समकालीन जनमत
कविता

जगदीश पंकज के नवगीतों में समकालीन चेतना और सामाजिक प्रतिरोध

 अशोक शर्मा ‘कटेठिया’


जगदीश पंकज समकालीन हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ नवगीतकार हैं। उनके नवगीत अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय परिस्थितियों पर मुखर होकर संवाद करते हैं। सामाजिक विसंगतियाँ, शोषण, दलित प्रश्न, असमानता, भूख-गरीबी और जनसामान्य की आवाज़ उनके गीतों का केन्द्रीय सरोकार है। वे कविता को केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम बनाते हैं। वर्ष 2014 से आपके साथ निरंतर बना संवाद मेरे लिए सौभाग्य ही नहीं, एक मूल्यवान साहित्यिक संबल भी रहा है।

मेरे संज्ञान में जगदीश पंकज के अब तक तेरह नवगीत-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं— ‘सुनो मुझे भी ‘ (2015), ‘निषिद्धों की गली का नागरिक’ (2015), ‘समय है सम्भावना का ‘ (2017), ‘आग में डूबा कथानक ‘ (2019), ‘मूक संवाद के स्वर’ (2019), ‘अवशेषों की विस्मृत गाथा ‘ (2020), ‘प्यास की पगडंडियों पर ‘ (2021), ‘हँसो, स्वयं पर हँसो’ (2023), ‘आक्रामक श्रद्धा के युग में ‘ (2023), ‘वर्तमान टूटे कन्धों पर’ (2024), ‘शिलाखंड पर खिचीं लकीरें’ (2024), ‘साक्षी हैं हम समय के’ (2025) तथा ‘बन्द कपाट, लगी है सॉकल ‘ (2026)। इसके अतिरिक्त उनका एक कविता-संग्रह ‘द्रोह असहमत इच्छाओं का ‘ भी प्रकाशित है।
नवगीत-संग्रह ‘सुनो मुझे भी ‘ के लिए उन्हें ‘देवराज वर्मा उत्कृष्ट साहित्य सृजन सम्मान–2015’ से सम्मानित किया गया, जो उनके रचनात्मक सरोकारों की गम्भीरता और सामाजिक प्रतिबद्धता का सशक्त प्रमाण है।

जगदीश पंकज के नवगीतों पर गहन अकादमिक शोध हुआ है। ‘हिन्दी नवगीत परंपरा और जगदीश पंकज : एक आलोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर से पीएच.डी. प्रदान की गई है तथा ‘जगदीश पंकज एवं यतीन्द्रनाथ राही के नवगीतों का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से पीएच.डी. सम्पन्न हुई है। इसके अतिरिक्त विभिन्न विश्वविद्यालयों में नवगीत विषयक शोधकार्य पीएच.डी. स्तर पर पंजीकृत हैं।

जगदीश पंकज के नवगीत समकालीन समाज और व्यक्ति के बीच चल रहे संघर्ष का जीवंत चित्र प्रस्तुत करते हैं। इनमें व्यक्तिगत अनुभव, सामाजिक असमानता, राजनीतिक द्वंद्व और प्राकृतिक चेतना का सघन मिश्रण दिखाई देता है। उनके गीत सदियों पुरानी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं को आज के संदर्भ में पुनः जीवित कर देते हैं और पाठक को यह सोचने के लिए विवश करते हैं कि भय, अज्ञान और असमानता से घिरे वर्तमान में नागरिक अपने अस्तित्व को कैसे बचा रहा है। समकालीन यथार्थ के संदर्भ में उनके कुछ चुनिंदा नवगीतों पर यह विमर्श उस वैचारिक चेतना को आगे बढ़ाने का प्रयास है, जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ गंभीर मंथन करेंगी।

रोज़मर्रा का संघर्ष और निर्भरता: नवगीत ‘अंकित हूँ समय पर’ (1) में वे रोज़मर्रा के संघर्ष और व्यवस्था-जनित निर्भरता को उजागर करते हैं। टैंकर, राशन की दुकान और जुलूस जैसे प्रतीक आम जन के जीवन की अनिश्चितताओं और असुरक्षाओं को सामने लाते हैं। यहाँ कवि स्वयं को ‘समय पर अंकित’ मानते हुए उस व्यापक जन-अनुभव का प्रतिनिधि बन जाता है, जो भूख, अपमान और सामाजिक अन्याय से जूझ रहा है।

मीडिया, सत्ता और विमर्श: ‘खबरें बरस रहीं धरती पर’ (2) और ‘यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है’ (3) में सामाजिक-राजनीतिक विमर्श तीखे रूप में उभरता है। मीडिया, अफ़वाह, विज्ञापन और सत्ता-संरचनाओं की भूमिका को कवि प्रश्नांकित करता है। ‘सिंहासन’ और ‘विज्ञापन’ जैसे प्रतीक यह संकेत देते हैं कि सूचना का उपयोग जनजागरण के बजाय भ्रम और नियंत्रण के औज़ार के रूप में किया जा रहा है।

मौन, भय और प्रतिरोध: ‘चुप रहे हों जब अबोले शब्द’ (4), ‘खतरे का बज रहा सायरन’ (6) और ‘एक सपन गूँगापन लादे’ (9) में मौन, असहायता और दबे हुए आक्रोश की अभिव्यक्ति है। ‘अबोले शब्द’ और ‘गूँगे’ केवल व्यक्तिगत चुप्पी नहीं, बल्कि सामाजिक विवशता के प्रतीक हैं। कवि संकेत करता है कि जब समाज बोलने की क्षमता खो देता है, तब अन्याय और भय का विस्तार अनिवार्य हो जाता है।
आर्थिक असमानता और युवाओं की बेचैनी: नवगीत ‘और न जाने क्या बदलेगा’ (5) उदारीकरण, पूँजी और वित्तीय जाल के माध्यम से बढ़ती आर्थिक असमानता को रेखांकित करता है। अवसरों के सिकुड़ते जाने और युवाओं की बेचैनी को कवि अत्यंत संवेदनशीलता से सामने लाता है। यह गीत केवल यथार्थ-वर्णन नहीं, बल्कि चेतना और प्रतिरोध का आह्वान है।

प्रकृति और साझा विरासत: ‘इन्द्रधनुषी रंग फैले हैं’ (8) में प्रकृति के प्रतीक—सूर्य, नदी, पर्वत, इन्द्रधनुष—मानवता की साझा विरासत का बोध कराते हैं। कवि यह स्पष्ट करता है कि प्रकृति पर किसी एक का स्वामित्व नहीं है। सामाजिक विघटन और घृणा के दौर में भी प्रकृति से संवाद नई आशा और सामूहिक चेतना का मार्ग दिखाता है।

इतिहास, भविष्य और नैतिक जिम्मेदारी: ‘हम प्रतीक्षा में खड़े हैं’ (7) और ‘जब अगली सदियों के शोधग्रन्थ में’ (11) में कवि इतिहास और भविष्य दोनों से संवाद करता है। आने वाली पीढ़ियाँ हमारे समय को किस दृष्टि से देखेंगी—यह प्रश्न कवि को बेचैन करता है। कथनी-करनी के अंतर, अवसरवाद और चुप्पी को यहाँ तीखे व्यंग्य के साथ प्रस्तुत किया गया है।

भय, नफरत और प्रेम की संभावना: ‘इस सदी ने डर उगाया’ (10) भय और विभाजन को सदी की नियोजित उपज के रूप में चिन्हित करता है, जहाँ नफ़रत का संस्थानीकरण हो चुका है और आधुनिकता के नाम पर मानवीय संबंध मौन हो गए हैं। इसके विपरीत, इसी अँधेरे में प्रेम, सहिष्णुता और सौहार्द को प्रतिरोध की नैतिक शक्ति के रूप में प्रस्तावित किया गया है। वहीं ‘क्या हो रहा यहाँ धरती पर’ (12) शासन और नागरिक के बीच बढ़ते तनाव, वैचारिक दमन और सच की जटिल खोज को प्रश्नात्मक संरचना के माध्यम से उजागर करता है। दोनों नवगीत मिलकर यह रेखांकित करते हैं कि भय और नफरत के इस युग में प्रेम केवल भावुकता नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संभावना का अंतिम आधार है।

भाषा और शिल्प: भाषा और शिल्प की दृष्टि से जगदीश पंकज के नवगीत मुक्त छंद, प्रतीकात्मकता और संवादात्मक शैली में रचे गए हैं। ‘सायरन’, ‘बैरीकेड’, ‘सिंहासन’, ‘गूँगे’ और ‘अबोले शब्द’ जैसे प्रतीक उनके गीतों को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से भी सशक्त बनाते हैं।

निष्कर्षतः जगदीश पंकज के नवगीत समकालीन सामाजिक चेतना और प्रतिरोध की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। ये गीत न केवल समय की विडंबनाओं को उजागर करते हैं, बल्कि पाठक को सोचने, प्रश्न करने और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित करते हैं। कवि स्पष्ट करता है कि मौन और असहायता का समय बीत चुका है—अब सच, न्याय और मानवीय गरिमा के लिए सक्रिय चेतना का समय है। मैं आदरणीय जगदीश पंकज जी के स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।

 

 

जगदीश पंकज के बारह नवगीत

1. अंकित हूँ समय पर

तुम गुफा, निर्जन वनों में
खोजना मत
मैं परत दर परत
अंकित हूँ समय पर !

टैंकर के पास लाइन में लगा हूँ
बालटी , दो बालटी
आ जाये हिस्से
कभी राशन की किसी दूकान पर मैं
सुन रहा हूँ भूख के
असहाय किस्से

इस तरह अमृत मिला
ऊँचे शिखर से
हो न पाऊँ जो
कभी मैं आत्मनिर्भर !

हूँ जुलूसों में, कभी हूँ रैलियों में
भर रहा हुंकार
सच की देहरी पर
कर दिया मुझको बहिष्कृत साधनों से
सिर्फ निर्भर कर दिया हूँ
चाकरी पर

मैं तुम्हारी मार
खाकर भी रहूँ चुप
अब नहीं स्वीकार
होगा मुझे पल भर ।

रोज रोजी के लिए आकर खड़ा हूँ
चौक की हर भीड का
मैं अंग बनकर
धर्म, मजहब, जातियों की साँकलों को
तोड़ता तुमको मिलुंगा
खड़ा तनकर

मत कुचलते ही
रहो आक्रोश मेरा
वह उठेगा फिर विकट
प्रतिरोध बनकर ।

2.‘खबरें बरस रहीं धरती पर’

खबरें ,
बरस रहीं धरती पर
आसमान बोझिल-बोझिल है
जाने-पहचाने
चेहरों पर
कुछ भी कह पाना मुश्किल है ।

कानाफूसी में
उलझी हैं
इतनी आदमकद अफवाहें
चलती-फिरती
दीख रही हैं
दीवारों की कुटिल निगाहें

सच को कितना
कहाँ खंगालें
सब प्रायोजित है, झिलमिल है ।

विज्ञापन तो
विज्ञापन हैं
शीर्ष-कथा की तरह परोसा
शंका उभरे
नहीं कहीं से
टूट न जाये कहीं भरोसा

पर जो दिखलाया
निखारकर
वह भी दीख रहा पंकिल है ।

इतना घटाटोप
छाया है
लगता सब कुछ धुंध भरा है
महाबौद्धिक
शोध कर रहे
कहाँ-कहाँ , क्या-क्या बिखरा है

फिर भी दीख रहा
साजिश में
कौन, कहाँ, कितना शामिल है ।

कितना जनमत
को भरमाना
यह खबरों पर आधारित है
क्या कुछ
ब्रेकिंग-न्यूज बनायें
निर्देशों पर अवलंबित है

समाचार तो
सिर्फ माध्यम
सिंहासन असली मंजिल है ।

3.‘यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है ‘

शब्द को
मिलकर तपायें
ताप को मिल गुनगुनायें
यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है ।

जहाँ अत्याचार की
शब्दावली को
घृणा के विष में डुबोया जा रहा है
आज के आहत विषय
पीछे हटाकर
बस विगत का बोझ ढोया जा रहा है

क्रूर कटुता
को दिखायें
क्रुद्ध जनमत को बतायें
बंद किन अलमारियों में घुटी लय है ।
यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है ।

सूचना के नाम पर
अफवाह देकर
अटकलों पर तन्त्र का खंभा टिका है
हो रहा गदगद
मिले विज्ञापनों से
मीडिया की किस जगह  क्या भूमिका है I

भूख को
कितना छिपायें
किस अघाये को दिखायें
लोक में जब फैलता हर ओर भय है ।
यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है ।

बढ़ रही है
धमनियों में सरसराहट
रक्त की भी कसमसाहट चढ़ रही है
यह हमारे दौर की
निरुपाय पीढ़ी
अब विकल्पों के चयन को बढ़ रही है

मार्ग कुछ
संभव बनायें
शब्द में प्रतिकार गायें
लोकमत की हो सकेगी तभी जय है ।
यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है ।

4.चुप रहे हों जब अबोले शब्द

चुप रहे हों जब अबोले
शब्द आकर
ओठ तक लाकर, न कहना भी
घुटन की यातना है ।

चित्र है या शब्द जो आ
नयन पट की
भंगिमा के
मौन का अनुवाद करते
या तृषा के तृप्ति से
अद्भुत मिलन की
चाह लेकर
देह भाषा में उतरते

ग्रन्थि कोई बन नहीं
अभिशाप जाये
यत्न से शायद वही
संकेत की उद्भावना है ।

जिस जगह विश्वास
मरणासन्न होकर
व्यर्थ की आश्वस्तियों में
घिर गया हो
उस जगह पर
अंध-श्रृद्धा के शवों पर
लग रहा संचित
सभी कुछ गिर गया हो

एक हिंसक सोच जो
विकसित हुई है
वह हमारे समय के, इस
सत्य की अवमानना है ।

5. और न जाने क्या बदलेगा

बदल गया कुछ
बदल रहा कुछ
और न जाने क्या बदलेगा
यह अपना गोलार्द्ध
न जाने
भटकन से कैसे संभलेगा ।

एक उदारीकरण उछलकर
जा बैठा
पूँजी के घर में
किन्तु पुरातन सामन्तों सा
सोच जमा
अब भी अंतर में

अर्थतन्त्र के
मकड़जाल से
लघु-निवेश कैसे निकलेगा ।

अवसर सिकुड रहे हैं हर दिन
सेवाएँ
दम तोड़ रही हैं
गति के समीकरण उलझे हैं
यात्राएँ
पथ छोड़ रही हैं

अंतराल पीढ़ी का कहकर
किसको कौन
दिलासा देगा ।

बहुदेशी हो गया प्रबंधन
निगमित हुई
व्यवस्था धन की
खड़ा भीड़ में व्यथित युवामन
खोज कर रहा
अधुनातन की

ताप बढ़ रहा धीरे-धीरे
शायद अब
लावा पिघलेगा ।

वंचित रहे सदा साधन से
होता रहा
अनवरत शोषण
यह वित्तीय व्यवस्था किसका
करती रही
निरंतर पोषण

ज्वालामुखी घोषणाओं से
कब किसको
सौहार्द मिलेगा ।

6. ‘खतरे का बज रहा सायरन’

खतरे का बज रहा सायरन
हम नुक्कड़ पर
बहस कर रहे ।

एक अघोषित
युद्ध चल रहा
विश्वग्राम की हर सीमा पर
अर्थ-तन्त्र के
औजारों पर
धार लग रही कसमें खाकर
हम पूँजी के उपनिवेश का
अपना-अपना
नाम धर रहे ।

खतरे का बज रहा सायरन
हम नुक्कड़ पर
बहस कर रहे ।

कट्टरता के महासमर में
खोज रहे हैं
अपनेपन को
धर्म-जाति के अंधकार में
बाँध दिया है
जब जन-जन को
बाहर एक समूचापन है
पर भीतर
अलगाव भर रहे ।

खतरे का बज रहा सायरन
हम नुक्कड़ पर
बहस कर रहे ।

कहीं भयानक आग लगी है
आक्रामक
निष्ठाएँ लेकर
कहीं असहमतियाँ उभरी हैं
समाधान पर
कुछ ले देकर
दुनिया के सरपंच चकित हो
साख बचाते
हुए डर रहे ।

खतरे का बज रहा सायरन
हम नुक्कड़ पर
बहस कर रहे ।

एक मवाली बना चौधरी
धमकाता सा
दीख रहा है
अपनी ताकत डर दिखलाकर
देता सबको
सीख रहा है
दंभ उच्चता के सपनों का
दिखलाकर हम
रोज़ मर रहे ।

खतरे का बज रहा सायरन
हम नुक्कड़ पर
बहस कर रहे ।

7. ‘हम प्रतीक्षा में खड़े हैं’

रुक नहीं जाना
प्रगति ! फिर रास्ते में
हम प्रतीक्षा में खड़े हैं ,
द्वार पर ही !

शपथ के , सौगन्ध के
कितने बहाने
फिर न मिल जायें ,
कहीं से राजपथ के
कहीं निर्वाचन
निरर्थक हो न जाये
और पहिये मुड़ न जायें,
कहीं रथ के

जो मिले थे वायदे
सिंहासनों से
वे खड़े सब
रेत के आधार पर ही !
है कहीं भ्रम , है कहीं
भटकन समय की
जाल लेकर हैं खड़े
शातिर शिकारी
लक्ष्य भेदन के लिए
अब बस्तियों में
सेवकों की
चल रही है चाँदमारी

झूठ के पर्दे
सजे हैं खिड़कियों पर
उँगलियाँ उठती रहीं
दीवार पर ही !

अब न गंगा का
नहीं साबरमती का
पुत्र हो या, हो कि
मानस पुत्र कोई
निकटतम संबंध के
शव को उठाकर
मातृवत् व्यवहार की
उम्मीद रोई

तोड़कर धागे
परस्पर बंधनों के
हो रही चर्चा
बदल उद्गार पर ही !

जो उछलकर आ रहे
नारे सभा से
कब तलक वे
धुंध फैलाते रहेंगे
हैं चयन में व्यस्त
धनवंतरि समय के
जो विकल्पों की
कथाओं को कहेंगे

अंकुरित होती नई
संभावनाएँ
हैं टिकी आकर
नये उपचार पर ही !

8. इन्द्रधनुषी रंग फैले हैं

इन्द्रधनुषी रंग
फैले हैं क्षितिज पर
हम प्रदूषण की हवाओं से घिरे हैं ।

अंतत: , आँचल
उठा करके धरा ने
सूर्य के पदचिह्न
नापे हैं गगन में
पेड़ पौधों ने तभी
गरदन उठायी
चूमने की चाह लेकर
शान्त मन में

घुट रहीं थीं
जो सहोदर भावनाएँ
ले नया उल्लास उनके दिन फिरे हैं ।

चल रहे विश्वास की
जो ले पताका
कुदरती संवाद से
अनभिज्ञ होकर
बाँटते  इतिहास को
वे ही सड़क पर
मारते सच में घृणा की
नित्य ठोकर

एक साझी विरासत के
पर कतरकर
खोजना संभव नहीं सच के सिरे हैं ।

व्यक्तिगत किसका कहाँ
भूगोल में भी
जो मिला है, वह
सभी का सामुहिक है
सूर्य हो या चन्द्र की
अद्भुत कलाएँ
सब सनातन से
यहाँ तक आधुनिक है

नदी, पर्वत, घाटियाँ
या है समन्दर
स्वामियों का दंभ लेकर हम गिरे हैं ।

9. एक सपन गूँगापन लादे

एक सपन गूँगापन लादे
भटक रहा
पूरी धरती पर ।

यहाँ कपोतों पर अंकुश है
नहीं कर सकें
कहीं गुटर गूँ
कोयल सहमी है कोटर में
जाकर कहाँ
सुरों को रोकूँ

कितनी देर दबाकर रक्खें
अपना दुख
अपने ही भीतर ।

राजमार्ग संकुचित हो रहे
पगडंडी पर
दिशा नहीं है
सीमाकर हो रहा असीमित
नई व्यवस्था
यहीं कहीं है

बैरीकेड़ लगे हर पथ पर
सड़कें बनीं
हुईं बंदीघर ।

रोज़ घोषणाएँ होती हैं
आदेशों की,
निर्देशों की
जन-गण रोज प्रतीक्षा करते
सिंहासन के
संदेशों की

लेकर सपने विश्वग्राम के
कब तक जियें
घुटन को पीकर ?

जिन्हें बोलना है वे चुप हैं
गूँगे का गुड़
स्वाद भरा है
सिसक रहा ईमान जेब में
लगता वह भी
डरा डरा है

यहीं कहीं पर राह मिलेगी
जतन करें
होठों को सींकर !

10. ‘इस सदी ने डर उगाया’

इस सदी ने
डर उगाया है दिलों में
और नफरत की
सजायी हैं दुकानें ।

आधुनिकता के
सभी सम्बन्ध चुप हैं
विफल हैं भावी
सृजन की योजनाएँ
विगत का गायन
नया सहगान बनकर
खोजता है
शून्य में संभावनाएँ

एक उत्तर-आधुनिक
अवधारणा का
वर्क लेकर ढक रहे
बूढ़ी खदानें ।

वित्त-पोषण
हो रहा है रूढ़ियों का
फिर नये लेकर
प्रकाशन से रिझाने
आज के विचलित
समय की सत्यता पर
कस रहा है झूठ
हँसकर रोज़ ताने

चल रहे हैं सब
निरर्थक बोझ लेकर
देख पीछे टूटतीं
गिरती मचानें ।

जब विभाजन के
प्रतीकों को सजाकर
प्रगति का पर्याय
माना जा रहा है
तब कहीं घायल
परिंदा भी उछलकर
समय के आक्रोश को
दुहरा रहा है

प्यार के उत्ताप से
नफरत पिघलती
उमड़ता सौहार्द
भर ऊँची उडानें ।

11. जब अगली सदियों के शोधग्रन्थ में 

सोचो जब अगली सदियों के
शोधग्रन्थ में हम भी होंगे
घिघियाते से, सकुचाते से,
खिसियाते से, पछताते से
बेबस होकर अपने पर ही !

अमृतकाल
लिखा जायेगा
किसी स्वर्णयुग से भी उन्नत
विजय पताका
फहरायेंगी
युग-युग की वाणी का जनमत

सोचो जब अगली सदियों में
हम दीखेंगे
शर्माते से, लतियाते से
और पिटे चेहरे ले करते
चारण कृतियों का अभिनंदन
दुहरायेंगे घुटते स्वर ही !

हम उत्तर-
आधुनिक लगेंगे
हुए बिना आधुनिक समय में
हँस कर गाते
हुए मिलेंगे
नाच दिखाते भय-संशय में

अगली सदियाँ खोद-खोदकर
खुर्दबीन से
तब परखेंगी
रीढ़ हमारी
कितनी तनी, झुकी है कितनी
ले कथनी-करनी अंतर ही ।

किसने
चरण वंदना की है
किस-किसने चाटा है तलुवा
किसने
ठुकरायीं सुविधाएँ
किसने चखा मगन हो हलुवा

लेकिन जब आने वाला युग
शल्य-क्रिया के
अभिलेखों में
खोजेगा मृत संदर्भों को
उसे मिलेंगे गर्दन ताने
खुद्दारी के भी अक्षर ही !

12. क्या हो रहा यहाँ धरती पर

क्या हो रहा
यहाँ धरती पर
मिली सूचनाएँ
अम्बर से
सहमे -सहमे
दीख रहे सब
पर चुप हैं, अनजाने डर से।

कर्फ्यूग्रस्त
दिशाएँ सारी
शासन की पूरी तैयारी
गलियों के
नुक्कड पर बहसें
कौन कहाँ पर कितना भारी
इतनी घुटन
भरी आँगन में
कैसे निकलें बाहर घर से ?

नव-अभिनव में
बहस छिड़ी है
कितनी किससे सोच भिड़ी है
अकस्मात
आये संकट से
किस-किसकी हालत बिगड़ी है
भाषा पूछ रही
अपनों से
शब्द दूर क्यों है अक्षर से ?

अपनी-अपनी
जिज्ञासा है
लेकिन मन फिर भी प्यासा है
तर्क-वितर्क
धरे बस्ते में
बहस चली बारहमासा है
मुक्त विचारों की
गठरी ले
नदी न मिल पाती सागर से।

कौन कहाँ
कितना तटस्थ है
शोध कर रहा इंद्रप्रस्थ है
तन के साथ
मानसिकता भी
कहाँ-कहाँ पर रही स्वस्थ है
उलझी हुई
दलीलें लेकर
प्रश्न पूछते हैं पत्थर से।

काया-कल्प
राजधानी का
मुद्दा उठा हवा पानी का
कितनी हुई
घोषणाओं में
कितना हिस्सा नादानी का
उठीं प्रदूषण
की आवाजें
मलिन बस्तियों और नगर से।

पूरी कहीं,
कहीं पर आधी
बाँट रहे राहत अपराधी
आकस्मिक
आपाधापी में
किसको कैसी मिली उपाधी
पूछ रहीं
विचलित निष्ठाएँ
डर-डर कर टूटे छप्पर से ।

कभी गरीबी का
नाटक है
बन्द किवाड़ों पर दस्तक है
जो अपने
अनुकूल नहीं है
उस पर ही शंका व्यापक है
नारों में उतना
चिल्लाते
जितना मिला हुकुम ऊपर से ।

हुंकारों में
घृणा भरी है
सारी परजा डरी-डरी है
नम्र धमकियों
वाली भाषा
यहाँ-वहाँ पर आ बिखरी है
हम फिर भी
आश्वस्त सदा ही
प्यार झरे युग के निर्झर से ।


 

कवि जगदीश पंकज, पूरा नाम : जगदीश प्रसाद जैन्ड , जन्म : 10 दिसम्बर 1952
स्थान : पिलखुवा, जिला-गाज़ियाबाद ( वर्तमान -पंचशील नगर ,उ .प्र .) , शिक्षा : बी.एससी .

प्रकाशित कृतियाँ : 1. ‘सुनो मुझे भी’ (नवगीत संग्रह)-2015 , 2. ‘निषिद्धों की गली का नागरिक’ (नवगीत संग्रह)-2015, 3.¹ समय है सम्भावना का’ (नवगीत संग्रह )- 2017, 4. ‘आग में डूबा कथानक’ (नवगीत संग्रह )-2019, 5. ‘मूक संवाद के स्वर’ (नवगीत संग्रह )-2019, 6. ‘अवशेषों की विस्मृत गाथा’ (नवगीत संग्रह)-2020, 7. ‘प्यास की पगडंडियों पर’ (नवगीत संग्रह)-2021. 8. ‘द्रोह असहमत इच्छाओं का’ (कविता संग्रह) 9.’हँसो,स्वयं पर हँसो'(नवगीत संग्रह)-2023.10. ‘आक्रामक श्रद्धा के युग में’ (नवगीत संग्रह)-2023 ,11. ‘वर्तमान टूटे कन्धों पर’ (नवगीत संग्रह)-2024 , 12. ‘शिलाखंड पर खिचीं लकीरें’ (नवगीत संग्रह)-2024 . 13. ‘साक्षी हैं हम समय के’ (नवगीत संग्रह)-2025.14. ‘बन्द कपाट,लगी है साँकल ‘(नवगीत संग्रह)-(2026)

कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ और नवगीत के अनेक समवेत संकलनों में नवगीत तथा कविताएँ प्रकाशित. सम्पादन : साहित्यिक पत्रिका ‘संवदिया’ के नवगीत-विशेषांक का सम्पादन.

सम्मान : विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित.

सम्प्रति : सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में वरिष्ठ प्रबन्धक के पद से सेवानिवृत्त एवं स्वतंत्र लेखन
संपर्क : सोमसदन ,5/41सेक्टर2,राजेन्द्रनगर,साहिबाबाद,गाज़ियाबाद-201005 .
मो . 08860446774 , e-mail: jpjend@yahoo.co.in
08851979992, jagdishjend@gmail.com

 

 

टिप्पणीकार अशोक कुमार शर्मा, उपनाम: ‘कटेठिया’
जन्म: 01.03.1968, स्थान: कटेठी, जनपद कानपुर देहात, उ.प्र., भारत। शिक्षा: बी.टेक. (सिविल), एम.बी.ए. (प्रोजेक्ट मैनेजमेंट)
व्यवसाय: सहायक निर्माण प्रबंधक, सी.एम.एस.सी.-01, आर.यू.आई.डी.पी., जयपुर। कार्यक्षेत्र: राजस्थान
लेखन विधाएँ: गीत, नवगीत, नई कविता, छन्द-मुक्त लंबी कविताएँ, दो-खंड काव्य (लेखनरत), लघु कथा, कहानियाँ एवं समालोचना
प्रकाशित समवेत संग्रह:
• निर्झरिका (2014), पारिजात (2015), वीथिका (2015), काव्योदय प्रथम (2016), उत्तरायण (2016), कविता अविराम – एक (2017), समकालीन गीतकोश (2017-18), संवदिया (2017), नवगीत का मानवतावाद (2019), नवगीत कोश (2020), आभाषी दुनिया के नवगीत (2021), नवगीत के सृजन सारथी – तृतीय खंड (2023)
साहित्यक गतिविधियाँ: काव्य-गोष्ठियाँ, फेसबुक और ब्लॉग में सक्रिय
संपर्क:
“चंद्रप्रभा विला”, 417, रॉयल रेजीडेंसी – प्रथम फेस, सारंगपुरा, बड़ के बालाजी, अजमेर रोड, जयपुर – 302026
मोबाइल: +91 82099 09309
ई-मेल: aks68envirad@gmail.com | aks68_knp@yahoo.co.in | aks68jpr@gmail.com | sharma68ak@gmail.com
फेसबुक पेज: https://www.facebook.com/katethiya/
ब्लॉग: https://aks684knp.blogspot.com/

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