समकालीन जनमत
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भगवान स्वरूप कटियार की कविताएँ : जीवन को बचाने के लिए ज़रूरी है प्रेम

कौशल किशोर


‘आज हम सब/हो गए हैं/अपनी-अपनी सरहदों में
जी रहे हैं छोटे-छोटे उपनिवेश
और एक-दूसरे के लिए/पैदा कर रहे हैं
भय, आतंक, दहशत/और गुलामी का डर।
इसलिए परिन्दे, हवा और मौसम
कभी सरहदों में नहीं रहते
वे उन्मुक्त घूमते-फिरते हैं
बगैर पासपोर्ट, वीजा और भय के’
ये काव्य पंक्तियां है भगवान स्वरूप कटियर की कविता ‘अपने अपने उपनिवेश’ की जिसमें मनुष्य द्वारा पैदा किए गये विभाजन और खीची गई सरहदों पर कवि तंज कसता है क्योंकि आज दुनिया की समस्याओं के मूल में यही है।
वह कहता है कि कम से कम इस संदर्भ में उसे परिन्दों, हवा और मौसम से सीख लेनी चाहिए। जो किसी सरहद में नहीं बंधते। कटियार का नया संग्रह इसी नाम से अभी आया है। यह उनका पांचवा संग्रह है। इसके पहले ‘मनुष्य विरोधी समय में’ नाम से उनका संग्रह आया था जिसमें कटियार ने आज के समय के लगातार क्रूर और अमानवीय होते जा रहे पक्ष से रू ब रू हैं। 
भगवान स्वरूप कटियार समकालीन कवियों में ऐसे कवि हैं जो न सिर्फ अतीत से शक्ति पाते हैं बल्कि उन लोगों के साथ उनका भावनात्मक जुड़ाव है और कविता के माध्यम से उन्हें याद करते हैं जिन्होंने समाज, राजनीति और साहित्य की दुनिया में अपना महत्वपूर्ण योगदान किया है। उनके सभी संग्रहों में ऐसी कविताएं बड़ी मात्रा में है।
समाजवादी विचारक रामस्वरूप वर्मा, लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा, दलित छात्र रोहित वेमुला, दिवंगत साहित्यकारों की स्मृति में लिखी ऐसी ही कविताएं हैं।  ये मात्र श्रद्धांजलि नहीं है, बल्कि कविता के माध्यम से उनके व्यक्तित्व को सामने लाने की कोशिश है। रोहित वेमुला को जिन हालातों में आत्महत्या करने को बाध्य किया गया, कटियार ‘टूटना एक तारे का’ कविता में न सिर्फ इसका विरोध करते हैं बल्कि इस ‘संभावनाहीन समय में एक बड़ी संभावना’ के रूप में उसे देखते हैं। वे कहते हैं:
तुम्हारा हम से जुदा होना/आकाश में
किसी सितारे का टूटने जैसा है
जो टूटते-टूटते/ऐसी रौशनी छोड़ जाता है
जिसके उजाले में चीजें/दिखने लगती हैं और साफ
और मुक्ति की राहें/खुलने लगती हैं खुद ब खुद।
कटियार के पास ऐसी कई कविताएं है जो वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य से रू ब रू हैं। रोम के जलने और नीरो के बंशी बजाते हुए मस्त रहने की कथा को आज के संदर्भ से जोड़ती कविता है ‘नीरो की बंशी’।
इसी तरह देश में बढ़ रहे अधिनायकवाद के खतरे तथा सत्ता की बढ़ती भूख को उदघाटित करती कविता है ‘तानाशाह’। हालात ऐसे हैं कि डा. अम्बेडकर हों या शहीद भगत सिंह, प्रेमचंद हों या मुक्तिबोध – मौजूदा सत्ता द्वारा न सिर्फ उनको हड़पा जा रहा है बल्कि उन्हें अनुकूलित किया जा रहा है। इसी को अभिव्यक्त करती कविता है ‘अधिग्रहण’।
कटियार मानते हैं कि यह समय निराशा से भरा है लेकिन हताश हो जाना कोई विकल्प नहीं है। इसलिए वे ‘उदासी का वसन्त’ लिख निराशा में आशा का संचार करते हैं कुछ यूं: ‘कठिन समय है/पर नयी जमीन पर/कुछ नया रचने का/यह बेहतर समय भी है/और सृजन हमेशा/बसन्त के गीत गाता है/भले ही वह उदासी का ही/बसन्त क्यों न हो’।
कटियार की कविता के विविध रंग हैं पर इनमें सबसे चटक रंग है ईमानदारी और प्रेम का। इनकी चर्चा  न की जाय तो इनकी कविता पर बात अधूरी रह जाएगी। ऐसे समय में जब छल, छद्म, धूर्तता व अवसरवाद मूल्य के रूप में स्थापित किया जा रहा हो, ईमानदार होना  किसी बुराई से कम नहीं है। वे कहते हैं: ‘ईमानदार होना उतना ही खतरनाक है/जितना उसका महत्वपूर्ण होना’। यहां ईमानदारी मूल्य है जिसे लड़कर ही हासिल किया जा सकता है। जो इसके पक्ष में हैं उन्हें लड़ना ही होगा और कवि स्वयं इस संघर्ष  में शामिल है। तभी तो वह कहता है: ‘मैं लड़ रहा हूं/वह लड़ाई जिसे/हर ईमानदार आदमी को/जीतना अभी बाकी है।’ कविता और प्रेम इस लड़ाई के हथियार हैं । इनके लिए ‘कविता प्रेमगीत होती है’। ये दोनों ‘जिन्दगी के हथियार’ हैं। यदि जिन्दगी को बचाना है तो कविता और प्रेम दोनों को बचाना होगा। वे कहते हैं:
प्रेम है इसलिए जीवन है…
सोचो प्रेम के बिना जीवन कैसा होता
नीरस…..मुर्दा
जीवन  को बचाने के लिए जरूरी है प्रेम को बचाना
जो विलुप्त होता जा रहा है प्रतिदिन
आपसी रिश्तों और व्यवहार में।  
भगवान स्वरूप कटियार की कविताएँ
1. अपने-अपने उपनिवेश
सरहदें हमें मुक्त नहीं करतीं
बांधती हैं स्वार्थों से
और पैदा करती हैं
भय, आतंक और असुरक्षा
सियासी दांव-पेच
और युद्ध।
पहला….दूसरा…..
और अब तीसरा विश्व  युद्ध
दस्तक दे रहा है हमारी दहलीज पर।
उखड़ने लगी थीं
साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की जड़ें
फ्रांसीसी और अक्टूबर क्रांति के बाद
गुलाम देश व्यग्र हो उठे थे
आजादी के लिए।
पूरी बीसवीं सदी
गुलामी से मुक्ति की सदी थी।
किन्तु आज 
उपभोक्तावाद, बाजारवाद
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जाल
और गुलामी की शक्ल में 
भूमंडलीकरण
मंडरा रहा है हमारे इर्द-गिर्द।
सरहदें जो टूटनी चाहिए थीं
और मजबूत होने लगी हैं।
आज हम सब हो गए हैं
अपनी-अपनी सरहदों में
जी रहे छोटे-छोटे उपनिवेश
और एक-दूसरे के लिए 
पैदा कर रहे हैं
भय, आतंक, दहशत 
और गुलामी का डर।
इसीलिए परिन्दे
हवा और मौसम
कभी सरहदों में नहीं रहते
वे उन्मुक्त घूमते-फिरते रहते हैं
बगैर पासपोर्ट
वीजा और भय के।
2. उद्बोधन
(कामरेड अनिल सिन्हा का अन्तिम आत्म कथ्य)
जहां मेरा इंतजार हो रहा है
वहां मैं पहुंच नहीं पा रहा हूं
दोस्तों की फैली हुई बाहें
और बढ़े हुए हाथ
मेरा इंतजार कर रहे हैं।
मेरी उम्र का पल पल
रेत की तरह गिर रहा है
रेहान मुझे बुला रहा है
ऋतु-अनुराग, निधि-अरशद
शाश्वत, दिव्या, मेरी प्रिय आशा
और मेरे दोस्तों की 
इतनी बड़ी दुनिया
मैं किस-किस के नाम लूं
सब मेरा इंतजार कर रहे हैं
पर मैं पहुंच नहीं पा रहा हूं
मेरी सांसें जवाब दे रही हूं। 
पर याद रखना दोस्तों
मौत, वक्त की अदालत का
आखिरी फैसला नहीं है
जिन्दगी मौत से 
कभी नहीं हारती।
मेरे दोस्त ही 
मेरी ताकत रहे हैं
मैं हमेशा कहता रहा हूँ 
कि दोस्त ही 
मेरी सबसे बड़ी ताकत हैं 
और दोस्ती से बड़ा 
कोई रिश्ता नहीं होता  
और न ही होता है 
दोस्ती से बड़ा कोई धर्म।
मैं तो यहाँ तक कहता हूँ 
कि दोस्ती से बड़ी 
कोई विचारधारा भी नहीं होती 
जैसे चूल्हे में जलती
आग से बड़ी 
कोई रौशनी नहीं होती।
मेरी गुजारिश है
कि उलझे हुए सवालों से
टकराते हुए
एक बेहतर इंसानी दुनिया
बनाने के लिए
मेरी यादों के साथ
संघर्ष का यह कारवां चलता रहे
मंजिल के आखिरी पड़ाव तक।          
3. तानाशाह 
वह जो संसद की 
सबसे ऊँचे गुम्मद पर बैठा 
खेल रहा है कबूतर- कबूतर 
वह जो भर रहा कान हवा के 
जो आ रही है बूचड़खाने की परिक्रमा करके 
वह जो हत्या कर रहा है मधुमक्खियों की 
शहद पाने के लिए 
वह जो हत्या कर रहा है फूलों की
ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए 
वह जो समुद्र को 
अपनी कमर में लपेटे 
आकाश में उड़ती 
तितलियों की हत्या कर रहा है 
वह जो स्वांग करता है 
हमारे भाग्य बिधाता होने का 
वह जो एक मसीहाई अन्दाज में 
पूरी दुनियाँ को करता है संबोधित 
वह कोई और नहीं 
लोकतंत्र के मुखौटे में 
तानाशाह है
एक निरंकुश तानाशाह 
जिसे हर हाल में 
सत्ता चाहिए 
भले ही वह खून में सनी हो 
ताकि वह उससे खेल सके 
एक खिलौने की तरह।
4. प्रेम 
जानते हो उँगलियों के बीच 
खाली जगह क्यों होती है ?
ताकि कोई दूसरा आये 
उसे भर सके।
उंगलियों का कसाव
और उसकी गर्मी ही
वह भाषा है
जिसके जरिए
जिन्दगी करती है संवाद।
विचार और तर्क की रोशनी में
इसका भरा जाना
एक बड़ी लड़ाई की 
अहम शुरुआत है।
5. घर
मनुष्य जब भी होता है उदास
पहुंचना चाहता है अपने घर।
थका, मांदा, पस्त
निढ़ाल होकर
मनुष्य पा लेता है घर में
मां की गोद जैसा सुख।
ईंट, गारे, सीमेंट
और महंगी टाईल्स का 
नाम नहीं है घर।
घर वह जगह है
जहां स्त्रियों के बोल
बच्चों की किलकारियां
और पुरुष के गुनगुनाने की
खुशबू होती है।
जहां होती है
भावनाओं और अपनेपन की
वह उष्मा
जो बर्फ-सी ठण्डी उदासी को
पिघला कर बदल देती है
गुनगुनी हंसी की धूप में
और निराशाओं के कुहासों को
बदल देती है
उम्मीद की रोशनी में। 

6. हीरोशिमा की चीख

हाँ, मैं सूर्योदय के देश का खुशनुमा शहर था कभी
वहां खिलते थे फूल और हंसते थे बच्चे
स्त्री, पुरुष, नौजवान, ब्रध्द वहां रहते थे
और करते थे प्रेम आपस में |

06 अगस्त 1945 को
सुबह ठीक 08 बज कर 15 मिनट पर
इस शहर में यूरेनियम -235 ने
मानव निर्मित सूरज को
पृथ्वी से 500 मीटर ऊपर
जलाता हुआ खड़ा किया |

फिर क्या था
धुंए की लकीरों
और एटमी अँधेरे के समुद्र में
डूब गया मैं और मेरा सौन्दर्य |

इसके बाद बची ध्वस्त इमारतें
टूटे हुए पुल
पत्थर की मूर्तियों की तरह गिरीं लाशें
खामोश सुबह,अविश्वसनीय सन्नाटा
झुलसी हुई चमडियाँ और गहरा अवसाद
जिसे ईश्वर ने नहीं
स्वयं मनुष्य ने रचा था
मेरे विरुध्द |

जंग के सौदागरों
और अमन के मसीहाओ से
हमारी प्रार्थना है की लौटा दो
हमारे पिता,हमारी माताएं, हमारे बुजुर्ग
और खुद मुझे भी
यदि लौटा सकते हो |

 

7. ग्रेटा के आँसू

ग्रेटा, आंसुओं से डबडबाई तुम्हारी आँखों
और गुस्से से लाल मासूम तुम्हारे चेहरे में
पूरी दुनियां के दर्द का
गहरा और ऊंची –ऊंची लहरों वाला समंदर दिखा |
वजूद के निस्तनाबूत होने के ख़तरे के
अहसास के दर्द ने
समय से पहले तुम्हे वयस्क कर दिया |
तुम उम्र से भले ही छोटी (16 साल ) हो
पर सोचती बहुत बड़ा हो
अजूबा,बेढंगा,लीक से हट कर |
तुमने कहा मैं चलती हूँ
नंगे पाँव तपते रेगिस्तान में
आओ मेरे साथ तुम भी चलो
इस धरती को बचाने
जिसके हम सब बच्चे हैं
सभी जीव-जन्तु,पशु-पक्षी
नदियाँ,पहाड़,समन्दर की
सुन्दर कायनात है जहाँ
जिसे मुनाफ़ाखोर लुटेरों ने
अपने जबड़ों में दबोच लिया है |
इस लहू लुहान धरती
उस पर गहरे खून के धब्बों ने
तुम्हें बेचैन किया
दर्द से छटपटाई तुमने
ललकारा लुटेरों को
यह कहते हुए
तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई
हमारे बचपन,हमारे सपने
और हमारी साँसें छीनने की ?
तुम्हारे संवेदनात्मक गुस्से के सामने
दुनियां की सत्ताओं के सर शर्म से झुके थे
और सभी थे मौन गुनहगारों की तरह |
यह तुम्हारी जंग की शुरुआत है
धरती पर चल रही
मारकाट,लूटपाट, तबाही
और दूर तक फैली भूख-प्यास के खिलाफ़ |
तुमने फिर आगाह किया
हम कल को कैसे देख पायेंगे
अगर आज ही खा जायेंगे
सबके हिस्से की रोटियां |
हम कैसा महसूस करेंगे
जब उर्वर जमीन, बंजर होकर
मुंह मोड़ लेगी
हमारे पेट भरने से |
उस जमीन पर
कभी अमन चैन नहीं होता
जहाँ कुछ के पास कुछ ज्यादा
और कुछ के पास बिल्कुल नहीं होता |
जब हम पूछते हैं ऐसा क्यों ?
वे कहते पाँचों उंगलियाँ
बराबर नहीं होती हैं
पर हम कहते हैं
भूमिकाएँ होती हैं पाँचों की बराबर
भले ही छोटी-बड़ी हों |
यह प्रदूषण, बाढ़ या तूफान बने
या सुनामी, सूखा या हैजा
यह लोगों को नहीं
लोगों के मन को मारने वाली
मारण ऋतु है
जिसके भयंकर डर से
मरते-मरते जी रहे हैं हम
अपनी वारी का इन्तजार करते |
हमारे पास जलता हुआ गुस्सा तो है
पर वह एका नहीं
जो प्रचण्ड आग बन कर
सब कुछ खाक करदे दुश्मन का
इस धरती के लुटेरे दुश्मनों का
हमारे बचपन, सपनों
और साँसों के दुश्मनों का |
बचा लो इस धरती को
जो क़ुदरत का
एक ख़ूबसूरत घरौंदा है
यानी हमारा घर, पूरी स्रष्टि का ठिकाना
जहाँ जिंदगियां कुलाचें भरती हैं
हम सबकी की पनाहगाह
हमारी धरती |

 

8. एक ज़ख्मी ख़्वाब
( सन्दर्भ गोधरा नरसंहार 2002 )

आरिफ़,मैं तुम्हें गाँव के उस मोड़ पर मिलूँगा
जहाँ भीड़ ने काकू और उनके टैक्सी ड्राइवर को
ज़िन्दा जला दिया था |
काकू कहते थे
पूरी दुनियां एक गाँव में तब्दील हो रही है
एक ग्लोबल विलेज में
जहाँ नफ़रत के लिए नहीं होगी कोई जगह
और मिट जायेंगी नस्लों की पहचानें
सब लोग बस एक गाँव के बासिन्दे होंगे |
अब्बू ने कहा भी
अकरम मियाँ क्या बहकी बहकी बातें करते हो
पूरी दुनियां एक गाँव
यह एक ख्व़ाब है महज ख्व़ाब
यह भला कैसे मुमकिन है
जहाँ मुल्कों और नस्लों के बीच
तल्खियां पनप रहीं हों
अपने गाँव को ही देखो
पहले जैसे कहाँ रह गये हैं लोग
शादी ब्याह , मरने जीने में
अब कहाँ रह गयीं हैं पहले जैसी नजदीकियां
नफ़रत, दहशतगर्दी और आपसी टकराव के
जबड़ों के बीच हम जिन्दा गोश्त की तरह फंसे हैं |
मगर काकू अपनी ज़िद पर अड़े रहे
आख़िरी दम तक यह कहते हुए
कि ये तल्खियाँ और नफरतें
मेहमान हैं सिर्फ़ चंद दिनों की
जो जल्द ही बदल जायेंगी ख़ूबसूरत रिश्तों में |
आरिफ़, वक़्त ने यह कैसा मज़ाक किया हमारे साथ
नफ़रत से नफ़रत करने वाले हमारे काकू को
नफरत करने वालों के हाँथों क़त्ल होना पड़ा |
आरिफ ,उनके ज़ख्मी ख़्वाब पर
जरूरत है हमारी तुम्हारी मोहब्बत के मरहम की
काकू के पूरी दुनियां को
एक गाँव बनाने के ख्वाब पर
जहाँ नफरत की कोई जगह न हो |
आरिफ़ हम कोशिश करेंगे
हमें अपने काकू की जली हुई कुछ हड्डियाँ मिल जांय
हम तुम सब मिल कर
काकू की हड्डियों को गाँव के कब्रिस्तान में
अब्बू के बाजू में दफ़न करेंगे |
याद रखना आरिफ़
कितनी भी दहशत क्यों न फैल जाय
पर हम नहीं छोड़ेंगे यह गाँव
यह हमारा गाँव
हिन्दू मुस्लिम हम सबका गाँव
हमारी साझी संस्कृति का गाँव
हमारे काकू के ख़्वाब का गाँव
हम इसे कैसे भूल सकते है भला
आरिफ़, मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा
तुम्हारे लन्दन से लौटने का |

 

9. स्पार्टकस

मार-मार कर
अधमरा कर दिया था दंगाइयों ने
उस निहत्थे आदमी को
वह बेबाक ,निडर और बिंदास था
न ऊधव का लेना और न माधव का देना
अपनी दुनियां का बादशाह था
वह निहत्था आदमी |
सच को सच
और झूठ को झूठ कहने में
उसे कोई हिचक नहीं थी
पर यही होना आज है
सबसे बड़ा अपराध
कलबुर्गी ,नरेंद्र दाभोलकर और पान्सारे
सब यही तो थे
गलत को गलत कहना राष्ट्रद्रोह है
आज के इस क्रूर समय के दौर में |
एक आवाज फूटी
उस अधमरे आदमी की चीख से
मैं मर कर भी
नहीं मरूँगा पाखण्डियो
मैं अकेला नहीं हूँ
मैं स्पार्टकस हूँ
गुलाम स्पार्टकस मरता नहीं है
जब तक रहती हैं जिन्दा
गुलामी और अन्याय धरती पर |

 

10. बुरा वक़्त

अच्छे लोगों की बातें
हर समय हो सकती हैं
बुरे वक्त में भी
पर बुरे वक्त की बात करना आसान नहीं
बुरा वक्त और बुरा होजाता है
जब बुनियादी सवालों को सुलझाने
और बुनियादी जरूरतों को
हासिल करने की आजादी न हो
समाज और व्यवस्था को खतरा लगने लगे
जब राष्ट्रवाद, धर्म, विकास आदि
बहस के मुद्दे न होकर
पवित्र अवधारणाए बन जाँय
और असल मक़सद हो जाय स्वार्थ सिध्द |

 

(भारतीय दलित साहित्य एकेडमी के डा0 अम्बेडकर सम्मान से सम्मानित कवि भगवान स्वरूप कटियार (1/2/50)कानपुर जनपद के ग्राम एवं पोस्ट –मिरगँव में एक किसान परिवार में पैदाइश | पिता – शंकर लाल कटियार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, माँ –रामप्यारी देवी | वर्तमान में हज़रतगंज लखनऊ में निवास |
शिक्षा – एम ए अंग्रेजी साहित्य ,एम ए इतिहास,अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में डिप्लोमा,बी एड |.
सहायक निदेशक सूचना उ. प्र. के पद से सेवानिवृत |
प्रकाशन– पांच कविता संग्रह- विद्रोही गीत (1978), जिन्दा क़ौमों का दस्तावेज (1998).हवा का रुख टेढ़ा है(2004),मनुष्य विरोधी समय में (2012),अपने-अपने उपनिवेश(2017) | वैचारिक पुस्तकें -अन्याय की परम्परा के विरुध्द(2015 ),समाजवादी विचारक एवं राजनीतिज्ञ रामस्वरूप वर्मा की जीवनी और उनके समग्र वैचारिक लेखन का तीन खण्डों में संपादन एवं प्रकाशन(2016), जनता का अर्थशास्त्र (2019) आदि लगभग एक दर्जन किताबें प्रकाशित|दैनिकअख़बारों, पत्र पत्रिकाओं में सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर स्तम्भ लेखन |

संपर्क: [email protected]

टिप्पणीकार कौशल किशोर जन संस्कृति मंच के संस्थापकों सदस्यों में से प्रमुख रहे हैं और समकालीन कविता का चर्चित नाम हैं। ‘नई शुरुआत’ और ‘वह औरत नहीं महानद थी’ नाम से उनके दो कविता संग्रह और ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ तथा ‘भगत सिंह और पाश अंधियारे का उजाला’ नाम से उनके दो गद्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।)

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