मनीष कुमार यादव
”जंगल में दूर किसी टहनी पर झूलती बया
अब तक इसी भरोसे पर सहती आयी है
इस विपदा को
कि थोड़ी देर बाद अपने आप थमेगी उसकी काया”
”उनकी आँखों में बेदखली का गुस्सा है बहुत गहरा
लेकिन शत्रु को पहचानने की
कोई तरकीब नहीं है”
”दूर देशों से आये रात के पखेरु
यहीं उतरते हैं पेड़ों पर विश्राम करने
यहीं जीवित है पवित्र अँधेरा
यहीं वो नक्षत्रों को गिनकर अगली यात्रा की दिशा तय करते हैं”
बलराम कांवट की इन कविताओं को पढ़ते हुए अनायास ही विजय शंकर चतुर्वेदी के कविता संग्रह ‘पृथ्वी के लिये तो रुको’ का स्मरण होता है इस अर्थ में भी कि विजय शंकर चतुर्वेदी के बाद पारिस्थितिकी क्षरण पर इतनी सजग और ज़रूरी रचनाओं का लोप रहा है हिंदी साहित्य जगत में।
ऐसे समय में जब पारिस्थितिकी चिंताएँ हिंदी के साहित्यिक विमर्शों में कहीं नहीं हैं तो बलराम कांवट की यह कविताएँ यह आश्वास्ति और उम्मीद जगाती हैं कि देवी प्रसाद मिश्र के शब्दों में ”कवि सिर्फ नैतिक अल्पसंख्यक न रह जाएँ” और साहित्य की चिंताधारा समृद्ध होकर समाज की चिंताधारा बन सके और हम अपनी आने वाली पीढ़ीयों के लिये एक कम क्रूर और अधिक समावेशी दुनिया छोड़ कर जा सकें जिसमें पाशविकता और मनुष्यता बहुत ख़राब अर्थों में एक दूसरे के पर्याय न हों।
बलराम काँवट की कविताओं का वितान एक प्रभावी हस्तक्षेप है। उनकी कविताओं में एक लक्षित धैर्य है जो इस समय व्याप्त मनुष्य की आराजक सामाजिकता से प्रतिवाद करती हैं।
बलराम कांवट की कविताएँ
1. इस घोर सूखे में
कहते हैं कभी किसी को प्यासा नहीं सोना चाहिए
चाहे कितनी ही गहरी
लगी हो आँख
कितना ही आलस भरा हो
तुम्हारी देह में
कितनी ही दूर रखी हो
खाट से मटकी
अगर प्यास बहुत कड़ी है
तो जरूर उठकर जाना ही चाहिए तुम्हें जल के पास
बचपन में जब चाँदनी रातों में लड़ते झगडते
हम भाई बहन छत पर सोते थे
सिरहाने जल से भरा लोटा रखते हुए माँ कहती थी
जब हम गहरी नींद और गहरी प्यास में होते हैं
और मन मरोड़े
अलसाये पड़े रहते हैं
तो अंदर ही अंदर इतने छटपटाने लगते हैं प्राण
कि वे देह से उतरकर
बाहर दुनिया में निकल जाते हैं
जल की खोज में
वे गाँव ही का एक क़िस्सा सुनाती थी
कि कैसे एक बुढ़िया के प्राण जल ढूँढते हुए चले गए
पड़ौस के आँगन में
एक खुले
घड़े के अंदर
तभी उस घर में
कोई उठा
और दो घूँट पानी पीकर
घड़े को ढक आया
इस तरह उसी घड़े में अटके रह गए उस बुढ़िया के प्राण
सुबह देखा तो उसकी साँसें बंद पड़ी थी
सबने मृत समझकर
रोते सुबकते
उसकी काठी बांधी
वे शमशान में
उसे अग्नि देने ही वाले थे
कि वहाँ दूर किसी ने अनजाने ही हटाया घड़े से बर्तन
और इधर
लकड़ियों को हटाती
भड़भड़ाकर
बाहर आई बुढ़िया
इस तरह जलते जलते वापस लौटे उसकी देह तक प्राण
इस घोर सूखे में
प्यास से अधमरा
बैठा हूँ
किसी रीती पड़ी बावड़ी में पाँव लटकाए
और सोचता हूँ
अब अगर जाना ही पड़ा मेरे प्राणों को
तो कितने रेगिस्तानों और बंजर भूमियों को पार करके जाएँगे वे प्यास बुझाने
और जब तक लौटेंगे
अग्नि देकर
घर लौट चुके होंगे ग्रामीण
देह जलकर
राख हो चुकी होगी!
2. नई आँधियाँ
जब भी उठती हैं धरती पर आँधियाँ
दीवार की ओट में
जीवन बैठ जाता है
आकाश में उड़ते पखेरू उतर आते हैं नीचे वृक्षों पर
जंगलों और पहाड़ियों में डोलते जीव
अपनी खोहों में सिमट आते हैं
पेड़ पौधे हाथ पकड़कर देते हैं एक दूसरे को सबसे मुश्किल घड़ी का आसरा
मनुष्य भागकर भेड़ता है
खिड़की दरवाजे
ये आँधियाँ
घरों की ओर लौटती पगडंडियों से
हमारे होने के निशान बुहार जाती हैं
ऐसे घोर अंधड़ों में
किसी की कोई थाह नहीं लगती
सब असहाय से दुबके रहते हैं अपनी शरणगाहों में
और तूफ़ान के थमने की
केवल प्रतीक्षा करते हैं
इस प्रतीक्षा में होता है
गहरा धैर्य
और यह विश्वास कि यह संकट नहीं आ बरपा है पृथ्वी पर सदा के लिए
इसमें अवश्य ही होगी कुछ हानि
कुछ अभागे पक्षी ज़ख़्मी होंगे
कोई पशु बिछड़ जाएगा अपने साथी से
कुछ पेड़ उखड़ जाएँगे
कुछ हार मानकर लेट जाएँगे
लेकिन वे घुटनों पर हाथ रखके वापस खड़े होंगे
यह विश्वास बना रहता है
खोया हुआ साथी पुनः मिलेगा अपने साथी से
यह विश्वास बना रहता है
इस कठिन समय में
जंगल में दूर किसी टहनी पर झूलती बया
अब तक इसी भरोसे पर सहती आई है इस विपदा को
कि थोड़ी देर बाद
अपने आप थमेगी उसकी काया
खेत में देह चिपकाए बैठी टिटिहरी अच्छी तरह जानती है
थोड़ी देर बाद
अपने आप दिखेगा आकाश में चाँद
बबूलों के नीचे खड़े रोजड़े
आश्वस्त हैं कि फिर से विचरेंगे वे इन घाटियों और मैदानों में
पगडंडियाँ जानती हैं
फिर से बनेंगे किसी पनिहारिन के पाँव के निशान उन पर
जैसे हर दुःख का निकल ही आता है कोई ना कोई निवारण
इसका निदान भी मिल ही जाता है
और अंततः एक रोते हुए बच्चे की तरह
सुबकते सुबकते
सबकुछ शांत हो ही जाता है
सबकी साझा स्मृतियाँ अब तक यही कहती आई हैं
और यही होता आया है
लेकिन अब उन स्मृतियों की मृत्यु का समय है
अब यह नई आबोहवा का समय है
अब मुश्किल है जीवित रहना उन्हीं पुरानी आस और उम्मीदों पर
अब नई आँधियों से
आँख मिलाने का समय है
मैं अपनी देखी हुई
सबसे तेज आंधी में अटका हूँ पचवारे के किसी रास्ते में
और एक तिबारे में
उंकड़ू बैठे
आँखें मींचे सोच रहा हूँ
अब इन आँधियों की चाल पहले से कितनी तेज है
इनकी आवाज़ें
कितनी भयावह
ये आँधियाँ आती हैं पहले से बहुत ज़्यादा समय के लिए
और आसानी से लौटने का
नाम नहीं लेती
मैं उस पुराने भरोसे के बारे में सोचता हूँ
जिसके सहारे
हम कैसी कैसी आँधियाँ सह लेते थे
लेकिन क्या होगा
जब नहीं रहेगा यह विश्वास
और लगेगा कि हमारे जीते जी नहीं थमेगी यह तेज बयार
साँझ हुए भी
हम नहीं पहुँचेंगे
अपने द्वार
हमारे आकाश में उठने तक
नहीं बैठेगा
यह धूल का गुबार !
3. गिद्ध
गाँव से आधा कोस दूर
खेतों में
जहाँ हल चलाते थे पिता
स्कूल से लौटकर
मैं सूनी दोपहरियों में उनकी रोटी लेकर जाता था
वहाँ सुनसान रास्ते में एक नाला पड़ता था
नाले के पास
बड़ का पेड़
मृत मवेशियों को
उधर ही घसीटकर आते थे ग्रामीण
उधर ही
कंकालों के चहुँओर
कूदते मंडराते दिखाई देते थे मुझे
गिद्धों के झुंड
मुझे गिद्धों से इतना डर लगता था
कंकालों से
इतना डर लगता था
कि उन्हें देखकर
मैं दूर ही ठिठका खड़ा रहता था आषाढ़ की कड़ी धूप में
और सारी दिशाओं से
किसी साथ आने जाने वाले की
घंटों घंटों
प्रतीक्षा करता था
जब दूर कहीं बैलों को हांकता आता
कोई किसान
अपनी मवेशियों के साथ आता कोई ग्वाला
कोई घास काटने आई स्त्री
पगडंडियों पर दिखाई देती
तो उनकी छांव पकड़कर पार करता था मैं यह रास्ता
और हर बार
तीसरे पहर तक पहुँचती थी
एक भूखे
किसान की रोटियाँ
यह बचपन की बात थी
बचपन अब कहीं नहीं है
जिस पगडंडी पर चलने से
मैं ख़ौफ़ खाता था
अब पक्की सड़क निकली है वहाँ धरती को चीरती
जिस खेत में
पिता हल चलाते थे
वहाँ कितने ही जीवों का घर उजाड़कर
हमने नया घर बनवाया है
वह बड़ का पेड़
जो कभी गिद्धों का घर था
अब भी किसी वृद्ध सा खड़ा है वहीं धूप में अकेला
लेकिन उसकी गोद में
अब कोई गिद्ध नहीं है
अब नहीं है कहीं कोई गिद्ध
यह सोचते हुए
मैं जब जब गुजरता हूँ
इस नए रास्ते से
मुझे पहले से बहुत ज़्यादा डर लगता है!
4. मनहार का फूल
कई बरस पहले
नदी किनारे चलते हुए मैंने तुम्हें एक फूल दिया था
पाँच रंगों वाला
नायाब
चमकीला
बनास की घाटियों में खिला
मनहार का फूल
मैंने कहा भी था
संभालना
यह दिनों दिन धरती से कम होता जा रहा है
आज वह पूरी तरह खत्म हो चुका है मेरी गौरा
उसे ढूँढो !
ढूँढो उसको
कहाँ जाएगा
यहीं कहीं रखा होगा घर में किसी पुस्तक के अंदर छिपाकर तुमने
मत पूछो किस काम आयेगा बस ढूँढो
जैसे काली घटाओं
मेघों फुहारों और पवन पुरवाइयों में फिर से जी उठते हैं
आकाश के नीचे सतरंगी सर्प
यह भी कभी
अनुकूल जल और वायु पाकर खोल सकता है अपनी आँख
सात ना सही
आख़िर पाँच रंग तो इसके भी पास हैं
तो रखेंगे इसे सहेजकर हम
जैसे किसान रखते हैं बरसों बरस घड़ों में बीज
और करेंगे प्रतीक्षा
इसके लिए सही हवाओं सही पानी सही नक्षत्रों की
अगर लौटकर आए कभी धरती के दिन तो शायद इसमें भी लौटें नए प्राण
फूल से बनेंगे फूल
एक बार फिर जी उठेंगी बनास की घाटियाँ
एक बार फिर
कोई रखेगा किसी के मुलायम हाथों में वही
नायाब चमकीला पचरंगा
मनहार का फूल!
मेरी गौरा उसे ढूँढो!
5. इलाक़े में नए पक्षी
इलाक़े में नए पक्षी आए हैं
वे कहाँ किस दिशा से आए हैं किसी को नहीं पता
लेकिन अक्सर ही
खेतों, पेड़ों और बिजली के खंभों पर
गुमसुम बैठे दिखाई देते हैं
वे अनजान पेड़ों, पगडंडियों और आकाश को देखते रहते हैं एकटक
वे अजनबी राहगीरों को
टुकुर टुकुर तकते रहते हैं
क्या ये महज़ पर्यटक हैं
या किसी खोए हुए अपने को ढूँढने आए हैं इतनी दूर परदेस में
यहाँ उन्हें कोई नहीं जानता –
इसलिए खेतों में खड़ी स्त्रियां झाँक रही हैं बहुत अचरज से
किसान और चरवाहे
उनका नाम पूछ रहे हैं
उनकी आँखें बता रही हैं कि वे अपनी मर्जी से नहीं आए
बल्कि निकाला गया है
उनके चेहरों पर अपने उजड़े हुए घरों की उदासी है
पाँखों पर
किसी हमले और लूट के निशान हैं
वे अपने जोड़ों से बिछड़कर आए हैं इस पराए देस में
वे अपने बच्चों को
पीछे छोड़कर आए हैं
उनकी आँखों में भय है यहाँ बसने के विचार को लेकर
यहाँ के पेड़ और पक्षी
उन्हें घुसपैठियों की तरह देख रहे हैं
उनकी आँखों में बेदख़ली का ग़ुस्सा है बहुत गहरा
लेकिन शत्रु को पहचानने की
कोई तरकीब नहीं है
वे अनभिज्ञ हैं प्रतिकार की भाषा से
उनके पास हथियार नहीं
हथियार उठाने वाले हाथ नहीं
उनके पास नहीं हैं ऐसे पैर जो उठ खड़े हों अन्याय के ख़िलाफ़
वे सिर्फ़ उड़ना जानते हैं
और गीत गा सकते हैं
वे अभी गीत नहीं गा रहे
उनके गीतों में विस्थापन जैसे शब्द नहीं
वे केवल सोच रहे हैं
कौन है जिसके पास है तबाही का यह बेजोड़ हुनर
वे अभी तिनके नहीं बीन रहे
शायद उन्हें पता है
यहाँ आकर भी कम नहीं होगी उनकी यह पीड़ा अपार
वे जहाँ से आए हैं वह धरती बर्बाद हो चुकी है
वे जहाँ आए हैं
वह बर्बाद हो रही है
इसी के बीच कर सकते हैं वे अपने होने का चयन
कुछ दिनों बाद उन्हें यहाँ से भी होना होगा बेदख़ल
लेकिन बहुत बलवान है उनका शत्रु
वह पीछे पीछे
पहुँचता रहेगा
उन्हें हांकता हुआ समय के अंतिम छोर तक
और फिर
एक दिन
उजड़ते उजड़ते पहुँच जाएँगे वे धरती के सबसे सुदूर कोने में
जहाँ चयन की सभी राहें समाप्त हो जाएंगी
वहीं देखेंगे
वे अंतिम बार
तारों भरा आकाश
वहीं कहेंगे
धरती को अलविदा!
6. भेड़िए
किसी ने तुम्हें आदमखोर कहा
किसी ने दरिंदा
किसी ने सबसे ख़ूँख़ार अपराधी की तुलना की तुमसे
किसी ने सदी के सबसे भ्रष्ट नेता के साथ लिया तुम्हारा नाम
और कहा –
यह दुनिया इतनी बुरी है समय इतना ख़राब
कि लोग भेड़िए हो गए हैं
व्यवस्था जंगलराज
मेरी प्रजाति के आख्यानों में तुम इसी तरह खलनायक हो
कवियों ने तुम्हें अनिष्ट का पर्याय बताया है
चित्रकारों ने
जब भी उकेरा है तुम्हारा चेहरा
कल्पित दैत्यों से मिलता जुलता खूनी रंग में उकेरा है
मनुष्यों को शायद इसलिए घृणा है तुमसे
कि तुम पालतू नहीं बन पाए
तुम सर्कसों में गुलामों की तरह करतब नहीं दिखाते
हमारे घरों की रखवाली नहीं करते
हालांकि यह सब करते
तब भी तुम्हें बर्दाश्त करना तय नहीं था –
क्योंकि तुम्हारी ही नस्ल से छिटका एक सदस्य
जिसका सारा इतिहास मनुष्य से वफादारी निभाने का इतिहास है
सबसे आम गाली
हमने उसी के नाम पर रखी हुई है
मैं बहुत शर्मिंदा हूँ अपनी प्रजाति के इस व्यवहार पर लेकिन
तुम इनकी एक मत सुनना
सिर्फ़ मेरा यक़ीन करना –
तुम बहुत सुंदर हो
तुम्हारे बच्चे संसार के सभी बच्चों की तरह हैं उतने ही नटखट और प्यारे
तुम्हारे खेल कूद और घुड़ मस्ती है उतनी ही स्नेह भरी – जैसी औरों की
तुम्हारी भूख सबके जैसी
तुम्हारी प्यास सबके जैसी
जब तुम चलते हो नदी किनारे पहाड़ी ढलानों पर
जीवन से लवरेज उछलते कूदते हुए चलते हो
जब तुम दौड़ते हो अपने झुंड के साथ बर्फीले मैदान और रेगिस्तानों में
लगता है चंद्रमाओं का झुंड दौड़ रहा है
तारों भरी अंधेरी रातों में
आकाश की ओर उठने वाली तुम्हारी आवाज़ें – जीवन का संगीत है
तुम्हें साज़िशन अँधेरे का प्रतीक बनाया गया
जबकि तुम भी सुंदर हो, अंधेरा भी
तुम्हें जंगली कहकर अमंगल का पूरक कहा गया
जबकि तुम भी पवित्र हो, जंगल भी
मनुष्यों ने तुम्हारी आँखों को बताया है सबसे ज़्यादा भयावह
जबकि वे बहुत निर्मल हैं
झील और जोहड़ों के जल से डबडब भरी हुई
जो मनुष्य कहता आया है तुम्हें डरावना
वह तुम्हारे लिए सबसे बड़ा डर है
तुम अब इस धरती पर कम होते जा रहे हो
यह सोचकर मेरी छाती फटी जाती है
जैसे कितने ही निर्दोष जीव चले गए पृथ्वी से मनुष्यों के अपशब्द सुनते सुनते –
तुम मत जाना
तुम यहीं रहना
यही धरती बराबर है मेरी तुम्हारी
हम अब भी साथ रह सकते हैं अपने अपने घरों में एक ही हवा में सांस लेते हुए
मुझे फ़िक्र है तुम्हारी
मैं परिवार के प्रति
तुम्हारी क़ुर्बानियों के लिए तुमसे प्रेम करता हूँ
मैं तुम्हारी सामाजिकता के लिए तुमसे प्रेम करता हूँ
मैं तुम्हारी आज़ादी के लिए तुमसे प्रेम करता हूँ
जिस दिन तुम नहीं रहोगे
चंद्रमा एक जगह ठहर जाएगा और रोने लगेगा फूट फूटकर
मैं चंद्रमा की आंखों में
दुःख नहीं देखना चाहता
मैं चाहता हूँ – जब तक रहे आकाश में चंद्रमा
तुम चंद्रमा को देखते हुए इसी तरह टहलते रहो पृथ्वी पर
चंद्रमा –
तुम्हें देखकर चलता रहे।
7. चील की परछाई
मैं और मेरे दोस्त
बचपन में देखते थे चील ही चीलों से भरा आकाश
वे गाँव के ऊपर
हवाओं के पार
बादलों में छुपती निकलती
दूर से
बहुत नन्हीं सी
तैरती दिखाई देती थी
हम अपने बुजुर्गों से सुनते आए थे
कि अगर हो कोई ऐसा तेज दौड़ाक
जो उड़ती हुई चील की
छाँव से
उठा ले मिट्टी
तो धरती पर बेर की तरह झड़कर गिर जाती है चील
और तुम्हारे हाथों में
आई धूल
जादुई तरीके से
एक भरे हुए नोटों के बंडल में बदल जाती है
हम सब किसानों और पशुपालकों के भूखे नंगे बच्चे
पतंग लूटने में बहुत माहिर
भरी दोपहरियों में
खेतों में
गिरते पड़ते कुंचालें मारते
चील की परछाइयों का पीछा किया करते थे
चील होती थी इतनी दूर
और इतनी तेज
कि उनकी परछाइयाँ
घड़ी घड़ी भेष बदलते बादलों की परछाइयों में समा जाती थी
वे कुछ ही क्षणों में
एक खेत से दूसरे खेत
आगे निकल जाती थीं
इस तरह दौड़ते हाँफते
जब हार मानकर पेट पकड़कर हम निढाल हो जाते थे
तो वहीं भैंस चराते
हल जोतते
हमारे बुजुर्ग
हम पर खीं खीं हँसने लगते थे
इन परछाइयों का पीछा करते हुए
मैं कई बार टकराया पेड़ों से
कई बार कुओं और पोखरों में गिरते गिरते बचा
कई बार पहाड़ियों से
लुढ़कते लुढ़कते
मेरे पैरों और आत्मा में जितने भी काँटे गढ़े हैं
इन्हीं नोटों की चाह में गढ़े हैं
उन दिनों
ना तो चील की परछाईं हाथ आई
ना ही नोट
लेकिन अब हम गांव के लड़के अधेड़ होने को हैं
और सबकी जेबों में
थोड़े बहुत नोट तो
रखे ही हैं
अपने काम धामों से छुट्टी पाकर
जब हम किसी तीज त्योहार पर गाँव में मिलते हैं
तो बचपन के दिनों को याद करके
बहुत हँसते हैं
हँसते हँसते जब बात चल निकलती है धरती पर चीलों की
तो एक ख़ाली आकाश
हमारे बीच
आ बैठता है
अब हमारे गाँव के आकाश में चील कहीं नहीं हैं
उन दिनों को याद करते हुए
मैं जब भी अपनी जेबों में हाथ डालकर टटोलता हूँ कोई नया नोट
तो लगता है
जैसे वहाँ मृत चीलों को आत्माएं फड़फड़ाती हों
जैसे उन्हीं चीलों ने
धरती पर दौड़ते नंगे बच्चों पर दया करके
आकाश से गिरकर
ये नोट पहुँचाये हों !
8. सकल बन
सर्दियों की उजली धूप में इतनी दूर तक चमकते हैं सरसों के मैदान
कि मेढ़ों में बँटें खेतों की लकीरें
फूलों से ढक जाती हैं
कहीं कोई बाड़ नहीं दिखती
कोई अन्य फूल पौधा या घास नहीं
सिर्फ़ एक पीला समुद्र है आँखों की कोर कोर तक फैला हुआ
ये फूल सबको भाते हैं
कवि रीझते हैं इन पर
ग्रामीण महिलाएँ अपने गीतों में इन्हें बार बार गाती हैं
बसंत के रागों में
बार बार आता है इनका जिक्र
मुझे भी ये
बुरे नहीं लगते
लेकिन एक शाम
कुएँ की ढाय पर बैठे बैठे
मैंने एक गीत सुना गाँव की किसी गौरी के मुख से
उसके सिर पर पीली लूगड़ी थी
लूगड़ी पर भरोटा
और सरसों के बीच डूबती उभरती
वह गाती हुई जा रही थी
वह अपने गीत में धरती से पूछ रही थी
कि “तेरे माथे पर केवल सरसों के फूल क्यों हैं
क्या ये सदा से इसी तरह फैले हुए थे मनुष्य के अहंकार की तरह
या पहले कुछ और भी था
अगर था तो क्या
और फिर क्या हुआ ऐसा – कि अब जहाँ देखो केवल सरसों का फूल है
अब फूलों के नाम पर
केवल सरसों का फूल हैं”
उसने कई ऐसे पौधों
और ऐसे फूलों के नाम लिए जो अब धरती पर कहीं नहीं थे
उसने कई ऐसे सुखों के नाम लिए जो अब मनुष्य के पास कहीं नहीं हैं
धरती ने उसके गीत का कोई जवाब नहीं दिया
और वह ऐसे ही लौट गई
अनुत्तरित
घरों की ओर लौटती पगडंडी पर
गीत गाती हुई
मैं सोचने लगा कि करीब आठ सौ बरस पहले
जब एक सेना के साथ चलता चलता कवि ख़ुसरो आया था मेरे गाँव के पास
तो क्या उसने यहीं देखी होगी ‘सकल बन सरसों’
क्या उसने
वन को ही कहा था – बन
या खेतों को ही बन कहकर
वह आगे बढ़ गया था
मैंने अपने पुरखों से पूछा
तो वे भी कुछ सदियों पहले तक नहीं जानते थे इस फसल का नाम
उनके पुरखों ने भी
इसे कभी नहीं उगाया
फिर पता नहीं
किसने कब दिया केवल एक ही पौधे को जीवित रहने का अधिकार
हालांकि अब भी इनमें मधुमक्खियाँ डोलती हैं
वे अब भी यहाँ रस बनाती हैं
लेकिन आकाश की ओर देखती हुई वे सोचती जरूर होंगी
पहले का वह रस अब कहाँ गया
पहले के वे रंग
अब कहाँ गए
मैंने पहली बार संदेह किया
इन खिलती हुई सरसों की घाटियों और मैदानों पर
मैंने पहली बार
इन फूलों के वर्चस्व को देखा किसी दूसरी आँख से
मैंने पहली बार समझा
कि यह सरसों का महाविस्तार दूसरे हज़ारों लाखों पौधों और फूलों का मरघट है
मैं पहली बार सरसों के बीच उदास बैठा हूँ !
9. चंबल की आवाज़
चंबल की घाटियों और खेतों में
अकेले भटकते हुए
बुझी आँखों से देखते हुए
साँझ का सूरज
जब भी धरती के दुःखों के बारे में सोचता हूँ
तो लगता है
कितना जटिल है जीवन
होना कितना असहनीय
जैसे किसी चीज का कोई अर्थ नहीं
जैसे सबकुछ
समझ से कोसों दूर है
ऐसे में कभी कभी
मन करता है
कि बस! जहाँ जिस खेत में खड़ा हूँ वहीं उतार दूँ अपनी चप्पलें
और चला जाऊँ उस पगडंडी की ओर
जहाँ आगे पीछे
एक ना एक दिन
सबको जाना है
लेकिन जैसे ही देखता हूँ
इस अनाम दिशा की ओर
सारी दिशाओं से कई आवाज़ें आती हैं बच्चों की तरह दौड़ती हुईं
और उँगली पकड़कर
मुझे थाम लेती हैं
टीलों और खाइयों में खिले
डांग के फूल मुझे मुड़कर देखते हैं
नदी किनारे सरसराते कांस की आवाज़ें
मुझसे कहती हैं
इतना भी मुश्किल नहीं है यह समझना
कि जहाँ जहाँ पहुँचेगा जल
घास और फूल
खिलते रहेंगे पृथ्वी पर
मुझे उस मल्लाह की आवाज़ रोकती है
जो कहता है
नदी पार करना
इतना भी कठिन नहीं
इन बीहड़ों में
दूर से दिखता मुझे मेरा गाँव रोकता है
गाँव में थान पर बैठा देवता रोकता है
थान पर नाचते मोर
और खेलती गिलहरियाँ
रोकती हैं मुझे
मुझे चिरौल की टहनी पर बैठी
फाख्ता रोकती है
जब उसकी आवाज़ घुलती है पास ही भैंस चराती किसी गूजरी के गीत से
तो उसका गीत मुझे रोकता है
जो कहता है
बहुत सुंदर है पृथ्वी पर फाख्ता की आवाज़
इतना सुख बहुत है
यहाँ ठहरने के लिए
होने के लिए
इतना मतलब बहुत है
मुझे वापस अपनी गोद में बुलाती है
यह कलकल बहती
नदी चंबल
यह कहते हुए कि कहाँ जाएगा मुझे अकेला छोड़कर
मैं तो तब से इस दुनिया से अपशब्द सुन रही हूँ जब मैं एक बूँद हुआ करती थी
कितनी तलवारें
कितनी गोलियाँ
फिर भी जीवन को जल देती हुई
टिकी हुई हूँ
अब भी धरती पर
इस तरह आकाश की ओर जाती उस पगडंडी की ओर जाने से
मुझे धरती पर बहती
एक नदी रोकती है!
10. अगले जन्म में
अंतिम बार
जिस वृक्ष के नीचे रोते हुए तुमने कहा था
कि अब अगले जन्म में मिलेंगे हम
मनुष्य नहीं
पक्षी बनकर आयेंगे
इसी धरती पर
वह वृक्ष मेरे देखते ही देखते सूख गया है
उसे देखकर
जब देखता हूँ धरती पर दूसरे वृक्षों
पक्षियों
नदियों, ऋतुओं, हवाओं को
तो लगता है
सबकुछ इसी जन्म में ख़त्म होता जा रहा है
मेरे देखते ही देखते
जब नदियाँ नहीं होंगी
मीठी ऋतुएँ और शीतल बहती हवाएँ नहीं होंगी
तो कैसे होंगे वृक्ष
जब वृक्ष नहीं होंगे तो कैसे होंगे पक्षी
जब धरती ही
नहीं होगी
तो कैसे मिलेंगे हम
अगले जन्म में!
11. कहने की ताकत
आकाश में फैलते धुएँ के नाम पर
मैं उस बुढ़िया से नहीं लड़ सकता
जो काँटों और चप्पलों की लड़ाई लड़कर लाती है बीहड़ से ईंधन
और अपने लिए दो रोटियाँ सेंकती है
पशु अधिकारों के बारे में
कैसे कहूँ मैं उस गड़रिये से कि आजाद करो अपने रेवड़
और बंद करो
जंगल जंगल चलना विचरना
जिसका इस संसार में कोई नहीं
केवल इन भेड़ों और बकरियों के
मैं उस मछुआरे को नहीं पढ़ा सकता जीव हत्या का पाठ
जिसके पास केवल यह नौका है – और केवल जल
मैं खेत पर जाते किसान का बैल नहीं छीन सकता !
मैं जंगल बचाने के लिए नहीं रोक सकता किसी लकड़हारे की साइकिल
मैं जैव विविधता की चिंता में
फूल बेचने जाती स्त्रियों का बाज़ार बंद नहीं करवा सकता
मैं उस मदारी का खेल कैसे रोकूँ
जो ख़ुद ही दुनिया के खेल से बाहर बैठा है
मैं किसी भील से नहीं कहूँगा कि जंगल जलाकर मत उगाओ अन्न
बहुत बढ़िया है वीगनवाद
लेकिन इसके लिए –
मैं एक दलित बच्ची के हाथ से नहीं छीनूँगा दूध की बोतल
जिसे इतिहास में पहली बार मिला है – ऐसा दुर्लभ क्षण
यहाँ बहुत ज़्यादा लोग हैं
जो प्रकृति की इन्हीं नन्हीं कुतरनों के सहारे टिके हुए हैं अब भी पृथ्वी पर
लेकिन इन बेर कुतरते पक्षियों को
मैं उनकी शाख से नहीं उड़ा सकता
जिनसे बहुत कुछ कहना चाहिए
वे संख्या में बहुत कम हैं
वे सिर्फ़ लोग नहीं – देश हैं संस्थायें हैं व्यवस्थाएँ हैं
उन्हीं के पास है
संसार के सारे खेल की रस्सी
वहाँ तक पहुँचने और कहने की ताक़त
शायद मेरे पास ना हो
लेकिन जो भी कहूँगा जैसे भी कहूँगा
यह तय है
उनसे कहूँगा।
12. श्मशान भूमि
प्रायः गाँव और घरों से दूर बीहड़ में होती है श्मशान भूमि
इतनी अशुभ और डरावनी जगह –
कि राख की ढेरों और ठीकरों के बारे में सोचकर ही आत्मा थरथराती है
साधारणतः वहाँ कोई नहीं जाता
किसी की मृत्यु पर ही जाते हैं काठी लेकर ग्रामीण
और जितना जल्दी हो
अग्नि देकर वापस लौट आते हैं शुद्धि के लिए
कुओं और तालाबों की ओर
मनुष्यों के लिए त्याज्य यह भूमि
इतनी मनहूस –
कि उधर से आने वाली हवाएँ भी मृत्यु सरीखी लगती है
उस दिशा में किसान और चरवाहे नहीं जाते
दूब खोदने स्त्रियाँ भी नहीं
अगर सबसे सुंदर पतंग चली जाए उधर हवा में भटकते हुए
तब भी नहीं जाता कोई बच्चा उसके पीछे
वहाँ कोई नहीं जाता
इसलिए कम ही बनती हैं उधर पगडंडियाँ
जहाँ मनुष्य के कदम कम पड़ते हैं –
सबसे अनोखी चीजें बनी रहती है अब भी पृथ्वी पर
अब यही भूमि है
जहाँ पीपल और गूलर खड़े रहते हैं पेड़ होने की पूरी आज़ादी को जीते हुए
जहाँ डबरों में पानी बचा रहता है
अगले साल नई बरखा होने तक
जिन पौधों के लिए यह धरती कब की ज़हर हो चुकी
उनके लिए अब भी बची है वहाँ साफ़ माटी
जो प्रजाति अब लुप्तप्राय है
अब भी खेलते हुए मिल जाते हैं उसके कुछ अंतिम शावक
जो फूल अब कहीं नहीं खिलते
यहाँ टिमकते हैं – चंद्रमा की रोशनी में दिपदिप अकेले
जिन पक्षियों की आवाज़ें कहीं सुनाई नहीं पड़ती
अब भी मिल जाते हैं अर्ध रात्रि में सृष्टि के सबसे सुंदर गीत गाते हुए
दूर देशों से आए रात के पखेरू
यहीं उतरते हैं पेड़ों पर विश्राम करने
यहीं जीवित है पवित्र अंधेरा
यहीं वे नक्षत्रों को गिनकर अगली यात्रा की दिशा तय करते हैं
जहाँ नहीं है मनुष्य – अब भी जीवन बचा हुआ है
जो जगह – मनुष्यों के लिए है काल की तरह शापित
मनुष्यों से इतर सारे जीवन के लिए –
सबसे सुंदर जगह है
कवि बलराम कांवट, गांव टोकसी, गंगापुर सिटी, राजस्थान में जन्म। जयपुर, दिल्ली और पुणे से पढ़ाई की। दिल्ली विश्वविद्यालय से विशाल भारद्वाज की फ़िल्मों पर पीएच.डी। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार के तहत एक उपन्यास ‘मोरीला’ अनुशंसित व प्रकाशित। मुख्यतः पारिस्थितिकी विमर्श से संबंधित लेखन।
संपर्क 7976412030
टिप्पणीकार मनीष कुमार यादव, उम्र 23 वर्ष। हिंदी की नई पीढ़ी से संबद्ध कवि-लेखक-अनुवादक हैं। इनकी कलम अभी नई है। वह इन दिनों राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (लखनऊ) में पढ़ाई कर रहे हैं।
सम्पर्क: 8058607121

