समकालीन जनमत
कविता

अवंतिका सिंह की कविता यात्रा संभावनाओं भरी नई सुबह की तलाश में है।

प्रज्ञा गुप्ता


अवंतिका सिंह की कविताएँ सामाजिक यथार्थ एवं उसकी विडंबनाओ का बोध कराती हुई हमसे संवाद करती है। अवंतिका एक ऐसा संसार रचना चाहती हैं जहाँ किसी का अपमान, तिरस्कार, भूख और लाचारी ना हो जहाँ बेरोजगारी, व्यभिचार, बलात्कार न हो। जहाँ मनुष्यता, प्रेम और सद्भाव का बसेरा हो। एक ऐसा संसार जहाँ जीवन की हरियाली हो और संगीत का सुर हमारे जीवन में गूंजे।

अवंतिका सिंह के पास समाज को देखने का एक अपना नज़रिया है एक मानवीय दृष्टिकोण है ‘नियति’ कविता में इसे वह अभिव्यक्त करती हैं। ‘नियति’ कविता सामाजिक विडंबना को प्रकट करती, साधारण से रिक्शे वाले की मेहनत को चित्रित करती ; समाज में उसके पीछे छूट जाने की नियति को मार्मिकता के साथ चित्रित करती है। वर्ग संघर्ष एवं सामाजिक विषमता पर प्रश्न उठाती अवंतिका की कविताएँ मेहनतकश लोगों की स्थिति को उजागर करती हैं-
“गंतव्य तक पहुंचाने का
मोलभाव !
रुपए,दो रुपए,पांच रुपए कम देने की
ज़िद
भारी भरकम सवारी और सामान
हाथ में हैंडल थाम
पैडल पर पैर मारता
तीन पहियों पर
संतुलन साधता
घंटी की टिन टिन में
रफ्तार पकड़
तेजी से आगे निकलता
लेकिन,
सीट पर बैठी सवारी से
बहुत पीछे छूट जाता है
रिक्शेवाला” !!

रिक्शा वाले के बहाने यह कविता पूरे श्रमजीवी समाज के संघर्ष को अभिव्यक्त करती सामाजिक विसंगतियों को दिखाती है। ‘तीन पहियों पर संतुलन साधता’ रिक्शावाला न केवल रिक्शा का संतुलन साधता है बल्कि अपने जीवन का भी संतुलन बनाता है। गरीब व्यक्ति अपनी मेहनत के माध्यम से जीवन भर अपने जीवन को संतुलित करने की कोशिश करता है।

कविता के माध्यम से कवयित्री अवंतिका एक ऐसे आदर्श संसार की कल्पना करती हैं जिसमें कोई पीड़ा, कोई अन्याय न हो कवयित्री प्राकृतिक सुंदरता, मानवता से परिपूर्ण ऐसे देश को देखना चाहती हैं जहाँ धर्मनिरपेक्षता महज़ दिखावा ना हो। ‘यौम -ए -आजादी’ कविता में देखा जा सकता है –
“सब एक दूजे से घुले मिले, बंधन सारे दूर हों। रजिया के घर राधा और ममता के घर मुमताज मिले
पहनावा किसी वर्ग की पहचान नहीं मिक्स और मैच रहे”
अवंतिका के पास स्त्री जीवन को देखने का अपना नजरिया है –
“शरीर टूटता है, मन बिखरता है
खुद से सवालों का सिलसिला चलता है
क्या जीवन का सच दर्दनाक होता है?
जवाब में मैं हूं न! कह दो
तो दर्द कुछ घटता है
यह दास्तान चौथा दिन कहता है”।

‘सृजन के दिन’ कविता स्त्री के जीवन में हर महीने आने वाले 5 दिनों के शारीरिक मानसिक संघर्ष को चित्रित करती हैं ।प्राय: परिवार में माहवारी के दिनों की खीझ और थकान को उपेक्षा की नज़र से देखा जाता है। ऐसे में मन की बेचैनी, थकावट, घबराहट और आश्वासन से मिले सांत्वना की चर्चा एक तरह से नए ढंग की कविता है। यह कविता नारी शरीर की सृजनात्मक, उसके कष्ट को नए नज़रिए से देखने की अपेक्षा रखती है। यह कविता सिर्फ महिला अनुभव की कविता नहीं बल्कि मानवीय संबंधों में सहानुभूति की महत्ता को कोमलता से ज़ाहिर करती है। कवि की कविता यात्रा संभावनाओं भरी नई सुबह की तलाश में है।
अवंतिका की कविता आम मनुष्य के संघर्ष, भूख को मार्मिकता के साथ प्रस्तुत करती है-

जद्दोजहद के बाद मिले नून और रोटी
कुछ लोग खा रहे हैं सनी खून की रोटी
बच्चों को मयस्सर नहीं दो वक्त की रोटी
दाता मेरे तू सबको दे ‘दो जून की रोटी’’।

जब तक सामाजिक विषमताएँ रहेंगी। बच्चों का जीवन बदहाल रहेगा; तब तक सुखी समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। अवंतिका की कविताएँ इस बात को पूरी ताकत से उठाती हैं। आम जीवन, स्त्री जीवन के संघर्ष को सामने लाकर वे और कविताएँ रचें। निश्चित हीं उनकी कविताएँ हिंदी संसार को समृद्ध करेंगी।

 

अवंतिका सिंह की कविताएँ

 

1. नियति

गंतव्य तक पहुंचाने का
मोलभाव!
रुपए,दो रुपए,पांच रुपए कम देने की
ज़िद
भारी भरकम सवारी और सामान
हाथ में हैंडल थाम
पैडल पर पैर मारता
तीन पहियों पर
संतुलन साधता
घंटी की टिन टिन में
रफ्तार पकड़
तेजी से आगे निकलता
लेकिन,
सीट पर बैठी सवारी से
बहुत पीछे छूट जाता है
रिक्शेवाला!!

2. यौम-ए-आज़ादी

सोचती हूं कि लिखी जाए अब ऐसी कविता
जिसमे न हो किसी राजतांत्रिक व्यवस्था का जिक्र

न लिखा जाए अपमान,तिरस्कार,भूख,लाचारी, निर्वासन, बदला, बेरोजगारी,व्यभिचार और बलात्कार को।

और न ही लिखा जाए चाटुकारिता में झूठी मान मर्यादा से भरी पंक्तियां।

लिखा जाए सिर्फ़ बच्चे की तोतली बोली, मोहक मुस्कान और निश्चल प्रेम को।

लिखा जाए नदी की स्वच्छ धारा, हरे भरे पहाड़, सुगंधित हवा, पंछियों का कलरव और हिरणों के चौकड़ी भरते झुण्ड और उनकी निर्भीकता को।

लिखा जाए सिर्फ़ और सिर्फ़ मनुष्य की मनुष्यता, प्रेम, सद्भाव और एकता को। लिखा जाए एक इंसान को दूजे इंसान का प्रतिबिंब मानकर।

नज़र जहां तक जाए वहां सुंदर सुगंधित फूल ही फूल खिलें दिखाई दें। हरियाली ही हरियाली हो। संगीत के नए सुर कान में मिश्री घोल दें।

सब एकदूजे में घुले मिले, बंधन सारे दूर हों!
रज़िया के घर राधा और ममता के घर मुमताज़ मिलें।
पहनावा किसी वर्ग की पहचान नही मिक्स और मैच रहे।

सभी कुछ तानावरहित!
संभव है क्या?..बिल्कुल संभव है। ज़रा ठान कर तो देखो!
लिखो अब ऐसी ही दिवास्वप्न सी प्रेम कविताएं!!

3. सृजन के दिन

उठती गिरती लहरों की चुभन
देह में लगातार है
बेचैनी घबराहट सब साथ है
मैं हूँ न! बस इतना कह दो
आए सुकून और प्यार है
अभी तो पहले दिन की शुरुआत है।

थकान लिपटती है, चैन न पाए हैं
ख्वाब आंखों में, निंदिया न आए है
दर्द से बातें, आंसुओं की जुबानी में
मैं हूँ न कि आवाज, सुन थोड़ी रवानी है
अब दूसरे दिन की बारी है।

करवट बदलते, दिन लगता भारी है,
कदम न उठते, हर साँस में दुश्वारी है
न दिल को सुकून, दिमाग को न राहत है
“मैं हूँ न,” सुनने की चाहत है
आज तो तीसरे दिन की आमद है ।

शरीर टूटता है, मन बिखरता है,
खुद से सवालों का सिलसिला चलता है
क्या जीवन का सच दर्दनाक होता है
जवाब में मैं हूँ न! कह दो
तो दर्द कुछ घटता है
यह दास्तान चौथा दिन कहता है।

अंत की ओर बढ़ता, यह मुश्किल सफर है
दर्द विदा लेता, हल्का सा मन है
राहत की साँसें, आज़ादी का मतलब
“मैं हूँ न,” के जादू का होता असर है
सब्र का अंजाम यह पांचवां दिन है
हर माह के मुश्किल ये पांच दिन हैं!!

4. दो जून की रोटी!!

खेतों में किसानों की मेहनत से है उपजी
हर बाली में अन्न का दाना लिए फिरती
चक्की पे जब पिसता है सोने सा वो दाना
तब भूख मिटाती मां के हाथ की रोटी।

गोल बनाकर लगे है चांद सी रोटी
आंच और तवे पर सिके प्यार से रोटी
पकने की जबरदस्त महक आए किचन से
ज़ोरों से लगे भूख, याद आए है रोटी।

तरकारी के संग और मजेदार है रोटी
चटनी ओ दाल संग लाजबाव है रोटी
कुछ को नसीब प्याज संग शाम की रोटी
हर आदमी की भूख मिटाती है ये रोटी।

रोटी के निवाले खिलाती थी जब अम्मा
कहती थी बड़े प्यार से खाया करो बिटिया
न जाने कल क्या हो,किसे कब है ये पता
दुनिया में सारे ऐब कराती है ये रोटी।

जद्दोजहद के बाद मिले नून और रोटी
कुछ लोग खा रहे हैं सनी खून की रोटी
बच्चों को मयस्सर नहीं दो वक्त की रोटी
दाता मेरे तू सबको दे दो जून की रोटी!!

5.

जंग होती कभी प्यार को पाने के लिए
तो होती कभी रोटी के निवाले खाने के लिए
देखी है लड़ाईयाँ गांव, शहर, गली और कूचों में
और देखी हैं स्वयं के अस्तित्व को बचाते हुए।

कभी होती है जंग अपने वर्चस्व को लेकर
तो कभी लड़ते हैं पढ़े लिखे सभ्य लोग
कुछ बचकानी हरकतों पर
गहरी जंग तो होती है खुद से खुद की भी।

असली जंग तो होती है फकत जंग के बाद
जब पिता का साया,मां का दुलार,बहन भाई का प्यार,
मांग का सिंदूर,पायल की झंकार सब खो जाते हैं
इंसानियत और इंसानों के साथ सारे जज़्बात मर जाते हैं।

सब गुम हो जाते हैं बम,बारूद और गोली की आवाजों में
रह जाता है बस घोर सन्नाटा घर में
जिसे नहीं समझ पाता है एक बच्चा
जो बैठा है दीवार से सटकर और सोचता है
कि कसूर उसका क्या है,इस जंग में?

 


कवयित्री डॉ अवंतिका सिंह, हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा पर शोध। आकाशवाणी लखनऊ, रामपुर,बरेली से अनके लेख, कहानी और कविताओं का प्रसारण। लंबे अरसे से पत्र पत्रिकाओं में कहानी,कविता, लेख और समीक्षाओं का प्रकाशन।
बागवानी, संगीत और सामाजिक कार्यों में रुचि।
पुरस्कार – अंतरराष्ट्रीय तथागत विशिष्ट साहित्य सम्मान 2022

2008 में कानपुर विश्वविद्यालय से पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की।
समय समय पर विभिन्न परा स्नातक कॉलेजों में अध्यापन।
प्रयाग संगीत समिति से तबले में विशारद की डिग्री प्राप्त की।
आकाशवाणी के साथ दूरदर्शन से कविताओं का पाठ और प्रसारण।

सम्पर्क: पता – शाद्वल, 54, दयाल फोर्ट, विष्णुपुरी 3
अलीगंज, लखनऊ। मोबाइल नंबर: 7985117919

ईमेल: singhavafemale9@gmail.com

 

टिप्पणीकार प्रज्ञा गुप्ता का जन्म सिमडेगा जिले के सुदूर गांव ‘केरसई’ में 4 फरवरी 1984 को हुआ। प्रज्ञा गुप्ता की आरंभिक शिक्षा – दीक्षा गांव से ही हुई। उच्च शिक्षा रांची में प्राप्त की । 2000 ई.में इंटर। रांची विमेंस कॉलेज ,रांची से 2003 ई. में हिंदी ‘ प्रतिष्ठा’ में स्नातक। 2005 ई. में रांची विश्वविद्यालय रांची से हिंदी में स्नातकोत्तर की डिग्री। गोल्ड मेडलिस्ट। 2013 ई. में रांची विश्वविद्यालय से पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2008 में रांची विमेंस कॉलेज के हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति ।

संप्रति “ समय ,समाज एवं संस्कृति के संदर्भ में झारखंड का हिंदी कथा- साहित्य” विषय पर लेखन-कार्य।

, विभिन्न पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित एवं विभिन्न पुस्तकों एवं पत्र- पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित।
• प्रकाशित पुस्तक- “ नागार्जुन के काव्य में प्रेम और प्रकृति”
• संपादित पुस्तक- “साहित्य, समाज, योग और विज्ञान”, “झारखंड का हिंदी कथा-साहित्य”
• संप्रति- स्नातकोत्तर हिंदी विभाग ,राँची वीमेंस कॉलेज ,राँची में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत।
ई-मेल-prajnagupta2019@gmail.com
मो.-8809405914

 

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