमाला युद्ध की भयावहता को दिखाती हैं; वही ‘कालिख’ शीर्षक कविता युद्ध के बाद के उन दृश्यों को बारीकी से प्रस्तुत करती है जो मनुष्यता से सवाल करती हैं-
मिसाइल के हमले से घायल
बदहवास शिशु
जिसे गहरी चोट के बावजूद रुलाई
नहीं आ रही
और कलेजे पर पत्थर रख
मरहम पट्टी करती नर्सों की बेबस हँसी
क्या इतिहास कभी पोंछ पाएगा
इन कालिखों को
इसराइल और फिलीस्तीन के पन्नों से…..।
जयमाला का नज़रिया जीवन के प्रति स्पष्टवादी है यह एक बड़ा सच है कि पूरे विश्व में जो युद्ध है उसके मूल में सत्ता है। जयमाला अपनी कविताओं के माध्यम से उस शून्य को सामने रखती हैं जहाँ जीत हार का अर्थ खो जाता है लेकिन हमारी धरती बहुत कुछ खो देती है।
जयमाला की कविताएँ युद्ध के बाद के संसार की छवियों को जिस रूप से दिखती हैं उसमें मनुष्य की गहरी पीड़ा और करुणा है।
जयमाला अपनी कविता के माध्यम से आज के चेतनाहीन, सत्ता- सम्मोहित, संवेदनहीन मनुष्य की कथा कहती हैं ।आज के आधुनिक समाज की एक बड़ी समस्या है अंध दौड़ एवं चेतनाहीन हो जाना। अपनी कविता ‘नशा’ के माध्यम से वे आधुनिक सत्ता, समाज, संस्कृति के मध्य भटके मनुष्य की गाथा व्यंग्यात्मक चेतना के साथ कहती हैं-
हमने पी लिया है
समय के अर्नगर्ल
प्रलापों को
हम नशे में हैं
आकंठ डूबे हुए
इस कदर कि
हमारी आंखें
निकाल ली गईं
और हमें पता ही नहीं चला।
राजनीतिक- सामाजिक चेतना से भरी यह कविता बेहद प्रभावी है ।जयमाला की कविताएँ आज के समय को जिस संवेदना से प्रस्तुत करती हैं वह हमारी चेतना को जगाने में सक्षम है। जयमाला की कविताओं में जीवन के कई रंग चित्रित है, लेकिन युद्ध को लेकर उनकी कविताएँ इस ओर इंगित करती हैं कि आज का मनुष्य आने वाली पीढ़ियों को कितना सुंदर जीवन दे जाएगा या युद्ध की सौगात सौंप जायेगा। इस कठिन समय में जयमाला अपनी कविताओं से संवेदना का संचार करती रहें।
जयमाला की कविताएँ
1.सवाल
पाँच साल के बच्चे ने
सबसे कुट्टी कर ली है
प्रतिज्ञा कर ली है उसने
नहीं करेगा किसी से बात
माँ घाटी की तरफ मुँह
करके रोती रहती है हमेशा
कुछ भी पूछो तो और भी
जोर-जोर से रोने लगतीं हैं
दीदी सुबक रही है
कैम्प के दूसरे कोने में
उसकी प्यारी बिल्ली
छूट गई है घर पर
आधी रात को घर
से भागते समय
जब से आया है कैम्प में
हजारों बार पूछ चुका है
कि उसके वे जूते कहाँ
रह गए जिसे पहन कर
किया करता था वह
फुटबॉल की प्रैक्टिस
रोनॉल्डो बनने के सपने
उसे सोने नहीं देते
उसके पिता हैं कि
कोई जवाब नहीं देते
केवल सूनी आँखों से
देखते रहते हैं आसमान
जाने कब लौटेगा वह अपने घर ?
जाने कब बैठेगा वह दादा की गोद में
जाने कब अपनी दुकान के मर्तबान
से अपने हाथों से निकालेगा टॉफियाँ
उप्फ ! कितने सारे सवाल हैं !
पर कोई नहीं देता है जवाब
अब नहीं करेगा वह किसी से बात
एक आदमी घुमा रहा है कैमरा चारों ओर
एक आदमी माईक पर बोल रहा है
दुकानें जल रही हैं… घर जल रहे हैं…
“घृणा की लहर में मणिपुर जल रहा है…”
अब ये घृणा क्या होती है भला … ?
किससे पूछे वह सवाल
नहीं मिलता है उसे जवाब
नहीं मिलता है कोई जवाब… !!!!!
2. ईश्वर की मौत
उन्होंने कभी जली हुई
गेंद नहीं देखी थी
न ही जलकर पिचकी हुई
दूध की बोतल देखी थी
जलता हुआ अपना घर
तो कभी भी नहीं देखा था
वे विशेष सुरक्षा से सुसज्जित
वातानुकूलित गुफाओं में
रहने वाले देवता हैं
जो, आँकड़ों में जीते हैं
उनके डायनिंग टेबल
के पास लगी होती है
वोट मापने की वोल्यूमैट्रिक मशीन
जिस पर नजरें टिकाये वे
ढूँढते रहते हैं नित नये मंत्र
ऐसे मंत्र जो मीटर की
रफ़्तार करती रहे तेज
इस बार देवताओं ने
ऐसा मंत्र फूँका कि
ईश्वर जल कर राख हो गया
हाँ ! ईम्फाल के ईरियशिम्पा में
एक एंबुलेंस के भीतर
घायल बच्चे की माँ के
प्रार्थना में जुड़े हुए हाथों के बीच
ईश्वर भी तो था मौजूद जिसे
दो हजार की उन्मादी भीड़ ने
जला कर राख कर दिया…
हाँ ! उस दिन ईश्वर की बनाई
हुई श्रेष्ठ कृति के साथ-साथ
ईश्वर भी जल कर राख हुआ था… !
देवताओं ! अपनी बेशर्म हँसी के साथ
जिस दिन फहराना विजय पताका
लगा लेना एक तिलक भी
ईश्वर की राख से… ईश्वर के भस्म से… !!!!!
3.पता
थक गई है चिड़िया
दुखने लगे हैं उसके डैने
हरे-भरे मैदान के किसी डाल से
देखा एक रात उसने आग
फैला था चहुँओर धुँवा
भयभीत चिड़िया छोड़ अपनी डाल
गई पहाड़ों की ओर भाग
तड़ तड़… तड़ तड़
चल रही थी गोलियाँ वहाँ
उड़ रही है तभी से हवा में वह
लगातार… इस पार… उस पार…
धुँवा ही धुँवा… जहर ही जहर…
पूछा उसने नभ से…
पूछा उसने जग से…
नहीं मिला कोई उत्तर
नहीं मिला कोई पता
कोई तो बताए आखिर…
अब वह जाए किधर…? जाए किधर… ?
– युद्ध के बाद –
4.बारूद
नारियल के ऊँचे पेड़ पर
हँसती हुई गिलहरी को
मालूम ही नहीं था कि
उनके देश का नाम
ईज्राईल है या गज़ा
वह तो बस अपने प्रेमी
की कलाबाजियाँ देख
दौड़ती भागती हँस रही थी
ठीक तभी, चंद अहंकारी
उँगलियों ने ट्रिगर दबाया
और… खो गई गिलहरी की
हँसी धुँवे के बवंडर में… …
राख के बादलों से ढके
आसमान में सुराख ढूँढती हवा को
अब भी इंतजार है
गिलहरी की चिक् चिक् हँसी के लौट आने का… … !
5. कालिख
मैं और मेरा की टकराहटों में
ढहा दी गई ईमारतें
पुनः खड़ी कर दी जाएंगी कभी
सिर्फ़…
मलबे के नीचे से झाँकती नन्हीं उँगलियाँ…
राख से लिपटे नन्हें शवों को
खींचकर निकालते पिताओं के आँसू…
रक्त के सूखे धब्बों वाले जीरो साईज के जूते…
कार की पिछली सीट पर रखी बेबी सीट
के बीचों-बीच पड़े गोलियों के सुराख…
मिसाईल के हमले से घायल बदहवास शिशु
जिसे गहरी चोट के बावजूद रूलाई नहीं आ रही…
और कलेजे पर पत्थर रख
मरहम-पट्टी करती नर्सों की बेबस हँसी…
क्या इतिहास कभी पोंछ पाएगा
इन कालिखों को…
ईज्राईल और फिलिस्तीन के पन्नों से … …?
6. विध्वंस के बाद
किसने किस पर
जीत हासिल की
कितने मैं और मेरा
एक दूसरे से टकराए
कितने लोग संख्या बन
सिमट गए खबरों में
कितने टन बारूद लगे
मलबे के पहाड़ बनाने में
कौन शेर बन दहाड़ा
कौन चूहे की मौत मरा
इन सबसे कुछ भी नहीं
बदला पृथ्वी के भूगोल में
बस मानचित्र की आड़ी-ति्रछी
वक्र रेखाओं के रंग बदल गए
बस समय के चेहरे पर ऐसी
खरोंचे आ गईं जिसे दुनियाँ का
सबसे सिद्धहस्त प्लास्टिक सर्जन
भी नहीं छुपा सकता है अपनी कला से
सूरज अब भी निकलता है
गज़ा हमास और ईज्राईल की धरती पर
शाम की ढलती धूप,
ढूँढती है उन मुंडेरों को
जिन पर बैठ सके रात घिरने से पहले
निहार सके प्रेम गीत गाती
चिड़ियों को पल भर के लिए… … !
7. अनुग्रह
शुरू हो गई है सर्दियाँ
गिरने लगी है ओस !
ओ मेरे नीले आकाश !
पद्म पत्रों की तरह
अँजुरी भर ओस
मुझे भी देना !
छींट आना चाहती हूँ मैं,
मिसाईल बरसती गज़ा और ईस्राईल की धरती पर
ताकि खिल जाएँ वहाँ भी सरसों की कलियाँ
हो जाए धरती पीली
गुनगुनाने लगे भ्रमर और मधुप !
ओ मेरे नीले आकाश !
समय के सबसे भयावह दृश्य देखे
मेरी आँखों को देना दो बूँद ओस !
देखना चाहती हूँ मैं
उस बच्चे की आँखों में आँसू
जो बारूद के हमले से रक्तरंजित
होने के बावजूद भूल गया है रोना ;
ओ मेरे नीले आकाश !
मुट्ठी भर ओस बरसा दो न !
उन मलबे के पहाड़ों पर
जिसके तहखानों में बंद
नवप्रसूताओं के स्तन से दूध
इसलिए नहीं उतर रहा कि
उसने नहीं पीया है पानी कई हफ्तों से ;
ओ मेरे नीले आकाश !
कर लो न ! अपनी छतरी
थोड़ा सा नीचे
भर लो न अपने आगोश में
उन आश्रयविहीन नन्हें फ़रिश्तों को
जो नहीं जानते अपना गुनाह
फिर भी, समेट रहे हैं
अहंकार के हमलों से छितराये अपनों के शवों को ;
मेरे नीले आकाश !
शुरू हो गई है सर्दियाँ
जीत के अहंकार में डूबे
मलबों के पहाड़ों पर बैठे गिद्ध से
स्वयंभू महानायकों की जलती आँखों पर
बरसाओ न थोड़ी सी ओस !
तुम सुन रहे हो न … … !!!!!
8.नशा
हमने पी लिया है
समय के अनर्गल
प्रलापों को …
हम नशे में हैं
आकंठ डूबे हुए
इस कदर कि …
हमारी आँखें
निकाल ली गईं
और हमें पता
ही नहीं चला ,
हम नशे में हैं
इस कदर कि
हमारे कानों को
बहरा कर दिया
गया और हमें
पता ही नहीं चला ,
रोप दिए गए पेड़
हमारे भीतर
अपने पसंदीदा फलों के
और हमें
पता ही नहीं चला ,
हाँ ! बख्श दिया गया
हमारे दोनों हाथों को
अथक श्रम के लिए ,
हाँ ! बख्श दिया गया
हमारे दोनों पाँवों को
मदारी की डमरू पर
नाचने के लिए…
वैसे भी नशे में
रहने वाले नहीं टटोटलते
कभी अपनी आँखें और कान
कि देख- सुन सकें जोशीले नारों
के पीछे की चालाक हँसी,
वैसे भी नशे में रहने वाले
नहीं खोलते अपनी आँखें
कि देख सकें अपने पैरों के
नीचे की ढहती जमीन को
हमारा नशे में होना
हमारी नियति नहीं
हमारी आँखों की पट्टी भर है
जो झंडे उठाये भाग रहे हैं
चालाक बाँसुरी धुन के पीछे… … !!!
9.दीमक
हिन्दू – मुस्लिम
नॉर्थ इंडियन – साउथ इंडियन
बंगाली – बिहारी
दलित – सामंती
आदिवासी – गैर आदिवासी
मैतेई – कुकी
शब्द युग्म नहीं हैं ये
इन दो शब्दों के बीच
मुस्कुरा कर गुड़-घी
का लेन-देन करते रहे
भाषा,संस्कृति और
भोजन जैसे शब्द
सत्ता के गलियारों के दीमक
चाट गए बीच के शब्दों को
खड़े कर दिए गए हैं
अब ये दोनों शब्द
विलोम की सूची में…
नए शब्दकोश में … !!!
कवयित्री जय माला, जन्म स्थान : हिरणपुर, झारखंड
निवास : रांची, झारखंड। शिक्षा : मनोविज्ञान एवं शिक्षा से स्नातक ।
कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, लघुकथाएँ, आलेख व रिपोर्ट प्रकाशित ।
संप्रति : कुछ वर्षों तक पत्रकारिता के बाद पूर्णकालिक लेखन ।
पुरस्कार :
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया नवकथा अन्तर्कथा पुरस्कार 2025
माँ धनपति देवी कथा साहित्य सम्मान 2025
कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता 2013,2014, 2021में लघुकथाएँ पुरस्कृत ।
टिप्पणीकार प्रज्ञा गुप्ता का जन्म सिमडेगा जिले के सुदूर गांव ‘केरसई’ में 4 फरवरी 1984 को हुआ। प्रज्ञा गुप्ता की आरंभिक शिक्षा – दीक्षा गांव से ही हुई। उच्च शिक्षा रांची में प्राप्त की । 2000 ई.में इंटर। रांची विमेंस कॉलेज ,रांची से 2003 ई. में हिंदी ‘ प्रतिष्ठा’ में स्नातक। 2005 ई. में रांची विश्वविद्यालय रांची से हिंदी में स्नातकोत्तर की डिग्री। गोल्ड मेडलिस्ट। 2013 ई. में रांची विश्वविद्यालय से पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2008 में रांची विमेंस कॉलेज के हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति ।
संप्रति “ समय ,समाज एवं संस्कृति के संदर्भ में झारखंड का हिंदी कथा- साहित्य” विषय पर लेखन-कार्य।
विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित।
प्रकाशित पुस्तक- “ नागार्जुन के काव्य में प्रेम और प्रकृति”
संप्रति स्नातकोत्तर हिंदी विभाग रांची विमेंस कॉलेज रांची में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत।
पता- स्नातकोत्तर हिंदी विभाग ,रांची विमेंस कॉलेज ,रांची 834001 झारखंड।
मोबाइल नं-8809405914, ईमेल: prajnagupta2019@gmail.com

