प्रो. रामेश्वर राय
कविता समय से तटस्थ नहीं होती, लेकिन समय के साथ उसका रिश्ता इतिहास और सूचना-तंत्र से भिन्न होता है। कविता में दर्ज़ समय पंचांग और गणित की सारी गणनाओं से बाहर एक ऐसे दिक्काल का निर्माण करता है, जहाँ काल के तीनों आयामों में आवाजाही संभव होती है, जहाँ भूगोल और खगोल की सारी तथता अनुभूति के ताप में पिघल कर एक नई दुनिया का निर्माण करती है। यथार्थ वस्तुगत तथता को अपदस्थ किए बिना रचना संभव नहीं। समय बदलता है, समाज और इनके साथ कविता और उसके पाठक भी।
हिंदी कविता का समकालीन परिदृश्य विमर्श, सत्ता और बाज़ार-प्रतिरोध, भूमंडलीकरण तथा पर्यावरण-संकट जैसे विषयों की बस्ती में बाढ़ के पानी की तरह फैला हुआ है। कुछ अपवादों को छोड़कर हिंदी कविता भाषा और अंतर्वस्तु के स्तर पर एक दयनीय एकरूपता की महामारी के चपेट में है।विचारधारा और विमर्श – उड़ान की अनंत संभावनाओं से भरी रचनाशीलता के पंख तोड़कर उसे ज़मीन पर रेंगने वाले सरसृप में बदल देते हैं। ऐसी कविताएँ किसी चित्र में धधकते उस आग जैसी दिखती हैं, जिसके नसीब में राख होना भी शेष नहीं बचता। जीवन और सृजन के ताप से पैदा होने वाली कविताएँ आलोचना की सैद्धांतिक चौहद्दी, विमर्शों के परिक्रमा-पथ और विचारधारात्मक निर्देशों का अतिक्रमण करके ही अपनी रचनात्मकता और पहचान की रक्षा कर पाती हैं।
हिंदी के समकालीन काव्य-परिदृश्य में गौरव की कविताएँ वर्षावन में एक नन्हें वृंत पर खिले फूल की तरह हैं, जिन्हें अलक्षित नहीं किया जा सकता। उसकी कविताओं में अभिव्यक्ति के आसान फॉर्मूलों को दरकिनार करने का विवेक भी है और होश भी। उसकी कविताएँ अपने विन्यास में और कथ्य में इकहरी नहीं हैं। उसे पता है कि ज़माने में कई ज़माने की परतें लिपटी होती हैं। इसलिए उसकी कविताएँ भाषा और जीवन के ऐसे इलाकों से गुज़रती हैं, जहाँ उम्रजनित भावावेश का अशांत सागर है तो व्यवस्था से टकराकर रथ के टूटे हुए पहिए का उदास मंज़र भी। परंपरा और मिथकों के भव्य तथा उदात्त शिखरों से वंचित जीवन के मामूलीपन का ठंडा पठार इन कविताओं के मानचित्र में मौजूद है —
हमारे हिस्से की नदी
किसी भगीरथ ने नहीं बहाई
अहर्निश प्यास लिए बैठे रहे हम मरुधरा पर
हमारे चुंबन पर
श्वेतवर्णी अप्सराओं ने नहीं बरसाए फूल
लाठी पटकते हुए सिपाही गाली देकर गए ..
अन्याय-असमानता पर टिकी इस दुनिया में उसकी कविताएँ पीड़ितों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं। शोषण की क्रूरता और श्रम की रागमयता के अक्षांश पर उसकी कविता संभव होती है —
वे अपने लोकगीत गुनगुनाते थे
तुम्हारी निर्माणाधीन
इमारतों में सीमेंट ढोते हुए
और तुम्हें लगा कि वे मनोरंजन करते हैं
जहाँ पर सिर्फ़ काम किया जाना चाहिए।
(अब वे तुम्हारे शत्रु हैं)
गौरव की काव्यानुभूति में शोर में भी प्रेम करने वाली स्त्रियों की चीखों को सुन लेने की गहरी संवेदनशीलता है। उसकी कई कविताएँ नेपथ्य में खो गए जीवन-रागों को आवाज़ देती हैं —
क्या कुत्ते अब तक
किसी आवाज़ पर चौंकते हैं
क्या तुम्हारे यहाँ की बिल्लियाँ
दुबली हो गई हैं
तुम्हारे घर के बच्चे
भैंस के थनों को छूकर अबभी भागते हैं?
(मैं सुन रहा हूँ)
प्रेम के कुछ विरल और कोमल प्रसंग मेघों के बीच ठिठक हुई बिजली की तरह देर तक हमारी स्मृतियों में बने रहते हैं —
जिन दिनों तुमने मेरा वरण किया
मेरी देह की व्याधियाँ डूब कर मर गईं थीं तुम्हारे द्रव में
आँखों के आगे खुल गया था
रोशनी का संसार और
त्वचा इतनी सुकोमल हो उठी थी कि
फूल की पंखुड़ी से भी काटी जा सकती थी..
(मैं तुम्हारे पास लौट आया हूँ)
गौरव की कविताओं में प्रेम-राग के मेघाच्छन्न क्षितिज पर वैराग्य के धुँधले अँधेरे की तरह है। इस प्रेम के पाँव में भावुकता की धूल लिपटी है, लेकिन अब वह व्यथा के ऐसे इलाके में है, जहाँ साथ होने और पा लेने की आकांक्षा झर गई है। अगर कुछ शेष है, तो क्षमा की भिक्षा माँगने की थरथराती पुकार, जो भाषा में नहीं, स्मृति और आँखों से उठती है –
तुमने मुझे इस तरह प्रेम किया
कि मैं ख़ुद की तलाश में निकल गया
और एक दिन ..
आज
अपना कपाल लिए
तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ
याचना के स्वर में तुमसे
क्षमा की भिक्षा माँगते हुए।
(मैं तुम्हारे पास लौट आया हूँ)
एक ऐसे दौर में, जब हिंदी कविता के अधिकांश इलाके पर विमर्शवादी और राजनीतिक मिज़ाज वाली कविताओं का कब्ज़ा है, गौरव ने निर्दोष आत्मस्वीकार के लिए ज़मीन चुनी है। आत्मस्वीकृति और आत्मकथ्य से रहित कविताएँ फसलों की रक्षा के लिए खेत में खड़े कर दिए गए पुतलों की तरह बेजान होती हैं। अपने लेखन के आरंभिक दौर में एक युवा कवि का आत्मस्वीकार अपवाद भी है और प्रीतिकर भी –
मैंने चोर निगाहों से
स्त्रियों के वक्ष देखे
और कई बार
एक लड़की का हृदय न समझ सकने की
शर्म के साथ सोया…
(आत्मस्वीकार :1)
उम्र, हालात और भावनाओं के झंझावात से जूझते हुए भी गौरव की स्मृतियों में बहन और पिता की स्मृति की लौ थरथराती रहती है। पिता के प्रति एक अनकही कृतज्ञता भावबिद्ध प्रश्न के रूप में उसकी कविताओं में डबडबाई आँखों से झाँकती है —
किसी को नम आँखों से विदा करके
वे कई सालों तक
रेल का इंतज़ार करते …!
उनके आराध्य दशकों तक
निष्कासित रहकर भी
अपना धैर्य नहीं खोते ..
(पिताओं में इतना धैर्य कहाँ से आता है?)
गौरव की कविताएँ पर्देदारी के संकोच से मुक्त हैं, लेकिन उसके कहने के ढंग में भाषा ही एक पर्दा है। इसलिए उसकी कविताएँ भाषा के परिचित, चालू और प्रत्याशित मुहावरों की क़ैद से बाहर हैं।प्रेम, प्रकृति, प्रतिरोध राजनीति, स्मृति, बाज़ार दुख – ये कविता के सनातन विषय हैं। यह सनातन जब बेधक अनुभूति बनकर कवि की चेतना में संक्रमित होता है, तब रचना संभव होती है। कविता दरअसल सनातनता के आकाश में भटका उल्कापिंड है। वह सनातन के सूर्य को दिया जाने वाला अंजुरी भर जल का अर्घ्य है। गौरव की कविताओं में इस अर्घ्य की कुछ बूँदें दिखती हैं।
गौरव की कविताओं में एक स्वाभाविक कच्चापन है, जो अनुभव, अभ्यास और अध्ययन के ताप से पकता चला जाएगा। यह कच्चापन एक युवा कवि का है, इसलिए प्यारा है। कच्चे घड़े पर हथौड़े नहीं चलाए जाते…
गौरव की कविताएँ
1.अब वे तुम्हारे शत्रु हैं
ये सड़क
जो ऐतिहासिक कथाओं में वर्णित
किसी योद्धा की तलवार की तरह चमक रही है
इसी से होकर वे गए थे तुम्हारे शहर …
वे अपने लोकगीत गुनगुनाने थे
तुम्हारी निर्माणाधीन इमारतों में सीमेंट ढोते हुए
और तुम्हें लगा कि वे मनोरंजन करते हैं
जिन जगहों पर सिर्फ़ काम किया जाना चाहिए..
उनकी हंसी तुम्हारे पत्थरों को हल्का ना कर दे
तुमने तराजू के दूसरे पलड़े पर गालियाँ रखीं
शताब्दियों से अपमान को पीने के अभ्यस्त
वे हंसी को भी पीने लगे…
वे अपनी बेटियों के सामने
अपने दुर्भाग्य की कातर दलील की आड़ में नहीं छिपे
और उनके मनपसंद खिलौने लाते रहे…
उनकी ज़िद पर
उन्होंने विस्मृत लोककथाओं के टुकड़े समेटे
और अपने बच्चों को कथासूत्रों से रहित शिल्पहीन कहानियाँ सुनाते रहे…
उनके गीतों के शब्द मशीनों में पिस गए
उनके छंद की सुकुमार बाहें बुलडोजरों ने नोंच डालीं
उनके वाद्ययंत्रों की कुर्सियाँ बनाकर तुम्हारी सभ्यता के मसखरे बैठ गए..
सपनों की गर्म तासीर से भयभीत
उन्होंने अपनी चादरें हमेशा झोले में ही रखीं
वे अपनी बेटियों की तरफ़ देखते और उन्हें ना जाने क्या हो जाता
वे अपनी भूख की अंधेरी खोह से बाहर निकल पड़ते
कंधे पर अँगौछा डाल बीड़ी सुलगाए हुए…
वे तुम्हें अपना शत्रु नहीं समझते थे
उन्हें पता भी नहीं था
कि उनके गीत वाद्ययंत्र कथाएँ छंद
सब कैसे चले गए…!
पर वे अपनी बेटियों के बारे में जानते हैं
और यह भी कि…
अब वे तुम्हारे शत्रु हैं!
2. मैं सुन रहा हूँ
क्या तुम्हारा नगर भी
दुनिया के तमाम नगरों की तरह
किसी नदी के पाट पर बसी एक बेचैन आकृति है?
क्या तुम्हारे शहर में
जवान सपने रातभर नींद के इंतज़ार में करवट बदलते हैं?
क्या तुम्हारे शहर के नाईं गानों की धुन पर कैंची चलाते हैं …
और रिक्शेवाले सवारियों से अपनी ख़ुफ़िया बात साझा करते हैं?
तुम्हारी गली के शोर में
क्या प्रेम करने वाली स्त्रियों की चीखें घुली हैं?
क्या तुम्हारे शहर के बच्चे भी अब बच्चे नहीं लगते
क्या उनकी आँखों में कोई अमूर्त प्रतिशोध पलता है?
क्या तुम्हारी अलगनी में तौलिये के नीचे अंतर्वस्त्र सूखते हैं?
क्या कुत्ते अबतक किसी आवाज़ पर चौंकते हैं
क्या तुम्हारे यहाँ की बिल्लियाँ दुर्बल हो गई हैं
तुम्हारे घर के बच्चे भैंस के थनों को छूकर अब भी भागते हैं..?
क्या तुम्हारे घर के बर्तन इतने अलहदा हैं
कि माँ अचेतन में भी पहचान सकती है..?
क्या सोते हुए तुम मुट्ठियाँ कस लेते हो
क्या तुम्हारी आँखों में चित्र देर तक टिकते हैं
और सपने हर घड़ी बदल जाते हैं…?
मेरे दोस्त,
तुम मुझसे कुछ भी कह सकते हो…
बचपन का कोई अपरिभाष्य संकोच
उँगलियों की कोई नागवार हरकत
स्पर्श की कोई घृणित तृष्णा
आँखों में अटका कोई अलभ्य दृश्य
मैं सुन रहा हूँ…
3. बड़ी बहन के लिये
बहुत कम रह पाया तुम्हारे साथ
महज दस साल की थी तुम
जब बिछड़ गयी हमसे..
और माँ-पिता छोड़ आये जंगल से घिरे एक आवासीय विद्यालय में
हमारे घर के वाचाल नागरिकों की जुबान कई दिनों तक पत्थर-सी रही..
उसके बाद तुम सालों तक
महज त्यौहार की छुट्टियों में घर आती
और हर रोज साफ होने वाले घर को
पता नहीं कैसे साफ करती…
कि अपार संभावनाशील-सा लगने लगता हमारा घर
देवी-देवताओं के आगमन की संभावना जैसे शतगुणित हो उठती..
बहन! जब तुम घर को व्यवस्थित करती
तो घर के छोटा होने की मेरी और माँ की शिकायतें छोटी हो जातीं
और पिता के चेहरे पर एक विजित मुस्कान तैर जाती…
मैं घर की चीजों की सही जगह कभी नहीं जान पाया
मसलन सिलाई मशीन की असली जगह
घर के सबसे कोने वाले कमरे की अलमारी थी
और इस्त्री जो चारपाई की दरी पर पड़ी रहने को विवश थी
उसके तार को सलीके से मोड़कर सिलाई मशीन के बगल में रखा जा सकता था..
तुम कपड़े इस ढंग से मोड़ देती
कि खोलने में हिचक होती..
घर के बिस्तर इतनी शालीनता से बिछा देती
कि बिगाड़ने का दिल नहीं करता
अक्सर धूल-मिट्टी लगे शरीर के साथ मैं जमीन पर ही लेट जाता…
एक अपराधबोध-सा भरता रहा मुझमें
और माँ में शायद एक प्रतिस्पर्धा!
सालों से वह इतने सलीके से जिस घर को संभालती रहीं
एक चौदह बरस की लड़की
उस घर की सम्भावनाओं को उनसे बेहतर जानती थी
जबकि वह साल में महज कुछ दिनों के लिए आती…
अगली सुबह जब पिता का बटुआ या सिलेंडर की पर्ची नहीं मिलती
माँ तुमको डांटती कि सबकुछ अस्त-व्यस्त कर दिया…
कभी तुम हँसते हुए खोज लाती…
तो कभी न मिलने पर रो भी पड़ती!
पर तुमने कभी घर में सुंदरता की संभावनाओं को देखना नहीं छोड़ा..
अब माँ-पिता की सेहत की सम्भावनाओं को देखती हो
छोटे भाई-बहन के भविष्य की संभावनाओं को भी..
मेरी बहन!
तुम हमसे मुक्त होकर क्या देखती हो?
क्या तुम्हारे सपनों में लाल घोड़े पर सवार
कोई राजकुमार आता है पुरानी फ़िल्मी लड़कियों की तरह..
तुम अपने एकांत में क्या देखती हो मेरी बहन..?
4. मैं तुम्हारे पास लौट आया हूँ
अपनी देह पर
चीवर धारण किये
मैं तुम्हारे पास लौट आया हूँ..
मेरे पास उस वक़्त विदा के शब्द नहीं थे
भाषा की पूँजी जमा करने के बाद भी
अव्यक्त घूम रहा था उस सघन कुंज में..
तुम्हारे होंठ आज भी उतने ही रक्ताभ हैं
आज भी तुम्हारी साँवली काया से ईर्ष्या करते हैं मेघ
तुम्हारी कलाइयों पर बँधने को आतुर हैं प्रतिज्ञाओं के धागे
अब भी तुम्हारे मस्तक पर सागर की तरह झिलमिलाती है बिंदी..
किंतु मैं तेज़ी से लौट रहा हूँ
अपनी पुरानी कृशकाय देहयष्टि में
जो तुम्हारे जीवन में आने से पूर्व थी..
मेरी मज्जाओं का द्रव्य सूख रहा है
और मस्तक के फूल कुम्हला गए हैं..
जिन दिनों तुमने मेरा वरण किया
मेरी देह की व्याधियाँ डूबकर मर गईं थीं तुम्हारे द्रव में
आँखों के आगे खुल गया था रोशनी का संसार
और त्वचा इतनी सुकोमल हो उठी थी
कि फूल की पंखुड़ी से भी काटी जा सकती थी..
तुमने मुझे इस तरह प्रेम किया
कि मैं ख़ुद की तलाश में निकल गया
और एक दिन…
आज
मैं अपना कपाल लिए तुम्हारे सम्मुख खड़ा हूँ
याचना के स्वर में तुमसे क्षमा की भिक्षा माँगते हुए..
5. हम फिर भी जी रहे थे
हमारे हिस्से की नदी
किसी भगीरथ ने नहीं बहायी
अहर्निश प्यास लिये बैठे रहे हम मरुधरा पर..
मुलाक़ात के लिये
नहीं मिला हमें विदेह का कोई उपवन
जंगली झाड़ों की ओट में भयाक्रांत
चूमने पड़े हमें अपनी प्रेमिकाओं के होंठ…
हमारे चुंबन पर
श्वेतवर्णी अप्सराओं ने नहीं बरसाये फूल
लाठी पटकते हुए सिपाही गाली देकर गये…
सिद्धहस्त कवियों ने
मयूरपंख की नोक से नहीं उकेरी
ताम्रपत्रों पर हमारी पुरखिनों की प्रेमकथाएँ
रक्त और थूक से सनी मिट्टी पर दर्ज हुईं वे..
हमारे विरह पर आर्तनाद नहीं किया आकाश ने
ना ही मुरझाया बगीचे का एक भी फूल
अपने दुःख को सीने में दबाए हमने देखा
कि धरती सिकुड़ती जा रही है
और स्मृतियाँ बेघर हो गई हैं…
हमने अपने रिश्ते निभाये
अवांक्षित और निर्विकल्प उदासी में
देवताओं को नीचा दिखाने के लिए नहीं
ना ही गढ़ने के लिए पवित्रता की कोई महान परिभाषा..
हम एक- दूसरे को अकेला नहीं छोड़ सके बियाबान में
और यही काफ़ी था साथ बूढ़ा होने के लिए…
प्रजापति ने नहीं तय की इसकी त्रिज्या
मिट्टी में खेलते बच्चों के पैरों से सनी
हमारी दुनिया
कुम्हारों की चाक पर बनी…
पगडंडियों पर खेलती हमारी औलादें
युद्ध के लिए जाती सेनाओं ने कुचल दीं
हमें मुआवज़े दिये गये!
और हमने देखा
आकाश के तारे हमारी कायरता पर थूक रहे थे
मजबूरन..
हम फिर भी जी रहे थे…
6. मुझे इस देह से निकालो
मुझे इस देह से निकालो
और किसी कृशकाय देह में डाल दो
ये बूढ़ा मन किसी युवा देह का हक़दार नहीं..
इस घर से मुझे उठाओ
और किसी असभ्य क़ौम के बीच छोड़ आओ
इस घर की दीवारों पर तुम्हारे महान पुरखों का इतिहास है
इस सड़क से धक्का देकर
तुम मुझे किसी बीहड़ रास्ते पर धकेल दो
मेरी बेढंग चाल इस सभ्यता पर चलने योग्य नहीं
इस नगर से मुझे भगाओ
यहाँ प्रेम करने के लिए अमलतास के फूल काफ़ी नहीं
मुझे इस कहानी से निकालो
मैं इसमें फिर से मरने को मजबूर हूँ
इसके सारे संयोग एक ताकतवर की मनमानी हैं..
7. आत्मस्वीकार-१
जो अपराध मैंने किये,
वो जीवन जीने की न्यूनतम ज़रूरत की तरह लगे!
मैंने चोर निगाहों से स्त्रियों के वक्ष देखे
और कई बार एक लड़की का हृदय ना समझ सकने की शर्म के साथ सोया..
मुझे परिजनों की मौत पर रुलाई नहीं फूटी
और कई दफ़े चिड़ियों की चोट पर फफककर रोया..
मैं अपने लोगों के बीच एक लम्बी ऊब के साथ रहा
और चाय बेचती एक औरत का सारा दुःख जान लेना चाहा..
मैंने रातभर जागकर लड़कियों के दुःख सुने
पर अपनी यातनाएँ कहने के लिए कोई नदी खोजता रहा
मुझे अपनी पीड़ाएँ बताने में संकोच होता है
मैं बीमारी से नहीं, उसकी अव्याख्येयता के कारण कुढ़ता हूँ…
जीवन के कई ज़रूरी क्षण भूल रहा हूँ
और तुम्हारे तिलों की ठीक जगह ना बता पाने पर शर्मिंदा हूँ…
मुझपर स्मृतिहीन होने के लांछन ना लगाओ
मैं पानी के चहबच्चों की स्मृतियाँ लिए शहर-दर-शहर भटक रहा हूँ.
जितनी मनुष्यता मुझे धर्मग्रंथों ने नहीं सिखायी
उससे कहीं ज़्यादा प्रेम एक बीस साल की लड़की ने सिखाया.
प्रेम में होकर मैंने ज़िन्दगी पर सबसे अधिक गौर किया
मैं यह मानने को तैयार नहीं कि प्रेम किसी को जीवन से विमुख कर सकता है..
8. आत्मस्वीकार-२
बहुत कम फूलों के नाम जानता हूँ
तितलियों की कम प्रजातियाँ देखी हैं जीवन में
हिंस्र पशुओं को सिर्फ चिड़ियाघर के बाड़ों में कैद देखा है
कविता के बिम्ब की तरह कुमुदिनी लिखते हुए कई बार हाथ कांपे हैं..
सैकड़ों ज़रूरी बातें
निरर्थक प्रलाप की तरह कानों से गुजर जाती हैं
सालों पहले देखे एक झरने की स्मृति से देह सिहरती है..
प्रेम के निविड़तम क्षणों में
नौकरी की प्रस्तावित तिथियों के बारे में सोचता हूँ
और नदियों को देखकर अबतक अपने खानाबदोश न बन पाने को कोसता हूँ..
तानाशाहों से बचने को
कविता का सबसे कीमती टुकड़ा बुहार देता हूँ
पर किसी की ख़ुशी के लिये कविता में एक पंक्ति भी नहीं लिखता..
असहमतियों के कारण असुरक्षित हूँ
और कभी अपनी जीवटता पर मुग्ध भी
कि मैंने असाध्य काँपती उंगलियों से कविताएँ लिखी हैं…
चाँद एक दुर्घटना की तरह याद रहता है
दिल में विक्षत कविताओं के अनगिन टुकड़े हैं
तुम्हारी सांत्वनाएँ मेरे लिये निरर्थक हैं…
9. मवाद का एक सैलाब
मवाद का एक सैलाब
मेरी ओर बढ़ रहा है
और मैं फूल की
पंखुड़ी की ओट में छिपा हूँ
वितृष्णा से बचना
एक चुनौती भरा अभियान है इन दिनों
इस सैलाब के गुजरने तक
मेरी भाषा के
कितने बूढ़े कवि मर चुके होंगे
इसके बारे में सोचना मुझे करुणा से भर देता है..
10. तुम बाहर आने को क्यों विकल हो?
कौन है यह वृद्ध
जो मृत्यु की आगत से भयभीत
छिपता रहता है मेरी पसलियों में..
जबकि मेरी आकांक्षाओं के हिमनद अभी पिघलना भी शुरू नहीं हुए..
अपनी आशंकाओं से भयभीत
मेरी रानों में शरण खोजते.. हे अधेड़!
जानता हूँ कि तुम्हारी संततियाँ शादी के लायक़ हो गईं
पर मैंने अभी जी भर देखा भी नहीं उसे…
मेरी भुजाओं को शिथिल करते
बेकारी से पीड़ित.. ओ युवक!
मेरी उँगलियों पर बजर बनकर नहीं गिरो
इनसे मुझे अनगिन प्रेमपत्र लिखने हैं..
मेरी इस काया में कुलांचे भरते
ओ बालक! तुम कहाँ से आये?
जबकि सब कहते हैं कि मेरे बाल सफेद हो गये
और आँखों की रौशनी भी कम हो रही..
मेरी धमनियों में बहते.. ओ शिशु!
ये अदृश्य नौका कहाँ से आयी
जिसपर तुम सारी दुश्चिंताओं से दूर सो रहे हो..?
मेरे हृदय पर यह सुकोमल लात किसकी है?
मेरे गर्भ में कौन करवटें ले रहा है…
मेरी कोख से बाहर आने को उद्यत..ओ सुकोमल शिशु!
इस संसार के सबलोग कहते हैं..
यह दुनिया तुम्हारे लायक नहीं..
तुम बाहर आने को क्यों विकल हो..?
11. पिताओं में इतना धैर्य कहाँ से आता है?
वे उन समयों से आते हैं
जिनमें एक चिट्ठी को पहुँचने में इतना वक़्त लग जाता
कि कई बार आम के बौर पके आमों में बदलने लगते
चिट्ठी पहुँचने तक नवप्रसूता गायें छुटान पर आ जातीं
और चिट्ठी के भीतर लिखा हुआ मौसम बदलकर झूठ बन जाता…!
उनके पिताओं को ऐतराज़ नहीं होता था ज़ख़्मों से
ज़ख़्मों को ऐतराज़ नहीं था धूल-मिट्टी और पानी से…
और त्वचा को ऐतराज़ नहीं था चोट के निशानों से
हर निशान अपना पूरा समय लेकर जाता था शरीर से…
कई बार तो अगले जन्म तक रहता था जस का तस…
(ऐसा गाँव के बुज़ुर्ग मानते हैं…)
ऋतुएँ उनकी देह को यातनाएँ देतीं थीं…
सूर्य की यातना से भयभीत वे लोग
कभी नहीं भूलते थे…
जीवन और यातना के पवित्र संबंध को
और हर सुबह देते रहते अर्घ्य निष्ठुर सूरज को…
मौसम के विरुद्ध वो
घर की दीवारों से कहीं अधिक भरोसा
किसी अज्ञात दीवार पर करते थे…
असंख्य वनस्पतियों के नाम-गुणों को
याद रखते उन लोगों के लिए स्मृतियाँ कभी बोझ नहीं बनीं…!
उनके पास बाढ़ की स्मृतियाँ हैं
बाढ़ में फँसे लोगों के दुःख की स्मृतियाँ हैं…
उनके पास उन प्रार्थनाओं की स्मृतियाँ हैं
जो क्रूर मौसम के विरुद्ध ईश्वर से की गईं…
पौराणिक मिथकों की स्मृतियों से चालित उनके लोग
बारिश के लिए अपनी नंगी स्त्रियों के साथ खेत तक जोतते थे…
(ताकि इंद्र प्रसन्न होकर वर्षा करें…)
जिन लोक-गीतों को वो गाते थे
उनमें अपार प्रतीक्षाओं के बंध हैं…
उनकी राग-रागिनियाँ
अधैर्य के साथ बिल्कुल नहीं सुनीं जा सकतीं हैं…
किसी को नम आँखों से विदा करके
वो कई सालों तक रेल का इंतज़ार करते…!
उनके आराध्य दशकों तक
निष्कासित रहकर भी अपना धैर्य नहीं खोते…
मेरा अनुमान है कि
शायद मैं जानता हूँ…
पिताओं में इतना धैर्य कहाँ से आता है…?
12. इस बेहद हताश वक़्त में
इस बेहद हताश वक़्त में
जब प्रेमी होकर जीना भी आत्मघाती है
मैं कवि होकर जीने का दुःसाहस कर रहा हूँ
सैकड़ों सिसकियाँ कानों में गूंजती हैं
चीत्कार के बराबर का शब्द खोजने की कोशिश में
मेरी भाषा टीन के ख़ाली संदूक की तरह कड़कती है
जब ज़िंदगी की हर शय से शिकायतों के सिलसिले हैं
अपने बिस्तर की नरमाहट का मालिकाना हक़
किसी सल्तनत की बादशाहत की तरह गूंजता है..
रात एक रौशनी की तरह उतरती है
आत्मा के कपाट खोल अंधेरे में नहाती है रुग्ण देह
भाषा के सारे शब्द इकट्ठे होकर मीरा के पद गाते हैं..
माथे की नसों के जंगल में
खिलना चाहता है हरसिंगार का एक फूल
तुम्हारे आंसू का फूल छाती में खिला है
और तुम्हारी हंसी का फूल हथेली पर
अनिर्वचनीय सुख के वो फूल खिले हैं पूरी देह में
माथे का हरसिंगार खिलना चाहता है
तुम पुरानी बातों को जाने दो
कवि गौरव सिंह, जन्म- 12 जून 1998, हरदोई, उत्तर प्रदेश। स्कूली शिक्षा भी हरदोई में हुई। स्नातक- हिंदू महाविद्यालय (2016-2019) परास्नातक- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (2019-2021) वर्तमान में हैदराबाद विश्वविद्यालय में शोध विषय- ‘हिंदी नवजागरण और रामरख सिंह सहगल’ पर शोधरत।
कविता लिखने की शुरुआत स्नातक के दिनों में हुई थी। कुछ पत्र पत्रिकाओं और वेब-पोर्टल्स पर कविताएँ प्रकाशित। कई प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों पर कविता पाठ और इस साल के हिन्दवी ऑल इंडिया कैंपस कविता में चयनित कवि।
सम्पर्क: ईमेल – rajgauneeshrav121298@gmail.com
टिप्पणीकार प्रो. रामेश्वर राय, हिंदी के जाने माने प्राध्यापक और आलोचक। हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से 2024 में सेवा निवृत्त। वाणी प्रकाशन से कविता पर आलोचनात्मक पुस्तक ‘कविता का परिसर: एक अंतर्यात्रा’ प्रकाशित।
सम्पर्क: ईमेल- dr.rameshwarrai@gmail.com

