गौरव पाण्डेय
चंदन मूलतः युवा चित्रकार हैं और कविताएँ लिखते हैं। चंदन के पास ऐसी भाषा है जो बोलने से ज़्यादा सुनने और ठहरने की मांग करती है। इनकी कविताओं में न तो चमक है और न ही अभी कोई चालाकी है। कवि की दृष्टि मूलतः दृश्य-केंद्रित है, पर दृश्य किसी स्थिर तस्वीर की तरह नहीं हैं । यह चलते, बदलते, फिसलते और खोते हुए दृश्य हैं। इन कविताओं में बार-बार रेखाएँ, घास, नदी, ब्रुश, गेहूँ, पेड़ और रोटी जैसे मूल तत्व आते हैं। ये केवल वस्तुएँ नहीं, बल्कि अनुभवों और परिवेश के छिपे हुए रास्ते हैं जिससे कवि की निर्मिति और उसकी चिंताओं को भी समझा जा सकता है ।
चंदन की संवेदना की सबसे बड़ी खूबी है कि वह ‘बहुत छोटे’ में ‘बहुत बड़ा’ देखते हैं और यह चित्रकार होने के नाते सहज रूप से कर पा रहे हैं । एक खोई हुई ब्रुश से लेकर माँ की चूड़ियों की आवाज़ तक, रोटी के गोल आकार से लेकर घास के डर तक, और नदी के भीतर उतरते दृश्य से लेकर कुत्ते की तरह चाटे जाते घाव तक। चंदन की कविताएँ आत्मकेंद्रित लग सकती हैं लेकिन ये अपने भीतर उतरती हैं ताकि बाहर की दुनिया को नए अर्थ दे सकें। ‘कुत्ता’, ‘माँ को याद करते हुए’ और ‘ब्रुश’ जैसी कविताएँ इस आत्म-यात्रा को गहरा बनाती हैं। कवि अपने भीतर के घाव, डर, असुरक्षा और प्रेम को बिना किसी शर्म के स्वीकार करता है। ‘खोना–ढूँढना’, ‘खोई हुई चीज़ों का पता’ और ‘बोझा’ जैसी कविताओं में एक लय बार-बार लौटती है कि जो खोता है वही हमारे भीतर शब्द बनकर लौटता है। यह समझ एक युवा कवि के लिए दुर्लभ है । नदी, गेहूँ, पेड़, गाँव, छाया, गौरैया, बकरी, ये सब सिर्फ स्मृतियाँ नहीं हैं; यह कवि का मूल-तत्त्व हैं । उसकी जड़ें हैं । इन प्रतीकों के बीच आधुनिक शहर का दबाव, दोस्तों की बेचैनी, नाम छप जाने की लालसा और बड़ा बन जाने का हड़बड़ाया हुआ सपना भी चलता है।
कुल मिलाकर कविताओं में एक उभरते युवा कवि को देखा जा सकता है। एक ऐसा कवि जो चीज़ों को छूकर लिखता है, भाव को दृश्य बनाकर दिखाता है और अपने भीतर की टूटन को कविता के रंग में रंगता है । हम कह सकते हैं कि चंदन उन युवा स्वरों में हैं जो अनुभव को अर्थ नहीं, अनुभव को आकार देने की कोशिश कर रहे हैं; वैसे ही जैसे रेखाएँ बिना शोर किए, किसी आकृति को जन्म देती हैं। जैसे कोई ब्रुश एक रंग को अपने भीतर खींच लेता है ठीक ऐसे ही चंदन दृश्यों को देखते हैं और वहाँ से शब्दों को सहेज ले रहे हैं और कविता रच रहे हैं ।
हम भविष्य में चंदन से और बेहतर कविताओं की उम्मीद कर सकते हैं।
चंदन सिंह की कविताएँ
1.रेखाएँ
रेखाएँ बोलती है
उतनी ही खामोशी से जब हमें नहीं पता चलता
कमरे से जाती धूप का
बनते–बिगड़ते आसमान के बादलों सा
सब कुछ एकददम धीरे से हो रहा होता है
जितने धीमें तुम बोल सकते हो
उससे कहीं अधिक गहरा रेखाएँ सुन सकती हैं
वो सब कुछ जिनको तुम ‘आकार’ देना चाहते हो।
2. खोना-ढूंढना
सुबह कुछ खो जाता है
दोपहर उसको खोजने में बीत जाती है
शाम तक वो मिलती नहीं
अब मैं रात को सो नही पाता हूँ
एक पूरा चौमासा बीत गया मुझे अब नींद नहीं आती है
मैने खुद को समझने में कई हफ़्ते लगाए
और पाया कि
खो जाने पर नींद नहीं आती है
आते हैं
सिर्फ शब्द–वाक्य, रेखा–रंग
जो कागज में उतरकर खो गये कुछ को ढूंढ रहे होते हैं…
3. नदी के अन्दर की घास
‘तुम्हें नदी के अन्दर घास दिख रही है ?’
‘कौन सी ?’
‘वो हरी वाली किनारे में‘
‘मुझे डर लगता है उन्हें देखकर !‘
‘क्या मछलियाँ भी उन्हें देखकर डरती होगीं?’
कुछ पल के लिए मैं वहाँ नहीं था
मुझे लगा जब आपस में बातें खत्म हो जाती हैं
तो हम नदी के नीचे की सीढ़ियां और घास देखने लगते है
उस समय हमारे पास कुछ शेष है तो
सिर्फ एक- दूसरे का होना
मुझे मेरे सारे शब्द नदी में तैरते मिल रहे थे
उसमें से यह था
कि वो शायद यही चाहती थी कि मैं उसके साथ उस वक्त रहूँ
या समय उसके साथ इस वक्त रहें
हर एक चीज
नदी, पानी के अन्दर की सीढ़ियां
सीढ़ी में फिसलती औरत
और तेज तपन से पानी में छलांग लगाते बन्दर की चिक्किया
और उनके डर से सहमा एक बच्चा
इन सबसे सिर्फ कहानियाँ निकल रही थी
जो कविताओं की तरह ठहरी हुए थी
जैसे नदी के अन्दर घास
उसके ऊपर पुल में
मैं और वह ।
मैं इस ठहरे हुए पल को कुर्ते की बगल की जेब में
सम्भाल कर रख लेना चाहता था
… एक कविता के लिए !
जिसे पढ़कर तुम उस दृश्य के
ठहराव को देख सकों
जहाँ
अभी भी सब ठहरा हैं …
नदी में अकेली नाव की तरह ।
4. थोड़ा सा
कि थोडे़ में हम इतना जुड़े हैं
यह थोड़ा छूटा हुआ वह बक्कल है
जो कल उलझ कर गिर गया था चादर में
यह थोड़ा
यादों में आकर होठों से तुम्हारा नाम निकलवाता है
मुझे तुम्हारी याद आती है और मैं खुद को कहीं दूर पाता हूं
यह थोड़ा इतना थोड़ा है
इसमें तुम और मैं एक चादर में आ जाए
दूर-दूर जाने के लिए
पास पास आने के लिए
यह थोड़ा कितना थोड़ा है।
5. खोयी हुई चीजों का पता
ब्रुशो की कोई निशानियाँ नहीं है,
वो खो जाते है
कभी दस तो कभी बारह
इस घटती, बढ़ती संख्याओं में
दो ब्रुश कहीं और पहुंच जाते हैं
खोयी हुई चीजों का पता हमारे पास होता तो
मुझे चीजों के खोने का दु:ख नहीं होता
मैं उन्हें ढूढने की कोशिश भी नहीं करता
एक डायरी के किसी पन्ने को पलटता
जिसमें लिखा हो
अंकित – तीन ब्रुश
अंकुश – दो ब्रुश
पुष्पा – एक ब्रुश
पिता जी कहते थे
जेब में एक डायरी और पेन होना चाहिए
पिता जी की बातें, पिता जी की तरह
बेटो को अकेले छोड़ देती है
और डायरी के पन्ने नाव बनकर
हिसाब बिगाड़ रहे होते है।
6. ब्रुश
कि अब दिन ब दिन अगुलियों पर ब्रुश का वजन बढ़ता जा रहा है,
हाथ हल्का हो रहा है
या बुश भारी हो रहा है
यह कहना कठिन है
कई दोस्त जो किताबों के अक्षरों को अपने शरीर में धसा रहे हैं
यह सोचकर कि उनका नाम किसी पीडीएफ
या कागज के पर्चे पर होगा
वो सिर्फ समाज और अपने परिवार की जिम्मेदारी को गठरी बनाकर पीठ में लादे
मृग मरीचिका की ओर बढ़े चले जा रहे हैं
नदी किनारे बैठा मैं ….ना दिल्ली जाना चाहता हूँ ना मुम्बई की चूमती इमारतों के बीच अपना घोसला बनाने,
अपनी जड़ो की और लौटता हुआ मैं बार -बार
अपने गाँव की ओर जाना चाहता हूँ
जहाँ आसमान के बदलते रंगों को पंक्षी की नजर से देखकर,
काग़ज़ में अपने अन्दर के नीले और हरे की रंगतो को देख सकूँ
यह कहना मुश्किल हैं कि यह लगाया पेड़ फल देगा कि नहीं,
मेरे हिस्से की छाया मुझे मिल सके मेरे लिए इतना काफी है,
जहाँ मुझे ब्रुश हल्का लगे
नदी के बहाव सा
और मैं मछली सा अपनी कला में गोते लगाता रहूँ
अनंत गहराइयों में
अनंत पीड़ा
7. गेहूँ
मैंने जब भी खुले मैदान की ओर देखा
मैने खेत देखे
खेत में लहलहाते हुए हरे गेहूँ देखे
मैं गेहूँ का हरापन देखता रहता था
मैं चाहता था उसके हरे से भूरे होते हर रंग को देखना
आंख बंद करके उन रंगों को छूना
मैं सिर्फ उन रंगों में खुद को खोकर
खोजना चाहता था
हल्का भूरापन
हल्का मटमैला
कही भूरे हुए रंगों को
अपनी आँख के सबसे पास से छूना चाहता था
चाहता था
अपनी आँख से उसके मटमैले रंग को
अपने अचेतन के उन गट्ठरों में रख दू
जहाँ से मेरी चेतना को ऊर्जा मिलती रहे
वो पके हुए गेहूँ
मटमैले गेहूँ
सूरज की गर्मी को चुनौती देते
मिट्टी से जुड़े गेहूँ
उसकी आत्मा की ताप, मैं अपने अन्दर बसाकर
इक्कीस साल से गेहूँ की बाली को भूरा कर रहा हूँ
आज वो हरे से धीरे – धीरे मटमैली हो रही है ।
8. बोझ
बनारस के मैदागिन से उलझते हुए
इलाहाबाद के सेक्टरों पर दायें से बायें जाकर
संगम में डुबकियां लगाकर
बस से यात्रा करना
बढ़ते चले जाने पर जो पीछे छूट रहा है
उसको मैने अभी ही तो देखा था
यह जो छूट चुका है
यह वापस नहीं आ सकता
यात्राएं ऐसी ही है
छूटी हुई चीजों का कहाँ कोई पता मिलता है ?
यायावरी के नुस्खे यह है कि
अपने साथ बोझ कम हो
चिंताओं का भी और पीठ पर भी
सर में बोझ ढोने के लिए सिद्धियाँ चाहिए
जैसे बढ़ती चली जा रही है औरतें
नैनी पुल से…
पीठ से बोझ कम करने के लिए करनी पड़ सकती है बहस
पचास रूपये बचाने के लिए
या नकली टान्सपोर्ट पेपर बनवाने का झमेला
आदमी से ज्यादा बोझा का वजन हो तो
यात्रा आदमी नहीं
बोझा कर रहा होता है
आदमी सिर्फ उसे ढोता हुआ
किसी दुर्घटना से बचता हुआ
धक्के खाते हुए चल रहा होता है
आदमी गौण हो जाता है
चलना एक क्रिया ना होकर
संज्ञा हो जाती है
अपने से अधिक बोझे का मूल्य चुकाता आदमी
धीरे-धीरे बोझा बन जाता है।
9. माँ को याद करते हुए सीखा हुआ एक काम
( माँ के लिए )
रोटी बनाते हुए मेरे कानों में सुनाई देने लगती हैं
चूड़ियों की आवाजें खन.. खन्
खन्न् खन्न खन्…
रोटी बनाते हुए मेरे भीतर की लड़की
बाहर आ जाती है जो पल्लू ओढ़े
रोटी बनाती है
रोटी बनाते हुए मुझे याद आती है अपनी मां
भाभी और चाची
हाथ की किसी उंगली में आ जाती है चाची
और सबसे बड़ी उंगली में मां और
अंगूठे में बुआ
रोटी बनाते हुए भूल जाता हूं अपना पुरुष होना
भूल जाता हूं खुद का छाती उठा
कर चलना
रोटी बनाता हुआ मैं
सिर्फ एक लड़की से संवाद कर रहा होता हूं
जिसकी अभी-अभी शादी हुई है और ससुराल में रोटी बना रही है
रोटी बनाते हुए
मैं अर्धनारीश्वर हो जाता हूं
गोल बनती हुई रोटी में मुझे नजर आता है
मां की तरह वृत्त-सा सरल जीवन
जहाँ एक लड़की गोल रोटी बनाना सीख रही थी
बेख़बर इस बात से की
धरती भी गोल है।
10. कुत्ता
सुबह उठना और
शब्दों को खुरचकर, वाक्यों में मिलाकर
भावों का घोल बनाकर
कविता लिखा जाना –
मौन के रास्ते दु:ख की तरफ भेज देता है
यह अपने पुराने जख्मों और तकलीफों को चाटने जैसा है
एक कुत्ते की तरह
मैं एक कुत्ता होता तो अपनी पीठ में लगे घाव को
हर समय चाटता रहता ।
इन्सान होकर मैं कुत्ते की हरकते करता हूं
सुबह – सुबह
अपने घाव चाटता हूँ और कविताएँ उतारता हूँ
यह उतरती हुयी कविताओं में कुत्ते की बू आती हो
तो समझना मैं धीरे – धीरे पूरी तरह से एक कुत्ता हो चुका हूं
मेरा इंसान होना कहीं दूर पीछे छूट चुका है
शेष सिर्फ – एक कुत्ता
अपने दुम के किनारे लगे घाव को चाटता हुआ
कूँ-कूँ करके समीक्षकों और प्रकाशकों की ओर देखकर
दुम को हिलाता लार चुआते हुए
दोनों पैरों को आगे कर उसमें सर टिकाकर
एकटक शून्य में
अपने आदमी पन को निहारते हुए…
कवि चन्दन सिंह, शोध छात्र (चित्रकला)
महात्मा गाँधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट, सतना ( मध्यप्रदेश)। दृश्य कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 2021 में चित्रकला से स्नातक तथा 2023 में परास्नातक पूर्ण किया।
2023 में यूजीसी- नेट उत्तीर्ण किया। ललित कला काशी द्वारा आयोजित “आवर्त ” समूह दृश्य कला प्रदर्शनी ( चित्रकूट आर्ट फेस्टिवल 2025 ) के समन्वयक। कई समूह प्रदर्शनी में प्रतिभागिता। हिंदी कुछ पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ एवं चित्र प्रकाशित।
सम्पर्क: 95651 45791
टिप्पणीकार कवि गौरव पाण्डेय, सहायक आचार्य हिंदी
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय चित्रकूट
पिन: 210205, मो: 6306813815
प्रकाशन: दो कविता संग्रह । १. धरती भी एक चिड़िया है ( साहित्य अकादमी नवोदय योजना २०२१ ) २. स्मृतियों के बीच घिरी है पृथ्वी ( सेतु प्रकाशन २०२३ )
स्मृतियों के बीच घिरी है पृथ्वी ( सेतु प्रकाशन २०२३ ) के लिए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार २०२४ से सम्मानित
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित । विभिन्न साहित्यिक मंचों से कविता पाठ एवं संवाद ।
Email: pandeygaurav.au@gmail.com
फ़ोन: 6306813815

