समकालीन जनमत
कविता

धर्मेश चौबे की कविताएँ दो दुनियाओं के बीच क्षरित होने की मार्मिक अभिव्यक्ति हैं

विपिन चौधरी


 

“घर केवल ईंट पत्थर और गारे का जोड़ भर नहीं होते
जो ईश्वर की कोई भी चुनी हुई कौम ढहा दे
तो ढह जाए” (घर )
‘घर’ महज़ एक भौतिक स्थान ही नहीं बल्कि यह भावनात्मक सुरक्षा, पहचान और अपनेपन की एक ख़ूबसूरत ठौर है. घर के भीतर ही हमारी अधिकतर स्मृतियाँ बनती-बिगड़ती हैं. घर, सांस्कृतिक पहचान भी है जहाँ हम अपनी बोली-बानी सीखते हैं, अपने रीति-रिवाजों को जानते-अपनाते हुए बड़े होते हैं यहाँ तक की हमारा विश्व-दृष्टिकोण भी उसी समझ से आकार लेता है जिसे हम अपने घर की आबोहवा में विकसित करते हैं.

उपरोक्त काव्यांश कवि धर्मेश की ‘घर’ शीर्षक से लिखी कविता से लिए गए हैं जिसे गाज़ा युद्धविराम के बाद घर लौटे लाखों लोगों को ध्यान में रख लिखा गया है.

धर्मेश, ‘घर’ की अवधारणा को गाज़ा के उन लोगों की पीड़ा के ज़रिए सामने लाते हैं, जो खंडहरों और अनिश्चित भविष्य की धुंध के बीच से होकर अपने घर लौटे हैं, उन घरों में, जो अब केवल यादों की छाया बन चुके हैं. मगर लौटने वाले आघात और अनिश्चितताओं के बावजूद उम्मीद को मज़बूती से थामे हुए हैं. लेकिन यह भी सच है कि हर लौटना, लौटना नहीं होता. लौटने वालों ने नज़दीक यह संशय हमेशा बना रहता है कि क्या घर अब भी वैसा ही है? वापसी पर ‘घर’ अब केवल एक भावना ही नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक और कानूनी माँग बन चुका है,एक ऐसा अधिकार, जिसकी पुनर्प्राप्ति किसी संघर्ष से कम नहीं है.

घर सिर्फ़ एक जगह नहीं है बल्कि यह पहचान, क्षति, स्मृति और आशा का प्रतीक है. घर लौट आने के बाद भी विस्थापन का घाव मन और स्मृति में गहराई से दर्ज रहता है- एक ऐसा अदृश्य आघात, जो न पूरी तरह दिखता है, न कभी भरता है.

यह एक कारुणिक सत्य है कि सामूहिक विस्थापन और वापसी से जुड़े आघात की भरपाई सकुशल वापसी के बाद भी नहीं हो सकती. हिंसा, विनाश और अनिश्चितता के भयावह मंज़रों से गुज़रने के बाद उबरने की उम्मीद एक सपने में तब्दील हो चुकी होती है.

इस जबरन विस्थापन में इंसान अपने घर, समुदाय और रोज़गार के साथ-साथ अपनी पहचान भी खो देता है एक ऐसी हानि जो केवल भौतिक नहीं, बल्कि गहरे स्तर पर मानसिक और सामाजिक होती है. बच्चों में बचपन अव्यवस्थित हो जाता है उनमें कई तरह की भावनात्मक दिक्कतें उत्पन्न हो जाती हैं, वे प्रेम और लोगों से नहीं जुड़ जाते. ऐसे समुदायों को विश्वास और एकजुटता दुबारा पैदा करने में बहुत संघर्ष करना पड़ता है।

विस्थापन से जुड़ी हिंसा और क्षति सामूहिक स्मृति है, जो सांस्कृतिक मानस में समा जाती है, और पीढ़ियों तक यही जमी रहती है. इंसान हर पल अनिश्चितता, तनाव और भय की रस्सी पर झूलता रहता है. वापसी एक आघात लेकर आती है और फिर यह वापसी कोई साधारण घर वापसी नहीं रह जाती. यह उत्तरजीवी का अपराधबोध है जो मनुष्य के भीतर अतिरिक्त दुख उत्पन्न करता है.
जिस प्रकार विस्थापित लोग ‘दो दुनियाओं के बीच’ की दरार में जीते हैं, उसी प्रकार धर्मेश भी एक क्वीयर व्यक्ति के रूप में उस दरार के बीचोंबीच खड़े हैं, जहाँ उनके सामने वह दुनिया है जिसे उन्होंने पीछे छोड़ दिया, और दूसरी ओर वह दुनिया जो उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं करती. इस दोहरे बहिष्कार के बीच उनकी आत्मा जैसे कहीं अटकी रह जाती है. आत्मा की यह बेचैनी उनकी हर कविता का खाद-पानी है.

धर्मेश की कविताओं में ‘पहचान’ और ‘देह’ के बीच गहरा संघर्ष दिखाई देता है,
‘देह का दायरा बेहद छोटा होता है
इसे बांध लेने की ख्वाहिश ने मुझे भी छोटा कर दिया” ( इलाहबाद)

सामाजिक मानदंडों से जकड़ी इस देह को एक क्वीयर जब अपने भीतर समेटना चाहता है, तो वह अपनी ही अस्मिता को थोड़ा-थोड़ा काटता चलता है.

ये पंक्तियाँ समलैंगिक और ट्रांस व्यक्ति के शरीर से जुड़ी सामाजिक अपेक्षाओं और उसे आकार देने या धारण करने, उसे समेटने, छिपाने के गंभीर न व्यक्तिगत कार्य के बीच अनुभवों की ओर इशारा करती हैं.

धर्मेश की कविताएँ क्वीयर व्यक्ति की पीड़ा को मूर्त रूप देती है. उनकी कविताओं के आंतरिक रूपक, विरोधाभासों से त्रस्त एक क्वीयर मानस का पता देते हैं. ये कविताएँ प्रेम के साथ शर्म, इच्छा के साथ अपराधबोध को एकसाथ रखती हैं.
“मैंने अपनी देह पर कितने घाव जमा लिए हैं
मेरी आँखों से रक्त बहता है
मेरी धमनियों में पश्चाताप दौड़ता है
शर्म और ग्लानि मेरे पेट में धंसते ही जाते हैं
और उनसे रिसता है उम्मीद का रक्त”( आदमी की याद )

कुछ इसी तरह की अभिव्यक्ति इलाहाबाद कविता में भी है-

मैंने आँखों को पानी किया
सीने को धुंआ
और अपनी देह को तब तक रौंदा
जब तक रगों में दौड़ने वाले प्रेत
आँखों के पिंजरे से ना निकल भागे

एक क्वीयर व्यक्ति का शरीर, शारीरिक और भावनात्मक दोनों तरह के आघातों से भरा होता है. उनकी देह, देह न होकर एक युद्धभूमि में तब्दील हो जाती है जहाँ सामाजिक अस्वीकृति, हिंसा, बेचैनी या आंतरिक शर्म से बार-बार समाना होता है.

मगर सच तो यह है कि एक क्वीयर की आईडेंटिटी कोई बोझ नहीं है बल्कि यह उनके जीवन की कहानी का एक ख़ूबसूरत हिस्सा है, उनकी देह एक भरा-पूरा घर है ठीक किसी घर की तरह ही सुरक्षित, सम्पूर्ण और पवित्र.

बतौर कवि, धर्मेश की काव्य-अभिव्यक्ति गंभीर, स्पष्ट और बेखौफ़ है. एक बेहतरीन कवि के तौर पर वे अपनी अलग पहचान बनाएँगे ऐसी आशा है और अपेक्षा है कि हर तरह की भीतरी और बहारी दुश्वारियों के बावजूद उनकी कविताओं में उम्मीद को हमेशा जगह मिलती रहेगी जैसी प्रस्तुत कविताओं में मिली है।

 

धर्मेश चौबे की कविताएँ

1. घर वापसी

एक दिन सब लौटते हैं घर
बेत हानून से लेकर जबालिया तक
और बस्तर से कश्मीर तक
घर करते हैं इंतज़ार लौटने वालों का
घर जो केवल ईंट पत्थर और गारे का जोड़ भर नहीं होते
जो ईश्वर की कोई भी चुनी हुई कौम ढहा दे
तो ढह जाए
लकड़ी, फूस और गोबर से बनाए मकान भी नहीं होते घर
जो नेता-परनेता किसी नहर, किसी बांध की बलि चढ़ाएँ
तो चढ़ जाएँ
घर उस आदमी की खुशबू है
जो सालों बाद
किसी अनजान सफ़र में
अजनबियों के बीच भी
अगर मुझतक टोहते-टटोलते आ जाए
तो मैं उससे ये ना पुछूँ कि अब तक कहाँ थे
बल्कि उसके चेहरे पर लगी धूल अपने अँचरे से पोंछ
उसे ठंडा पानी पिलाकर कहूँ
अब आ गए हो तो कुछ दिन रहकर जाना

मैं जानता हूँ एक दिन हम सबके घर ढहा दिए जाएंगे
और हम कविता की ज़मीन में दफना दिए जाएंगे
दोस्तों उस दिन हमें जैतून और चिनार के पेड़ों की तरह
फिलिस्तीन से कश्मीर तक एक बार फिर से उगना होगा

*जनवरी 2025 में ग़ज़ा में युद्धविराम की घोषणा के बाद लाखों लोग अपने घर लौटे। यह कविता उन तस्वीरों को देखकर नाज़िर हुई है।

 

2. इलाहाबाद

तुम्हारी हँसी से खयाल आया
कि अब भी खिलते हैं गुलाब
शहर इलाहाबाद में
कि अब भी नेहरू का घर वहीं है
वहीं है दुर्गा भाभी का घर
और वो कमरा जिसमें मैने तुम्हें पहली बार चूमा था

अब भी मेरे सीने में उठता है तूफ़ान
ठीक वैसे जैसे उठती है तुम्हारी हँसी
तुम्हारे सीने के किसी कोने से
और फैल जाती है तुम्हारी पूरी देह में

देह का दायरा बेहद छोटा होता है
इसे बांध लेने की ख्वाहिश ने मुझे भी छोटा कर दिया
किसी वक्त मैं भी बड़ा था
दो नदियों को पार कर के बना था
मेरे अस्तित्व में एक शहर ही नहीं
उसमें बसने वाले भी समाए थे

लेकिन एक रात उन्नींदे कदमों से चलते हुए
मैं बहुत दूर निकल आया
इतना दूर कि मेरा शहर मेरे ही भीतर जलकर खाक हो गया
उसकी नदियाँ सूख गईं और पेड़ों ने शोक से आत्महत्या कर ली

और फिर एक दिन आकाशवाणी हुई
पीछे लौटकर देखेगा तो ढेर बन जाएगा
नमक का ढेर

ईश्वर को मृत घोषित कर देने के बाद भी
उसकी आवाज़ मुझे आतंकित करती रही
उसके दूत मुझे प्रताड़ित करते रहे

मैंने आँखों को पानी किया
सीने को धुंआ
और अपनी देह को तब तक रौंदा
जब तक रगों में दौड़ने वाले प्रेत
आँखों के पिंजरे से ना निकल भागे

और उनके चले जाने के बाद
उतनी ही जगह मेरी आँखों में
फिर से खाली हो गई
जितनी जगह उनकी थी

तो अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे

सिवाय इसके की
देवदूतों से नज़र बचाकर
नींद की ओट में
अक्सर लौट जाता हूँ मैं हर रात
अपने शहर इलाहाबाद में

 

3. युद्ध

(1)
नदी के मुहाने पर खड़ा है युद्ध

अहंकार से छोटा और आदमी से बड़ा युद्ध
सबसे पहले करता है चींटियों की हत्या

उसके बाद मारे जाएंगे सेर भर जमीन में घर बनाए
कीट पतंग और पेट के बल चलने वाले जीव
फिर बारी आएगी
धरती को जड़ों में बाँधे अगिनत पेड़ों की
फिर एक-एक कर मर जाएंगी
बच्चों की कहानियाँ

बूढ़ों के बरगद और
सोहागिनों के तेवहार
भी मरेंगे युद्ध होने से पहले

लेकिन इनसे पहले मरेगा वो आदमी
जो बच्चों को रोते देख सहम जाता है
जिसने कागज पर खींची लकीर को
नहीं माना अपनी मनुष्यता की लक्ष्मण रेखा

(2)
लक्ष्मण रेखा के उस पार खड़ा है युद्ध
इस पार मैं सहलाता हूँ—

मुखि कड़ियाली कुमति की,
कहण न देई राम

उधर से गर्जना होती है
चुप साला देशद्रोही मादरचोद!

 

4. आदमी की याद

मैंने तुम्हें याद किया
यानि मुझे दुख था
यानि मुझे अब भी उम्मीद है
कि तुम्हारे होने से दुख का विस्तार न होगा

उम्मीद आग की तरह होती है
बढ़‌ती जाए तो लालसा का दावानल हो जाती है
बुझ जाए तो हारे हुए आद‌मी की राख

आदमी हमेशा ही हारता रहा है
जो जितना आदमी होगा
वो उतना ही हारेगा
इसीलिए बच्चों को सबसे पहले हराया जाता है
इससे पहले कि वे आदमी हो जाएँ

मैं जब बच्चा था
हारते हुए ये जान ही ना पाया
कि हार जाने के बाद उठने पर
दुगनी ताकत से प्रहार होता है
समझदारी इसी में है कि रेंगते रहा जाए

मेरी शिक्षा दीक्षा अधूरी रही
मैं बारंबार हारा
बारंबार उठा

देखते हो
आज उठते हुए
मैंने अपनी देह पर कितने घाव जमा लिए हैं
मेरी आँखों से रक्त बहता है
मेरी धमनियों में पश्चाताप दौड़ता है
शर्म और ग्लानि मेरे पेट में धंसते ही जाते हैं
और उनसे रिसता है उम्मीद का रक्त
उम्मीद तुम्हारे आने की
उम्मीद कि तुम होगे तो ज़ख्म भूलाए जा सकेंगे
कि तुम होगे तो मैं आदमी रह सकूँगा

 

5. गंध

सदियों से उठ रही है मेरी देह से एक गंध
ये गंध मेरी सड़ चुकी आत्मा की है
ये गंध है कि मरने से पहले
मर जाने की भारी इच्छा से भर गया हूँ
कि अगर देह की ज़रूरतें ना हों
तो बहुत संभव है कि सड़ जाऊँ बिस्तर समेत
तुम पूछते हो आखिर मुझे क्या दुख है
मेरी इच्छा की वजह तलाशते हुए

तुम छैनी हथौड़ी चलाते हो
ताकि मेरे बजबजाते हुए दिमाग से
निकाल सको एक सही जवाब
जो भले मेरे किसी काम ना हो
लेकिन शांत कर दे तुम्हारी तृष्णा
तुम्हें अंततः भान हो जाए
कि आखिर ऐसा भी क्या दुख है

मेरी देह पर चकत्ते पड़ गए हैं
उनसे पस बहने लगा है
तुम अचंभित हो
घाव नहीं दिखते
दिखते हैं तो पस बहाने को
जगह जगह सिगरेट से जलाए
मोम से पिघलाए
ब्लेड से काटे
नाखूनों और दांतों से खुरचे
निशान
“ये तो तुमने किया है ना! क्यों?”
मैं तुम्हारे मुंह पर खींच कर तमाचा जड़ देना चाहता हूँ
मैं नहीं समझा सकता तुम्हें अपना ”क्यों”
तुम समझ भी ना सकोगे

और अगर तुम जान ही गए हो क्यों
तो आओ मेरी तरफ़
देखो
क्या इस कोढ़ खाए दिमाग
और मवाद बहते देह में
कुछ है भी बचाने लायक?


 

 

कवि धर्मेश (जन्म 9 जून, 1996, अम्बाला) एक क्वीयर कवि, अनुवादक, स्वतंत्र शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी कविताएँ और लेख कई पत्र-पत्रिकाओं में छपे हैं। उन्होंने रोहिन कुमार की पुस्तक ‘लाल चौक: दिल्ली और कश्मीर के बीच मुसलसल चल रही ‘जंग’ की दास्ताँ’ का स्पीकिंग टाइगर के लिए अंग्रेज़ी अनुवाद किया है। साथ ही उन्होंने सी-हेल्प, ऑल्टरनेटिव लॉ फ़ॉरम, पीपल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया, एजेंट्स ऑफ़ इश्क और अशोका सेंटर फॉर ट्रांसलेशन आदि के लिए भी अनुवाद किया है।
इन दिनों वे पन्ना, मध्य प्रदेश में राजगोंड समुदाय के साथ केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से होने वाले विस्थापन में आध्यात्मिक क्षति पर काम कर रहे हैं। उनसे

सम्पर्क:  ईमेल: chaubeydharmesh0@gmail.com

 

टिप्पणीकार विपिन चौधरी समकालीन स्त्री कविता का जाना-माना नाम हैं। वह एक कवयित्री होने के साथ-साथ कथाकार, अनुवादक और फ्रीलांस पत्रकार भी हैं.

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