समकालीन जनमत
कविता

गरिमा सिंह की कविताएँ स्मृति और अनुभव के परिष्कार से निर्मित हैं

सुमन शेखर


गरिमा सिंह की कविताएँ मूलतः स्मृति और अनुभव के परिष्कार से निर्मित एक ऐसी संवेदनात्मक भूमि है, जहाँ स्त्री-अस्मिता, अस्तित्वगत बेचैनी और काव्य-रूढ़ियों के विरुद्ध एक सचेत विद्रोह दिखाई देता है। उनकी काव्य-चेतना तीन आधारभूत स्तंभों पर टिकी है। पहली अनुभव की प्रामाणिकता, दूसरी भाषा की स्वायत्तता और तीसरी नैतिक साहस। जहाँ समकालीन कविता अक्सर शिल्प के अतिरेक में अपनी आत्मा खो देती है, वहाँ गरिमा संवेदना को प्राथमिकता देते हुए बिंबों की एक ऐसी निरंतरता बुनती हैं, जो कविता को आंतरिक अनुशासन और संरचनात्मक दृढ़ता प्रदान करती है। उनकी भाषा की प्रकृति ‘द्वन्द्वात्मक’ है; वह घोषणात्मक होते हुए भी नितांत निजी है और प्रतिरोधी होते हुए भी अत्यंत आत्मीय।

विलियम वर्ड्सवर्थ ने कविता को “प्रबल भावनाओं का सहज उद्गार” कहा था, जो स्मृति में शांत होकर भाषा बनती है। गरिमा की कविता “फ़र्क पड़ता है!” इसी सूत्र को पुष्ट करती है। यहाँ बाहरी हिंसा या सामाजिक अपमान से अधिक देह की स्वायत्तता का प्रश्न केंद्रीय है।
गरिमा इस कविता में लिखती हैं- “क्योंकि ‘उम्मीद’ को बहुत कसकर नहीं पकड़ती
इसलिए निर्भीक हूं और आज़ाद भी!”

इसी कविताआ में आगे कहती हैं-

“प्रेम’ में भी अपनी देह पर
बिना मेरी मर्जी
किये गये प्रत्येक दंतक्षत और नखक्षत से तीव्र घृणा है मुझे
और उतना ही अधिक फ़र्क पड़ता है
जितना एक स्त्री को बलात्कार से!!!”

यह स्मृति और अनुभव के परिष्कार से निकली हुई भाषा है। स्त्री-देह के अधिकार को कविता का नैतिक केंद्र बनाना आधुनिक स्त्रीवादी काव्यधारा से उनका संवाद स्थापित करता है।

टी. एस. इलियट ने परंपरा और व्यक्तिगत प्रतिभा के संतुलन की बात करते हुए कहा था कि नया लेखक परंपरा को जानकर उससे अलग अपनी आवाज़ निर्मित करता है। गरिमा की कविता “शैली” इस विचार पर खड़ी उतरती है।
“शैली” कविता में गरिमा लिखती हैं- “किसी आलोचक-संपादक की मनुहार मत करना।”

“हम पढ़-जानकर किसी विचार -विचारधारा और प्रचलित शैली ही तो जान सकते हैं
लेकिन बनानी हो कोई नई विधा, विचार, विचारधारा
तो विकसित करनी होगी एक नवीन शैली”

इस कविता को पढ़ते हुए इलियट की कविता याद आती है- “I can’t write when my heart doesn’t have anything to say, The page remains blank if my mind isn’t in harms way.”

यहाँ कविता लिखना एक नैतिक कर्म है, और इसका लिखना प्राकृतिक है न कि प्रकाशन की रणनीति। यह आज के समय की जरूरी बात है जब साहित्य में AI की सहायता लेकर कविताएं लिखी जा रही हैं, प्रमोशन के जरिए खराब कविताएं और कहानियाँ प्रचारित कर महान बताई जा रही हैं। नई विधा के नाम पर बहुत ही सतही रचनाएं परोसी जा रही हैं, भाषा और कहन की मौलिकता और शैली कुंद पड़ती जा रही है, “शैली” कविता यहाँ एक राह तलाशती हुई दिखती है। भाषा में “नए शब्द गढ़ने” और “प्रचलित शब्दों को नए अर्थ देने” की आकांक्षा गरिमा को प्रयोगशील परंपरा से जोड़ती है।

ज्यां-पॉल सार्त्र ने साहित्य को मनुष्य की स्वतंत्रता का दायित्व कहा था। गरिमा की “डाह” कविता इसी अस्तित्वगत बेचैनी का रूपक है। आग की नदी यहाँ केवल ईर्ष्या नहीं बल्कि भीतर की असंतोषजन्य ऊर्जा है जो विवेक को भी जला देती है।
“हम मृतक हैं!
हम जीवित कहां हैं?
कि जब तक एक ‘डाह’ जीवित है हमारे भीतर!!!”
यह पंक्ति मनुष्य की आत्मिक जड़ता पर टिप्पणी है। कविता यहाँ आत्म-अन्वेषण का उपकरण बन जाती है।

कविता का आधार है- आंतरिक हल्कापन या आत्ममुक्ति। राइनर मारिया रिल्के ने युवा कवि को पत्रों के माध्यम से सलाह दी थी – “यदि लिखना अनिवार्य लगे तभी लिखो।” गरिमा की कविता “हल्की होना चाहती हूं…” इसी अनिवार्यता की कविता है। संवाद के माध्यम से स्वयं को हल्का करना दरअसल अस्तित्व का बोझ उतारना है। इसमें पर्याप्त बिम्ब का प्रयोग भी है। कविता कई मौके पर दिखाती है कि लेखन एक तरह का आत्म-संवाद से सजा हुआ मनोवैज्ञानिक उपचार भी हो सकता है।

मैं तुम्हारे साथ बातें करते हुए
हल्की हो जाना चाहती हूं
इतनी हल्की कि
भांप बनकर उड़ सकूं…
और मेरे स्त्रीत्व का ठोसपन
द्रव्यत्व में परिणत हो जाये…

लिखना हमें बार बार हल्का करता है, संभालता है, और साहस देता है। साहित्य लिखने की ऐसी अनिवार्यता से भरा हुआ है। हालिया पढ़ी गई डिमाइज़ रिले की दोनों किताबें अपने पुत्र की आत्महत्या के बाद उन्हे स्मृतियों के जरिए दुबारा ढूँढने जैसा था या सलमान रुश्दी की किताब नाइफ भी। ऐसा लेखन कितना जरूरी बन पड़ता है, और व्यक्ति खुद को कितना धनी मानता है जब वह अपने भीतर के लेखन की अनिवार्यता को भली-भांति समझता है। लेखन स्मृति का देवता है, जो जिए हुए को बार बार, कई कई रंगों में, शक्लों में जीवित करता है।

“जंगली फूल” कविता में कवयित्री प्रकृति के रूपक के माध्यम से स्त्री पहचान को परिभाषित करती हैं।
“बल्कि जंगली फूल होना-
एक आज़ाद स्त्री का संपूर्ण परिचय है!!!”
समाज जिस स्त्री को अस्वीकार करता है, वही अपनी जिजीविषा से पुनः उगती है। यह प्रतिरोध आक्रामक नहीं बल्कि जीवित रहने की जैविक इच्छा से जन्मा है।

अंतिम कविता “वह और माँ”में माँ-बेटी संवाद के भीतर सामाजिक वर्ग, लैंगिक असुरक्षा और इच्छाओं का दबा हुआ तनाव उपस्थित है। जूते चमकाने वाले व्यक्ति का बार-बार उपस्थित होना सामाजिक दूरी और आकर्षण के द्वंद्व को रेखांकित करता है। कविता नियति, पुनर्जन्म और संबंधों की अस्पष्टता के बीच भावनात्मक जटिलता रचती है।

गरिमा इस कविता में लिखती हैं –
‘तुम हमेशा मिला करो मुझसे’
यह आदेश है या प्रेम!
जो भी हो; शीरोधार्य है!
मैं तुम्हें छोड़कर कहाँ जा पाऊंगी माँ!!

गरिमा सिंह की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता में आत्मानुभूति, स्त्री-स्वायत्तता और अस्तित्वगत प्रश्नों की एक विशिष्ट संवेदनात्मक भूमि तैयार करती हैं

गरिमा सिंह की कविताएँ

1. फ़र्क पड़ता है!

अब फ़र्क नहीं पड़ता…
मैं दुत्कारी जाऊं
पैर के नीचे कुचल दी जाऊं
सड़क पर चलते हुए किसी दुर्घटना में मारी जाऊं
मुझे ज़हर दे दिया जाए
मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन खींच ली जाए
मुझे सिर उठाने के लिए आसमान ना मिले
मेरी सरे-आम हत्या कर दी जाए
मेरी सारी उपलब्धियों को धता बताया जाये
मेरी योग्यता पर प्रश्नचिह्न लगाया जाये
नहीं फ़र्क पड़ता किसी बात का
क्योंकि ‘उम्मीद’ को बहुत कसकर नहीं पकड़ती
इसलिए निर्भीक हूं और आज़ाद भी!

लेकिन मेरी देह को
बिना मेरी मर्जी
कोई छू नहीं सकता
ना ही उसे रौंद सकता है
‘प्रेम’ में भी अपनी देह पर
बिना मेरी मर्जी
किये गये प्रत्येक दंतक्षत और नखक्षत से तीव्र घृणा है मुझे
और उतना ही अधिक फ़र्क पड़ता है
जितना एक स्त्री को बलात्कार से!!!

2. शैली

लिखते हुए मत सुनना किसी और की
चाहे तुम किसी भी विधा में लिख रहे हो
एकदम बेलौस, उन्मुक्त होकर लिखना
स्वयं की उस आवाज़ को ध्यान से सुनना
जो बहुत भीतर से आती है

कोई काव्यशास्त्रीय प्रतिमान मत मानना
मत लिखना किसी पत्र-पत्रिका के आदेश पर
छपने के लिए मत करना किसी की नकल
मत करना किसी आलोचक-संपादक की मनुहार

लिखना तुम अपनी शैली में
जब भीड़ हांकी गई हो एक राह पर
जब सब सीखा रहे हों एक दिशा में बढ़ना
तब तुम एक नई दिशा की खोज करना
उन सबको छोड़ देना
जो पहले से बनी लकीर के अलावा कोई अन्य लकीर स्वीकार नहीं करते
जिन्हें नयापन और ताजापन के लिए जबर्दस्ती के तर्क चाहिए
छोड़ देना सबको
जो तुम्हारी शैली में तुम्हें स्वीकार ना करें

मैं नतशिर हूं
सभी उपस्थित विचार, विचारधाराओं और शैलियों के प्रति
लेकिन यह भी मानती हूं कि
किसी नवीन शैली के रूप में विकसित मौलिकता
एक नवीन पहचान और अनुसंधान है
हमें जरूरत है इसकी
इसलिए
मैं नवीन शब्द गढ़ना चाहती हूं
और प्रचलित शब्दों को नवीन अर्थ देना चाहतीं हूं
मैं नहीं चाहती कि किसी पुराने, प्रचलित मानदंडों के आधार पर
किसी विकसित हो रही नवीन दृष्टि को ओझल कर दिया जाए
और फलां-फलां को पढ़ने-जानने की नसीहत दी जाये
हम पढ़-जानकर किसी विचार -विचारधारा और प्रचलित शैली ही तो जान सकते हैं
लेकिन बनानी हो कोई नई विधा, विचार, विचारधारा
तो विकसित करनी होगी एक नवीन शैली-
बिना एक लीक पर चले, बिना एक तरह से सोचें

हमें केवल लिखते हुए नहीं
बल्कि पढ़ते और बोलते हुए भी
प्राकृतिक रहना होगा
जैसे प्रकृति रहती है
इसलिए वह एक सुंदर शैली है
और अब मैं भी
अपनी एक सुंदर शैली रच रही हूं।

3. डाह

बात-बात में डबडबाई आंखें
सहसा-
भीतर की आग से,
सूखने लग जातीं हैं…
और एक चिंगारी फूट पड़ती है;
यह आग की नदी है…

नदी कोई बंधन नहीं मानती,
वह बहती है उन्मत्त प्रवाह से…
और आग भी कहाँ मानता है कोई बंधन?
उसका शमन सब कुछ का दहन है…
सहसा बहने लगती है-
मेरे भीतर भी आग की नदी…

मैंने मुख से उचारा-
‘शांति:! शांति:! शांति:!’
वह आग की नदी सहसा
बाहर प्रवाहित होने लगी…
सबने पुकारा-
शांति:! शांति:! शांति:!
हमने देखा-
आग की नदी का विकराल रूप!

वह प्रबल ज्वाला वेगवती हो
निरंतर आगे बढ़ रही है…
मेरा मन सूखता जा रहा है;
“बचाओ हमें! शरण दो!”
यह ज्वाला हमें निगल लेगी…
मेरा विवेक- तुम्हारा विवेक जल रहा है!
हृदय केवल राख रह गया है!
उसकी तीक्ष्ण गंध; – नथुनों से होकर
आत्मा में पहुंच रही है…
वह चित्कार कर रहा है-
इस विचित्र देह में रहने का कर्ज भर रहा है!
बचाओ उसे…
मत डूबने दो इस नदी में!
और वह डूब गया…

हम कहीं भी साबुत नहीं;
हल्की-भुरभुरी सी आकृति लिये चल रहे हैं-
जिससे केवल जलने की बू आती है…
हम मृतक हैं!
हम जीवित कहां हैं?
कि जब तक एक ‘डाह’ जीवित है हमारे भीतर!!!

4. हल्की होना चाहती हूं…

मैं तुम्हारे साथ
बातें करते हुए
‘हल्की’ हो जाना चाहती हूं
इतनी हल्की कि हवा, ताप, पानी सबको-
महसूस कर सकूं…
वे मेरे भीतर उतर सकें-
जैसे रूई सोखता है अपने भीतर-
हवा, ताप और पानी…

मैं तुम्हारे साथ बातें करते हुए
हल्की हो जाना चाहती हूं
इतनी हल्की कि
भांप बनकर उड़ सकूं…
और मेरे स्त्रीत्व का ठोसपन
द्रव्यत्व में परिणत हो जाये…
और समा जाऊं इस तरह
जैसे बारिश की बूंदें समाती हैं धरती में-
प्यास और शक्ति बनकर!

मैं तुम्हारे साथ बातें करते हुए
हल्की हो जाना चाहती हूं
इतनी हल्की कि
पत्तों की तरह टूटकर-
शाखों से अलग बिखरने को
सहज स्वीकार सकूं…
और बह सकूं आज़ाद,
जैसे बहती है नदी-
सभी अवरोधों को तोड़कर…

मैं तुम्हारे साथ बातें करते हुए
हल्की हो जाना चाहती हूं
इतनी हल्की कि
उतार सकूं अपने भारीपन का केंचुल…
और ठठाकर हँस सकूं-
सारे रंज-ओ-ग़म पर…
कि मेरी हंसी की तीक्ष्णता-
फूल सी दुनिया में काँटा बन जाये…
मैं महसूस कर सकूं-
एक बढ़ती हुई चुभन…
जैसे चुभती है नागफ़नी
बिना पानी बढ़कर…

मैं तुम्हारे साथ
इतनी हल्की हो जाना चाहती हूं
कि अपना सकूं खुद को-
सारी अच्छाईयों और बुराईयों के साथ…
और जी सकूं एक मनुष्य का जीवन…
कि मुक्त कर सकूं खुद को और तुमको;
इसलिए करती हूं तुमसे बातें…
हर प्रकार के भारीपन से बचे रहने के लिए!!!

5. जंगली फूल

किसी जंगली फूल सी मैं-
प्रेम से रोपी नहीं गई;
अपने आप हर जगह उगती चली गई…

विशिष्ट अभिरुचि वाले व्यक्तियों को-
नहीं भाते जंगली फूल!
लेकिन जैसे
विविध रंगों के फूल आकर्षित करते हैं-
किसी रमणीय यात्रा पर निकले यात्री को;
जंगलीपन सम्मोहित करता है-
हर प्रकार की कृत्रिमता से उब चुके व्यक्ति को;
एक स्त्री के रूप में मैं भी-
बस स्वस्थ मन के निमित्त
जंगली फूल के रूप में परिभाषित हुई!
क्योंकि जंगली फूल होना-
प्रकृति का पर्यायवाची होना है!

आसान नहीं होता जंगली फूल होना
क्योंकि जंगली फूल-
जितनी सहजता से आकर्षित करता है,
उतनी ही सहजता से तिरस्कृत और विस्मृत भी होता है;
जंगल से बाहर अतिक्रमण कर रहे-
अनायास उगे जंगली फूलों को,
सौंदर्यबोध समाप्त हो जाने पर-
बलात् जड़ से समूल उखाड़ फेंका जाता है…
मैं भी समूल उखड़ी हूं जंगली फूल सी!
लेकिन जीजिविषा लिए बिना पोषण के
फिर-फिर उगी हूं जंगली फूल सी ही-
प्राकृतिक सौन्दर्यबोध का सत्य बनकर

जंगल मेरा पिता है और उसकी मिट्टी मेरी मां है!
जन्म से ही जंगल मेरी स्मृतियों का हिस्सा है…
इसलिए मैं जंगली फूल सी उर्वर रहूंगी सदा
आकर्षण और विकर्षण में भी,
उगने और उखाड़े जाने में भी,
मेरा रंग विद्युत्लता की भांति उज्ज्वलतम होगा,
मैं खिलूंगी प्रत्येक विपरीत मौसम में,
यह मेरी नियति नहीं, ना ही है कोई संभावना
बल्कि जंगली फूल होना-
एक आज़ाद स्त्री का संपूर्ण परिचय है!!!

6. ‘वह’ और ‘माँ’

माँ ने कहा-
‘चाँदी पहना करो,
चाँदी पहनने से मन शान्त रहता है’!

मैंने सोचा-
माँ, तुम तो चाँदी पहनती हो
फिर तुम्हारा मन क्यों इतना अशांत रहता है?
क्यों तुम्हारी आंखें इतनी बेचैन रहा करती हैं?
जैसे कहीं टिककर भी टिकना नहीं चाहतीं…

‘वह’ जो इस वक्त जूते चमका रहा है…
‘उसे’ क्यों इतने ध्यान से देख रही हो?
तुम्हारी बातें मुझे विवश कर रहीं हैं!
माँ, मुझे देखो-
मैं जूते के आकार में ढल रही हूं
और ‘उस’ जूते चमकाने वाले की छोटी आँखों ने
मुझे अपने भीतर छिपा लिया है…

मैं देख रहीं हूं-
तुम्हारे चेहरे पर एक गहरी उदासी उतर रही है
जो धीरे-धीरे मुझमें जज़्ब होती जा रही है…
माँ, मेरा दिन भी उदास हुआ जा रहा,
तुम्हारी तरह!

तुम कहती हो-
‘तुम कितनी सुंदर हो’!
‘एकदम बच्ची सी लगती हो’!
यही बात ‘वह’ जूते चमकाने वाला भी कहता है…
और यह क्या माँ;
सहसा सशंकित कह उठती हो-
‘तुम हमेशा मिला करो मुझसे’
यह आदेश है या प्रेम!
जो भी हो; शीरोधार्य है!
मैं तुम्हें छोड़कर कहाँ जा पाऊंगी माँ!!

सुनो माँ!
इस वक्त-
मैं तुम्हारे गर्भ में समा जाना चाहती हूं
मैं जानती हूं तुम जो सोच रही हो मेरे लिए
‘उस’ जूते चमकाने वाले को देखकर
वह नितांत कोरी कल्पना के सिवाय कुछ नहीं!!!

जानती हो माँ-
हम समय के पहिया में जुते हुए लोग हैं
जो नियति के साथ खींचे जा रहें हैं
लेकिन भरोसा रखो माँ
मैं आऊँगी फिर से इस धरती पर
‘तुम्हारी बेटी’ बनकर
और ‘वह’ जूते चमकाने वाला ‘मेरा साथी’ बनेगा!!!!


कवयित्री गरिमा सिंह, जन्म- 26 जनवरी, 1988
जन्मस्थान- मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी० ए० एवं एम० ए० (काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी), हिन्दी साहित्य में एम० फिल० एवं पीएचडी (दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली)
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
सम्प्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, विद्यावती मुकंदलाल गर्ल्स कॉलेज, गाजियाबाद।
संपर्क-
ईमेल-garima.singh496@gmail.com
मोबाइल नंबर- 9711700526

 

टिप्पणीकार सुमन शेखर, जन्म- 13 जुलाई 1995, शिक्षा-मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर।
कई नाटकों का लेखन, अभिनय और निर्देशन।
ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली में कुछ विशेष शो का संचालन।
कुछ फ़िल्में- सैड्डिस्ट (देश-दुनिया के प्रमुख फिल्म फेस्टिवल में शामिल), ख्वाबिदा (एन एफ डी सी बेस्ट रोमांटिक फिल्म 2025) लाउडस्पीकर (अवार्ड विनिंग), वेपर (फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में प्रदर्शित), छिछोरे, दिल्ली पुलिस, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, शेड्स ऑफ रेड (अवार्ड विनिंग) , स्माइल वेरसेज़ स्माइलीज(अवार्ड विनिंग), अनचाहा, दाग, इंटॉक्सिकेशन, द लिफ्ट, फर्स्ट लव, प्राची, चिट्ठी, किरदार सहित कई फिल्मों और एड में अभिनय, लेखन सह निर्देशन। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित।

वर्तमान पता-अंधेरी वेस्ट, मुम्बई में ठिकाना।
स्थाई पता- माँ, कृष्णा नगर, खगड़िया-851204
मोबाइल-8877225078
ईमेल- Shekhers9144@gmail.com

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