नीरज
हमारे इर्द-गिर्द हमेशा अनुत्तरित आत्माभिव्यक्तियों के गुबार मौजूद होते हैं जिन्हें केवल सहृदय ही महसूस कर पाते हैं, कवि-हृदय इस मामले में सबसे सहज होता है। वो मौजूदा संवेदनाओं से जुड़ता है, उन पीड़ाओं में सहचर होता है और अनैतिक नहीं हो पाता।
निपुणता आहिस्ता आहिस्ता धीमी आँच पर तथा सघन ऊर्जायुक्त आती है फलत: एक ख़ूबसूरत कार्य साधा जाता है। पकने में मुकम्मल समय की दरकार सर्वथा होती है। दुर्गेश की इन कविताओं में आत्मिक, सामाजिक और नैतिक पक्ष मौजूद हैं। यह कविताऍं कवि के आसपास मौजूद रॉ-मैटेरियल्स से राब्ता की उपज हैं, जिनमे संभाव्य गहराई निहित है।
उदाहरणार्थ ‘वक्त’ कविता में कवि कहता है:
और आदमी?
वो सोचता है कि
वो विशेष है…
कि उसके दुःख, उसके आँसू,
उसकी चाहतें,
शायद वक्त को छू जाएँगी…
यह प्रश्न कहीं न कहीं हम सबसे जुड़ा हुआ है, जिनसे हम या तो रूबरू हो चुके हैं या आगे होंगे। वो समय हरेक ज़िंदगियों से टकराता है जब आदमी अपने अहं में अपनी कल्पित और वैकल्पिक दुनिया में जीने लगता है जहॉं असल में उसके अलावा कोई और मौजूद नहीं होता और जब वो व्यथित लौटता है तब तक उसके पास कोई नहीं बचता।
जीवन में तमाम ऐसे प्रसंग हैं जो विस्मृति से परे हैं जो आजीवन दिमाग़ के एक कोने में हरे-भरे बचे रहते हैं। अधिकतर वे स्मृतियों में तब लौटते हैं जब आदमी नैराश्य व ऊब से सूख जाता है।
कविता ‘मॉं और गौरैया’ में कवि इन्हीं स्मृतियों की तरफ जाता हुआ दिखाई देता है-
मॉं चूल्हा सुलगाती
लकड़ी की जलती गंध
अधपकी रोटी की भाप
और सोंधी मिट्टी की महक
सब मिलकर एक गीत बनाते
जिसमें गौरैया अपनी चिर-चिर मिलाती।
मॉं के हाथों से
आटे का छोटा-सा टुकड़ा टूटकर गिरता
गौरैया उसे उठा
अपने घोंसले में ले जाती
जैसे मॉं ने ही
अपने मुँह का निवाला बाँटा हो।
समय इन प्रतीकों से भी इतनी तेज़ी से भाग रहा है कि आने वाले समय में गौरेया को याद करने वाले भी गौरेया की ही तरह विलुप्त हो जाएंगे। ऐसी भीषण विलुप्तप्राय स्थितियों में कवि सदैव बचाना ही चाहता है। यह तय है कि दुर्गेश की कविताऍं अपार संभावनाओं से भरी हुई हैं बावजूद इसके कवि को शिल्पगत, कथ्यगत आदि विषयों में एक लंबा प्रयत्नशील समय देखना है, जोकि एक नवागत कवि के लिए नैसर्गिक प्रक्रिया भी है। उनकी प्रेम-स्मृति, वैचारिकी आदि को एक संतुलित व मजबूत प्रवाह मिले और वे समृद्ध हों..कवि को शुभकामनाएं सहित प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताऍं-
दुर्गेश कुमार मिश्रा की कविताएँ
1. वक्त
वो रुकता नहीं…
आदमी के लिए
न उसकी टूटी नींदों के लिए
न उसके अधूरे ख़्वाबों के लिए
न उसके घुटते शब्दों के लिए…
न उसके बिखरे संसार के लिए।
वो चलता रहता है…
बिना देखे कि कौन पीछे छूट गया,
बिना सुने कि किसकी साँसें भारी हैं,
बिना समझे कि किसका जीवन
अब भी एक सवाल है।
तू टूटा था न उस दिन…
जब अपने, बस नाम के रह गए थे
जब घर की दीवारें अजनबी हो गई थीं
और आँखों के आँसू
कभी न सूखने वाले समुंदर बन गए थे।
तू चाहता था—
वक्त थम जाए…
बस कुछ पल
बस इतनी देर…
कि तू ख़ुद को समेट सके।
पर वक्त ने देखा भी नहीं..
वो चलता रहा,
बिल्कुल वैसे ही जैसे
श्मशान की राख उड़ती है हवा में
बिना पछतावे, बिना ठहराव।
और आदमी!
वो सोचता है कि
वो विशेष है…
कि उसके दुःख, उसके आँसू,
उसकी चाहतें,
शायद वक्त को छू जाएँगी…
पर नहीं…
वक्त को मोह नहीं होता,
वो प्रेम नहीं करता,
वो बस समय है—
निष्ठुर…
अनवरत्…
और अपरिवर्तनीय।
इसलिए
अगर तू गिरा है,
तो उठ…
अगर तू टूटा है,
तो जुड़…
क्योंकि वक्त रुकने वाला नहीं…
और जो वक्त के साथ नहीं चला
वो बस कहानी बन गया…
जो कोई सुनता नहीं।
वक्त रुकता नहीं आदमी के लिए…
और आदमी…
बस यही भूल करता अपने लिए
पर वक्त रुकता नहीं आदमी के लिए।
2. तुम्हे महाकाव्य लिखूँ
तुम्हें महाकाव्य लिखूँ-
हर अक्षर में बुन दूँ तुम्हारी मुस्कान
हर श्लोक में रख दूँ वो पल,
जब पहली बार तुम्हारी आँखों में देखा था अपना जहां।
ख़ुद को कोई अनकही कहानी कहूँ—
जिसके पन्नों पर सिर्फ़ तुम हो,
और मैं हूँ एक भटका हुआ किरदार,
जो हर बार तुम्हारे नाम पर ठहरता है।
तुम्हें कविता लिखूँ—
जहाँ मेरी कलम काँपती है तुम्हारी याद में
शब्दों में बहती है वो ख़ुशबू
जो तुम्हारी चुप्पियों में छुपी रहती है।
ख़ुद को आँखों का पानी कहूँ—
वो ख़ामोश नमी जो तब छलकती है
जब तुम नहीं होती,
और यादें तुम्हारे होने का सबूत देती हैं।
तुम्हारा होना, मेरे हर लिखे में साँस लेता है,
तुम्हारा नाम, मेरी रचनाओं की आत्मा बन गयी है।
मैं सिर्फ़ शायर नहीं —
तुम्हारे प्रेम में एक यायावर हूँ,
जो हर पंक्ति में लौटता है, बस तुम तक।
3. तख़्त से गिरने पर
जब तक तख़्त से गिराए जाएंगे वे लोग
मुझे देखना है उनको —
उनकी आँखों में उतरते अंधेरे को,
सत्ता के मद से ढहते चेहरे को।
जिन हाथों ने लहू को नदियों-सा बहाया
जिन शब्दों ने सच्चाई को कैद किया,
जिन कदमों ने सपनों को रौंदा,
उन्हें लड़खड़ाते हुए देखना है मुझे।
मैं नहीं चाहता उनका अंत शोर में हो,
बस सन्नाटे में टूटे उनका अभिमान—
जैसे किसी मंदिर की घंटी बिना स्वरों के
किसी महल की दीवारें बिना नींव के।
वे जो सोचते थे ख़ुद को खुदा से ऊपर,
जिन्हें ग़ुरूर था अपने ऊँचे सिंहासन पर—
उन्हें ज़मीन छूते देखना है,
किसी आम की तरह टूटते देखना है।
क्योंकि मैं जानता हूँ—
तख़्त हमेशा नहीं रहते सिर पर
कभी न कभी हर ऊँचाई
पुकारती है अपनी गिरावट को।
और जब वे गिरेंगे—
मैं नहीं हँसूंगा
न जश्न मनाऊँगा,
बस ख़ामोशी से देखूँगा
कि अन्याय का अंत कैसा होता है।
4. प्रेम कहीं स्थायी, कहीं स्मृति
सबके हिस्से आया ज़रूर,
कभी एक मधुर राग बनकर,
तो कभी एक अधूरी गूॅंज बनकर।
कभी हृदय की गहराइयों में स्थायी बन बैठा,
तो कभी एक धुंधली स्मृति की तरह,
साँसों के कोनों में ठहर गया।
प्रेम जब आया तो जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सिहर उठा,
वृक्षों की शाखाएँ फूलों से भर गईं,
नदियाँ अपनी सीमाओं को भूलकर बह चलीं,
और वायु में एक अदृश्य मिठास घुल गई।
प्रेम के स्पर्श ने पत्थरों को मोम बनाया,
वर्षों से सूखी धरती को भी अंकुरित कर दिया।
परन्तु…
हर प्रेम अपने पूर्ण स्वरूप में नहीं ठहरता,
कुछ प्रेम पत्तों की तरह झड़ जाते हैं,
तो कुछ वृक्ष की छाल बनकर सदियों तक जीवित रहते हैं।
जब प्रेम स्थाई बना,
तो वो प्राणों में लय हो गया,
धड़कनों में समा गया,
एक मौन संकल्प की तरह,
जिसे शब्दों की आवश्यकता न थी।
साथ में चलने वाला एक साया,
जो दिन के उजालों में भी संग रहता,
और रात के अंधेरों में भी थामे रखता।
पर जब प्रेम स्मृति बना,
तो वो एक अनकही पीड़ा बनकर उभरा,
हर सन्नाटे में उसकी आहट सुनाई दी,
हर भीड़ में उसकी अनुपस्थिति चुभी।
वो एक रुकी हुई सांस की तरह,
जिसे छोड़ा नहीं जा सकता,
पर जिया भी नहीं जा सकता।
कभी एक भूले हुए गीत की धुन सा,
कभी एक नाम की खामोश प्रतिध्वनि सा।
प्रेम…
एक अधूरा पत्र,
जो कभी पूरा नहीं हुआ,
एक सपना,
जो नींद टूटते ही बिखर गया।
एक आँखों की कोर पर ठहरा हुआ आँसू,
जो गिरना चाहता है, पर साहस नहीं जुटा पाता।
प्रेम…
जब स्थाई बना,
तो आत्मा का संगीत बन गया।
जब स्मृति बना,
तो हृदय का शोकगीत बन गया।
प्रेम…
कभी मंदिर की घंटी सा पावन,
तो कभी श्मशान की राख सा शांत।
प्रेम…
कभी संपूर्णता का उत्सव,
तो कभी विछोह की चुप्पी।
प्रेम…
एक यात्रा,
जो कभी समाप्त नहीं होती,
एक अनुत्तरित प्रश्न,
जो कभी हल नहीं होता।
प्रेम सबके हिस्से आया ज़रूर…
परन्तु…
किसी के जीवन का संगीत बनकर,
तो किसी के हृदय का मौन।
किसी के अधरों पर मुस्कान बनकर,
तो किसी की पलकों पर नमी।
प्रेम…
हर बार आता है,
हर बार जाता है,
पर उसकी छाया कहीं न कहीं,
सदैव जीवित रहती है।
5. मॉं और गौरैया
भोर के धुँधलके में
जब आकाश का पहला उजाला
गाँव की कच्ची गलियों पर उतरता
तब मॉं के आँगन में
नीम की सबसे ऊँची डाल पर
गौरैया का छोटा-सा परिवार जाग उठता।
मॉं चूल्हा सुलगाती
लकड़ी की जलती गंध
अधपकी रोटी की भाप
और सोंधी मिट्टी की महक
सब मिलकर एक गीत बनाते
जिसमें गौरैया अपनी चिर-चिर मिलाती।
मॉं के हाथों से
आटे का छोटा-सा टुकड़ा टूटकर गिरता
गौरैया उसे उठा
अपने घोसले में ले जाती
जैसे मॉं ने ही
अपने मुँह का निवाला बाँटा हो।
बरसात आती
आँगन में पोखरे से पानी भर जाता
नीम की पत्तियों पर
मोती-से ओस चमकते
और तेज़ हवा में
गौरैया का घोसला झूलता।
अम्मा दोनों हाथ उठाकर
घोसले को बचाने की प्रार्थना करतीं
“हे भगवान,
इस चिरई के बच्चे भी
मेरे बच्चों जैसे सुरक्षित रहें।”
सर्दियों में,
जब ओस की परत छप्पर तक जम जाती
अम्मा चूल्हे के पास
खाट पर बैठ जातीं,
गौरैया उनके सिर के ऊपर
चौखट की लकड़ी पर बैठ,
धुएँ की गरमी में
अपना बदन सेंकती
अम्मा कहतीं—
“देखो, यह भी मेरी बेटी है,
बस पंखों वाली।”
गर्मी आती—
आँगन में अमरूद और नींबू की गंध फैलती
गौरैया अम्मा की परछाई के साथ चलती
कभी रसोई में, कभी आँगन में,
और कभी खेत की मेड़ तक
उनका पीछा करती।
अम्मा को भी आदत हो गई थी—
खेत जाते समय
आटे की गठरी में
एक मुट्ठी दाना
हमेशा गौरैया के लिए रखना।
“मनुष्य हो या पक्षी
भूख सबकी एक-सी होती है,”
वे अक्सर कहतीं।
त्योहारों में—
दीवाली की रात
दीयों की लौ में
गौरैया का घोसला
किसी मंदिर की आरती जैसा चमक उठता,
और होली के दिन
अम्मा की हँसी में
गौरैया की चिर-चिर मिलकर
रंगों की तरह बिखर जाती।
फिर एक दिन—
अम्मा बूढ़ी हो गईं
आँखों की रोशनी धुँधली
पैरों में कंपन,
पर आँगन में नीम का पेड़
अब भी वही,
और उस पर गौरैया भी वही।
अम्मा चौखट पर बैठकर कहतीं—
“तू भी बूढ़ी हो गई रे,
अब तेरे परों में पहले जैसी उड़ान नहीं रही।”
लेकिन वे दोनों—
एक स्त्री और एक चिरई
दोनों जानते थे,
कि उनका रिश्ता
रोटी और दाने से भी आगे का है।
यह एक जीवन से दूसरे जीवन में
साँसों के अदृश्य आदान-प्रदान जैसा था।
अंतिम दिनों में
जब अम्मा बिस्तर पर थीं,
गौरैया हर सुबह
उनके कमरे की चौखट पर आकर बैठती,
बिना चिर-चिर किए,
बस उन्हें निहारती।
और जिस दिन अम्मा ने
आखिरी साँस ली,
गौरैया ने पूरे दिन
कुछ नहीं खाया,
शाम होते ही
नीम की सबसे ऊँची डाल से
एक लंबी उड़ान भरी
और फिर कभी गाँव में नहीं लौटी।
कहते हैं,
अम्मा की चिता की राख
जब आँगन में बिखरी,
तो नीम की जड़ में
नए पत्ते फूटे,
और उसी डाल पर
एक नई गौरैया ने
घर बनाया।
शायद—
कुछ रिश्ते देह से नहीं,
मन से जन्म लेते हैं,
और मन,
शायद जन्म-जन्म तक
अपनी “अम्मा” को ढूँढ लेता है।
°°°°
कवि दुर्गेश कुमार मिश्रा, जन्म 06/03/2004, चित्रकूट उत्तरप्रदेश। शिक्षा: गोस्वामी तुलसीदास राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से स्नातक जारी है। प्रमुख पत्र -पत्रिकाओं में कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित
संपर्क: 9510375785
ई मेल: www.durgeshkumar95@gmail.com
टिप्पणीकार नीरज, जन्म – 12 मई 2000
शिक्षा : वर्तमान में डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय से हिंदी से एमए
आजमगढ़, उत्तर प्रदेश, पेशे से फार्मासिस्ट।
कुछ कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल्स पर प्रकाशित
संपर्क: kumneeraj005@gmail.com
मोबाइल: 9119820081

