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कविता

चंदन सिंह की कविताएँ अपने प्राथमिक कार्यभार की ओर लौटती कविताएँ हैं

आशीष मिश्र


चन्दन सिंह कविता से प्राथमिक काम लेने वाले कवि हैं। इस दौर में जब कविता के मत्थे ही सारी जिम्मेदारियाँ थोपी जा रही हैं: उसी को व्यक्ति की कुंठाएँ ढोना है, क्रांति करना है, प्रतिद्वंद्वी का हिसाब बराबर करना है, भाषिक सरकस से मुदित करना है, दिशाहीन आक्रोश को सहलाना है, तब इसी समय में चन्दन सिंह को कविताओं के प्राथमिक कार्यभार पर लौटते हुए देखकर थोड़ा आश्चर्य होता है!

वे कविता को भाषा की उस मूल क्षमता तक उतारना चाहते हैं, जहां कविता का बीजवपन होता है। ठीक इसी तरह वे मानवीय भावों: आश्चर्य, उत्साह, सुख-दु:ख, अनुताप, पश्चाताप, पीड़ा, अवसाद, विषाद को आदिभूत संवेदन और अनुभवों में लौटा लेना चाहते हैं, जहां से वे पूर्व-अनुभवों और सांस्कृतिकबोध के अवलंबन से भिन्न-भिन्न नाम-रूप ग्रहण करते हुए पल्लवित होते हैं।

भाषा और भाव के आदिभूत को छूने की यह कोशिश संभवतः मनुष्यता के बीजतत्त्व की तलाश है, जिसे हर बड़ा कलाकार अपने ढंग से पाने की कोशिश करता है।
कविता का क्षेत्र भाषा का क्षेत्र है।

इसलिए कविता के कुल सार को भाषा से निःसृत समझ लिया जाता है। यह भाषा और कविता का बहुत सरल-सा संबंध है, इसलिए यह सामान्य धारणा और वस्तुनिष्ठ सत्य की तरह स्थापित है। लेकिन, गहराई से सोचने पर ऐसा लगता है, कविता सिर्फ चीजों का सटीक नामदान भर नहीं करती, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की सामान्य चीजों का प्रथमोद्घाटन कविता में ही हुआ होगा।

भाषा से कविता का जन्म नहीं हुआ, बल्कि एक काव्यात्मक प्रक्रिया में भाषा का विकास होता गया होगा। कविता बार-बार भाषा में संभव इसलिए हो पाती है, क्योंकि भाषा कविता की इस मूल प्रकृति की रक्षा करती है।

भाषा द्वारा रक्षित, कविता के इसी मूल प्रकृति की जमीन पर ही हर समय में काव्यात्मक सृजन संभव होता है। अर्थात कविता या काव्यभाषा, भाषा का संस्कारित और परिनिष्ठित रूप नहीं, बल्कि वह उसका आद्यरूप और अनिवार्य शक्ति है।

काव्यभाषा रोज़मर्रा की भाषा का प्राथमिक, ताजा, बहु-स्तरीय और अस्पष्ट रूप है; जिसमें निश्चितता, अर्थों की रूढ़ियाँ, इकहरी तार्किकता इतनी मज़बूत नहीं होती, अपितु इसमें चीज़ों के नामकरण और नये अर्थों की अपार संभावनाएँ होती हैं।

काव्यशास्त्रियों ने इन्हीं संदर्भों में काव्य को नियति-कृत नियम रहित कहा है। नाम और अर्थ लगातार दुहराए जाते हुए और जनचेतना को उत्पादित-पुनरुत्पादित करते हुए, सत्ताओं में परिणत हो जाते हैं, फिर भी इसमें कविता की मूल प्रकृति किंचित बची रहती है।

कविता फिर-फिर अपनी इसी क्षमता के सहारे संभव होती रहती है। इस तरह देखें तो कविता और भाषा का संबंध द्वन्द्वात्मक नहीं लगता, अपितु भिन्न दिशाओं की तरफ़ खुलता हुआ सहकार्यात्मक संबंध लगता है।

भाषा सार्वभौमिक व्याकरण, संस्थापन और सत्तात्मक परिणतियों की तरफ जाती है और कविता नयी संज्ञाओं, अनुभवों और अर्थों को पैदा करने की जद्दोजहद जारी रखती है।

संस्थापन और सत्तात्मक परिणतियों तक पहुँचकर भाषा भिन्न और नये अनुभवों को किंचित नकारने और विरूपित करने का प्रयास करती है, लेकिन वही भाषा अपने गहन स्तरों पर नये अनुभवों में ढलने वाली सुनम्यता रखती है, जो अर्थ मात्र के बजाय ध्वनियों, लय, चित्रों और कई बार निरर्थक होकर भी सृजन संभव करती है।

कविता का संबंध भाषा के इन्हीं गहन संस्तरों से है। चन्दन सिंह अर्थरूढ शब्दों, अनुकूलित अनुभवों, लोकप्रिय समाज-राजनीतिक आख्यानों के नीचे, कविता और भाषा के मूलभूत तत्वों एवं ‘संवेदन—भाव—चिंतन’ की मूल रेखा पर बार-बार उतरने की कोशिश करते हैं।

मानों प्रत्येक कविता में कह रहे हों—क्या फर्ज़ है कि सबको मिले एक-सा जवाब / आओ न हम भी सैर करें कोह-ए-तूर की।

भाषा, अर्थ और अनुभवों की यह प्रवह्मान जमीन ही चन्दन सिंह की कविता की जमीन है। वे कविताओं में संज्ञान-प्रक्रिया के संवेदन-अक्ष से लेकर चिंतन-अक्ष तक जाते हैं, लेकिन संवेदन और भाव पर ज़्यादा टिकते हैं।

काव्यात्मक भाव-बोध के स्वरूप और गतिकी को समझने के लिए चार तत्त्वों को आधार बनाया जा सकता है—तीव्रता, स्पष्टता, विस्तार तथा अवधि। तीव्रता वह विमा है जिसके साथ काव्य-भाव का वर्णन किया जाता है; जैसे उच्च दीप्ति के कवि हैं और केदारनाथ सिंह मद्धम दीप्ति के कवि कहे जाते हैं।

तीव्रता के काव्यभाषा में आवेग, लय और क्षिप्रता के जरिए चिन्हित किया जा सकता है। तीव्रता काव्यबोध में ‘संवेदनमुखी भाव’ का प्रमाण है।

दूसरा तत्त्व है—स्पष्टता। काव्यबोध में स्पष्टता की कमी से तीव्रता और प्रभावशीलता में कमी आती है। अगर संवेदन—भाव—चिंतन की एक संज्ञान-रेखा बनाएँ तो संवेदन अक्ष की तरफ़ बढ़ते हुए तीव्रता और स्पष्टता बढ़ती जाती है।

भाव और चिंतन-अक्ष की तरफ़ बढ़ते हुए तीव्रता एवं स्पष्टता कम होती जाती है। जैसे ही आप किसी मनोभाव पर सोचने की कोशिश करते हैं, वह फैलने और उलझने लगता है और अंततः वह मनोभाव अपना संवेग ही खो देता है। तीसरा तत्त्व है—विस्तार।

अर्थात विशिष्ट काव्यबोध जीवन के विविध अनुसंगों से कितना जुड़ा हुआ है और जीवन के कितने बड़े संदर्भ को खोलता है।

काव्यबोध में विस्तार के साथ तीव्रता कम होती जाती है। चौथा है—अवधि। काव्यबोध में कोई खास मन:स्थिति या प्रक्रिया कितनी देर तक बनी रहती है। काव्यबोध में विस्तार और अवधि ‘चिंतनमुखी भाव’ का प्रमाण है। काव्यभाषा में इसे विवरण, तार्किकता, नाटकीयता और शमित-लय के रूप में चिन्हित कर सकते हैं।

अगर इस जमीन पर चन्दन सिंह की कविताओं को रखें तो उनके यहाँ काव्यबोध के कई संस्तर मिलेंगे, लेकिन सर्वाधिक दबाव ‘संवेदनमुखी भावों’ का है। इसलिए उनके संग्रह में छोटी कविताएँ ज़्यादा मिलेंगी।

कविताएँ ऐंद्रिक बिंम्बों से रची जाती हुई और बहुत कम पंक्तियों में मुकम्मल व्यक्तित्त्व ग्रहण करती हुई, पाठक के भीतर भक्क से किसी सौंदर्यात्मक भाव को प्रदीप्त कर के पूर्ण हो जाती हैं। कोई सघन ऐंद्रिय संवेदन वाला कवि ही लिख सकता है—
सड़क किनारे
चूल्हे की आँच पर सिंकते भुट्टे
जीभ पकड़कर खींच लेते हैं मुझे अपने पास
हाथों में कितनी गर्मजोशी से आते हैं वे
अपने ही पत्तलों पर
नमक
हरी मिर्च
स्वाद की काली धारियाँ
और ख़ुशबुओं के अपने प्रभा-मंडल के साथ।

स्वाद की दु:निवार कामना के लिए मुहावरे का प्रयोग हुआ है—जीभ पकड़कर खींच लेना। आँच पर सिंकते भुट्टे जीभ पकड़कर खींच लेते हैं मुझे अपने पास।

चन्दन सिंह की कविता से पहले इस मुहावरे का प्रयोग किसी की वाणी छीन लेने के लिए होता रहा है। लेकिन, जिह्वा सिर्फ़ वाग्दा नहीं है, रसदा भी है। वह रस की तरफ़ अवश आकर्षित भी होती है।

कवि ने पुराने मुहावरे में ही उसके दूसरे वैशिष्ट्य को स्थापित कर दिया। नकारात्मक अर्थ में प्रयुक्त होने वाले मुहावरे को सात्विक और सकारात्मक अर्थ में बदल दिया। कवि लिखता है—अभी-अभी सिंके हुए भुट्टे हाथों में कितनी गर्मजोशी से आते हैं! ध्यातव्य है कि भुट्टे उठाए नहीं जा रहे हैं, वे स्वयं आते हैं—अपने ही पत्तलों पर—नमक, हरी मिर्च, स्वाद की काली धारियों और ख़ुशबुओं के अपने प्रभा-मण्डल के साथ।

यह भुट्टे का उस जिह्वा की दुर्निवार कामना के प्रति स्वयं का अर्पण है। चंद पंक्तियों में भुट्टा एक व्यक्तित्त्व ग्रहण कर लेता है।

यह संभव होता है स्वाद, कामना और उसकी फलश्रुति में प्राथमिक सौंदर्यात्मक अनुभव से।

चन्दन सिंह सघन ऐंद्रिय अनुभवों के कवि हैं। यह उसी व्यक्ति में संभव है जो इस माटी-पानी, धरती-आकाश के प्रति अकूत लगाव से भरा हुआ हो।

जिसमें इस दुनिया का अकुंठ स्वीकार्य हो। ‘भुट्टे’ शीर्षक कविता की तरह भूख और स्वाद पर ‘पुनर्जीवन’ शीर्षक से एक सुंदर कविता है।

पाठक कल्पना करें कि दिनभर का भूखा और थका-मांदा कोई व्यक्ति चप्पलें घसीटता हुआ किसी सँकरी-सी गली से गुजर रहा हो कि तबतक किसी मकान से अचानक छन्न-से मछली तलने की करवाइन गंध आए और नथुनों में भर जाए!!

पुनर्जीवन शीर्षक कविता में चन्दन सिंह भूख और स्वाद के इस आदिम अनुभव को उसी तीव्रता के साथ पकड़ते हैं—
मेरे मुँह में पानी आ गया यहाँ तक
कि मुझे वह एक तालाब ही लगा छोटा-सा
बस तभी मैं रोक नहीं पाया अपने को जोर से पुकार उठा
ओ कड़ाही में तली जाने वाली मछलियों!
ओ मरी हुई, कटी हुई हल्दी में लिपटी मछलियो!
आओ, यहाँ आओ
मेरे पास, मेरे मुँह में
जो दरअसल एक तालाब है

आओ उसमें और तैरो!
आओ उसमें और फिर से जी उठो!

भूखा व्यक्ति तर्क देता है कि मरी हुई, कटी हुई हल्दी में लिपटी मछलियों का मनुष्य के स्वाद, रक्त-मज्जा और मानवीय सृजन में पुनर्जीवन होगा।

यह भूखे व्यक्ति का सौंदर्यबोध है। यह कविता के पीछे का ‘विज़न’ है, लेकिन चन्दन सिंह विज़न के बजाय संवेदन और अनुभव के प्रति ज़्यादा उन्मुख होते हैं। भाव एवं विचार की अपेक्षा संवेदन में जो स्पष्टता और तीव्रता होती है वे उसी को पकड़ने की कोशिश करते हैं।

उद्धृत पंक्तियों में जो क्षिप्रता दिखाई पड़ रही है, वह भूख की तीव्रता को व्यंजित करती है।

मानवीय अनुभव और दुनिया से इस हद का जुड़ाव शायद मृत्यु की जमीन से ही अनुभव किया जा सकता है। यह विचार, कि एक दिन हम इसे नहीं महसूस कर पाएँगे, इस विविधवर्णी दुनिया के प्रति और तीव्र लगाव का कारण बन जाता है।

इस संग्रह के कवि को समझने के लिए ‘किसी और ने उसकी पलकें मूँदीं’ शीर्षक कविता पढ़नी चाहिए। मृतक की आँखें खुली थीं। मानों वह देखने की चाहत में पलकें मूँदना भूल गया था।

किसी और ने उसकी पलकें मूँदीं। मानों वह मृत व्यक्ति इस दृश्य को छोड़ना न चाहता हो, लेकिन नियतिवश उसका प्राण निकल गया हो। उसकी पलकों के मूँदने की क्रिया कितनी विडंबनात्मक है—
पर उसमें हुआ यह
कि जो दृश्य था एक उसकी आँखों के सामने-
एक खुली खिड़की
आम के कुछ पत्ते
टेलीफोन का तनिक झुका हुआ खंभा
बिज़ली के तार
सामने के सफ़ेद मकान पर पोचारे-सी धूप
नीला आकाश
अपनी उड़ान पर थिर बैठी एक चील
कमरे में लोगों के चेहरे
घूमता हुआ एक पंखा

उसकी पलकें
इस पूरे दृश्य को
पोंछती हुई बंद हुईं

दुनिया को देखते हुए प्राण त्याग देने वाले व्यक्ति की आँखों में यह पूरा दृश्य ठहरा हुआ है। जैसे वह, उसकी आँखें, उस दृश्य को छोड़ना न चाहती हों।

उसकी पलकें जब किसी और द्वारा बंद की गईं तो इस पूरे दृश्य को पोंछती हुई बंद हुईं। यह मृत व्यक्ति जो भी हो, लेकिन दृश्य के प्रति यह शिद्दत चन्दन सिंह की है।

कवि एक कविता में कहता है कि पानी गिरने की आवाज कुछ-न-कुछ भरने की आवाज़ है—चाहे गड्ढा या कुआँ या सीपी या कंठ या बाल्टी। उसी कविता में कहता है—
पानी गिरने की आवाज़ से
भरता हूँ मैं
अपने कानों के चुल्लू
हाथों की अंजलि में पानी का आयतन और द्रव्यमान संभाला जाएगा लेकिन पानी गिरने की आवाज के लिए कौन-सी अंजलि होगी? जाहिर है उसके लिए कान की अंजलि चाहिए। संग्रह में ‘जीभ’ और ‘पकने की गंध’ शीर्षक कविताएँ इसी कोटि की एवं उल्लेखनीय कविताएं हैं।
संवेदना वास्तविकता का ज्ञान कराती है। भावना मूल्य प्रदान करती है। चिंतन उसे अर्थ प्रदान करता है। इस त्रिक के बाहर कोई संज्ञान प्रक्रिया संभव नहीं है। इसलिए बड़ी कविता सिर्फ ‘संवेदनमुखी भाव’ से संभव नहीं है। इसमें ऐंद्रियता और तीव्रता चाहे जितनी हो, लेकिन विस्तार और भावों का सामाजिक संस्पर्श छूट जाता है।

संवेदन जब भाव में, और भाव चिंतन में पर्यवसित होने लगता है, तो उसमें दिशा और धार आती है। कवि-व्यक्तित्त्व पुनः चिंतन से पीछे भाव और संवेदन को भाषा में सार्थक और व्यंजक बनाने की कोशिश करता है।

इस प्रक्रिया में कविता सार्वजनीन और अर्थगर्भ होती जाती है। चन्दन सिंह के पास ऐसी कई अच्छी कविताएँ हैं। लेकिन, हमेशा ही इस प्रक्रिया की शुरुआत संवेदन और अनुभव से होती है, इसलिए हर कविता में संवेदनात्मक तीव्रता, मार्मिकता और ऐंद्रियता बनी रहती है। इस तरह की सबसे अच्छी कविता के बतौर ‘बसना’ शीर्षक कविता का उल्लेख किया जा सकता है।

यह शहर के एक नये बसते हुए इलाक़े के वृहत्तर सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक व्यंजनाओं को खोलती हुई कविता है। यह शहर का वह इलाक़ा है जहां अभी सब्जियों से अधिक सीमेंट और छड़ की दुकानें हैं। म्यूनिसीपैलिटी ने अभी इसे अपना पानी नहीं पिलाया है। बने-अधबने मकानों के भीतर अभी भी हल चलने-भर जगहें बची हैं।

इन खेतों में फूटे हुए ढेलों को देखकर कवि को विश्वास नहीं होता कि यह अकेले हल का काम होगा। उसे लगता है कि जैसे उसके नीचे कुछ है जो मिट्टी को फोड़कर बाहर आना चाहता है।

वह क्या है? कविता में यह व्यंजना के रूप में अंतःविन्यस्त है। यह जीवन, सौंदर्यबोध और प्रकृति की वह जमीन है, जिसे दबाकर ही यह नया बसता हुआ इलाक़ा बसेगा।

जैसे-जैसे यह बसता जाएगा वैसे-वैसे इसके नीवों के नीचे दबते चले जाएँगे इसके साँप, इसके बिच्छू और बरसात की रातों में रात-रातभर चलने वाली झींगुरों की तीखी बहस। कवि इस नष्ट होते जीवन-संदर्भ को एक उदात्त बिम्ब के जरिए अभिव्यक्त करता है—
सामने पानी लगे खेतों में
स्त्रियाँ
लाल-पीली-हरी सचमुच की रंगीन साड़ियों में
विराट पक्षियों की तरह पृथ्वी पर झुककर
रोप रही हैं बीहन
हर बार जब ये रोपती हैं बीहन
तो गीली मिट्टी में जैसे कहीं खुल जाती है कोई चोंच
धान रोपती हुई स्त्रियाँ धरती पर झुकी हुई विराट पक्षियों के मानिंद लगती हैं।

हर बार जब वे बेहन रोपने के लिए धरती पर झुकती हैं तो चक्क से एक अदृश्य चोंच धरती में खुल जाती है। रोपनी करती स्त्रियाँ और बचे हुए खेतों का संबंध विराट पक्षी और उसके चूजों के बिम्ब में बदल जाता है।

चूजे उस जीवन संदर्भ में बदल जाते हैं जिनके नाश पर ही यह शहर बसेगा और स्त्रियाँ इस जीवन को चाहने वाली संततियों में।

यह देखने और जीने की अलग-अलग पद्धतियाँ हैं। जो खेत स्त्रियों के लिए जीवन का अभिन्न हिस्सा है, वही किसी दूसरे के लिए ‘प्लॉट’है—जिसका नक़्शा कागज़ पर या आँखों में पहले से तैयार है।

किसी के लिए कुआँ तो किसी के लिए सोकपिट का विकल्प है। दमन, शोषण और हिंसा की नई संस्कृति प्रकृति, समाजिकता और करुणा को सोखकर ही संभव हो सकता है—
इस इलाक़े का बसना उस दिन पूरा मान लिया जाएगा
जिस दिन यहाँ पहली हत्या होगी
और जिस दिन यहाँ की झोपड़ियाँ उजाड़ दी जाएँगी
वह उसके बसने का आख़िरी दिन होगा।

कविता ही वह जमीन है, जहां मानवीय अनुभवों में सूक्ष्म परिवर्तनों और दमन के महीन रेशों को पहचाना जा सकता है। कविता ही वह जमीन है जहां से कोई सार्थक और मौलिक बात कही जा सकती है।

कविता गहन स्तरों की राजनीति करती है। उसकी राजनीति झूठ द्वारा रगड़कर सपाट किए जा चुके लोकप्रिय मुहावरों की राजनीति नहीं है।

इसकी राजनीति मनो-सामाजिक स्तरों पर चलने वाले सत्तात्मक दमन के खेल को चिन्हित करना और शुभ भविष्य का स्वप्न रचने का है।

चन्दन सिंह मूलतः इस ‘जॉनर’ के कवि नहीं हैं, लेकिन संग्रह में कुछ कविताएँ ऐसी हैं जिनसे उनके कवि-व्यक्तित्त्व के विस्तार और गहराई का पता चलता है।

मसलन पाँच स्त्रियाँ दुनिया की असंख्य स्त्रियाँ हैं, उसकी हत्या में हथियार शामिल नहीं होंगे, मैं वैसा गरीब न हो सका, गरीबों के बिना, धारावाहिक और कालाहांडी शीर्षक कविताएँ इसी तरह की कविताएँ हैं। यह बातचीत लंबी होती जा रही है, फिर भी मैं एक कविता पढ़वाने के लोभ को शमित नहीं कर पा रहा हूँ। इसका शीर्षक है—उसकी हत्या में हथियार शामिल नहीं होंगे।

यह कविता एक वर्ग-विभाजित समाज में हिंसा के महीन और अदृश्य सूत्रों को उद्घाटित करती है। कविता व्यंजित करती है कि वर्ग-विभाजित समाज में हिंसा की परिभाषा भी राजनीति से मुक्त नहीं होती।

ऐसे समाज में संभव है कि दमन न्याय बन जाए और उसका प्रतिरोध हिंसा। वर्ग-विभाजित समाज में हिंसा के सूत्र बहुत महीन, अदृश्य और पवित्र हैं। इतने पवित्र कि सब्ज़ी काटने से भले ही गंदा हो जाए कोई चाकू ख़ून से तो हरगिज नहीं।

यह हिंसा इतिहास में तो क्या थाने में भी दर्ज़ नहीं मिलेगी, लेकिन इसे यह कविता दर्ज़ करती है।
यह तय है कि वह मारा जायेगा
पर, उसकी हत्या में
हथियार शामिल नहीं होंगे
सब्जी काटने से भले ही गंदा हो जाये कोई चाकू
उसके ख़ून से तो हरगिज नहीं

किसी दिन वह एक गाड़ी के नीचे
नहीं आएगा बचकर बगल से गुज़रता
उसकी खूबसूरती से मारा जाएगा।

आलोचक गोपेश्वर सिंह इस कविता को रघुवीर सहाय की ‘रामदास’ कविता के साथ देखते हैं। यह ठीक है, अगर आप ‘रामदास’ के साथ रखकर देखें तो काव्य सच में आए बदलाव को मुकम्मल ढंग से पहचान पाएँगे।

चन्दन सिंह के पास ऐसी बहुत सी कविताएँ हैं, जिनपर बात करते हुए समय के जरूरी प्रश्नों और सभ्यता के अंधेरे संस्तरों तक जाना पड़ता है।

अगर उन कविताओं पर बात हो पाती तो शायद कविता का संसार और विस्तृत होता, लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पंद्रह वर्ष पूर्व प्रकाशित इस संग्रह पर कोई चर्चा नहीं हुई! आशा है कि बातचीत में शामिल पाठक संग्रह तक जरूर जाएँगे।

चंदन सिंह की कविताएँ-

1. भुट्टा

भुट्टे
मुझे बेहद पसंद हैं

सड़क किनारे
चूल्हे की आँच पर सिंकते भुट्टे
जीभ पकड़कर खींच लेते हैं मुझे अपने पास
हाथों में कितनी गर्मजोशी से आते हैं वे
अपने ही पत्तलों पर
नमक
हरी मिर्च
स्वाद की काली धारियाँ
और ख़ुशबुओं के अपने प्रभा-मंडल के साथ

कोई-कोई भुट्टा
तो इतना खिच्चा
कि दोनों को अँगुलियों से छुड़ाते हुए लगता है
मानो छू रहा हूँ
किसान की देह पर पसीने की बूंदें

भुट्टा खाने के बाद
नियम से नहीं पीता हूँ पानी
नियम से तोड़कर उसे सूंघता हूँ
पता नहीं किसने बताये ये नियम और इनके क्या फायदे हैं
पर मेरी आदत से
कुछ दोस्त परेशान रहते हैं
मुझे समझाते हैं
कि इन चूल्हों का कोयला
मसानघाट से
लाया हुआ होता है

पर मैं अवश
खा ही लेता हूँ भुट्टे
सड़क किनारे
औघड़ की तरह .

 

2. पुनर्जीवन
दिनभर का भूखा
थका–मांदा मैं जा रहा था
खाने को कुछ भी नहीं था मेरे पास तो
तलुओं में निकल आये दांत
भूख
चप्पलों को ही चबाने लगी
चप्पलें घसीटते मैं जा रहा था
वह एक बेहद संकरी–सी गली थी कि तभी
न जाने किस मकान से आई अचानक छन्न से
मछली तलने की करवाइन गंध
और भर गई नथुनों में !

मेरे मुँह में पानी आ गया यहाँ तक
कि मुझे वह एक तालाब ही लगा छोटा-सा
बस तभी मैं रोक नहीं पाया अपने को जोर से पुकार उठा,
‘ओ कड़ाही में तली जाने वाली मछलियों!
ओ मरी हुई, कटी हुई हल्दी में लिपटी मछलियो!
आओ, यहाँ आओ
मेरे पास, मेरे मुँह में
जो दरअसल एक तालाब है

आओ उसमें और तैरो!
आओ उसमें और फिर से जी उठो!’

 

3. किसी और ने उसकी पलकें मूंदीं

मृतक की आँखें खुली थीं
मानो वह भूल गया था पलकें मूंदना
किसी और ने उसकी पलकें मूंदीं

पर उसमें हुआ यह
कि जो दृश्य था एक उसकी आँखों के सामने-
एक खुली खिड़की
आम के कुछ पत्ते
टेलीफोन का तनिक झुका हुआ खंभा
बिज़ली के तार
सामने के सफ़ेद मकान पर पोचारे-सी धूप
नीला आकाश
अपनी उड़ान पर थिर बैठी एक चील
कमरे में लोगों के चेहरे
घूमता हुआ एक पंखा

उसकी पलकें
इस पूरे दृश्य को
पोंछती हुई बंद हुईं .

 

4. पानी गिरने की आवाज़

पानी गिरने की आवाज़ से
भरता हूँ मैं
अपने कानों के चुल्लू

चाहे बारिश हो
या झरना
या नल
पानी गिरने की आवाज़
कुछ–न–कुछ भरने की आवाज़ है

कुछ-न-कुछ भरता है
चाहे गड्ढा
या कुआं
या सीपी या कंठ
या बाल्टी

पानी गिरने की आवाज़
कुछ –न-कुछ भरने की आवाज़ है
चाहे यह आवाज़
समुद्र के ऊपर
बरसती बारिश की ही क्यों न हो .

 

5. बसना

यह शहर का नया बसता हुआ इलाक़ा है
यहाँ सब्जियों से अधिक अभी सीमेन्ट छड़ की दुकानें हैं
म्युनिसपैलिटी ने अभी इसे अपना पानी नहीं पिलाया है

बने –अधबने मकानों के बीच
अभी भी बची हुई हैं इतनी जगहें
कि चल सके हल

इस इलाक़े में
अभी भी दिख जाते हैं जुते हुए खेत
इन खेतों में मिटटी के फूटे हुए ढेलों को देख
मुझे विश्वास नहीं होता
कि यह अकेले हल का काम है
मुझे लगता है जैसे वहां कोई है
जो मिट्टी को फोड़कर बाहर आना चाह रहा है

सामने पानी लगे खेतों में
स्त्रियाँ
लाल-पीली-हरी सचमुच की रंगीन साड़ियों में
विराट् पक्षियों की तरह पृथ्वी पर झुककर
रोप रही हैं बीहन
हर बार जब ये रोपती हैं बीहन
तो गीली मिट्टी में जैसे कहीं खुल जाती है कोई चोंच
पर ये सिर्फ खेत ही नहीं
प्लॉट भी है
काग़ज़ पर नहीं तो आँखों में
कहीं-न-कहीं नक़्शा तैयार है
और वह कुआं जिसके में प्लॉट आया है
इस बात से खुश
कि उसे अलग से सोकपिट नहीं बनवाना होगा

स्त्रियाँ जहाँ रोप रही हैं बीहन
कल अगर यहाँ आना हुआ गृह–प्रवेश के भोज में
तो मकान

जिसकी दीवारों पर प्लास्टर नहीं होगा
जिसके खिड़कियों–दरवाज़ों की कच्ची लकड़ियों में
एक ख़ुशबू होगी जिसे पेड़ छिपाकर रखते हैं
जिसकी ताजाछत की छाया में एक गीलापन होगा
वह मकान मुझे
एक खड़ी फ़सल की तरह ही दिखाई देगा पहली बार

यह शहर का नया बसता हुआ इलाक़ा है
जैसे-जैसे यह बसता जाएगा
वैसे-वैसे नींवों के नीचे दबते चले जाएँगे
इसके सांप
इसके बिच्छू
बरसात की रातों में रार-रात भर चलने वाली
झींगुरों की तीखी बहस
यहाँ सड़कें होंगी
कार और स्कूटर होंगे
बाज़ार होगा
स्कूल होगा

आवारा कुत्ते होंगे
पते होंगे
जिन पर चिट्ठियां आने लगेंगी
लिफ़ाफ़ों में बंद दूसरे इलाक़ों की थोड़ी हवा यहाँ पहुंचेगी
पर सबसे अच्छी बात यह होगी
कि यहाँ बच्चे जन्म लेंगे
ऐसे बच्चे
जिनकी देह के सारे तत्त्व
क्षिति जल पावक समीर सभी
इसी इलाक़े के होंगे

इसी इलाक़े में रखेंगे वे
डगमगाता हुआ अपना पहला कदम
और जब वहां
उस जगह पड़ेगा उनका पहला कदम
तो मैं फिर याद नहीं रख पाऊंगा
कि पहले वहां
एक छोटा-सा पोखर हुआ करता था
और जिस रात चाँद
इस इलाक़े तक आते-आते थक जाता था
वहीं डूब लेता था

इस इलाक़े का बसना उस दिन लगभग पूरा मान लिया जाएगा
जिस दिन यहाँ पहली हत्या होगी
और जिस दिन यहाँ की झोपड़पट्टियाँ उजाड़ दी जाएँगी
वह इसके बसने का आखिरी दिन होगा

ऐसे ही बसेगा यह इलाक़ा
यहाँ बसने के चक्कर में एक दिन पाऊंगा
उजाड़ होकर ढह चूका है गाँव का घर
देखते-देखते वह तब्दील हो चुका है
एक डीह में
जीते-जी हो गया हूँ मैं
अपना ही पूर्वज.

 

6. अमरूद सुर्खा

एक ऐसे समय
जब बच्चे भी
अपनी कॉपियों के पन्नों पर रबड़ घिसकर
मिटाने लगे हैं उसे
मैं भी अपनी जीभ के पन्ने से
मिटाता हूँ इलाहाबाद

इन दिनों
अगर कहीं पढ़ता हूँ इलाहाबाद
तो आँखे बंद करता हूँ सायास
इस उम्मीद में कि शायद
मेरी पलकों-बरौनियों से पुँछकर
मिट जाएगा वह जो लिखा हुआ है

अब यह मेरे कानों में आता है
ग़लत पते पर पहुँची
किसी चिट्ठी की तरह
मैं इसे भूल रहा हूँ
जैसे यह कभी याद नहीं था मुझे

पर तभी अचानक
मेरी इन कोशिशों में
गड़ने लगता है
दाँतों में फँसा
अमरूद का एक अदद बीज

अमरूद जो दरअसल
खुशबू पर
स्वाद की सुर्ख़ लिपि में लिखा
इलाहाबाद है
एक गूँजता हुआ उच्चारण
उस इलाके की धूप-मिट्टी-बारिश-लोग-बाग का
हाथ में लेते ही
उंगलियों में लग जाता है
इलाहाबाद

शायद ये अमरूद
बचा लेंगें इलाहाबाद
जैसे कुछ नदियों ने मिलकर
बचा लिया था
तीर्थराज प्रयाग।

7. अंत की कल्पना

मुझे मारना
तो अकेले बिलकुल अकेले मारना मुझे

मेरे साथ पानी को मत मारना
हवा को पेड़ों को
लोगों को मकानों को मत मारना
अकेले बिलकुल अकेले मारना मुझे

मैं चाहता हूँ
मेरे मरने के बाद भी बचा रहे पानी
साफ़ और ठंडा
कि धोई जा सके मेरी लाश
बची रहे हवा
जो किन्हीं दिशाओं की ओर नहीं
फेफड़ों की ओर बहती है
बहती हुई हवा आदतन मेरे मृत फेफड़ों में पहुंचे
जहाँ उसे शोक हो
बचा रहे यह मकान
कि उठ सके यहाँ से उस शाम
चूल्हे के धुएँ की जगह विलाप
और बचे रहें पेड़ भी
जो दे सकें मेरी चिता के लिए लकड़ियां
सच मानिए
मैं किसी वृक्ष की गहरे कुएं जैसी छाया को याद करूँगा
और चला जाऊँगा
चिता की अग्नि के पार बिना जले

और लोग तो ख़ैर बचे ही रहने चाहिए
चार तो कन्धा देने के लिए ही
कुछ रोने -बिलखने के लिए भी

मरने के बाद
मैं महज एक लाश बनना चाहता हूँ
जान-पहचान वाला जिसकी शिनाख़्त कर सके

मुझे मारना हो
तो किसी परमाणु की नाभि में नहीं
मेरी ही नाभि में घोंप देना कोई खंज़र
खंज़र अगर किसी म्यूज़ियम का हो
तो और भी अच्छा
कम से कम
मरते-मरते उसकी मूठ पर कलात्मक नक़्क़ाशी को निहार
मुग्ध तो हो सकूँगा

अकेले बिलकुल अकेले मारना मुझे

सबके साथ
एक सार्वजनिक मृत्यु में सम्मिलित होते हुए
मुझे शर्म आएगी
मेरी बायीं जाँघ पर जो एक काला-सा तिल है
उसी की तरह निजी और गोपनीय
चाहता हूँ मैं अपनी मृत्यु

पर क्या वे सुनेंगे मेरी बात ?
ऐसे समय
जब एक अकेले आदमी की हत्या में
बहुत कम रह गई है हत्यारों की दिलचस्पी।

8. चारुकेशी

बहुत लम्बे -घने थे उसके केश
उसके दुःख की तरह काले
उसके सुख की तरह चमकदार

उसके केश
उसकी पीठ पर निरन्तर स्पर्श
जिसमें देखती रहती थी वह दिनभर
अपना होना
रात वे
उसकी नींद,उसके प्रेम में बिछते थे

उसे अच्छा लगता था
धूप में गीले केश सुखाना
और इसी बहाने
लाखों -करोड़ों वर्षों से तपते सूर्य को
थोड़ा आर्द्र करना

फिर वह कैंसर की मरीज़ हुई
तो कीमोथेरेपी ने उतरवा लिए
उसके सारे केश

उस रात
जब टीस की तरह लहकता था बादलों में रह -रहकर चाँद
वह
घुटनों-कुहनियों-जोड़ों में पाई जाने वाली तरलता-सी एक स्त्री
अब तक सब कुछ सह लेने वाली एक स्त्री
दर्द से तलफला कर
पहली बार चीख़ी
ज़िंदगी भर की नहीं चीख़ी गई तमाम चीख़ें
ताख़ पर अख़बार के नीचे रखी गई चीख़ें
साड़ी की तहों में छिपाकर रखी गई चीख़े
रखकर भूल गई चीख़ें

उसकी चीख़ों में कुछ ऐसा था
कि खोखलें होने लगे मेरे हाथ ,मेरे पाँव
हड्डियों की सुरंगों में
गूँजती रही उसकी चीख़ें

पहली बार वह चीख़ी
पहली बार उसके मुँह से फूटा
एक ज़रूरी शब्द :नहीं
जीवन की पहली लड़ाई लड़ी उसने
जीवन के अंत के ख़िलाफ़

मृत्यु को
पारे की फिसलती बूँद की तरह बेदाग़ पार कर
आई है वापस वह जीवन में आज
बच्चों की तरह ख़ुश होकर दिखाती है सबको
अंकुरों की तरह उग रहे
अपने नन्हें केश
सबसे सुन्दर केश
और एकदम जीवित
कि इनमें भी बहता है उसका ख़ून
मैंने कहा उसे
चारुकेशी।

 

 

(कवि चंदन सिंह 1956 बाँका, बिहार में जन्में पटना विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में एम. ए. विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। कविता संग्रह ‘बारिश के पिंजड़े में’। रोज़ेविच, हर्बत, सेफेरिस, ब्रॉडस्की, आदि की कविताओं का अनुवाद। चन्दन सिंह संगीतकर्मी भी हैं उन्होंने हारमोनियम पर पंडित जसराज, निर्मला अरुण जैसे कई बड़े कलाकारों के साथ संगत भी की है। वर्तमान में वे ए. एन. कॉलेज पटना में अध्यापन कर रहे हैं।टिप्पणीकार आशीष मिश्र दिल्ली विश्वविद्यालय में पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च फेलो हैं और समकालीन कविता आलोचना के क्षेत्र में उभरता हुआ नाम हैं. )

संग्रह- बारिश के पिंजड़े में
कवि- चन्दन सिंह
प्रकाशक- प्रकाशन संस्थान
प्रकाशन वर्ष- 2004

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