शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
बीती सदी के नवें दसक में उभरी नई पीढ़ी के एक महत्वपूर्ण कवि बलभद्र जनवादी काव्यशैली और लोकभाषिक अस्मिता के साथ हिंदी कविता में बिना किसी हलचल के प्रवेश करते हैं। वे अपने समय की प्रवृत्तियों और साहित्य से अधिक सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित रहे। यह प्रभाव उनके साहित्य के स्वभाव की निर्मिति का आधार है।
उनकी शुरुआती कविताओं में जनवादी किसान-मजदूर आंदोलनों की प्रमुख घटनाएँ स्पष्ट छाप लिए मनुष्योचित आक्रोश के इर्दगिर्द साहित्यिक संवेदना का रूप ग्रहण करती हैं। यह रूप आगे चलकर भाषा में शिल्प और बिंबों के माध्यम से और निखरता है। वे अपने समय के अंधाधुंध पूंजीवादी विकास से उत्पन्न खतरों से लोगों को आगाह करने के लिए कविता को माध्यम बनाते हैं और इस माध्यम को जीवटता की कलात्मक अभिव्यति के रूप में हम देख सकते हैं।
बलभद्र की कविताएँ पढ़ते हुए, मुझे बार-बार ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक का एक संवाद याद आता रहा। जिसमें बहुत महत्वपूर्ण बात कही गई है कि ‘योग्यता एक चौथाई व्यक्तित्व का निर्माण करती है। शेष पूर्ति प्रतिष्ठा द्वारा होती है।’ तो बलभद्र ने प्रतिष्ठा की परवाह नहीं की। इस शेष पूर्ति के अभाव में वह उतने चर्चित नहीं हुए जितना कि होना था। इसके अपने लाभ भी हैं, बहरहाल नुकसान तो हैं ही। नुकसान यह कि योग्यता प्रोत्साहन की निष्क्रियता में अकेली पड़ गई जिसके चलते काव्य लेखन में उत्साह का ह्रास हुआ। फायदा यह कि वे साहित्य की दुनिया में ठेठ देशी जमीन पर स्वभावतः टिके हुए हैं। उन्हें कोई दंभ नहीं। हाँ एक खास बात यह जरूर जिसकी तारीफ़ बहुत जायज़ है कि वे अपनी प्रतिष्ठा को लेकर कुंठित कतई नहीं हैं और यह उनके ज़मीनी अनुभवों और विचारधारा के मेल से संभव हो सका है।
बलभद्र की सबसे बड़ी ताकत यह कि वे पहले अपनी मातृभाषा भोजपुरी के कवि हैं, बाद में हिंदी के। वे भरपूर भोजपुरिया मनई हैं और अपने लोक की सघन अनुभूतियों से जुड़े हुए हैं।
जनवादी मूल्यों और वसूलों को जीने-जगाने वाले कवि बलभद्र के दो कविता संग्रह पिछले वर्षों प्रकाशित हो चुके हैं। पहला संग्रह भोजपुरी कविताओं का ‘कब कहलीं हम’ (2015) और दूसरा ‘समय की ठनक’ (2018) लोकायत प्रकाशन, वाराणसी से प्रकाशित है।
बलभद्र लगातार ढंग से पढ़ने-लिखने वाले रचनाकार हैं। वे जीवन और लेखन को सिर्फ़ अपनी शर्तों पर जीने वाले साहित्यिक नहीं बल्कि सामाजिक सरोकार और मनुष्यता उनकी सबसे बड़ी कसौटी हैं। उनकी रचनाओं और जीवन में भी बाज़ारू चमक कहीं नहीं दिखाई देती। वे ठाठ-बाट से परहेज करते हुए खुरदरी ज़िंदगी की मनुष्यता को तरजीह देने वाले कविता के नागरिक हैं।
उनकी कविताएँ और कविताओं पर लिखे लेख इसके प्रमाण हैं। वे लगातार उन पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं, जो बाज़ार की चकाचौंध से अलग चुपचाप छोटी जगहों से निकलती हैं। वे इस उत्तर-आधनिक समय और समाज में प्रगतिशील और जनवादी मूल्यों पर भरोसा रखने वाले व्यक्ति हैं। हालांकि उत्तर-आधुनिक समय की विसंगतियों और विडंबनाओं से टकराए बिना इस समय सोचना-समझना आसान नहीं। वे इनसे टकराते भी हैं लेकिन उनके अपने स्थापित मूल्य हैं जहाँ से उन्हें सवालों के एक हद तक जवाब मिल जाते हैं।
कविता की आंतरिक सत्ता या ताकत है संवेदना। यह संवेदना जब ज्ञान-सम्मत हो तो आधुनिकता की समवेत प्रवृत्तियाँ कविता में दिखाई देती हैं। इसके साथ ही साथ रचनाकार बहुत कुछ जाने-अनजाने भी कविता में ऐसा लिख जाता है जिससे उसके समय की चेतना और विश्वासों का पता बहुत आगे तक मिलता रहता है।
आजकल वे अपने रोज़मर्रा के जीवन से सूक्ष्म संवेदनाओं को कोमल भाषिकता का चोला पहनाकर कविताओं में ले आते हैं। ‘साँझ का संगीत’ और ‘पट्टीदार पंछी’ दिवाली से पहले और दिवाली से एक दिन बाद की लिखी हुई कविताएँ हैं। आज सांस्कृतिक उत्सवों पर विकृत विकासवाद का ज़हरीला नशा हमारी सभ्यता को लगातार प्रकृति विरोधी बनाता जा रहा है। इस प्रकृति विरोधी पूंजीवादी समाज की संस्कृति का विद्रुप चेहरा बड़ी संवेदनशीलता से कवि चित्रित करता है। ‘साठ पूरने को है’ और ‘पुरानी चिट्ठियाँ’ सिर्फ़ अतीतातुर (Nostalgically) लिखी कविताएँ नहीं हैं, वरन बीते जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता का एक कलात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करती हैं।
कवि कविताओं में पारंपरिक प्रासंगिकताओं का भी मूल्यांकन ज़रूरी समझता है। बलभद्र कविताओं में जीवन के प्रासंगिक और जीवंत मूल्यों के पक्षधर कवि हैं। वे तमाम ऐसे विषय कविता में ले आते हैं जो अब तक कविता में कहीं दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते। यहाँ उनकी तीन भोजपुरी में लिखी कविताएँ भी हैं जहाँ उनका कवि मन जितना सहज है उतना ही सजग।
‘ऊ का जानै’ कविता में बनावटी और दिखावटी संस्कृति का पर्दाफ़ाश कवि ने जिस वर्ग-चेतस विवेक से किया है यही इनका शील कहा जा सकता है। ‘कब कहलीं हम’ कविता बलभद्र की सबसे बेहतरीन कविता है, उन्होंने जिस किसान-मज़दूर जीवन से इन बिंबों को गढ़ा है उन्हें भाषा ने सबसे अधिक दुलारा। भारतीय लोक चेतना की यह बेमिसाल कविता है।
यहाँ बलभद्र की हाल-फ़िलहाल की लिखी कविताएँ हैं एक दो को छोड़कर। इन्हें पढ़ना हमारी सामाजिक चेतना और ज़िम्मेदारी को और जगाना है।
बलभद्र की कविताएँ
1. सांझ का संगीत
यह सांझ का संगीत है
सूर्यास्त के ठीक कुछ ही पहले का
उजाला अभी शेष है
आम के पत्ते हिल रहे हैं बिन हवा
लचीली टहनियां डोल रही हैं
गजब का संगीत है
नहीं है कोई वाद्ययंत्र
ढोल झाल मजीरा
तानपुरा नहीं है कुछ भी
कुछ भी नहीं
पर संगीत है गजब का
खूब मनभावन
असंख्य चहक असंख्य फुदक असंख्य गौरैये
इस डाल से उस डाल
शनैः शनैः गज्झिन होता जा रहा है संगीत
शनैः शनैः पत्तों का कम्पन थिर होता जा रहा है
शनैः शनैः उतरता आ रहा है सांझ का सांवलापन
चहक कम चहक होती जा रही है शनैः शनैः
डूबती जा रही है कहीं किसी ओट में शनैः शनैः
सब कुछ शनैः शनैः
वॉल्यूम संगीत का बढ़ जा रहा है रह-रह
फिर डूबता जा रहा है
डूबता जा रहा है आत्म में कहीं शनैः शनैः
डूबता जा रहा है
लो डूब गया पूरी तरह (दिवाली से पहले)
2. पट्टीदार पंछी
कल की भीषण पटाखेबाजी के बावजूद
शुक्र है कि झुंड के झुंड
गौरैयों का आना और चहचहाना फिर शुरू हो गया है
देखते ही देखते यह आम्रवृक्ष संगीतमय हो उठा है
कुछ ही देर पहले मन में यह आशंका थी
कि शायद आज न आएं ये सब
शायद कभी न आएं
हमलोग परेशान थे, चिंतित थे
किसी अपनों से अपने के कहीं चले जाने पर
जैसे घेरती है उदासी, हमलोग गहरी उदासी में जाए जा रहे थे।
कल के धमाकों ने रात भर परेशान किए रखा इन सबों को
मारे दहशत फड़फड़ाते रहे रह रह
हमलोग भी परेशान रहे देख देख
अपने परेशान इन पट्टीदार पंछियों को
इनकी चहकों के बीचोबीच
अभी भी धमाके हुआ कर रहे हैं रह रह
और हर धमाके पर सेकंड भर एकमुश्त चुप्पी साध ले रही हैं ये
पूरा वृक्ष मौन
ये हमारे ऐसे पट्टीदार पड़ोसी हैं
जिनके आने का हमें इंतजार रहता है
इनके आने में जरा सी देरी से हम परेशान हो उठे आज
हर धमाके पर सोचते हैं कलेजा थामे कि शायद यह आखिरी हो।
सांझ का सांवलापन बढ़ चला है
अमूमन इस वक्त तक बिलकुल शांत हो जाया करती थीं ये
पर आज नहीं
आज की चहक में आशंकाएं हैं, चीख है, दहशत है। (दिवाली के एक दिन बाद)
3. अब साठ पूरने को है
पहली बार लगा कि अब साठ पूरने को है
मां होती तो क्या कहती!
क्या कहते चाचा* गर होते!
बाबूजी* जिन्होंने पढ़ाने-लिखाने की ज्यादा चिंता की
होते तो पता नहीं क्या-क्या कहते!
पहली बार लगा कि अब साठ पूरने को है
गौर किया पत्नी के आधे से अधिक बाल सफेद दिखे
बहुत दुबली-पतली थी जब आई थी
पहली बार लगा कुछ सरकते जा रहा जैसा
पहली बार लगा कि अब साठ पूरने को है
थोड़ा चेतंग हुआ था तो सुनी थी भरबीतन की कथा
अनुमानतः पचास साल हो गए होंगे वह कथा सुने
जिस खपरैल घर में सोती थी मां
उसके दरवाजे पर बचपन में नीम रोपा करता था
कि मां को झुरझुर हवा लगेगी
उस झुरझुर ख्याल के भी अपने उम्र हुए
नहीं कह सकता कितने साल
बाबूजी से कुछ कहना था जो नहीं कह सका उनके रहते
अब कहकर क्या पा लूंगा!
लेकिन जो दिनकर की ‘हिमालय’ कविता है न
‘चक्रवाल’ से जिसे सुनाई थी बाबूजी ने-
‘साकार दिव्य गौरव विराट
पौरुष के पूंजीभूत ज्वाल
मेरी जननी के हिम किरीट
मेरे भारत के दिव्यभाल
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
ऐसे जैसे सुना रहे हों बाबूजी
दुआर पर हुआ करता था नीम का एक खूब घना छतनार पेड़
यह वह महीना है जब नीम में फूल लगते हैं
नई-नई पत्तियों संग नन्हे-नन्हे फूल
जिसकी सफेदी पत्तों से थोड़ी हरीतिमा लिए मारती है झालर
वह किश्तों में कटा जब नया दालान बना
घूमने के नाम पर खेत-बधार घूमना याद है
बाकी तो पढ़ने-लिखने, दवा-दारू और नौकरी-चाकरी की आपाधापी है
साठ साल पूरने को है
बड़े बेटे से कहा तुम आ गए हो कलकत्ता
अच्छा ही हुआ
कलकत्ता थोड़ा घूमने का इरादा है
बहुत पुराना एक राग है कलकता
वहां अपने छोटका बाबा को खोजना है
जो हो गए थे कलकतवा बाबा
उनकी लिखी चिट्ठियों की मार्मिक स्मृतियां हैं
सबसे ऊपर ‘श्री गणेशाय नमः’
फिर काली माई का नाम लेते हुए सबकी खुशहाली की कामना
‘कि जो सुनकर दिल खुश हो!’
अब साठ पूरने को है
मेरे संग बहुत सी चीजों के भी साठ साल पूरने को है
उस ‘घुघुआ माना उपजे धाना’ के भी
जो पूरी होती है
नई भीत के उठने और पुरानी के गिरने की संगत में
* अपने पिता को चाचा कहता था
* बड़े पिता को बाबूजी
4. पुरानी चिट्ठियां
कितनी चीजें खो गईं, नष्ट हो गईं , बिला गईं, उधिया गईं
नहीं रहा उन कितनी चीजों का हिसाब-किताब जो आज मोहक और जरूरी लग रही हैं
जिनका तब कोई मोल नहीं समझ आ रहा था
न वर्षा में गलकर न आंधी में उधियाकर न आग में जलकर
पर नष्ट हो गईं जैसे कि नष्ट होना ही था उनको
वे सारी कापियां जिन पर जिल्द चढ़ाकर जय मां शारदे लिखना नहीं भूला कभी
उनके बदले नहीं ली कभी सोन पापड़ी क्योंकि तब कापियों को बेंचना विद्या को बेंचना समझा जाता था
वे सारी अधूरी कविताएं वे सारी कच्ची कविताएं विचाराधीन कविताएं
संपादकों के स्वीकृति-अस्वीकृति के वे सारे पत्र
गायब हो गए संचकर रखे जाने के बावजूद
गायब होते-होते भी कुछ चीजें लुक-छिपकर जैसे तैसे बच ही जाती हैं
जैसे कुछ चिट्ठियां
पिता के बक्से में पड़े कुछ अंतर्देशीय पत्र
जिसमें पिता के बड़े भाई घर और खेती के हाल चाल लिखने के साथ आशीर्वाद लिखना नहीं भूले
एक छोटे बालक की जूते की फरमाइश बिना फीता बंधे शब्दों में
मैंने भी लिखे थे कई पत्र
कुछ डाक में डाले थे कुछ भेजवाए थे हाथोंहाथ
पर मिले नहीं खो गए हेरा गए गल पच गए काल प्रवाह में
यूं तो घर-परिवार के मामले में बहुत कम मौके मिले पत्र लिखने के
शादी के बाद भी तो हमदोनों ज्यादातर रहे संग-साथ मरते-खपते
फिर भी कुछ चिट्ठियों के लिए तो अवसर निकल ही आते थे यदा-कदा
और वे चिट्ठियां नहीं रखी जाती थीं किसी ताखे पर किसी टेबल पर
पढ़कर झट धर दी जातीं आड़ा- अलोता बिस्तर के नीचे
वैसी जगह जहां किसी के हाथ न पहुंचे
उसी के चलते उनमें बच गईं कुछेक पत्नी के बक्से के निचले तले में
उसकी सुगंधि बक्से में तब से ही रही घुमड़ती
बचाए जाने से ही नहीं बचती बहुत सारी चीजें
बचाए जाने की चाहत ही काफी नहीं होती
नष्ट किए जाने से भी नष्ट नहीं होती बहुत सारी चीजें
बचाने और नष्ट करने से बाहर भी हैं बहुत कुछ
इन चिट्ठियों को पढ़ना उन अनेक प्यारे संबोधनों के साथ होना है
जिन संकोचों के लिए छुपाकर रखी गई थी चिट्ठियां
उन मासूम संकोचों पर एक बार फिर संकोच हो आता है
और शायद यह होता ही रहे
5. एक पूरा जीवन
वह कहां का है ? किस जिला किस राज्य का ?
कोई आज तक नहीं जान पाया
किसी को जानने की जरूरत भी नहीं समझ आई
दस वर्षो से भी अधिक समय से उसे देख रहा हूं
वह पागल तो बिल्कुल नहीं है
उसे पागल तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता !
वह सुबह समझता है
वह सांझ और रात समझता है
उसे मैदान जाने की जरूरत समझ आती है
बोतल में पानी ले वह कहीं भी नहीं बैठ जाता
वह वहीं बैठता है जहां ठीक ठाक लोग बैठते हैं
वह खैनी खाता है और उसे थूक भी देता है
वह नियम से मालिक का दुआर बुहारता है
बुहारन को नियत जगह फेंकता है
गाय के लिए हरा चारा काट ले आता है
कुट्टी काटता है गाय के नाद में कुट्टी डालता है
पानी पिलाता है पानी मिलाता है
गोबर टारता है खेतों में फेंकता है
बोझ ढोता है
प्यास भी उसे लगती है पानी भी पीता है
भूख भी लगती है और काढ़ी गई थाली में जो डाल दिया जाता है
चाव से खाता भी है
कुछ पूछने पर नहीं के बराबर बोलता है
अकेले में कुछ बोलता है जिसे अपने ही सुनता और समझता है
कोई भी नहीं उसके बोलने का मतलब समझ पाता है
न ही वह किसी की बात समझ पाता है
कभी कभी खुद ब खुद हंसता है
और इसी के चलते जो नहीं समझा जाना चाहिए
वह पागल समझ लिया जाता है
किसी को आजतक यह क्यों नहीं समझ आया कि वह अपने समूह से बिछड़ा हुआ एक गरीब लाचार आदमी है
जो अपनी भाषा के सिवा और कोई भाषा न जानता है न समझता है
किसी ने आजतक यह जानने की कोशिश आखिर क्यों नहीं की
कि कौन है? कहां का है ? कि वह भी अपने लोगों और अपने मुल्क के लिए बिसूरता होगा ?
जब सब सो रहे होंगे वह अपनी भाषा में अपनी पुरानी यादों में कहीं कुछ जोह रहा होगा
इतने बड़े गांव में उफ्फ ! कोई नहीं जो उसे उसके लोगों तक पहुंचाने को सोच सके !
उसके पास बैठ उसकी बुदबुदाहटों को सुन सके !
उसकी ध्वनियों और बेचैनियों को समझ सके !
उफ्फ !
वह जिस दरवाजे पर रहता है उसके मालिक के लिए वह बहुत बड़ी सुविधा है
फटे पुराने कपड़े और भर थरिया खाना पर आजकल कहां कोई मिलता है ?
वह भी असालतन, बिना किसी सवाल के, बिना किसी शर्त के
कुछ लोग तो दुआर मालिक की तकदीर को सराहते हैं
दुआर मालिक भी कम खिलाड़ी थोड़े है
कहता है कहां जाता, दो टाइम खाता है और जो बन पड़ता है करता है
उसे कोई देखे तो आसानी से समझ जाए कि बस वह जी रहा है
जाड़े में फटे चिटे निहायत पुराने गंदे कपड़े गांथे दुआर के पत्थर पर पड़े
बस जी रहा है
यह भाषा का जितना मामला है उससे अधिक कहीं मनुष्यता का
ये साफ सुथरे लोग उफ्फ! हैं कितने भद्दे, कितने क्रूर!
वह जो अस्त व्यस्त दिखता है विवश, लाचार
अब शायद ही अपनी भाषा के लोगों के बीच पहुंच पाए कभी?
एक पूरा जीवन एक पूरे गांव में उफ्फ इस कदर !
6. मधुपुर से आई थी
मधुपुर से आई थी वह लड़की अपने भाई का एडमिशन फॉर्म वेरिफाई कराने
फॉर्म सामने रखते ही कहा कि मेरा नहीं भाई का है
मैंने पूछा भाई क्यों नहीं आया?
उसको आना चाहिए था। ऐसे कैसे होगा?
उसका उत्तर बहुत सीधा था कि वह मधुपुर है, नहीं आ पाया
वेरिफाई कर दीजिए सर!
क्यों कर दें?
कक्ष में और कई थे जो इसी काम के लिए खड़े थे
कुछ सकुचाते हुए उसने धीरे से कहा बहुत मजबूरी है सर
कुछ और पूछे बगैर फॉर्म देखने लगा
ठीक ठीक भरा हुआ था
कर दिया साइन
चली गई चुपचाप बगैर थैंक यू सर बोले
घंटा भर बाद वही लड़की दिखी प्राचार्य कक्ष में
बैठे हुए थे कुछ प्राध्यापक
प्रिंसिपल के हाथ में कुछ नोट थमाते हुए कहा कि यह ऑफिस के बरामदे में गिरा हुआ मिला है
कुल सोलह सौ रुपए थे
होगा किसी का, कोई खोज पूछ में आए तो दे दिया जाएगा
किसी ने सुझाया कि बड़ा बाबू के पास रख दिया जाए
अभी यह तय नहीं हो सका था कि पूछते हुए आ गई एक लड़की
तफ्तीश के बाद यह हो गया कि रुपए उसी के हैं
फिर खोज हुई उस लड़की की जिसको ये रुपए मिले थे गिरे हुए और जिसने उसे उठाया था और प्रिंसिपल के पास पहुंचाया था
नहीं गई थी दूर अभी वह, थी बाहर ही
आ गई बुलावे पर बिल्कुल शांत शांत कोई बड़ा या महान कार्य किया है के बोध से बिलकुल बाहर
आ गई, चुप खड़ी हो गई
हमारे बीच से किसी ने कहा – देखो, इसी को मिले थे तुम्हारे रुपए
जाओ, कुछ खिला पिला दो इसे
जो मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा
मैंने उसके चेहरे को देखा
फॉर्म वेरिफाई कराते वक्त न जाने क्यों ऐसा लगा था कि वह जो कह रही है
भाई के न आ पाने की मजबूरी वह बनावटी नहीं थी
वह किसी अमीर अथवा खाते पीते परिवार की तो बिलकुल नहीं थी
लिबास बिलकुल सिंपल था
जहां बिना पैसे का कोई सुनता नहीं किसी का
जहां फोटो खिंचाने की धूम मची है
चुपचाप चली गई वह लड़की संकोच के साथ
किसी के पास नहीं है उसकी फोटो
नहीं है पता
उसकी कोई चर्चा नहीं है
7. दो मासूम और कुत्ते
गिरिडीह के झंडा मैदान में दो मासूम
जिसमें एक ने अब जाकर कायदे से चलना सीखा होगा
और दूसरी उसकी बहन उससे महज दो ढाई साल ही बड़ी होगी
हाथों में पतली लचकदार लकड़ी लिए
तीन-तीन कुत्तों के पीछे दौड़ रहे थे थुलथुल-थुलथुल
और कुत्ते बिना रुके थोड़ा थोड़ा आगे जा रहे थे भागे भागे
वे दोनों कुत्तों को छू लेना चाहते थे
और कुत्ते भी ऐसे भाग रहे थे जैसे रुके तो पिटे!
मां बार बार पकड़ रही थी
और वे बार बार दौड़ रहे थे
मां के छक्के छुड़ा रहे थे
जैसे ही मां दौड़कर पकडती
कुत्ते भी अपनी जगह ठहर जाते जैसे किसी ने बोल दिया हो थम्म!
मां की पकड़ को खारिज करते वे दोनों
कुत्तों को ही देख रहे थे
और कुत्ते भी कुछ कम नहीं थे उनसे
मैदान में कुछ लोग टहल रहे थे
कुछ किनारे बैठे मोबाइल चला रहे थे
कुछ क्रिकेट जमाए हुए थे
और एक मां अपने दो मासूमों के पीछे दौड़ रही थी
वे दोनों कुत्तों के पीछे
और कुत्ते उन पीछा करने वालों से
अब छुआ तब छुआ से थोड़ा ही आगे आगे
सोच रहा था कि थोड़ा और रुक जाऊं
जी भर देख तो लूं यह खेल
पर नहीं, मां ने एक का हाथ पकड़ा, एक को गोद में लिया
और लकड़ी को कुत्तों की तरफ झटकते हुए फेंक दिया
फेंकी गई लकड़ी का कुत्तों पर नहीं दिखा कोई असर
जहां थे वही बैठ गए, लेट गए, दांतों से पूंछ खुजलाने लगे
8. अब शायद ही
अपने गांव अब शायद ही लौट पाऊं
लौटने के लिए महज स्मृतियां ही काफी नहीं होतीं
गांव मैंने खुद ब खुद नहीं छोड़ा
छोड़ना मेरा खुद का फैसला नहीं था
अब तो सत्तर की शहतीरें भी सड़ने लगी हैं
पानी के निकास के रास्ते तक बंद हो गए हैं
हां, सामने जामुन के पेड़ पर पंडुक आज भी बोलते हैं
रेल लाइन बगल से ही गुजरती है
आती जाती ट्रेनों की आवाजें गूंजती रहती हैं कानों में
इन ट्रेनों ने तो जबरी नहीं बैठाया कभी
कि दोष इनके मत्थे मढूं!
जहां जन्म लिया
जिस मिट्टी से दूर होते खूब बिसूरा
लिखी कविताएं
अब शायद ही लौट पाऊं!
9. ऊ का जाने !
1.
हर-फार ऊ का जाने जे कबहूं परिहथ धइलस ना !
भूख के हाल ऊ का जाने जे छूंछा हंड़िया जनलस ना!
गरम रजाई, गुलगुल गद्दा, तोसक-तकिया ऊ का जाने!
दुइ जून पेट भरे खतिरा जे जूठ मलत बा आन घरे
मिलल-मांगल जे पहिरेला, गरब गुमान ऊ का जाने !
2.
पीर के बोध मेटावत बा जे झूठ के सांच बतावत बा
राम-सलाम सुहाये ना, ऊ मेल-मोहब्बत का जाने!
ईंट पुजावे महजिद ढावे, माटी पूज ¹ मति भरमावे
सांच कही से दुश्मन होई , जेल मिली, होई ना बेल
तिनतसिया, रंगहासियार गांधी के मोल ऊ का जाने !
3
नदी-नार, बन-बाग सबतर कोइल, काग, मनई उदास
सोहर फगुआ कजरी बिरहा कतना दो जाने का उदास
दलपिट्ठी के स्वाद अलोपित कथा कहानी गइल हेराय
हउवे जेकर करसाज ई कुल, आंतर के पीर ऊ का जाने!
4
पांच अंगुरी के छापा से घर के देवाल देवता-पित्तर
उतरे अंगना में जोत नया बिहंसे कलसा-ढकना-फुटहा ²
बिरत रात उठे सोहर, पूड़ी- ठेकुआ छनमन- छनमन
ना कुछ शोर ना हरहर पटपट, ना लफड़ा ना ही हुहुकार
धरम के नांव जे वोट बेसाहे , लोकराग ऊ का जाने !
1. ‘मेरी माटी मेरा देश’ के तहत कलश में माटी बटोर आयोजन।
2. रामनमी के अवसर पर सांझ को जो कलश रखा जाता था उसके ढक्कन में फसल कटे सात खेतों से सात फसलों की चुनी हुई बालियां रखी जाती थी। उन बालियों को ही फुटहा कहा जाता था।
10. कब कहलीं हम
कब कहलीं हम
कब कहलीं
कि हमरा खेत में जन * आवे सुग्गा
जोन्हरी-जनेरा के बालियन में जन मारे चोंच
कब कहलीं कि ए गवरइया
धान के पाकल-झुकल बालियन प
फुदुक-फुदुक जन बइठ s
पंडुक, बकुला, नीलकंठ तू लोग
खेत के आरी – कगरी तक जन फटक s
नीलगाय रहर के खेत में जन सुस्ताय
कब कहलीं कि सियार सांझ होखते
जन करे हुआं – हुआं
खूब कइलीं त
खेत से घर ले
भरराह भरपेट बकबकइलीं
खेत में खाड़ कइलीं बिजूखा
अउरी नाहीं त एहनी के
दादी – अठराजी के लगा के गरिअवलीं भरहिंक
खेत में गड़लीं उटुंग मचान
हो – हल्ला कइलीं
अइसन भला हो सकेला
कि केहू खेत के आर धइले जाए
आ ओकरा गोड़ के भिरी से
नन्ही – नन्ही चिरई ना उड़े फुर से
आ ऊ अचकचा के हट ना जाए
एकाध डेग पाछा!
एह चिरइयन के उड़ल
जतना लउके, ना लउके
ओ से बेसी कतहीं सुनाई देला
धरती से लागल उड़ान के संगीत एगो, फुलुकदार
हम त कबो ना कहलीं कि
ए फुदुकजान!
ए कोमलपरान !
खेत में, आरी के जरी
गाय – गोरू के खुरहेठियन में
जन लुका, जन उड s फुर से
धान-पान के सीजन में
डोंड़वन से, चेरन से, घोंघन से
भेंट त पक्का जनिह
बाबा रहलें कि देखत जब रहलें
डोंड़वन के आर-मेड़ प बइठल- सुस्तात
गोड़ आपन धब – धब पीटे ऊ लागें
साइत – वाइत नाहीं , पक्का जानीं
कि रहल ई उनकर एगो आपन इशारा
कि हट जा भाई, हट जा
जाए द, छोड़ द राह
केकड़न प उनका के लाल-पियर होत
देखलीं कतने बार
कि ‘आर-मेड़ में छेद क देलन स ससुरा
बहे लागेला पानी’
बाकी नइखीं देखले कि ऊ ओहनी के ओरिया देवे के
ठनलें कब जिद !
ऊ त कहत रहलें कि ई सब बाड़न स त
जनिह कि खेत बा, खेती बा
जहंवा ई होलें स, जवना बधार में
कंचन बरसेला, कंचन उपजेला
गांव जइसे खाली होत जा रहल बा नवहन से
खेतो-बधार खाली होत जा रहल बा एह जिया-जन्तुअन से
हमनी के चहला, ना चहला के
कहंवा रह गइल बा कवनो माने-मतलब
कवना तरह के विकास के दौर में आ फंसलीं जा
कि सरसों के फूलन से डेराए लगली स तितली
कि जनेरा के बालियन से गायब होखे लागल दाना
केकर हवे ई सराप
कि हमनी के खेतन के
तोपले जा रहल बा बेहिसाब
मल्टीनेशनल घास
कब कहलीं हम
कि आव s, आव s, ए मल्टीनेशनल घास !
ए अमेरिकी खर-पतवार !
आव s , हमरा खेतन के तोप s , पसर s
पछाड़ s हमरा फसलन के
हमरा घासन के पछाड़ s
आव s आ हमरा मुलुक के छाती प जम s
जम s आ राज कर s
कब कहलीं हम !
कब कहलीं !
*(भोजपुरी में जन का प्रयोग ना के अर्थ में भी होता है।)
11. पेड़ आ बकुला
1.
ओहटा से बुझाए
पेड़ के ऊपर
पतइन के हरियरी बीचे
उज्जर-उज्जर फूल
तनिका नगीच से
अरे, ई कुल्ह बकुला हवे !
आहर-पोखर से बहरी
हरियरी के संग
उज्जर के बतकही!
ई मेल -मोहब्बत!
2
बकुलन के पत बात प
पत फड़फड़ प
डेहुंगी-पतई झूम जाला बाँव-दहिन
हो जाला तनी हेठा तनी उठ जाला ऊंचा
डाढ़- पात प जमकल कारिख
चिमनियन के धुंआ के धूर
बकुलन के चेंगुरा में, पाँख में लागे मत
फिकिरे हलकान पेड़-पालो !
बकुलवो के चिंता कि पानी कुल आहर के पोखर के
गड़हा के नदी- नार के
भ गइल करिखाह
कि नान्ह-बार मछरियो के जियल मोहाल
कि डाढ़ आ पतइयो जे बाटे सहारा
बा करिखे तोपाइल
कि धरती के सोता ले जनि पहुंचे कारिख ई
सूखे जनि ई सोता
कि दूनो हलकान
के देवे एह देने कान!
के देवे ध्यान !
कवि बलभद्र, बिहार के भोजपुर जिला के योगीबीर गांव में 07 जुलाई 1964 को जन्म।
हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी से ‘मार्कण्डेय : कथाकार और समीक्षक’ विषय पर शोधकार्य के उपरांत पीएच. डी. उपाधि प्राप्त।
संप्रति, विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग , झारखंड की अंगीभूत इकाई गिरिडीह कॉलेज, गिरिडीह में अध्यापन।
प्रकाशित पुस्तकें:
1. कब कहलीं हम , भोजपुरी कविता संग्रह, लोकायत प्रकाशन, वाराणसी ।
2. समय की ठनक, हिंदी कविता संग्रह, लोकायत प्रकाशन, वाराणसी।
3. समकाल की आवाज श्रृंखला के तहत चयनित कविताएं , न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली।
4. भोजपुरी : साहित्य हाल फिलहाल, आलोचनात्मक पुस्तक, सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली।
5. भोजपुरी साहित्य : देश के देस का, आलोचनात्मक पुस्तक, सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली।
6. झनकि बाजे हो, निबंध संग्रह, सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली।
टिप्पणीकार शैलेन्द्र कुमार शुक्ल, 1986 अवध अंचल के सीतापुर जनपद के साहब नगर गाँव में एक सीमांत किसान परिवार में जन्म वहीं से प्राथमिक शिक्षा और आगे की पढ़ाई-लिखाई लखनऊ, बनारस, हैदराबाद और वर्धा से। ‘बलभद्र प्रसाद दीक्षित पढ़ीस की अवधी कविता में लोक’ एवं ‘अवधी कविता : स्वभाव और प्रवृत्तियाँ (1850-2010)’ विषयों पर शोधकार्य। एक हिंदी कविता संग्रह ‘सावन सुआ उपास’। अवधी की वार्षिक पत्रिका खरखइंचा का 2025 से संपादन।

